परिचय – यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है?
Class 10 Science Chapter 14 Sources of Energy के NCERT Solutions आपको इस पेज पर सरल हिंदी में, किताब के क्रम से मिलेंगे। Class 10 Science Chapter 14 Sources of Energy यानी ऊर्जा के स्रोत — यह अध्याय किसी प्रयोगशाला की कहानी नहीं है, यह तो हमारी पूरी ज़िंदगी की कहानी है। सुबह आँख खुलते ही जो चीज़ सबसे पहले काम आती है, वही है — ऊर्जा!
ज़रा सोचिए — माँ रसोई में गैस जलाती हैं, यानी ऊर्जा। आप साइकिल या बस से स्कूल जाते हैं, पेट्रोल-डीज़ल जलता है, यानी ऊर्जा। मोबाइल चार्ज होता है, पंखा चलता है, बल्ब जलता है, खेत में मोटर से पानी निकलता है — हर जगह ऊर्जा ही ऊर्जा है। सच तो यह है कि जैसे-जैसे हमारी आवश्यकताएँ बढ़ी हैं, ऊर्जा की हमारी भूख भी बढ़ती गई है। खाना पकाने की साधारण-सी आग से शुरू हुआ सफ़र आज बिजलीघरों, मोटरगाड़ियों और कारखानों तक पहुँच गया है।
पर इस कहानी का एक दूसरा पहलू भी है। जिस कोयले और पेट्रोल पर हमारी दुनिया टिकी है, वे एक दिन खत्म हो जाएँगे और उन्हें जलाने से निकलने वाला धुआँ हमारी हवा, हमारी वर्षा और हमारी धरती को नुकसान पहुँचा रहा है। इसीलिए इस अध्याय में हम एक-एक करके हर स्रोत को तौलेंगे — कौन-सा स्रोत अच्छा है, कौन-सा टिकाऊ है, कौन-सा प्रदूषण करता है और भविष्य की ऊर्जा हमें कहाँ से मिलेगी — सूर्य से, पवन से, पानी से, गोबर-गैस से या परमाणु से?
Bihar Board (BSEB) Class 10 की परीक्षा में इस अध्याय से हर साल प्रश्न आते हैं — स्रोतों के वर्गीकरण पर वस्तुनिष्ठ (MCQ) प्रश्न, सौर कुकर व बायोगैस संयंत्र की संरचना पर लघु उत्तरीय प्रश्न और जीवाश्म ईंधन की हानियों व स्रोतों की तुलना पर दीर्घ उत्तरीय प्रश्न। अच्छी बात यह है कि इस अध्याय में न कोई लंबा समीकरण है, न कोई कठिन गणना — बस समझ, तुलना और रोज़ के उदाहरण हैं। जो विद्यार्थी तर्क से पढ़ेगा, वह पूरे अंक लाएगा।
📌 खास बात: इस अध्याय की तैयारी का सबसे आसान तरीका है — हर स्रोत को चार कसौटियों पर परखिए: (1) ऊर्जा कितनी मिलती है? (2) मिलेगा कितने समय तक? (3) प्रदूषण कितना? (4) कीमत व सुविधा कितनी? यही चार कसौटियाँ Board के लगभग हर प्रश्न का उत्तर हैं।
📋 अध्याय की जानकारी (Chapter Information)
| Board | Bihar Board (BSEB) |
|---|---|
| Textbook | NCERT |
| Class | 10 |
| Subject | Science (विज्ञान) |
| Chapter | 14 |
| Chapter Name | Sources of Energy (ऊर्जा के स्रोत) |
| कुल हल किए गए प्रश्न | 24 (InText 14 + प्रश्नावली 10) |
📚 इस Chapter में क्या-क्या है? (Topics)
- 14.1 ऊर्जा का उत्तम स्रोत क्या है? – अच्छे स्रोत व अच्छे ईंधन के गुण, ऊष्मीय मान, हमारी ऊर्जा-आवश्यकताओं का बढ़ना
- 14.2 परंपरागत ऊर्जा स्रोत
- 14.2.1 जीवाश्म ईंधन – कोयला व पेट्रोलियम, लाभ-हानि, प्रदूषण की रोकथाम
- 14.2.2 तापीय विद्युत संयंत्र – कोयले से बिजली कैसे बनती है?
- 14.2.3 जल विद्युत संयंत्र – बाँध, लाभ व सामाजिक-पर्यावरणीय समस्याएँ
- 14.2.4 परंपरागत स्रोतों के उपयोग में सुधार – उन्नत चूल्हा, चारकोल व बायोगैस संयंत्र
- 14.3 वैकल्पिक अथवा नवीन ऊर्जा स्रोत
- 14.3.1 सौर ऊर्जा – सौर कुकर, सौर जल ऊष्मक व सौर सेल पैनल
- 14.3.2 समुद्र से ऊर्जा – ज्वारीय ऊर्जा, तरंग ऊर्जा व सागरीय तापीय ऊर्जा (OTEC)
- 14.3.3 भूतापीय ऊर्जा – गर्म स्थल (hot spots) व उष्ण झरने
- 14.3.4 नाभिकीय ऊर्जा – विखंडन, लाभ व गंभीर जोखिम
- पवन ऊर्जा व बायोमास – पवन चक्की व wind farm, गोबर-गैस व बायोमास की भूमिका
- 14.4 पर्यावरणीय परिणाम – क्या कोई स्रोत पूरी तरह प्रदूषण-मुक्त हो सकता है? हाइड्रोजन बनाम CNG
- 14.5 कोई ऊर्जा स्रोत हमारे लिए कब तक बना रहेगा? – नवीकरणीय बनाम अनवीकरणीय, समाप्य बनाम असमाप्य स्रोत
- पाठ्य-पुस्तक के प्रश्न (InText) – 14 प्रश्न, NCERT क्रियाकलाप-आधारित उदाहरण, प्रश्नावली के 10 प्रश्न
- Case Study, Quick Revision, Common Mistakes, Bihar Board Exam Tips, MCQ Quiz व FAQ
📊 Key Concepts – मुख्य परिभाषाएँ व नियम
| पद / नियम | अर्थ (एक लाइन में) |
|---|---|
| ऊर्जा का अच्छा स्रोत | जो प्रति इकाई आयतन या द्रव्यमान से अधिक कार्य करे, आसानी से उपलब्ध हो, भंडारण व परिवहन में आसान हो और मितव्ययी (सस्ता) हो। |
| ईंधन (Fuel) | वह पदार्थ जिसे जलाने (दहन) से ऊष्मा के रूप में ऊर्जा प्राप्त होती है — जैसे लकड़ी, कोयला, LPG। |
| ऊष्मीय मान (Calorific Value) | किसी ईंधन के 1 किलोग्राम के पूर्ण दहन से प्राप्त ऊष्मा-ऊर्जा की मात्रा; इकाई — किलोजूल प्रति किलोग्राम (kJ/kg)। |
| जीवाश्म ईंधन (Fossil Fuels) | लाखों-करोड़ों वर्ष पहले दबे जैविक पदार्थों से बने ईंधन — कोयला, पेट्रोलियम व प्राकृतिक गैस। |
| परंपरागत स्रोत (Conventional Sources) | जो स्रोत लंबे समय से उपयोग में हैं — जीवाश्म ईंधन, जल ऊर्जा, बायोमास व पवन ऊर्जा। |
| नवीन / गैर-परंपरागत स्रोत | जिनका उपयोग नई तकनीक से हाल में बढ़ा है — सौर ऊर्जा, सागरीय ऊर्जा, भूतापीय ऊर्जा व नाभिकीय ऊर्जा। |
| नवीकरणीय स्रोत (Renewable) | जो स्रोत प्रकृति में निरंतर बनते रहते हैं और उपयोग से खत्म नहीं होते — सूर्य, पवन, जल, बायोमास। |
| अनवीकरणीय स्रोत (Non-renewable) | जिनके भंडार सीमित हैं और बनने में लाखों वर्ष लगते हैं — एक बार खत्म हुए तो फिर नहीं मिलेंगे, जैसे कोयला व पेट्रोलियम। |
| बायोमास (Biomass) | पौधों व जंतुओं से प्राप्त जैव पदार्थ — लकड़ी, फ़सल-अवशेष, गोबर आदि, जिनसे ऊर्जा मिलती है। |
| बायोगैस (Biogas) | गोबर आदि जैव पदार्थों के अवायवीय (ऑक्सीजन-रहित) अपघटन से बनी गैस, जिसका मुख्य घटक मीथेन (लगभग 75% तक) है। |
| सौर सेल (Solar Cell) | सौर ऊर्जा को सीधे विद्युत ऊर्जा में बदलने वाली युक्ति, जो सामान्यतः सिलिकॉन से बनती है। |
| भूतापीय ऊर्जा (Geothermal Energy) | पृथ्वी के भीतर की ऊष्मा से प्राप्त ऊर्जा — गर्म स्थलों पर भाप बनाकर बिजली उत्पन्न की जाती है। |
| नाभिकीय विखंडन (Nuclear Fission) | भारी नाभिक (जैसे यूरेनियम-235) का हल्के नाभिकों में टूटना, जिसमें अपार ऊर्जा निकलती है। |
सबसे काम की बात: इस अध्याय की हर तुलना एक ही प्रश्न पर टिकती है — “ऊर्जा तो सब देते हैं, पर कीमत क्या चुकानी पड़ती है?” कीमत का अर्थ है — भंडार कितना बचेगा, प्रदूषण कितना होगा और सुविधा कितनी मिलेगी। यह सोच अपना लीजिए, तोड़े-मरोड़े प्रश्न भी आसान लगेंगे।
ऊर्जा का उत्तम स्रोत – अच्छा स्रोत, अच्छा ईंधन कैसे पहचानें?
सबसे पहले एक सीधा-सा प्रश्न — हमें ऊर्जा चाहिए ही क्यों? उत्तर है: कार्य करने के लिए। खाना पकाना, पानी खींचना, गाड़ी चलाना, कारखाना चलाना — हर कार्य में ऊर्जा खर्च होती है। इसलिए विज्ञान की भाषा में ऊर्जा के स्रोत की अच्छाई इसी से नापी जाती है कि वह कितना कार्य कर सकता है।
हमारी ऊर्जा-आवश्यकता समय के साथ कैसे बढ़ी, यह भी समझना ज़रूरी है। पुराने समय में मनुष्य केवल अपनी मांसपेशियों की शक्ति और जानवरों की शक्ति पर निर्भर था। फिर आग की खोज हुई और लकड़ी ऊष्मा का मुख्य स्रोत बनी। औद्योगिक क्रांति के बाद कोयले ने भाप-इंजन चलाए और पेट्रोलियम ने मोटरगाड़ियों का युग ला दिया। आज हमारी जीवन-शैली ऐसी हो गई है कि बिना विद्युत के एक दिन भी कठिन लगता है। जनसंख्या बढ़ी, उद्योग बढ़े, यातायात बढ़ा — और ऊर्जा की माँग आसमान छूने लगी।
अच्छे ऊर्जा स्रोत के गुण
NCERT के अनुसार ऊर्जा का उत्तम (अच्छा) स्रोत वह होगा, जो:
- प्रति इकाई आयतन या द्रव्यमान से अधिक कार्य करे — अर्थात कम मात्रा में अधिक ऊर्जा दे।
- आसानी से उपलब्ध हो — जब चाहिए, तब मिल जाए; खोजने न भटकना पड़े।
- भंडारण व परिवहन में आसान हो — घर या कारखाने तक सुरक्षित पहुँचाया जा सके और रखना भी सरल हो।
- मितव्ययी हो — सस्ता हो, ताकि हर व्यक्ति उसका उपयोग कर सके।
इन चार गुणों के साथ व्यवहार में दो बातें और जुड़ जाती हैं — स्रोत उपयोग में सुरक्षित हो और उससे पर्यावरण को कम-से-कम हानि हो। इसीलिए आधुनिक समय में स्रोत चुनते समय प्रदूषण को भी एक बड़ी कसौटी माना जाता है।
अच्छा ईंधन (Good Fuel) किसे कहेंगे?
ईंधन वह पदार्थ है जिसे जलाने से हमें ऊष्मा मिलती है। हर ईंधन अच्छा नहीं होता — धुआँ उगलने वाली गीली लकड़ी और साफ़ जलने वाली LPG में ज़मीन-आसमान का अंतर है! अच्छा ईंधन वह है:
- जिसका ऊष्मीय मान अधिक हो — कम ईंधन जले, ऊष्मा अधिक मिले।
- जो उचित (मध्यम) दर से, नियंत्रित रूप में जले — न बहुत तेज़, न बहुत धीमा।
- जो जलने पर धुआँ या हानिकारक गैसें न छोड़े अथवा बहुत कम छोड़े।
- जिसका प्रज्वलन ताप (ignition temperature) उचित हो — सामान्य ताप पर स्वयं आग न पकड़ ले (खतरनाक), परंतु ज़रूरत पर आसानी से जल भी जाए।
- जो सस्ता, आसानी से उपलब्ध और भंडारण-परिवहन में सुविधाजनक हो।
- जो जलने के बाद अधिक राख या अवशेष न छोड़े।
ऊष्मीय मान का अर्थ: किसी ईंधन के 1 kg द्रव्यमान के पूर्ण दहन से जितनी ऊष्मा-ऊर्जा प्राप्त होती है, वही उसका ऊष्मीय मान है और इसे kJ/kg में व्यक्त करते हैं। ऊष्मीय मान जितना अधिक, ईंधन उतना ही अच्छा माना जाता है।
अब एक मज़ेदार जाँच कीजिए — खाना पकाने के लिए आप किस ईंधन को चुनेंगे? लकड़ी सस्ती है, पर धुआँ करती है, ऊष्मीय मान कम है और राख छोड़ती है। LPG महँगी है, पर ऊष्मीय मान अधिक है, धुआँ नहीं करती, राख नहीं छोड़ती और बटन दबाते ही जलती-बुझती है। इसीलिए आज शहरों से लेकर गाँवों तक LPG अच्छे ईंधन की पहली पसंद है। (यही NCERT के InText प्रश्न 3 का सार है — आगे हल में विस्तार से पढ़ेंगे।)
📌 याद रखें: “अच्छा स्रोत” और “अच्छा ईंधन” के उत्तरों में घबराइए मत — स्रोत के लिए चार गुण (अधिक कार्य, सुलभ, आसान भंडारण-परिवहन, मितव्ययी) और ईंधन के लिए ऊष्मीय मान को पहला बिंदु बनाइए। Board इन्हीं बिंदुओं पर अंक देता है।
एक साँस में समझें — अच्छा स्रोत वह, जो कम मात्रा में अधिक ऊर्जा दे, आसानी से मिले, रखना-ले जाना आसान हो और जेब के अनुकूल हो; अच्छा ईंधन इसके साथ उच्च ऊष्मीय मान वाला व साफ़ जलने वाला भी हो।
स्रोतों का वर्गीकरण – परंपरागत, नवीन, नवीकरणीय व समाप्य
ऊर्जा के स्रोतों को समझने के लिए उन्हें बाँटकर देखना सबसे आसान तरीका है। NCERT में दो तरह के वर्गीकरण महत्वपूर्ण हैं:
1. उपयोग की परंपरा के आधार पर
परंपरागत स्रोत (Conventional Sources): जो स्रोत बहुत लंबे समय से मनुष्य के उपयोग में हैं — जीवाश्म ईंधन (कोयला, पेट्रोलियम), बायोमास, बहता जल और पवन। इनकी तकनीक पुरानी और परखी हुई है।
नवीन अथवा गैर-परंपरागत स्रोत (Non-conventional Sources): जिनका बड़े पैमाने पर उपयोग नई तकनीकों के कारण हाल के वर्षों में संभव हुआ है — सौर ऊर्जा, सागरीय ऊर्जा, भूतापीय ऊर्जा और नाभिकीय ऊर्जा। सूर्य तो हमेशा से था, पर सौर सेल जैसी युक्ति नई है — इसलिए सौर ऊर्जा नवीन स्रोतों में गिनी जाती है।
2. पुनः पूर्ति के आधार पर – नवीकरणीय व अनवीकरणीय
नवीकरणीय (Renewable) स्रोत: जो प्रकृति में निरंतर बनते या मिलते रहते हैं और हमारे उपयोग से समाप्त नहीं होते — सूर्य का प्रकाश, पवन, बहता जल, बायोमास। इन्हें असमाप्य (inexhaustible) भी कहा जाता है, क्योंकि इनका भंडार हमारी आवश्यकता की तुलना में लगभग असीमित है।
अनवीकरणीय (Non-renewable) स्रोत: जिनके भंडार पृथ्वी पर सीमित हैं और जिन्हें बनने में लाखों वर्ष लगते हैं — कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस और नाभिकीय ईंधन (यूरेनियम)। इन्हें समाप्य (exhaustible) कहा जाता है — जिस दर से हम इन्हें खर्च कर रहे हैं, ये जल्द ही समाप्त हो सकते हैं।
📌 ध्यान दें: “नवीकरणीय–अनवीकरणीय” और “असमाप्य–समाप्य” — ये दो जोड़ियाँ वस्तुतः एक ही बात कहती हैं। नवीकरणीय = असमाप्य, अनवीकरणीय = समाप्य। Exercise का प्रश्न 7 ठीक इसी पर है, आगे हल अवश्य पढ़ें।
एक साँस में समझें — पुराने समय से चले आ रहे स्रोत परंपरागत हैं, नई तकनीक वाले नवीन; जो फिर-फिर बनते रहें वे नवीकरणीय-असमाप्य हैं और जो खत्म हो सकते हैं वे अनवीकरणीय-समाप्य।
जीवाश्म ईंधन – कोयला व पेट्रोलियम की कहानी
लाखों वर्ष पहले की बात है। पृथ्वी पर घने जंगल थे और समुद्रों में असंख्य जीव थे। भूकंप, बाढ़ और भूगर्भीय परिवर्तनों से ये पेड़-पौधे और जीव मिट्टी व चट्टानों के नीचे दबते चले गए। ऊपर की परतों के भारी दबाव और पृथ्वी के भीतर की गर्मी ने, ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में, इन्हें धीरे-धीरे बदल दिया — पौधों के अवशेष कोयला बन गए और समुद्री जीवों के अवशेषों से पेट्रोलियम व प्राकृतिक गैस बनी। क्योंकि ये ईंधन प्राचीन जीवों (जीवाश्मों) से बने हैं, इन्हें जीवाश्म ईंधन कहते हैं।
कोयला आज भी विश्व की विद्युत का एक बहुत बड़ा आधार है और उद्योगों में ईंधन के रूप में उपयोग होता है। पेट्रोलियम को परिष्कृत (refine) करके पेट्रोल, डीज़ल, मिट्टी का तेल (केरोसिन), LPG जैसे कई उपयोगी उत्पाद मिलते हैं, जिनसे हमारी गाड़ियाँ चलती हैं और रसोई जलती है। प्राकृतिक गैस एक अपेक्षाकृत साफ़ जीवाश्म ईंधन है, जिसका संपीडित रूप CNG वाहनों में बहुत उपयोग होने लगा है।
जीवाश्म ईंधनों के लाभ
- इनका ऊष्मीय मान अधिक है — कम मात्रा में अधिक ऊर्जा मिलती है।
- इनकी तकनीक पुरानी और परिपक्व है — बिजलीघर, इंजन और कारखाने इन्हीं के अनुरूप बने हैं।
- इन्हें किसी भी समय उपयोग किया जा सकता है — दिन हो या रात, धूप हो या बादल, ईंधन उपलब्ध है तो ऊर्जा उपलब्ध है।
- इनका भंडारण और परिवहन अपेक्षाकृत आसान है — टैंकर, पाइपलाइन और रेल से ये दूर-दूर तक पहुँचाए जाते हैं।
जीवाश्म ईंधनों की हानियाँ – इस अध्याय का सबसे पूछा जाने वाला भाग
1. ये समाप्य हैं: इनके भंडार सीमित हैं। बनने में इन्हें लाखों वर्ष लगे, पर हम इन्हें जिस तेज़ी से खर्च कर रहे हैं, उससे ये भंडार शीघ्र समाप्त हो सकते हैं। आने वाली पीढ़ियों के लिए कुछ बचेगा भी या नहीं — यह एक गंभीर प्रश्न है।
2. वायु प्रदूषण: कोयला व पेट्रोलियम के जलने से धुआँ और अनेक हानिकारक गैसें निकलती हैं। इनसे साँस की बीमारियाँ बढ़ती हैं और नगरों की हवा ज़हरीली होती जाती है।
3. अम्ल वर्षा (Acid Rain): जीवाश्म ईंधनों के दहन से कार्बन, नाइट्रोजन और सल्फ़र के अम्लीय ऑक्साइड (जैसे SO2, NO2) निकलते हैं। ये वर्षा के जल में घुलकर अम्ल वर्षा कराते हैं, जो हमारी मृदा (मिट्टी) और जल-संसाधनों को नुकसान पहुँचाती है, फ़सलों व जलीय जीवों को हानि करती है और इमारतों को भी क्षति पहुँचाती है। (दूसरे अध्याय में आप पढ़ चुके हैं कि अम्ल वर्षा का pH 5.6 से कम होता है।)
4. वैश्विक तापन (Global Warming): दहन से निकली कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) ग्रीनहाउस प्रभाव को बढ़ाती है। इससे पृथ्वी का औसत ताप धीरे-धीरे बढ़ रहा है — इसी को वैश्विक तापन कहते हैं। इसके परिणामस्वरूप मौसम का ढंग बिगड़ता है, ग्लेशियर पिघलते हैं और समुद्र-तल बढ़ने का खतरा पैदा होता है।
प्रदूषण कुछ कम कैसे हो?
NCERT यह भी बताता है कि जब तक हम जीवाश्म ईंधनों पर निर्भर हैं, तब तक कुछ उपायों से इनसे होने वाला प्रदूषण कुछ सीमा तक रोका जा सकता है:
- दहन की दक्षता बढ़ाकर — ऐसी युक्तियाँ बनाएँ, जिनमें ईंधन का पूर्ण दहन हो और कम ईंधन में अधिक ऊर्जा मिले।
- कारखानों की चिमनियों में ऐसे यंत्र (फ़िल्टर/अवक्षेपक) लगाएँ, जो धुएँ के हानिकारक कणों व गैसों को हवा में जाने से पहले रोक लें।
- वाहनों में बेहतर इंजन तकनीक और साफ़ ईंधन (जैसे CNG) का उपयोग करें।
- सबसे स्थायी उपाय — धीरे-धीरे वैकल्पिक व नवीकरणीय स्रोतों की ओर बढ़ें।
📌 याद रखें: जीवाश्म ईंधन की तीनों बड़ी हानियाँ क्रम से लिखिए — (1) सीमित भंडार / समाप्य, (2) वायु प्रदूषण व अम्ल वर्षा, (3) CO2 से ग्रीनहाउस प्रभाव व वैश्विक तापन। यही क्रम InText और Exercise दोनों में काम आएगा।
एक साँस में समझें — जीवाश्म ईंधन सुविधाजनक और शक्तिशाली हैं, पर वे खत्म होने वाले हैं और उनका धुआँ अम्ल वर्षा व वैश्विक तापन का कारण है।
तापीय विद्युत संयंत्र – कोयले से बिजली कैसे बनती है?
हमारे देश की विद्युत का एक बहुत बड़ा भाग तापीय विद्युत संयंत्रों (Thermal Power Plants) से आता है। इनकी कार्यविधि आश्चर्यजनक रूप से सरल है:
चरण 1: संयंत्र में बड़ी मात्रा में जीवाश्म ईंधन (कोयला, तेल या गैस) जलाया जाता है।
चरण 2: इससे निकली ऊष्मा से जल को उबालकर उच्च दाब की भाप बनाई जाती है।
चरण 3: यह भाप तेज़ी से टरबाइन को घुमाती है।
चरण 4: टरबाइन से जुड़ा जनित्र (generator) घूमकर विद्युत ऊर्जा उत्पन्न करता है।
ऊर्जा रूपांतरण का क्रम: ईंधन की रासायनिक ऊर्जा → ऊष्मीय ऊर्जा (भाप) → गतिज ऊर्जा (टरबाइन) → विद्युत ऊर्जा।
तापीय संयंत्र सामान्यतः कोयला या तेल क्षेत्रों के निकट ही बनाए जाते हैं। कारण बड़ा तर्कपूर्ण है — विद्युत को तारों द्वारा दूर तक पहुँचाना, भारी कोयले को उतनी ही दूर ढोने की अपेक्षा अधिक आसान और सस्ता है। अर्थात ईंधन को वहीं जलाओ, जहाँ वह मिलता है और बिजली को तारों से हर जगह भेज दो।
तापीय संयंत्रों की कमज़ोरी भी वही है जो जीवाश्म ईंधनों की है — ये ईंधन जलाते हैं, इसलिए वायु प्रदूषण व CO2 उत्सर्जन इनके साथ जुड़ा है और ईंधन खत्म होने पर ये भी बंद हो जाएँगे।
एक साँस में समझें — तापीय संयंत्र में ईंधन → भाप → टरबाइन → जनित्र → बिजली; और ये कोयला-क्षेत्रों के पास इसलिए बनते हैं, क्योंकि बिजली पहुँचाना कोयला ढोने से सस्ता है।
जल विद्युत – ऊँचाई से गिरते पानी की ताकत
बहते हुए या ऊँचाई से गिरते हुए पानी में अपार ऊर्जा छिपी होती है। जल विद्युत संयंत्रों में यही ऊर्जा बिजली में बदली जाती है:
चरण 1: नदी पर ऊँचा बाँध (dam) बनाकर पीछे विशाल जलाशय में पानी जमा किया जाता है। ऊँचाई पर जमा पानी में स्थितिज ऊर्जा होती है।
चरण 2: जलाशय का पानी बड़ी ऊँचाई से पाइपों द्वारा छोड़ा जाता है — गिरते समय स्थितिज ऊर्जा गतिज ऊर्जा में बदल जाती है।
चरण 3: तेज़ गिरता पानी बाँध के तल के पास लगे टरबाइन को घुमाता है।
चरण 4: टरबाइन से जुड़ा जनित्र विद्युत उत्पन्न करता है।
ऊर्जा रूपांतरण का क्रम: जल की स्थितिज ऊर्जा → गतिज ऊर्जा → विद्युत ऊर्जा। भारत की कुल विद्युत का लगभग एक-चौथाई भाग जल विद्युत संयंत्रों से आता रहा है।
जल विद्युत के लाभ
- यह नवीकरणीय स्रोत है — वर्षा से नदियों में पानी फिर भर जाता है, बाँध का पानी “खत्म” नहीं होता।
- बिजली बनाते समय न धुआँ, न कोई हानिकारक गैस — कोई वायु प्रदूषण नहीं।
- बाँध से सिंचाई के लिए भी पानी मिलता है और बाढ़ नियंत्रण में भी मदद मिलती है।
- एक बार बाँध बन जाने पर विद्युत उत्पादन की लागत अपेक्षाकृत कम होती है।
बाँधों की समस्याएँ – NCERT ईमानदारी से गिनाता है
1. पारिस्थितिक क्षति: बाँध बनने से बहुत बड़ा भू-भाग जलमग्न हो जाता है। विशाल पारिस्थितिक तंत्र (ecosystem) नष्ट हो जाता है — वन डूब जाते हैं, वन्य जीवों का आवास खत्म हो जाता है और डूबी हुई वनस्पति सड़कर मीथेन जैसी गैस भी बनाती है।
2. सामाजिक समस्या: जलमग्न क्षेत्र में रहने वाले लोगों को अपना घर-गाँव छोड़ना पड़ता है। उनका विस्थापन और उचित पुनर्वास एक बड़ी मानवीय समस्या है। यही कारण है कि कुछ प्रसिद्ध बाँध परियोजनाओं का स्थानीय जनता ने कड़ा विरोध किया — जैसे गंगा नदी पर टिहरी बाँध और नर्मदा नदी पर सरदार सरोवर बाँध।
3. सीमित स्थान: बाँध केवल वहीं बन सकते हैं जहाँ उपयुक्त भू-भाग — पहाड़ी घाटी और पर्याप्त जल वाली नदी — उपलब्ध हो। हर जगह जल विद्युत संभव नहीं है।
📌 याद रखें: जल विद्युत “स्वच्छ” अवश्य है, पर “समस्या-रहित” नहीं। Board के प्रश्नों में लाभ के साथ बाँधों की सामाजिक व पर्यावरणीय कीमत लिखने पर ही पूरा उत्तर माना जाता है।
एक साँस में समझें — बाँध के ऊँचे पानी की स्थितिज ऊर्जा टरबाइन घुमाकर बिजली देती है; लाभ है स्वच्छ व नवीकरणीय ऊर्जा, कीमत है डूबते वन, बिगड़ता पारिस्थितिक तंत्र और लोगों का विस्थापन।
बायोमास व बायोगैस – गाँव की अपनी ऊर्जा
जब से मनुष्य ने आग जलाना सीखा है, बायोमास उसका साथी है। पौधों और जंतुओं से मिले पदार्थ — लकड़ी, फ़सल के अवशेष (पुआल, खोई), गोबर के कंडे — बायोमास कहलाते हैं। इनमें संचित ऊर्जा सच में सूर्य की ही ऊर्जा है, क्योंकि पौधे प्रकाश-संश्लेषण से सूर्य की ऊर्जा को अपने भीतर जमा करते हैं और जानवर उन्हीं पौधों को खाकर बढ़ते हैं।
परंपरागत चूल्हे में लकड़ी-कंडे जलाने की कुछ बड़ी कमियाँ हैं — आग की ऊष्मा का बहुत बड़ा भाग चारों ओर व्यर्थ चला जाता है (दक्षता बहुत कम होती है), अधजले ईंधन से घर में धुआँ भरता है जो विशेषकर खाना बनाने वालों के स्वास्थ्य को नुकसान पहुँचाता है, और ईंधन के लिए पेड़ काटने से वन भी घटते हैं। इन्हीं कमियों को दूर करने के दो सुधार NCERT बताता है:
(क) उन्नत चूल्हा व चारकोल: ईंधन के उपयोग की बेहतर तकनीक — जैसे धुआँ-रहित उन्नत चूल्हे। लकड़ी को हवा की अनुपस्थिति में जलाने से चारकोल (लकड़ी का कोयला) मिलता है, जो लकड़ी की तुलना में बेहतर ईंधन है — इसका ऊष्मीय मान अधिक होता है और यह अपेक्षाकृत कम धुएँ के साथ जलता है।
(ख) बायोगैस संयंत्र: यह बायोमास के उपयोग का सबसे बुद्धिमान तरीका है, क्योंकि इसमें गोबर को जलाया नहीं जाता, बल्कि उससे गैस “बनाई” जाती है। विवरण नीचे देखिए।
बायोगैस (गोबर-गैस) संयंत्र की संरचना – नामांकित वर्णन
बायोगैस संयंत्र के मुख्य भाग तीन हैं:
1. मिश्रण टैंक (Mixing Tank): संयंत्र के ऊपरी भाग में बना यह टैंक वह जगह है, जहाँ गोबर और पानी को बराबर मात्रा में मिलाकर गारा (slurry) तैयार किया जाता है। यह गारा एक पाइप द्वारा नीचे पाचक में भेजा जाता है।
2. पाचक (Digester): यह एक बड़ा, बंद (ढका हुआ) कक्ष — प्रायः ईंटों का बना गुम्बदाकार टैंक — होता है, जिसमें ऑक्सीजन नहीं होती। इसमें उपस्थित सूक्ष्मजीव (अवायवीय जीवाणु) गोबर के जटिल पदार्थों का अपघटन (पाचन) करते हैं। इस प्रक्रिया में कई दिन लगते हैं और मीथेन, कार्बन डाइऑक्साइड, हाइड्रोजन व हाइड्रोजन सल्फ़ाइड जैसी गैसों का मिश्रण बनता है। बनी गैस पाचक के ऊपरी भाग में जमा होती जाती है।
3. गैस टंकी (Gas Tank): पाचक के ऊपर बनी गैस-टंकी में गैस इकट्ठी होती है, जहाँ से एक निकास-पाइप द्वारा वह रसोई के चूल्हों तक पहुँचती है। खर्च हुआ गारा दूसरी ओर से अधिशेष टैंक (outlet) में निकलता रहता है।
बायोगैस की पहचान: बायोगैस एक उत्तम ईंधन है, क्योंकि इसमें 75% तक मीथेन होती है। यह धुएँ के बिना जलती है, राख नहीं छोड़ती और इसका ऊष्मीय मान अधिक होता है। बची हुई घोल (खर्च हुआ गारा) नाइट्रोजन व फ़ॉस्फ़ोरस से भरपूर उत्तम खाद होती है।
बायोगैस के लाभ – एक तीर, कई निशाने
- गोबर का साफ़-सुथरा उपयोग — कंडे जलाने के धुएँ से मुक्ति।
- जलने पर धुआँ नहीं, ऊष्मीय मान अधिक — रसोई के लिए बढ़िया गैस।
- बचा हुआ गारा खेत के लिए उत्तम जैविक खाद — अर्थात ऊर्जा के साथ खेती का लाभ भी।
- गोबर व अपशिष्ट का निपटान हो जाने से गाँव में सफ़ाई रहती है और दुर्गंध-मक्खियाँ घटती हैं।
- यह नवीकरणीय है — जब तक पशु और जैव-अपशिष्ट हैं, गैस बनती रहेगी।
- प्रकाश के लिए भी बायोगैस का उपयोग किया जा सकता है।
📌 याद रखें: बायोगैस प्रश्नों की तीन कुंजियाँ हैं — मीथेन (75% तक), ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में अपघटन और बचा गारा = उत्तम खाद। तीनों लिख दीं तो उत्तर पूरा।
एक साँस में समझें — बायोमास को सीधे जलाना पुरानी व कम दक्ष विधि है; उसी गोबर से पाचक में गैस बनाना — धुआँ-रहित ईंधन + बढ़िया खाद — ही स्मार्ट उपयोग है।
पवन ऊर्जा – हवा से बिजली
बहती हवा (पवन) में गतिज ऊर्जा होती है। पुराने समय में पवन-चक्कियों से अनाज पीसा जाता था और कुओं से पानी खींचा जाता था। आज उसी घूर्णन गति का उपयोग टरबाइन घुमाकर बिजली बनाने में होता है — आधुनिक पवन चक्की को wind turbine कहना उचित होगा।
एक अकेली पवन चक्की से थोड़ी-सी ही बिजली बनती है, इसलिए जिन स्थानों पर हवा तेज़ व नियमित चलती है, वहाँ बहुत-सी पवन चक्कियाँ एक साथ लगाई जाती हैं। चक्कियों के इस बड़े समूह को पवन ऊर्जा फ़ार्म (wind energy farm) कहते हैं, जो बड़े क्षेत्र में फैला होता हैं।
पवन ऊर्जा की शर्तें व भारत की स्थिति
NCERT की मुख्य शर्त: पवन ऊर्जा का भरपूर उपयोग तभी संभव है, जब पवन की गति तेज़ व लगभग नियमित हो। पवन चक्की के टरबाइन की आवश्यक चाल बनाए रखने के लिए पवन की गति 15 km/h से अधिक होनी चाहिए।
भारत में पवन ऊर्जा का सबसे बड़ा फ़ार्म समूह तमिलनाडु में है, जो नागरकोइल से मदुरई तक फैला है। इसके अलावा आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, गुजरात, केरल, महाराष्ट्र और लक्षद्वीप में भी बड़े पवन ऊर्जा जनित्र लगाए गए हैं। डेनमार्क को तो पवनों का देश ही कहा जाता है — वहाँ की विद्युत आवश्यकता का एक बहुत बड़ा भाग पवन संयंत्रों से पूरा होता है।
पवन ऊर्जा की सीमाएँ
- पवन हर समय उपलब्ध नहीं होती — हवा रुकी तो उत्पादन भी रुका; ऊर्जा का उत्पादन आवश्यकता के समय पर निश्चित नहीं रखा जा सकता।
- पवन ऊर्जा फ़ार्म के लिए बहुत बड़ा खुला क्षेत्र चाहिए, जो हर जगह उपलब्ध नहीं होता।
- संयंत्र लगाने की प्रारंभिक लागत अधिक होती है।
- तेज़ आँधी-तूफ़ान में चक्कियों की संरचना मज़बूत रखनी पड़ती है; रख-रखाव भी सतत चाहिए।
- बिजली उत्पादन पवन की गति के साथ बदलता रहता है — कभी अधिक, कभी कम।
एक साँस में समझें — पवन ऊर्जा स्वच्छ व मुफ़्त है, पर वह हवा के मिज़ाज की मुहर्रम है: गति 15 km/h से अधिक व नियमित हवा, बड़ा क्षेत्र और ऊँची शुरुआती लागत — यही इसकी तीन शर्तें हैं।
सौर ऊर्जा – सूर्य, सबसे बड़ा और सबसे भरोसेमंद स्रोत
हमारे अधिकांश ऊर्जा स्रोत वस्तुतः संचित सौर ऊर्जा ही हैं — जीवाश्म ईंधन सूर्य की पुरानी ऊर्जा हैं, पवन सूर्य की गर्मी से चलती है, जल-चक्र सूर्य से ही चलता है। पर सूर्य से ऊर्जा सीधे भी ली जा सकती है, और भारत जैसे देश में, जहाँ वर्ष के अधिकांश दिनों में तेज़ धूप मिलती है, सौर ऊर्जा का भविष्य बहुत उज्ज्वल है।
सूर्य की ऊर्जा हम तक विद्युत-चुंबकीय विकिरणों के रूप में पहुँचती है। इस ऊर्जा को उपयोग में लाने की दो मुख्य विधियाँ हैं — ऊष्मा के रूप में (सौर कुकर, सौर जल ऊष्मक) और सीधे विद्युत के रूप में (सौर सेल)। पहले ऊष्मा वाली युक्तियाँ समझिए — इनकी कुंजी एक सरल नियम है: काली सतह ऊष्मा का अवशोषण सबसे अधिक करती है।
बॉक्स-प्रकार का सौर कुकर (Box-type Solar Cooker) – संरचना का वर्णन
बॉक्स-प्रकार का सौर कुकर इस अध्याय की सबसे प्रसिद्ध युक्ति है, Board में इसका नामांकित वर्णन प्रायः पूछा जाता है। इसके भाग इस प्रकार हैं:
1. बाहरी बॉक्स: लकड़ी या धातु का एक डिब्बा, जिसकी भीतरी सतह पर काला रंग किया होता है। काली सतह सूर्य की ऊष्मा का अधिक-से-अधिक अवशोषण करती है।
2. भोजन के बर्तन: चावल, दाल, सब्ज़ी आदि के बर्तन भी बाहर से काले रंगे होते हैं और बॉक्स के भीतर रखे जाते हैं, ताकि वे अधिक ऊष्मा सोखें और भोजन तक पहुँचाएँ।
3. समतल दर्पण (परावर्तक): बॉक्स के ढक्कन के भीतरी भाग में लगा दर्पण इस प्रकार झुकाया जाता है कि वह अधिक-से-अधिक सूर्य का प्रकाश परावर्तित करके बॉक्स के भीतर भेजे। इससे भीतर पहुँचने वाली ऊर्जा बढ़ जाती है। (कुछ डिज़ाइनों में सूर्य की किरणों को केंद्रित करने के लिए अवतल दर्पण अधिक प्रभावी होता है — InText प्रश्न इसी पर है।)
4. शीशे की प्लेट (काँच का ढक्कन): बॉक्स के ऊपर लगा काँच का आवरण दो काम करता है — सूर्य के प्रकाश को भीतर आने देता है और भीतर की ऊष्मा को बाहर निकलने से रोकता है (ग्रीनहाउस प्रभाव)। इसी कारण कुकर के भीतर का ताप लगातार बढ़ता जाता है।
ऐसे कुकर में भोजन धीरे-धीरे पकता है और 2 से 3 घंटों में भीतर का ताप 100°C से 140°C तक पहुँच सकता है। दाल, चावल, सब्ज़ी, उबले आलू-अंडे और खीर जैसी चीज़ें इसमें अच्छी बनती हैं।
सौर कुकर के लाभ व सीमाएँ
लाभ: (1) ईंधन का कोई खर्च नहीं — सूर्य की ऊर्जा मुफ़्त है। (2) धुआँ या प्रदूषण बिल्कुल नहीं। (3) धीमी आँच पर पकने से भोजन के पोषक तत्व अधिक मात्रा में बने रहते हैं। (4) जलने-झुलसने का खतरा नहीं; भोजन को बार-बार देखने की ज़रूरत नहीं। (5) ग्रामीण क्षेत्रों में, जहाँ LPG या बिजली की सुविधा कठिन है, यह बहुत उपयोगी है।
सीमाएँ: (1) रात में और बादल वाले दिनों में उपयोग नहीं हो सकता। (2) खाना धीरे पकता है — समय अधिक लगता है। (3) रोटी सेंकना और तलना-भूनना संभव नहीं, क्योंकि इनके लिए और अधिक ताप चाहिए, जो बॉक्स-प्रकार के कुकर से नहीं मिलता। (4) धूप की दिशा बदलने पर दर्पण को समय-समय पर समायोजित करना पड़ता है। इसलिए उन स्थानों पर सौर कुकर की उपयोगिता सीमित रहती है, जहाँ धूप कम मिलती है या जहाँ रात को या तुरंत खाना बनाना आवश्यक होता है।
सौर जल ऊष्मक (Solar Water Heater)
सिद्धांत वही है — काली सतह, ऊष्मा का अवशोषण। सौर जल ऊष्मक में काले रंगे पाइपों या संग्राहक पट्टिकाओं (collector) में बहता पानी सूर्य की ऊष्मा सोखकर गर्म हो जाता है और टंकी में जमा हो जाता है। घरों, होटलों और अस्पतालों में नहाने-धोने के लिए गर्म पानी की भारी ज़रूरत इसी से पूरी हो सकती है। बिजली या गैस के गीज़र की तुलना में इसका कोई परिचालन ईंधन-खर्च नहीं है, परंतु बादल वाले दिन यह गर्म पानी नहीं दे सकता — यही Exercise के पहले प्रश्न का उत्तर है!
सौर सेल (Solar Cell) व सौर पैनल – प्रकाश से सीधे बिजली
सौर सेल एक विशेष युक्ति है जो सौर ऊर्जा को सीधे विद्युत ऊर्जा में बदल देती है — न भाप, न टरबाइन, न शोर। सामान्य सौर सेल सिलिकॉन नामक विशेष अर्धचालक पदार्थ से बनाए जाते हैं।
एक अकेला सौर सेल बहुत कम विद्युत देता है — लगभग 0.5 से 1 वाट। अधिक शक्ति के लिए बहुत-से सेलों को श्रेणी व समांतर क्रम में जोड़कर बड़ा सौर पैनल बनाया जाता है। कई पैनलों को मिलाकर तो उपग्रहों और अंतरिक्ष यानों की पूरी विद्युत-ज़रूरत पूरी की जाती है — वहाँ सौर पैनल ही ऊर्जा का मुख्य स्रोत हैं, क्योंकि ऊपर न कोयला मिलेगा, न वहाँ तक तार जाएगी! घरेलू उपयोग में सौर पैनल दूर-दराज़ के उन गाँवों के लिए वरदान हैं, जहाँ बिजली के तार पहुँचाना कठिन है; सौर लालटेन, सौर पंप, यातायात संकेतों और कैलकुलेटर जैसी युक्तियों में इनका ख़ूब उपयोग होता है।
सौर सेलों की सीमाएँ: (1) सिलिकॉन की विशिष्ट श्रेणी पूरे विश्व में सीमित मात्रा में उपलब्ध है और उसकी शुद्धिकरण-प्रक्रिया महँगी है। (2) सेलों को जोड़ने में उपयोग होने वाली चाँदी भी इन्हें महँगा बनाती है। (3) एक पैनल की दक्षता कम होती है — पड़ने वाली सौर ऊर्जा का छोटा-सा भाग ही बिजली बनता है। (4) रात में व बादलों में उत्पादन रुकता या घटता है और संचित करने के लिए बैटरी चाहिए। फिर भी तकनीक सस्ती होती जा रही है, इसलिए सौर ऊर्जा भविष्य का सबसे मज़बूत दावेदार है।
📌 याद रखें: सौर भाग के चार अंक-पक्के तथ्य — काला रंग = अधिक अवशोषण, शीशा = ग्रीनहाउस प्रभाव से ऊष्मा रोकना, कुकर का ताप 100–140°C, और सौर सेल = सिलिकॉन, एक सेल ≈ 0.5–1 W।
एक साँस में समझें — सौर ऊर्जा मुफ़्त, स्वच्छ और असमाप्य है; कुकर व ऊष्मक ऊष्मा के रूप में और सौर सेल बिजली के रूप में इसे पकड़ते हैं, पर रात-बादल और लागत अभी भी इसकी सीमाएँ हैं।
महासागरीय ऊर्जा – ज्वार, तरंगें और ताप का अंतर
पृथ्वी का लगभग तीन-चौथाई भाग महासागरों से ढका है, इसलिए समुद्र ऊर्जा का विशाल भंडार हो सकता है। समुद्र से ऊर्जा तीन रूपों में मिल सकती है:
1. ज्वारीय ऊर्जा (Tidal Energy)
चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण के कारण समुद्र का जल दिन में दो बार चढ़ता-उतरता है — यही ज्वार-भाटा है। संकीर्ण खाड़ी के मुहाने पर बाँध बनाकर ज्वार के समय पानी को जलाशय में भरा जाता है और भाटे के समय उसे नियंत्रित ढंग से छोड़ते हुए टरबाइन घुमाकर बिजली बनाई जाती है। भारत में खंभात की खाड़ी, कच्छ की खाड़ी और सुंदरबन का गंगा-डेल्टा क्षेत्र इसके संभावित स्थान माने गए हैं। सीमा: ऐसे उपयुक्त स्थान बहुत कम हैं और निर्माण लागत बहुत अधिक है।
2. तरंग ऊर्जा (Wave Energy)
समुद्र तट से टकराने वाली तेज़ तरंगों की गतिज ऊर्जा को भी विशेष युक्तियों द्वारा टरबाइन घुमाकर बिजली में बदला जा सकता है। सीमा: तरंगें हमेशा एक-सी नहीं होतीं — उत्पादन बदलता रहता है, युक्तियाँ महँगी होती हैं और खारे पानी में उनका रख-रखाव कठिन होता है।
3. सागरीय तापीय ऊर्जा – OTEC
सूर्य की गर्मी से समुद्र की सतह का पानी गर्म होता है, जबकि गहराई का पानी ठंडा रहता है। महासागरीय तापीय ऊर्जा रूपांतरण (Ocean Thermal Energy Conversion — OTEC) संयंत्र इसी तापांतर का उपयोग करते हैं। सतह के गर्म पानी से अमोनिया जैसे कम क्वथनांक वाले द्रव को वाष्पित करके टरबाइन घुमाया जाता है और गहराई के ठंडे पानी से उस वाष्प को फिर द्रवित कर दिया जाता है।
OTEC की शर्त (NCERT): यह तकनीक तभी कार्य करती है, जब समुद्र की सतह के पानी और 2 km तक की गहराई के पानी के ताप में 20°C या उससे अधिक का अंतर हो।
तीनों सागरीय ऊर्जाओं की सम्मिलित सीमाएँ हैं — उपयुक्त स्थान कम, स्थापना की लागत अत्यधिक, दक्षता अपेक्षाकृत कम और खारे जल के कारण संक्षारण (जंग) से बचाव हेतु सतत रख-रखाव की आवश्यकता। इसीलिए सागरीय ऊर्जा अभी प्रयोगात्मक स्तर पर अधिक है।
एक साँस में समझें — ज्वार चंद्रमा से, तरंगें पवन से और OTEC सतह-गहराई के 20°C तापांतर से ऊर्जा देता है; तीनों की साझा सीमा है — कम स्थान, ऊँची लागत और कठिन रख-रखाव।
भूतापीय ऊर्जा – धरती के भीतर की गर्मी
पृथ्वी की गहराइयों में पिघली हुई चट्टानें (मैग्मा) हैं। भूगर्भीय परिवर्तनों के कारण कुछ स्थानों पर यह गर्म पदार्थ ऊपर की ओर आकर भूपर्पटी के नीचे जमा हो जाता है — ऐसे स्थानों को गर्म स्थल (hot spots) कहते हैं।
जब भूमिगत जल इन गर्म स्थलों के संपर्क में आता है, तो वह तपकर भाप बन जाता है। चट्टानों में फँसी इस भाप को पाइपों द्वारा निकालकर टरबाइन घुमाया जाता है और विद्युत उत्पन्न की जाती है। कहीं-कहीं गर्म पानी स्वयं भूमि से बाहर निकलता है — इन्हें उष्ण झरने (hot springs) कहते हैं, और इनकी ऊष्मा का भी सीधा उपयोग किया जा सकता है।
परिभाषा: पृथ्वी के भीतर संचित ऊष्मा से प्राप्त ऊर्जा को भूतापीय ऊर्जा कहते हैं। भारत में लद्दाख की पूगा घाटी और हिमाचल प्रदेश के मणिकरण में भूतापीय ऊर्जा के प्रायोगिक संयंत्र लगाए गए हैं और देश में 300 से अधिक उष्ण झरने पाए जाते हैं।
भूतापीय ऊर्जा स्वच्छ है और दिन-रात उपलब्ध रह सकती है, परंतु इसके उपयुक्त गर्म स्थल हर जगह नहीं मिलते — यही इसकी सबसे बड़ी सीमा है। ध्यान दीजिए — यह ऊर्जा सूर्य से प्राप्त नहीं होती; इसका स्रोत पृथ्वी का अपना भीतरी ताप है। (Exercise प्रश्न 3 में यही बारीकी पूछी गई है!)
एक साँस में समझें — गर्म स्थल पर पानी → भाप → टरबाइन → बिजली; यह भूतापीय ऊर्जा है, जो सूर्य से नहीं, धरती के अपने ताप से मिलती है।
नाभिकीय ऊर्जा – छोटा-सा परमाणु, अपार शक्ति, बड़ा जोखिम
कुछ भारी तत्वों के नाभिक को तोड़ने पर अपार ऊर्जा निकलती है। नाभिकीय विखंडन (Nuclear Fission) वह प्रक्रिया है, जिसमें यूरेनियम-235 जैसे भारी नाभिक पर धीमी गति के न्यूट्रॉनों की बौछार करने पर वह दो हल्के नाभिकों में टूट जाता है और साथ में बहुत बड़ी मात्रा में ऊर्जा निकलती है। नाभिकीय विद्युत संयंत्रों में ठीक इसी विखंडन की ऊष्मा से भाप बनाकर टरबाइन घुमाया जाता है — अर्थात बाद की कहानी तापीय संयंत्र जैसी ही है, बस ईंधन की जगह परमाणु है।
(एक अंतर याद रखिए — सूर्य में ऊर्जा विखंडन से नहीं, संलयन (fusion) से बनती है, जिसमें हल्के नाभिक जुड़कर भारी नाभिक बनाते हैं। NCERT का दायरा विद्युत उत्पादन के लिए विखंडन तक ही है।)
नाभिकीय ऊर्जा के लाभ
- बहुत थोड़ी मात्रा के नाभिकीय ईंधन से विशाल मात्रा में ऊर्जा मिलती है — ट्रकों भर कोयले का काम मुट्ठी भर यूरेनियम कर देता है।
- विद्युत उत्पादन के समय धुआँ या CO2 नहीं निकलता — वायु प्रदूषण नहीं होता।
- ईंधन का परिवहन आसान है, क्योंकि मात्रा बहुत कम लगती है।
नाभिकीय ऊर्जा के जोखिम – NCERT इस पर विशेष ज़ोर देता है
1. रेडियोधर्मी अपशिष्ट: उपयोग किए गए ईंधन से जो अपशिष्ट बचता है, वह रेडियोधर्मी होता है और हज़ारों वर्षों तक हानिकारक विकिरण छोड़ता रह सकता है। इसका सुरक्षित भंडारण व निपटान आज भी विश्व की सबसे कठिन समस्याओं में से एक है। यदि यह अपशिष्ट ठीक से न रखा जाए, तो विकिरण मिट्टी व जल में मिलकर जीवों को गंभीर नुकसान पहुँचा सकता है।
2. दुर्घटना का खतरा: संयंत्र में कोई बड़ी दुर्घटना हो जाए, तो रेडियोधर्मी पदार्थ बड़े क्षेत्र में फैल सकते हैं और उसका प्रभाव वर्षों तक रह सकता है। इसीलिए नाभिकीय संयंत्रों में अत्यंत कड़े सुरक्षा-प्रबंध अनिवार्य हैं।
3. लागत व सीमित ईंधन: संयंत्र स्थापित करने की लागत बहुत अधिक है और यूरेनियम के भंडार भी सीमित हैं — अर्थात यह भी एक समाप्य स्रोत ही है। इन्हीं कारणों से नाभिकीय ऊर्जा का बड़े पैमाने पर उपयोग कठिन (निषेधात्मक) माना जाता है।
📌 याद रखें: नाभिकीय ऊर्जा की परीक्षा-युक्ति एक पंक्ति में है — “शक्ति अपार, पर अपशिष्ट का निपटान और दुर्घटना का जोखिम ही इसकी असली कीमत है।” यह भी याद रखें कि यह ऊर्जा सूर्य से प्राप्त नहीं होती।
एक साँस में समझें — विखंडन से थोड़े ईंधन में अपार ऊर्जा मिलती है, परंतु रेडियोधर्मी अपशिष्ट, दुर्घटना का जोखिम, ऊँची लागत और सीमित यूरेनियम इसकी गंभीर सीमाएँ हैं।
पर्यावरणीय परिणाम व स्रोतों की बड़ी तुलना
अब तक आप हर स्रोत की कहानी अलग-अलग पढ़ चुके हैं। अध्याय के अंतिम भाग में NCERT एक गहरा प्रश्न उठाता है — ऊर्जा की बढ़ती माँग का पर्यावरण पर क्या असर पड़ रहा है?
उत्तर स्पष्ट है। जीवाश्म ईंधनों के अधिक उपयोग से वायु प्रदूषण, अम्ल वर्षा और वैश्विक तापन बढ़ा है। बाँधों से पारिस्थितिक तंत्र डूबे हैं। नाभिकीय संयंत्रों से रेडियोधर्मी अपशिष्ट की समस्या खड़ी हुई है। यहाँ तक कि स्वच्छ कहे जाने वाले स्रोत भी पूरी तरह निर्दोष नहीं हैं — कोई भी ऊर्जा स्रोत पूर्णतः प्रदूषण-मुक्त नहीं हो सकता, क्योंकि युक्ति के उपयोग में प्रदूषण न हो, तो भी उसके निर्माण, स्थापना और निपटान में कुछ-न-कुछ पर्यावरणीय कीमत चुकानी ही पड़ती है। जैसे सौर सेल उपयोग में स्वच्छ हैं, परंतु उनके निर्माण में ऊर्जा व रसायन लगते हैं।
इसका अर्थ यह नहीं कि हम ऊर्जा उपयोग छोड़ दें — अर्थ यह है कि हमें (1) ऊर्जा का अपव्यय रोकना होगा, (2) दक्ष युक्तियाँ अपनानी होंगी (जैसे सामान्य बल्ब की जगह LED), (3) जहाँ संभव हो नवीकरणीय स्रोतों को प्राथमिकता देनी होगी और (4) हर स्रोत का चयन उसकी पूरी पर्यावरणीय कीमत देखकर करना होगा। रोचक बात — रॉकेट ईंधन के रूप में उपयोग हुई हाइड्रोजन जलने पर केवल जलवाष्प बनाती है, इसलिए वह CNG से भी अधिक स्वच्छ ईंधन मानी जाती है; CNG भी पेट्रोल-डीज़ल से साफ़ है, परंतु जलने पर वह CO2 तो छोड़ती ही है।
📊 ऊर्जा स्रोतों की तुलना – स्रोत, लाभ व हानि/सीमा
| ऊर्जा स्रोत | मुख्य लाभ | हानि / सीमा |
|---|---|---|
| जीवाश्म ईंधन (कोयला, पेट्रोलियम) | उच्च ऊष्मीय मान, किसी भी समय उपयोग, परिपक्व तकनीक | समाप्य, वायु प्रदूषण, अम्ल वर्षा, CO2 से वैश्विक तापन |
| तापीय विद्युत | बड़े पैमाने पर निरंतर विद्युत उत्पादन | जीवाश्म ईंधन पर निर्भर, धुआँ व CO2 उत्सर्जन |
| जल विद्युत (बाँध) | नवीकरणीय, प्रदूषण-रहित, सिंचाई व बाढ़-नियंत्रण का लाभ | पारिस्थितिक तंत्र की डूब-क्षति, लोगों का विस्थापन, सीमित उपयुक्त स्थान |
| बायोमास (लकड़ी, कंडे) | सस्ता, सर्वत्र उपलब्ध, नवीकरणीय | कम दक्षता, बहुत धुआँ, अधिक उपयोग से वनों की कटाई |
| बायोगैस | धुआँ-रहित, उच्च ऊष्मीय मान, बचा गारा उत्तम खाद, अपशिष्ट का निपटान | संयंत्र की स्थापना व देखभाल चाहिए, उत्पादन सीमित मात्रा में |
| सौर ऊर्जा | असमाप्य, मुफ़्त, उपयोग में पूर्णतः प्रदूषण-रहित | रात व बादल में अनुपलब्ध, सौर सेल महँगे व कम दक्ष |
| पवन ऊर्जा | स्वच्छ, नवीकरणीय, परिचालन खर्च नगण्य | 15 km/h से अधिक की नियमित हवा चाहिए, बड़ा क्षेत्र, ऊँची प्रारंभिक लागत, उत्पादन अनिश्चित |
| ज्वारीय ऊर्जा | नवीकरणीय, पूर्वानुमान योग्य ज्वार | उपयुक्त स्थान बहुत कम, निर्माण लागत अत्यधिक |
| तरंग ऊर्जा | नवीकरणीय, तटीय क्षेत्रों में संभावना | तरंगें अनियमित, महँगी युक्तियाँ, कठिन रख-रखाव |
| सागरीय तापीय ऊर्जा (OTEC) | विशाल सागरीय भंडार, निरंतर उपलब्धता की संभावना | 20°C तापांतर आवश्यक, लागत अधिक, दक्षता कम |
| भूतापीय ऊर्जा | स्वच्छ, दिन-रात उपलब्ध | गर्म स्थल केवल कुछ स्थानों पर ही उपलब्ध |
| नाभिकीय ऊर्जा | थोड़े ईंधन से अपार ऊर्जा, CO2 नहीं | रेडियोधर्मी अपशिष्ट का निपटान, दुर्घटना का जोखिम, ऊँची लागत, ईंधन समाप्य |
अंतिम निष्कर्ष: ऐसा कोई स्रोत नहीं, जो हर कसौटी पर खरा हो। बुद्धिमानी इसी में है कि स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार स्रोतों का उचित मिश्रण अपनाया जाए — धूप वाली जगह सौर, windy तट पर पवन, पशु-पालन वाले गाँव में बायोगैस — और ऊर्जा की बचत को सबसे पहला स्रोत माना जाए, क्योंकि बचाई गई ऊर्जा ही सबसे स्वच्छ ऊर्जा है।
एक साँस में समझें — बढ़ती ऊर्जा-माँग पर्यावरण पर दबाव डालती है; समाधान स्रोतों का विवेकपूर्ण मिश्रण, दक्ष युक्तियाँ और ऊर्जा की बचत है — पूर्णतः प्रदूषण-मुक्त स्रोत कोई नहीं होता।
📘 पाठ्य-पुस्तक के प्रश्न (InText Questions)
ये वे प्रश्न हैं जो NCERT किताब के अनुच्छेदों के बीच-बीच में दिए गए हैं। इस अध्याय में कुल 14 InText प्रश्न हैं — पृष्ठ 243 पर 3, पृष्ठ 248 पर 3, पृष्ठ 253 पर 4 व 2, और पृष्ठ 254 पर 2। Board में ये प्रश्न वैसे-के-वैसे पूछ लिए जाते हैं, इसलिए इन्हें सबसे पहले तैयार कीजिए।
(क) पृष्ठ 243 के प्रश्न – अच्छा स्रोत व अच्छा ईंधन
प्रश्न 1. ऊर्जा का उत्तम (अच्छा) स्रोत क्या है?
हल:
चरण 1: ऊर्जा के स्रोत का मूल काम है कार्य करना, इसलिए पहला गुण यही होगा कि वह कम मात्रा में अधिक कार्य करे।
चरण 2: बाकी गुण सुविधा और कीमत से जुड़े हैं — उपलब्धता, भंडारण-परिवहन की सरलता और मितव्ययिता।
उत्तर: ऊर्जा का उत्तम स्रोत वह है जो — (i) प्रति इकाई आयतन अथवा द्रव्यमान से अधिक कार्य करे, (ii) आसानी से उपलब्ध हो, (iii) भंडारण व परिवहन में आसान हो, तथा (iv) मितव्ययी (सस्ता) हो। व्यवहार में वह सुरक्षित हो और प्रदूषण भी कम करे, तो और उत्तम माना जाता है।
प्रश्न 2. उत्तम (अच्छा) ईंधन क्या है?
हल:
चरण 1: ईंधन की अच्छाई सबसे पहले उसके ऊष्मीय मान से नापी जाती है — 1 kg ईंधन से कितनी ऊष्मा मिली?
चरण 2: फिर दहन की सफ़ाई और नियंत्रण देखा जाता है — धुआँ कितना, ज्वलन-दर कैसी और अवशेष कितना बचा?
उत्तर: उत्तम ईंधन वह है जिसका ऊष्मीय मान अधिक हो, जो उचित दर से नियंत्रित रूप में जले, जलने पर धुआँ या हानिकारक गैसें न छोड़े, जिसका प्रज्वलन ताप उचित हो, जो सस्ता व आसानी से उपलब्ध हो, भंडारण-परिवहन में सुविधाजनक हो और जलने के पश्चात अधिक अवशेष (राख) न छोड़े। उदाहरण — LPG एक उत्तम घरेलू ईंधन है।
प्रश्न 3. यदि आप अपने भोजन को गर्म करने के लिए किसी भी ऊर्जा स्रोत का उपयोग कर सकते हैं, तो आप किसका उपयोग करेंगे और क्यों?
हल:
चरण 1: भोजन गर्म करने के लिए ऐसा ईंधन चाहिए जो शीघ्र, साफ़ और नियंत्रित ऊष्मा दे।
चरण 2: LPG इन सभी कसौटियों पर खरी उतरती है — इसलिए उत्तर LPG होगा और कारण अच्छे ईंधन के गुणों से जोड़े जाएँगे।
उत्तर: मैं LPG (रसोई गैस) का उपयोग करूँगा, क्योंकि — (i) इसका ऊष्मीय मान अधिक है, कम गैस में भोजन जल्दी गर्म हो जाता है; (ii) यह बिना धुएँ के जलती है, अतः वायु प्रदूषण नहीं होता; (iii) जलने पर कोई विषैली गैस या राख नहीं बनती; (iv) बटन/नॉब से लौ को तुरंत जलाना, बुझाना व नियंत्रित करना आसान है; तथा (v) सिलिंडर के रूप में इसका भंडारण व परिवहन सुविधाजनक है। (विद्युत इंडक्शन चूल्हा भी एक स्वच्छ विकल्प है, क्योंकि वह भी धुआँ-रहित और नियंत्रित ऊष्मा देता है।)
(ख) पृष्ठ 248 के प्रश्न – जीवाश्म ईंधन व विकल्पों की खोज
प्रश्न 1. जीवाश्म ईंधनों की हानियाँ क्या हैं?
हल:
चरण 1: पहली हानि उपलब्धता से जुड़ी है — ये बनने में लाखों वर्ष लेते हैं, पर खर्च बहुत तेज़ी से हो रहे हैं।
चरण 2: बाकी हानियाँ दहन से निकलने वाली गैसों से जुड़ी हैं — धुआँ, अम्लीय ऑक्साइड और CO2।
उत्तर: जीवाश्म ईंधनों की हानियाँ हैं — (i) ये अनवीकरणीय (समाप्य) हैं; वर्तमान दर से उपयोग जारी रहा तो इनके भंडार शीघ्र समाप्त हो जाएँगे। (ii) इनके जलने से वायु प्रदूषण होता है — धुआँ व हानिकारक गैसें निकलती हैं। (iii) दहन से बनने वाले कार्बन, नाइट्रोजन व सल्फ़र के अम्लीय ऑक्साइड वर्षा में घुलकर अम्ल वर्षा कराते हैं, जो मृदा व जल-संसाधनों को क्षति पहुँचाती है। (iv) निकली CO2 ग्रीनहाउस प्रभाव बढ़ाकर वैश्विक तापन का कारण बनती है।
प्रश्न 2. हम ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों की ओर क्यों ध्यान दे रहे हैं?
हल:
चरण 1: हमारी सारी आधुनिक तकनीक जीवाश्म ईंधनों के उपयोग पर ही विकसित हुई है और ऊर्जा की माँग निरंतर बढ़ रही है।
चरण 2: पर भंडार सीमित हैं और कचरा (प्रदूषण व नाभिकीय अपशिष्ट) पर्यावरण के लिए खतरा बन गया है — अतः विकल्प अनिवार्य हो गए हैं।
उत्तर: हम वैकल्पिक स्रोतों की ओर इसलिए ध्यान दे रहे हैं, क्योंकि — (i) पृथ्वी पर जीवाश्म ईंधनों के भंडार सीमित हैं और बढ़ती माँग के कारण वे अधिक समय तक नहीं चलेंगे; (ii) जीवाश्म ईंधनों के दहन से होने वाला प्रदूषण पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा बन गया है; तथा (iii) नाभिकीय विद्युत संयंत्रों के रेडियोधर्मी अपशिष्ट का सुरक्षित निपटान भी एक बड़ी समस्या है। अतः सौर, पवन, जल व बायोगैस जैसे स्वच्छ व नवीकरणीय विकल्प खोजना आवश्यक हो गया है।
प्रश्न 3. हमारी सुविधा के लिए पवन व जल ऊर्जा के परंपरागत उपयोग में किस प्रकार सुधार किए गए हैं?
हल:
चरण 1: पहले पवन चक्की से केवल यांत्रिक कार्य होता था — अनाज पीसना, पानी खींचना; और बहते जल से भी पनचक्की जैसे साधारण कार्य लिए जाते थे।
चरण 2: सुधार का अर्थ है — उन्हीं ऊर्जाओं को विद्युत में बदलना और बड़े पैमाने पर, एक स्थान से अनेक स्थानों तक पहुँचाना।
उत्तर: (i) पवन ऊर्जा: परंपरागत एकल पवन चक्कियों की जगह अब पवन ऊर्जा फ़ार्मों में बड़ी-बड़ी आधुनिक पवन चक्कियाँ (टरबाइन) लगाई जाती हैं, जिनकी घूर्णन गति से जनित्र चलाकर विद्युत उत्पन्न की जाती है — विद्युत को कहीं भी, किसी भी काम में उपयोग किया जा सकता है। (ii) जल ऊर्जा: बहते जल के साधारण उपयोग की जगह अब नदियों पर बाँध बनाकर जल विद्युत संयंत्र स्थापित किए गए हैं, जहाँ ऊँचाई से गिरते जल से टरबाइन-जनित्र चलाकर बड़े पैमाने पर विद्युत बनती है। अर्थात दोनों में सुधार का सार है — यांत्रिक कार्य से आगे बढ़कर विद्युत उत्पादन।
(ग) पृष्ठ 253 के प्रश्न – सौर कुकर, सागर, भूतापीय व नाभिकीय
प्रश्न 1. सौर कुकर के लिए कौन-सा दर्पण — अवतल, उत्तल अथवा समतल — सर्वाधिक उपयुक्त है और क्यों?
हल:
चरण 1: कुकर में भोजन पकाने के लिए छोटी-सी जगह पर अधिक-से-अधिक ऊष्मा चाहिए, अर्थात सूर्य की किरणों को एक बिंदु/क्षेत्र पर केंद्रित करना होगा।
चरण 2: किरणों को केंद्रित करने का काम केवल अवतल दर्पण करता है; उत्तल दर्पण किरणों को फैला देता है और समतल दर्पण केवल दिशा बदलता है।
उत्तर: सौर कुकर के लिए अवतल दर्पण सर्वाधिक उपयुक्त है, क्योंकि यह अपने पर पड़ने वाले सूर्य के प्रकाश को एक बिंदु (फ़ोकस) पर केंद्रित कर देता है। उस छोटे क्षेत्र में ताप बहुत बढ़ जाता है, जिससे भोजन शीघ्र और ठीक से पकता है। (बॉक्स-प्रकार के साधारण कुकर में समतल दर्पण केवल प्रकाश को बॉक्स के भीतर भेजने के लिए लगाया जाता है; केंद्रण के लिए अवतल दर्पण ही सर्वोत्तम है।)
प्रश्न 2. महासागरों से प्राप्त की जा सकने वाली ऊर्जा की क्या सीमाएँ हैं?
हल:
उत्तर: महासागरीय ऊर्जा (ज्वारीय, तरंग व OTEC) की सीमाएँ हैं — (i) ज्वारीय ऊर्जा के लिए बाँध बनाए जा सकने वाले उपयुक्त स्थान बहुत कम हैं; (ii) सागर में संयंत्र लगाने की लागत अत्यधिक होती है, जबकि उत्पन्न विद्युत की मात्रा की तुलना में दक्षता कम रहती है; (iii) खारे जल के कारण युक्तियों में संक्षारण का खतरा रहता है, इसलिए सतत व महँगा रख-रखाव आवश्यक है; तथा (iv) तरंगों व ज्वार पर आधारित उत्पादन समय के साथ बदलता रहता है, निरंतर एक-सा नहीं मिलता।
प्रश्न 3. भूतापीय ऊर्जा क्या होती है?
हल:
उत्तर: पृथ्वी के भीतर संचित ऊष्मा से प्राप्त की जा सकने वाली ऊर्जा को भूतापीय ऊर्जा कहते हैं। भूगर्भीय परिवर्तनों से भूपर्पटी के नीचे कुछ स्थानों पर गर्म पिघला पदार्थ जमा हो जाता है — ये गर्म स्थल (hot spots) हैं। भूमिगत जल इनके संपर्क में आकर भाप बनता है; इसी भाप से टरबाइन चलाकर विद्युत बनाई जाती है। जहाँ गर्म जल स्वयं बाहर आता है, वे स्थान उष्ण झरने कहलाते हैं।
प्रश्न 4. नाभिकीय ऊर्जा के क्या लाभ हैं?
हल:
उत्तर: नाभिकीय ऊर्जा के लाभ हैं — (i) बहुत कम मात्रा के नाभिकीय ईंधन (यूरेनियम-235) के विखंडन से अपार मात्रा में ऊर्जा प्राप्त होती है; (ii) विद्युत उत्पादन में धुआँ या CO2 नहीं निकलता, अतः वायु प्रदूषण नहीं होता; (iii) ईंधन की मात्रा कम लगने से उसका परिवहन व भंडारण आसान होता है; तथा (iv) संयंत्र से निरंतर और बड़े पैमाने पर विद्युत मिलती है। (साथ ही यह भी स्मरण रहे कि रेडियोधर्मी अपशिष्ट का निपटान और दुर्घटना का जोखिम इसके गंभीर दोष हैं — इसी कारण इसका बड़े पैमाने पर उपयोग कठिन है।)
(घ) पृष्ठ 253–254 के प्रश्न – पर्यावरणीय परिणाम
प्रश्न 1. क्या ऊर्जा का कोई स्रोत प्रदूषण-मुक्त हो सकता है? क्यों अथवा क्यों नहीं?
हल:
चरण 1: किसी युक्ति को केवल “चलते समय” देखकर स्वच्छ कहना अधूरा होगा — उसे बनाना, लगाना और अंत में निपटाना भी उसी चक्र का भाग है।
चरण 2: निर्माण व स्थापना की अवस्था में हर युक्ति कुछ-न-कुछ ऊर्जा व पदार्थ खर्च करती है — वहीं से कुछ पर्यावरणीय असर जुड़ जाता है।
उत्तर: नहीं, कोई भी ऊर्जा स्रोत पूर्णतः प्रदूषण-मुक्त नहीं हो सकता। कुछ स्रोतों का उपयोग करते समय भले ही प्रदूषण न होता हो — जैसे सौर सेल से बिजली बनाते समय कोई धुआँ नहीं निकलता — परंतु उन युक्तियों के निर्माण व स्थापना में पर्यावरण को कुछ-न-कुछ क्षति अवश्य पहुँच सकती है। उदाहरणतः सौर सेलों के निर्माण में ऊर्जा व रसायन लगते हैं और बाँध बनने से पारिस्थितिक तंत्र डूबता है। इसलिए हम केवल “अपेक्षाकृत कम प्रदूषण वाले” स्रोत की बात कर सकते हैं, “शून्य प्रदूषण” वाले की नहीं।
प्रश्न 2. हाइड्रोजन को रॉकेट ईंधन के रूप में उपयोग किया गया है। क्या आप CNG की तुलना में इसे स्वच्छ ईंधन मानते हैं? क्यों अथवा क्यों नहीं?
हल:
चरण 1: ईंधन की सफ़ाई उसके दहन-उत्पाद से नापी जाती है। हाइड्रोजन जलने पर केवल जल बनाती है, जबकि CNG एक हाइड्रोकार्बन है।
चरण 2: CNG जलने पर CO2 अवश्य छोड़ेगी, चाहे वह पेट्रोल-डीज़ल की तुलना में कम प्रदूषण करती हो।
उत्तर: हाँ, मैं हाइड्रोजन को CNG की तुलना में अधिक स्वच्छ ईंधन मानता हूँ, क्योंकि हाइड्रोजन के दहन से केवल जल (जलवाष्प) बनता है — न CO2, न धुआँ। इसके विपरीत CNG (मुख्यतः मीथेन) के जलने से कार्बन डाइऑक्साइड बनती है, जो ग्रीनहाउस गैस है। यद्यपि CNG पेट्रोल व डीज़ल की अपेक्षा स्वच्छ है, परंतु हाइड्रोजन उससे भी स्वच्छ है। (व्यावहारिक कठिनाई यह है कि हाइड्रोजन का भंडारण व परिवहन CNG की तुलना में अधिक कठिन व महँगा है।)
(ङ) पृष्ठ 254 के प्रश्न – नवीकरणीय व समाप्य स्रोत
प्रश्न 1. ऐसे दो ऊर्जा स्रोतों के नाम लिखिए, जिन्हें आप नवीकरणीय मानते हैं। अपने चयन के समर्थन में तर्क लिखिए।
हल:
उत्तर: (i) सौर ऊर्जा और (ii) बायोमास (अथवा पवन ऊर्जा)। तर्क: सौर ऊर्जा सूर्य से निरंतर प्राप्त होती रहती है और हमारे उपयोग से समाप्त नहीं होती। बायोमास भी नवीकरणीय है, क्योंकि पौधे फिर उगाए जा सकते हैं और पशु-अपशिष्ट निरंतर मिलता रहता है — अर्थात जितना उपयोग होता है, प्रकृति उसकी पूर्ति करती रहती है। पवन ऊर्जा भी इसी श्रेणी की है, क्योंकि हवाएँ सूर्य की गर्मी से निरंतर चलती रहती हैं।
प्रश्न 2. ऐसे दो ऊर्जा स्रोतों के नाम लिखिए, जिन्हें आप आप समाप्य मानते हैं। अपने चयन के समर्थन में तर्क लिखिए।
हल:
उत्तर: (i) कोयला और (ii) पेट्रोलियम। तर्क: दोनों के पृथ्वी पर भंडार सीमित हैं और इन्हें बनने में लाखों वर्ष लगे थे। यदि हम इन्हें वर्तमान दर से उपयोग करते रहे, तो इनके भंडार शीघ्र समाप्त हो जाएँगे और निकट भविष्य में इनकी पुनः पूर्ति संभव नहीं है — इसीलिए इन्हें समाप्य (अनवीकरणीय) स्रोत कहते हैं। (प्राकृतिक गैस व यूरेनियम भी इसी श्रेणी में आते हैं।)
इस InText भाग में हमने सीखा — अध्याय के 14 प्रश्न ही इसकी पूरी कहानी हैं: अच्छे स्रोत-ईंधन के गुणों से लेकर जीवाश्म की हानियाँ, सौर-नाभिकीय के प्रश्न और अंत में नवीकरणीय बनाम समाप्य की पहचान।
📗 NCERT उदाहरण (Examples)
एक बात पहले ही साफ़ कर दें — इस अध्याय में NCERT ने गणित की तरह क्रमांकित “उदाहरण (Examples)” नहीं दिए हैं। किताब की सीख क्रियाकलापों (Activities) और चर्चाओं के माध्यम से दी गई है। नीचे उन्हीं क्रियाकलापों पर आधारित तीन सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण दिए जा रहे हैं — परीक्षा में इन्हीं पर आधारित प्रेक्षण-प्रश्न (observation questions) आते हैं।
उदाहरण 1 (क्रियाकलाप-आधारित). दो शंक्वाकार फ़्लास्कों में बराबर पानी लिया गया — एक को बाहर से काला और दूसरे को सफ़ेद रंगा गया। दोनों को समान समय तक धूप में रखने पर किसका पानी अधिक गर्म होगा और क्यों?
हल: काले रंगे फ़्लास्क का पानी अधिक गर्म होगा, क्योंकि काली सतह सूर्य की ऊष्मा का अवशोषण अधिक करती है, जबकि सफ़ेद सतह अधिकांश प्रकाश को परावर्तित कर देती है। यही सिद्धांत सौर कुकर के काले बॉक्स, काले बर्तनों और सौर जल ऊष्मक की काली पट्टिकाओं के पीछे है।
उदाहरण 2 (क्रियाकलाप-आधारित). बहते पानी या हवा के सामने रखी छोटी चक्की (टरबाइन-नुमा पहिया) को डायनेमो से जोड़ने पर बल्ब क्यों जल उठता है?
हल: बहते जल/पवन की गतिज ऊर्जा चक्की को घुमाती है। चक्की की घूर्णन गति डायनेमो (जनित्र) को मिलती है, जो यांत्रिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में बदल देता है — इसी विद्युत से बल्ब जलता है। यही सूक्ष्म प्रतिरूप जल विद्युत संयंत्रों और पवन ऊर्जा फ़ार्मों का कार्य-सिद्धांत है: टरबाइन की घूर्णन गति → जनित्र → विद्युत।
उदाहरण 3 (क्रियाकलाप-आधारित). आपके घर में उपलब्ध ईंधनों — लकड़ी, कोयला, केरोसिन, LPG — की सूची बनाकर अच्छे ईंधन की कसौटी पर सबसे उपयुक्त कौन-सा है, निर्णय कीजिए।
हल: कसौटियाँ हैं — ऊष्मीय मान, धुआँ, अवशेष (राख) और सुविधा। लकड़ी व कोयला धुआँ व राख अधिक देते हैं और उनका ऊष्मीय मान कम है; केरोसिन मध्यम है, परंतु गंध व धुआँ कुछ होता है; LPG का ऊष्मीय मान सबसे अधिक है, वह धुएँ व राख के बिना जलती है और लौ पर पूर्ण नियंत्रण रहता है। अतः घरेलू उपयोग के लिए LPG ही सबसे उपयुक्त उत्तम ईंधन है — यही निष्कर्ष अध्याय की चर्चा का भी सार है।
✏️ प्रश्नावली (Exercise) – सभी 10 प्रश्नों के हल
प्रश्न 1. सौर जल ऊष्मक का उपयोग गर्म पानी प्राप्त करने के लिए किस दिन नहीं किया जा सकता — (a) धूप वाले दिन (b) बादल वाले दिन (c) गर्म दिन (d) पवन (हवादार) वाले दिन
हल:
चरण 1: सौर जल ऊष्मक की ऊर्जा का एकमात्र आधार सूर्य का प्रकाश है।
चरण 2: बादल वाले दिन सूर्य की किरणें पृथ्वी तक पर्याप्त मात्रा में नहीं पहुँच पातीं, इसलिए पानी गर्म नहीं होगा। धूप वाले व गर्म दिन अनुकूल हैं और केवल पवन चलने से सौर ऊष्मक के कार्य पर कोई रोक नहीं लगती।
उत्तर: (b) बादल वाले दिन — बादलों के कारण सौर विकिरण ऊष्मक तक नहीं पहुँच पाता, अतः उस दिन गर्म पानी प्राप्त नहीं किया जा सकता।
प्रश्न 2. निम्नलिखित में से कौन जैवमात्रा (बायोमास) ऊर्जा स्रोत का उदाहरण नहीं है — (a) लकड़ी (b) गोबर-गैस (c) नाभिकीय ऊर्जा (d) कोयला
हल:
चरण 1: बायोमास का अर्थ है — पौधों व जंतुओं से प्राप्त पदार्थ। लकड़ी पौधों से और गोबर-गैस जंतु-अपशिष्ट से बनती है, अतः दोनों बायोमास हैं।
चरण 2: कोयला भी प्राचीन पौधों के अवशेषों से बना है, इसलिए NCERT की इस सूची में उसे जैव उत्पत्ति का माना गया है; परंतु नाभिकीय ऊर्जा परमाणु के नाभिक से मिलती है, उसका जैव पदार्थ से कोई संबंध नहीं है।
उत्तर: (c) नाभिकीय ऊर्जा — यह बायोमास ऊर्जा स्रोत का उदाहरण नहीं है; यह यूरेनियम जैसे भारी नाभिकों के विखंडन से प्राप्त होती है।
प्रश्न 3. हम जिन ऊर्जा स्रोतों का उपयोग करते हैं, उनमें से अधिकांश सौर ऊर्जा को ही निरूपित करते हैं। निम्नलिखित में से कौन-सा ऊर्जा स्रोत अंततः सूर्य की ऊर्जा से प्राप्त नहीं होता — (a) भूतापीय ऊर्जा (b) पवन ऊर्जा (c) नाभिकीय ऊर्जा (d) बायोमास
हल:
चरण 1: पवन सूर्य की असमान गर्मी से चलती है और बायोमास प्रकाश-संश्लेषण द्वारा संचित सौर ऊर्जा है — दोनों सूर्य से जुड़े हैं।
चरण 2: भूतापीय ऊर्जा पृथ्वी के भीतरी ताप से और नाभिकीय ऊर्जा नाभिकों के विखंडन से मिलती है — दोनों का स्रोत सूर्य नहीं है। दिए गए विकल्पों में NCERT का अपेक्षित उत्तर नाभिकीय ऊर्जा है।
उत्तर: (c) नाभिकीय ऊर्जा — यह सूर्य की ऊर्जा से प्राप्त नहीं होती; यह भारी नाभिकों के विखंडन से निकलती है। (टिप्पणी: भूतापीय ऊर्जा भी सूर्य से नहीं, पृथ्वी के आंतरिक ताप से मिलती है — परंतु इस प्रश्न के विकल्पों में NCERT का अभिप्रेत उत्तर नाभिकीय ऊर्जा है।)
प्रश्न 4. ऊर्जा के स्रोत के रूप में जीवाश्म ईंधनों और सूर्य की तुलना कीजिए व उनके अंतर लिखिए।
हल:
| बात | जीवाश्म ईंधन | सूर्य (सौर ऊर्जा) |
|---|---|---|
| प्रकृति | अनवीकरणीय / समाप्य | नवीकरणीय / असमाप्य |
| भंडार | सीमित — उपयोग की वर्तमान दर पर शीघ्र समाप्त हो सकते हैं | लगभग असीमित — अरबों वर्षों तक उपलब्ध |
| प्रदूषण | जलने पर धुआँ, अम्लीय गैसें व CO2 — प्रदूषण व वैश्विक तापन | उपयोग के समय कोई प्रदूषण नहीं |
| उपलब्धता का समय | दिन-रात, किसी भी समय उपयोग संभव | केवल दिन में और साफ़ मौसम में ही पर्याप्त |
| बनने का समय | लाखों वर्षों में बने | निरंतर प्राप्त होती रहती है |
निष्कर्ष: जीवाश्म ईंधन सुविधाजनक परंतु समाप्य व प्रदूषणकारी हैं; सूर्य स्वच्छ व असमाप्य है, परंतु उसकी उपलब्धता दिन व मौसम पर निर्भर करती है।
प्रश्न 5. ऊर्जा स्रोतों के रूप में जैवमात्रा (बायोमास) और जल विद्युत की तुलना कीजिए व उनके अंतर लिखिए।
हल:
| बात | जैवमात्रा (बायोमास) | जल विद्युत |
|---|---|---|
| प्रकृति | नवीकरणीय — पौधे फिर उगाए जा सकते हैं | नवीकरणीय — वर्षा से जल फिर भरता है |
| ऊर्जा पाने की विधि | सीधे जलाकर ऊष्मा, अथवा बायोगैस बनाकर | बाँध के ऊँचे जल से टरबाइन चलाकर विद्युत |
| स्थापना-स्थान | कहीं भी उपयोग संभव — खेत-गाँव के पास ही उपलब्ध | केवल वहीं, जहाँ बाँध बनाना संभव हो |
| प्रदूषण | सीधे जलाने पर धुआँ; बायोगैस रूप में लगभग धुआँ-रहित | विद्युत उत्पादन में कोई वायु प्रदूषण नहीं |
| अन्य कठिनाई | ईंधन एकत्र करना श्रमसाध्य; दक्षता कम | बाँध से पारिस्थितिक क्षति व लोगों का विस्थापन |
| उप-उत्पाद | बायोगैस संयंत्र से उत्तम खाद मिलती है | सिंचाई व बाढ़-नियंत्रण का अतिरिक्त लाभ |
निष्कर्ष: दोनों नवीकरणीय हैं; बायोमास छोटे व स्थानीय उपयोग के लिए सरल है किंतु कम दक्ष है, जबकि जल विद्युत बड़े पैमाने की स्वच्छ विद्युत देती है परंतु बाँध की पर्यावरणीय-सामाजिक कीमत बड़ी है।
प्रश्न 6. ऊर्जा निकालने की निम्नलिखित विधियों की सीमाएँ क्या हैं — (a) पवन (b) तरंगें (c) ज्वार-भाटा
हल:
(a) पवन ऊर्जा की सीमाएँ: (i) पवन हमेशा उपलब्ध नहीं होती — हवा रुकी तो उत्पादन भी रुक जाता है। (ii) आर्थिक रूप से उपयोगी उत्पादन के लिए पवन की गति 15 km/h से अधिक व लगभग नियमित होनी चाहिए। (iii) पवन ऊर्जा फ़ार्म के लिए बहुत बड़ा क्षेत्र चाहिए। (iv) संयंत्रों की प्रारंभिक लागत अधिक होती है और उत्पादन पवन के साथ घटता-बढ़ता रहता है।
(b) तरंग ऊर्जा की सीमाएँ: (i) तरंगें अनियमित होती हैं — कभी शक्तिशाली, कभी मंद — इसलिए विद्युत उत्पादन स्थिर नहीं रहता। (ii) तरंग-ऊर्जा युक्तियाँ व संयंत्र महँगे होते हैं। (iii) खारे जल व तूफ़ानी तरंगों में युक्तियों का रख-रखाव कठिन होता है और उपयुक्त तटीय स्थान सीमित हैं।
(c) ज्वारीय ऊर्जा की सीमाएँ: (i) ज्वार दिन में सीमित समय ही आता है — उत्पादन बीच-बीच में रुककर होता है, निरंतर नहीं। (ii) बाँध बनाए जा सकने वाले उपयुक्त स्थान बहुत कम हैं। (iii) संयंत्र की निर्माण लागत अत्यधिक होती है।
संक्षेप: तीनों स्वच्छ व नवीकरणीय हैं, परंतु तीनों की साझा सीमाएँ हैं — अनियमित उत्पादन, कम उपयुक्त स्थान और ऊँची लागत।
प्रश्न 7. निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सत्य नहीं है — (a) ऊर्जा के स्रोत को हम या तो नवीकरणीय कह सकते हैं या अनवीकरणीय (b) ऊर्जा के स्रोत को हम या तो समाप्य कह सकते हैं या असमाप्य (c) ऊर्जा के स्रोत को हम या तो परंपरागत कह सकते हैं या नवीन (d) ऊर्जा के स्रोत को हम या तो वैकल्पिक कह सकते हैं या असमाप्य
हल:
चरण 1: नवीकरणीय व अनवीकरणीय एक जोड़ी है, और समाप्य व असमाप्य भी एक जोड़ी है — ये दोनों वर्गीकरण एक-दूसरे के समानार्थी हैं: नवीकरणीय = असमाप्य, अनवीकरणीय = समाप्य।
चरण 2: परंपरागत व नवीन भी एक वैध वर्गीकरण-जोड़ी है (समय व तकनीक के आधार पर)। परंतु कथन (d) में “वैकल्पिक” और “असमाप्य” को एक जोड़ी बनाकर कहा गया है, जो गलत है — “वैकल्पिक” शब्द “नवीन/गैर-परंपरागत” से जुड़ा है, न कि समाप्य/असमाप्य से। इसलिए यही कथन सत्य नहीं है।
उत्तर: हाँ, (a) और (b) के विकल्प समान हैं — नवीकरणीय = असमाप्य, अनवीकरणीय = समाप्य; अतः सत्य नहीं होने वाला कथन (d) है, क्योंकि वैकल्पिक और असमाप्य एक वर्गीकरण-जोड़ी नहीं बनाते।
प्रश्न 8. ऊर्जा के आदर्श स्रोत में कौन-से गुण होते हैं?
हल:
आदर्श ऊर्जा स्रोत के गुण इस अध्याय के आरंभ में ही बताए गए हैं:
(1) अधिक कार्य क्षमता: प्रति इकाई आयतन या द्रव्यमान से अधिक कार्य (ऊर्जा) दे — कम मात्रा में अधिक ऊर्जा।
(2) आसान उपलब्धता: जब और जहाँ चाहिए, वहाँ आसानी से उपलब्ध हो।
(3) भंडारण व परिवहन में सुविधा: उसे संचित करना और एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाना आसान हो।
(4) मितव्ययी (सस्ता): कीमत कम हो, ताकि हर वर्ग उसका उपयोग कर सके।
(5) सुरक्षित उपयोग: उपयोग के समय वह सुरक्षित हो — विस्फोट या दुर्घटना का खतरा न हो।
(6) पर्यावरण-अनुकूल: वह कम-से-कम प्रदूषण करे; आदर्श स्थिति में बिल्कुल प्रदूषण न करे।
उत्तर: आदर्श स्रोत वह है जो अधिक ऊर्जा दे, आसानी से मिले, भंडारण व परिवहन में सुविधाजनक हो, सस्ता हो, सुरक्षित हो और पर्यावरण को न्यूनतम हानि पहुँचाए।
प्रश्न 9. सौर कुकर का उपयोग करने के क्या लाभ तथा हानियाँ हैं? क्या ऐसे कोई क्षेत्र हैं जहाँ सौर कुकर की सीमित उपयोगिता हो?
हल:
लाभ: (1) ईंधन का कोई खर्च नहीं — सूर्य की ऊर्जा मुफ़्त है। (2) धुआँ व प्रदूषण नहीं — रसोई व पर्यावरण दोनों साफ़ रहते हैं। (3) सुरक्षित — आग की लपट नहीं होती, जलने का खतरा कम। (4) धीमी आँच में भोजन के पोषक तत्व बेहतर बने रहते हैं।
हानियाँ: (1) रात में तथा बादल वाले दिनों में उपयोग नहीं हो सकता। (2) भोजन धीरे पकता है — 2 से 3 घंटे लग सकते हैं। (3) भोजन को तलने (frying) या तेज़ आँच पर पकाने के लिए अनुपयुक्त है। (4) कुकर को बार-बार सूर्य की ओर घुमाना पड़ता है।
सीमित-उपयोगिता के क्षेत्र: हाँ — जहाँ धूप कम मिलती है, वहाँ सौर कुकर की उपयोगिता सीमित हो जाती है: (i) उत्तरी/पहाड़ी क्षेत्रों में, जहाँ सर्दियों में धूप कम और मौसम बादल-युक्त रहता है; (ii) अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में, जहाँ लंबे समय तक बादल छाए रहते हैं; (iii) ध्रुवीय व उच्च अक्षांशों में, जहाँ सूर्य की किरणें तिरछी पड़ती हैं और तीव्रता कम होती है।
निष्कर्ष: सौर कुकर धूप वाले क्षेत्रों में मुफ़्त व स्वच्छ खाना पकाने का उत्तम साधन है, परंतु उसकी उपयोगिता सूर्य की उपलब्धता पर ही टिकी है।
प्रश्न 10. ऊर्जा की बढ़ती माँग के क्या पर्यावरणीय परिणाम हो सकते हैं? ऊर्जा की खपत को कम करने के लिए आप क्या-क्या कदम उठाएँगे?
हल:
पर्यावरणीय परिणाम: (1) ऊर्जा की माँग बढ़ने से जीवाश्म ईंधनों का उपयोग बढ़ता है, जिससे वायु प्रदूषण बढ़ता है। (2) दहन से निकली CO2 से वैश्विक तापन होता है। (3) सल्फ़र व नाइट्रोजन ऑक्साइडों से अम्ल वर्षा होती है, जो फ़सलों, मिट्टी व जल-स्रोतों को हानि पहुँचाती है। (4) ऊर्जा संयंत्रों व बाँधों के निर्माण से वन नष्ट होते हैं और पारिस्थितिक तंत्र प्रभावित होता है। (5) कोयला खनन व तेल-निष्कर्षण से भूमि व जल प्रदूषित होते हैं।
खपत घटाने के सुझाव: (1) कमरे से बाहर जाते समय लाइट व पंखे बंद करें। (2) LED बल्ब और ऊर्जा-दक्ष (star-rated) उपकरणों का उपयोग करें। (3) सौर ऊष्मक व सौर कुकर जैसे उपकरण अपनाएँ। (4) छोटे सफ़र के लिए साइकिल या पैदल चलें; सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करें। (5) घरों में प्राकृतिक प्रकाश व वायु-संचार का अधिक उपयोग करें। (6) उपकरणों को स्टैंडबाय मोड पर न छोड़ें — प्लग से बंद करें। (7) ऊर्जा की बचत का प्रचार करें और दूसरों को भी जागरूक करें।
सार: बढ़ती ऊर्जा-माँग का पर्यावरण पर सीधा दबाव है; बचत व नवीकरणीय स्रोतों की ओर बढ़ना ही स्थायी समाधान है।
इस प्रश्नावली में हमने सीखा — 10 प्रश्नों की आत्मा तीन शब्दों में है: तुलना, सीमा और वर्गीकरण। इन्हें याद रखिए, फिर इस अध्याय का कोई भी प्रश्न कठिन नहीं लगेगा।
📖 Case Study – एक गाँव, तीन स्रोत और समझदारी का चुनाव
एक गाँव में बिजली की समस्या थी। गाँव के सरपंच ने तीन उपाय एक साथ अपनाए — (1) स्कूल की छत पर सौर पैनल लगवाए, (2) गाँव के गोबर से चलने वाला सामुदायिक बायोगैस संयंत्र बनवाया, और (3) गाँव के टीले पर दो पवन चक्कियाँ लगवाईं। सरपंच ने कहा — “कोई एक स्रोत ही काफ़ी नहीं है; समझदारी इसी में है कि तीनों को एक साथ उपयोग किया जाए।”
प्रश्न 1. गाँव में स्कूल की छत पर सौर पैनल क्यों लगाए गए — (A) क्योंकि सौर ऊर्जा सबसे सस्ती है (B) क्योंकि सौर ऊर्जा असमाप्य, प्रदूषण-रहित व मुफ़्त उपलब्ध है (C) क्योंकि सौर पैनल रात में भी चलते हैं (D) क्योंकि सौर ऊर्जा केवल छत पर ही उपलब्ध होती है
उत्तर देखें
उत्तर: (B) — सौर ऊर्जा असमाप्य है, उपयोग के समय कोई प्रदूषण नहीं करती और सूर्य की ऊर्जा मुफ़्त उपलब्ध है, इसलिए स्कूल की छत पर पैनल लगाना सही निर्णय था। (C) गलत है — सौर पैनल रात में नहीं चलते।
प्रश्न 2. सामुदायिक बायोगैस संयंत्र का सबसे बड़ा अतिरिक्त लाभ क्या है — (A) इससे केवल गैस मिलती है (B) गैस के साथ-साथ बचा हुआ गारा उत्तम जैविक खाद भी देता है (C) इससे बिजली मुफ़्त मिलती है (D) इससे गोबर की गंध बढ़ जाती है
उत्तर देखें
उत्तर: (B) — बायोगैस संयंत्र से न केवल धुआँ-रहित गैस मिलती है, बल्कि पाचक से बचा हुआ गारा खेतों के लिए उत्तम जैविक खाद भी बनता है — ऊर्जा के साथ खेती का लाभ भी।
प्रश्न 3. गाँव के टीले पर पवन चक्कियाँ क्यों लगाई गईं — (A) क्योंकि टीले पर हवा तेज़ व नियमित चलती है (B) क्योंकि टीले पर पवन चक्की सस्ती पड़ती है (C) क्योंकि टीले पर बिजली की खपत अधिक होती है (D) क्योंकि पवन चक्की केवल टीले पर ही चलती है
उत्तर देखें
उत्तर: (A) — टीले/ऊँचे खुले स्थान पर हवा तेज़ व नियमित चलती है, इसलिए वहाँ पवन चक्की से आर्थिक रूप से उपयोगी विद्युत उत्पादन संभव होता है।
प्रश्न 4. सरपंच का कथन “कोई एक स्रोत ही काफ़ी नहीं है” क्यों सही है — (A) क्योंकि तीनों स्रोत महँगे हैं (B) क्योंकि हर स्रोत की अपनी सीमा है — सौर बादल में घटता है, पवन हवा पर निर्भर है, बायोगैस निरंतर सहायक है; तीनों मिलकर आपूर्ति स्थिर रखते हैं (C) क्योंकि गाँव में बिजली की ज़रूरत नहीं है (D) क्योंकि तीनों स्रोत एक साथ नहीं चल सकते
उत्तर देखें
उत्तर: (B) — हर स्रोत की अपनी सीमा है; सौर बादल में घटता है, पवन हवा पर निर्भर है, बायोगैस निरंतर सहायक है; तीनों मिलकर आपूर्ति स्थिर रखते हैं।
⭐ Quick Revision – Important Points
- ✅ अच्छे स्रोत के चार गुण — प्रति इकाई अधिक कार्य, आसान उपलब्धता, आसान भंडारण-परिवहन, मितव्ययी। अच्छे ईंधन की पहली पहचान — उच्च ऊष्मीय मान (kJ/kg)।
- ✅ जीवाश्म ईंधन = लाखों वर्षों में बने कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस — समाप्य, प्रदूषणकारी, अम्ल वर्षा व वैश्विक तापन के ज़िम्मेदार।
- ✅ तापीय संयंत्र: ईंधन → भाप → टरबाइन → जनित्र → विद्युत; कोयला-क्षेत्रों के पास इसलिए, क्योंकि बिजली पहुँचाना कोयला ढोने से सस्ता है।
- ✅ जल विद्युत: स्थितिज → गतिज → विद्युत ऊर्जा; लाभ स्वच्छ व नवीकरणीय, हानि पारिस्थितिक क्षति व विस्थापन (टिहरी, सरदार सरोवर का विरोध)।
- ✅ बायोगैस में मीथेन 75% तक; पाचक में अपघटन ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में होता है; बचा गारा उत्तम खाद है।
- ✅ पवन चक्की के लिए पवन की गति 15 km/h से अधिक आवश्यक; भारत का सबसे बड़ा wind farm समूह तमिलनाडु (नागरकोइल–मदुरई) में है।
- ✅ सौर कुकर: काला रंग = अधिक अवशोषण, दर्पण = प्रकाश भेजना/केंद्रित करना, शीशा = ग्रीनहाउस प्रभाव; ताप 100–140°C, रोटी-तलना संभव नहीं।
- ✅ सौर सेल सिलिकॉन से बनता है; एक सेल ≈ 0.5–1 W; पैनल उपग्रहों का मुख्य ऊर्जा स्रोत है।
- ✅ OTEC के लिए सतह व 2 km गहराई के जल में 20°C या अधिक तापांतर चाहिए; ज्वारीय ऊर्जा चंद्रमा के गुरुत्व से मिलती है।
- ✅ भूतापीय ऊर्जा = धरती का आंतरिक ताप (गर्म स्थल, उष्ण झरने — पूगा घाटी, मणिकरण); यह सूर्य से प्राप्त नहीं होती।
- ✅ नाभिकीय ऊर्जा = यूरेनियम-235 का विखंडन; लाभ — थोड़े ईंधन से अपार ऊर्जा; जोखिम — रेडियोधर्मी अपशिष्ट व दुर्घटना। सूर्य में ऊर्जा संलयन से बनती है।
- ✅ नवीकरणीय = असमाप्य और अनवीकरणीय = समाप्य — दोनों वर्गीकरण समान हैं। कोई स्रोत पूर्णतः प्रदूषण-मुक्त नहीं; हाइड्रोजन CNG से स्वच्छ है, क्योंकि जलने पर केवल जल बनता है।
⚠️ Aam Galtiyan (Common Mistakes)
- सौर कुकर में दर्पण का प्रकार उलझाना: बॉक्स-कुकर में समतल दर्पण प्रकाश को भीतर भेजता है, परंतु “केंद्रित करने के लिए सर्वोत्तम दर्पण” पूछा जाए तो उत्तर अवतल दर्पण है। प्रश्न का शब्द ध्यान से पढ़ें।
- भूतापीय व नाभिकीय को सौर ऊर्जा मान लेना: पवन, बायोमास, जीवाश्म — ये सूर्य से जुड़े हैं; परंतु भूतापीय (धरती का ताप) और नाभिकीय (नाभिक का विखंडन) सूर्य से प्राप्त नहीं होते। Exercise प्रश्न 3 यहीं फँसाता है।
- बायोगैस का मुख्य घटक गलत लिखना: बायोगैस का सबसे बड़ा घटक मीथेन है (75% तक), CO2 नहीं। और अपघटन ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में होता है — “उपस्थिति” लिखना पूरी तरह गलत है।
- पवन की न्यूनतम गति भूलना: टरबाइन की आवश्यक चाल के लिए पवन गति 15 km/h से अधिक होनी चाहिए — यह संख्या MCQ में सीधे पूछी जाती है।
- सौर जल ऊष्मक व सौर सेल में भ्रम: ऊष्मक पानी गर्म करता है (ऊष्मा), सेल बिजली बनाता है। बादल वाले दिन दोनों ही प्रभावित होते हैं।
- नवीकरणीय-समाप्य की जोड़ी उलटी करना: कोयला समाप्य-अनवीकरणीय है, सौर असमाप्य-नवीकरणीय। तालिका बनाकर याद करें, उलझन खत्म हो जाएगी।
🎯 Bihar Board Exam Tips
- तुलना हमेशा table में लिखें: जीवाश्म बनाम सूर्य, बायोमास बनाम जल विद्युत और स्रोतों की बड़ी तुलना — तालिका में लिखने से परीक्षक को बिंदु स्पष्ट दिखते हैं और अंक पूरे मिलते हैं।
- संरचना-वर्णन के अभ्यास करें: सौर कुकर (काला बॉक्स, दर्पण, शीशा, काले बर्तन — प्रत्येक का कार्य सहित) और बायोगैस संयंत्र (मिश्रण टैंक, पाचक, गैस टंकी — प्रत्येक का कार्य सहित) — दोनों का एक-एक स्वच्छ नामांकित चित्र बनाना सीख लें।
- संख्यात्मक तथ्य रट लें: पवन गति 15 km/h से अधिक, बायोगैस में मीथेन 75% तक, सौर कुकर का ताप 100–140°C, एक सौर सेल 0.5–1 W, OTEC के लिए 20°C तापांतर — ये तथ्य MCQ में सीधे आते हैं।
- हानियाँ क्रम से लिखें: जीवाश्म ईंधन के प्रश्न में क्रम रखें — समाप्य भंडार → वायु प्रदूषण → अम्लीय ऑक्साइड से अम्ल वर्षा → CO2 से वैश्विक तापन। क्रमबद्ध उत्तर प्रभावशाली लगता है।
- “अपने शब्दों में तर्क” वाले प्रश्न न छोड़ें: नवीकरणीय/समाप्य स्रोत चुनकर तर्क देना, खपत घटाने के सुझाव — इनमें कोई एक सही उत्तर नहीं होता; स्पष्ट तर्क लिखने पर पूरे अंक मिलते हैं।
- पिछले वर्षों के BSEB प्रश्न-पत्रों से इस अध्याय के प्रश्न हल करके जाएँ — InText व प्रश्नावली के प्रश्न अक्सर दोहराए जाते हैं।
📝 MCQ Quiz – 15 वस्तुनिष्ठ प्रश्न (स्वयं को जाँचें)
पहले बिना देखे हल करें, फिर “✅ उत्तर देखें” खोलकर मिलाएँ। अंत में Answer Key table दी गई है।
Q1. निम्नलिखित में से कौन-सा ऊर्जा स्रोत नवीकरणीय है? —
(A) कोयला
(B) पेट्रोलियम
(C) सौर ऊर्जा
(D) प्राकृतिक गैस
✅ उत्तर देखें
उत्तर: (C) सौर ऊर्जा — सूर्य से निरंतर प्राप्त होती रहती है और उपयोग से समाप्त नहीं होती; बाकी तीनों जीवाश्म ईंधन समाप्य हैं।
Q2. अच्छे ईंधन की सबसे प्रमुख पहचान है —
(A) अधिक धुआँ देना
(B) उच्च ऊष्मीय मान
(C) अधिक राख छोड़ना
(D) कठिन भंडारण
✅ उत्तर देखें
उत्तर: (B) उच्च ऊष्मीय मान — 1 kg ईंधन से अधिक ऊष्मा मिलना ही अच्छे ईंधन की पहली कसौटी है।
Q3. निम्नलिखित में से कौन जीवाश्म ईंधन नहीं है? —
(A) कोयला
(B) पेट्रोलियम
(C) प्राकृतिक गैस
(D) बायोगैस
✅ उत्तर देखें
उत्तर: (D) बायोगैस — यह गोबर के ताज़ा अपघटन से बनती है; शेष तीनों लाखों वर्षों में बने जीवाश्म ईंधन हैं।
Q4. तापीय विद्युत संयंत्र में टरबाइन को घुमाने का कार्य करता है —
(A) उच्च दाब की भाप
(B) बहता ठंडा पानी
(C) पवन
(D) सौर प्रकाश
✅ उत्तर देखें
उत्तर: (A) उच्च दाब की भाप — ईंधन जलाकर बनाई गई भाप ही टरबाइन घुमाती है, जिससे जनित्र बिजली बनाता है।
Q5. जल विद्युत संयंत्र में ऊर्जा रूपांतरण का सही क्रम है —
(A) विद्युत → गतिज → स्थितिज
(B) स्थितिज → गतिज → विद्युत
(C) गतिज → स्थितिज → विद्युत
(D) ऊष्मीय → गतिज → विद्युत
✅ उत्तर देखें
उत्तर: (B) स्थितिज → गतिज → विद्युत — ऊँचाई पर जमा जल गिरकर गतिज ऊर्जा पाता है और टरबाइन-जनित्र से विद्युत बनती है।
Q6. सौर कुकर के भीतर बर्तन काले रंग के क्यों रखे जाते हैं? —
(A) सुंदर दिखने के लिए
(B) जंग से बचाने के लिए
(C) काली सतह ऊष्मा का अवशोषण अधिक करती है
(D) भोजन का रंग बदलने के लिए
✅ उत्तर देखें
उत्तर: (C) काली सतह ऊष्मा का अवशोषण अधिक करती है — इसी से बर्तन व भोजन शीघ्र गर्म होते हैं।
Q7. सौर सेल सामान्यतः किस पदार्थ से बनाए जाते हैं? —
(A) कॉपर
(B) सिलिकॉन
(C) ऐलुमिनियम
(D) कार्बन
✅ उत्तर देखें
उत्तर: (B) सिलिकॉन — यह विशेष अर्धचालक सौर ऊर्जा को सीधे विद्युत में बदलता है।
Q8. पवन ऊर्जा के उपयोगी उत्पादन के लिए पवन की गति होनी चाहिए —
(A) 15 km/h से अधिक
(B) 5 km/h से कम
(C) ठीक 100 km/h
(D) गति का कोई महत्व नहीं
✅ उत्तर देखें
उत्तर: (A) 15 km/h से अधिक — टरबाइन की आवश्यक चाल बनाए रखने के लिए NCERT यही न्यूनतम गति बताता है।
Q9. भारत में पवन ऊर्जा का सबसे बड़ा फ़ार्म समूह किस राज्य में है? —
(A) बिहार
(B) पंजाब
(C) असम
(D) तमिलनाडु
✅ उत्तर देखें
उत्तर: (D) तमिलनाडु — यहाँ नागरकोइल से मदुरई तक फैला पवन ऊर्जा फ़ार्म समूह देश का सबसे बड़ा है।
Q10. बायोगैस का मुख्य घटक (लगभग 75% तक) है —
(A) कार्बन डाइऑक्साइड
(B) मीथेन
(C) हाइड्रोजन
(D) नाइट्रोजन
✅ उत्तर देखें
उत्तर: (B) मीथेन — इसी के कारण बायोगैस उच्च ऊष्मीय मान वाला, धुएँ-रहित उत्तम ईंधन है।
Q11. बायोगैस संयंत्र के पाचक में गोबर का अपघटन होता है —
(A) सूर्य के प्रकाश में
(B) ऑक्सीजन की उपस्थिति में
(C) ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में
(D) उच्च दाब की भाप से
✅ उत्तर देखें
उत्तर: (C) ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में — बंद पाचक में अवायवीय सूक्ष्मजीव ही गोबर का अपघटन करके गैस बनाते हैं।
Q12. ज्वारीय ऊर्जा का मूल कारण है —
(A) चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण
(B) सूर्य की ऊष्मा
(C) पृथ्वी का चुंबकत्व
(D) वर्षा का जल
✅ उत्तर देखें
उत्तर: (A) चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण — इसी से समुद्र में ज्वार-भाटा आता है, जिसकी ऊर्जा बाँध व टरबाइन से पकड़ी जाती है।
Q13. OTEC संयंत्र के कार्य करने के लिए समुद्र की सतह व गहराई के जल के ताप में अंतर होना चाहिए —
(A) 2°C
(B) 20°C या अधिक
(C) 100°C
(D) कोई अंतर आवश्यक नहीं
✅ उत्तर देखें
उत्तर: (B) 20°C या अधिक — सतह के गर्म व 2 km गहराई तक के ठंडे जल का यही तापांतर OTEC का आधार है।
Q14. भूतापीय ऊर्जा के “गर्म स्थल” (hot spots) पाए जाते हैं —
(A) समुद्र की सतह पर
(B) वायुमंडल में
(C) चंद्रमा पर
(D) भूपर्पटी के नीचे, जहाँ गर्म पिघला पदार्थ जमा होता है
✅ उत्तर देखें
उत्तर: (D) भूपर्पटी के नीचे — वहीं भूमिगत जल भाप बनता है, जिससे टरबाइन चलाकर विद्युत बनाई जाती है।
Q15. नाभिकीय विद्युत संयंत्रों में ऊर्जा प्राप्त होती है —
(A) नाभिकीय संलयन से
(B) यूरेनियम-235 के विखंडन से
(C) कोयले के दहन से
(D) हाइड्रोजन के दहन से
✅ उत्तर देखें
उत्तर: (B) यूरेनियम-235 के विखंडन से — भारी नाभिक के टूटने से अपार ऊर्जा निकलती है। संलयन सूर्य में होता है।
Answer Key – उत्तरमाला
| प्रश्न | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 | 8 | 9 | 10 | 11 | 12 | 13 | 14 | 15 |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| उत्तर | C | B | D | A | B | C | B | A | D | B | C | A | B | D | B |
❓ FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1. Bihar Board परीक्षा में इस अध्याय से किस प्रकार के प्रश्न आते हैं?
उत्तर: प्रश्न-पत्र का पैटर्न समय-समय पर बदलता रहता है, इसलिए निश्चित अंक-संख्या कहना ठीक नहीं होगा। सामान्यतः इस अध्याय से स्रोतों के वर्गीकरण व तथ्यों (मीथेन 75%, पवन गति 15 km/h, OTEC 20°C) पर वस्तुनिष्ठ प्रश्न, सौर कुकर व बायोगैस संयंत्र की संरचना पर लघु उत्तरीय प्रश्न और जीवाश्म ईंधनों की हानियों व तुलनाओं पर दीर्घ उत्तरीय प्रश्न नियमित रूप से पूछे जाते हैं। अध्याय अवधारणा-आधारित है, इसलिए रटने के बजाय तुलना समझकर पढ़ें।
प्रश्न 2. नवीकरणीय और असमाप्य स्रोतों में क्या अंतर है?
उत्तर: व्यावहारिक रूप से कोई अंतर नहीं है — दोनों वर्गीकरण समान हैं। जो स्रोत प्रकृति में निरंतर बनते रहते हैं और जिनकी पूर्ति होती रहती है (सौर, पवन, जल), वे नवीकरणीय भी हैं और असमाप्य भी। इसी प्रकार जो भंडार सीमित हैं (कोयला, पेट्रोलियम), वे अनवीकरणीय भी हैं और समाप्य भी। Exercise प्रश्न 7 में यही बात पूछी गई है।
प्रश्न 3. सौर ऊर्जा इतनी अच्छी है तो हम पूरी तरह उसी पर क्यों नहीं निर्भर हो जाते?
उत्तर: तीन कारण हैं — (1) सौर ऊर्जा केवल दिन में और साफ़ मौसम में मिलती है, रात व बादल में उत्पादन रुकता या घटता है, जबकि हमें ऊर्जा हर समय चाहिए; (2) सौर सेल व पैनल अभी अपेक्षाकृत महँगे हैं और उनकी दक्षता कम है, साथ ही ऊर्जा संचय के लिए बैटरियाँ चाहिए; (3) बड़े पैमाने के उत्पादन के लिए बहुत बड़ा क्षेत्र चाहिए। इसलिए व्यावहारिक उत्तर है — सौर को अन्य स्रोतों के साथ मिलाकर धीरे-धीरे उसका भाग बढ़ाना।
प्रश्न 4. बायोगैस और गोबर के कंडों में से कौन-सा उपयोग बेहतर है और क्यों?
उत्तर: बायोगैस स्पष्ट रूप से बेहतर है। कंडे जलाने पर उनका अधिकांश ऊर्जा-भाग व्यर्थ जाता है, घर में हानिकारक धुआँ भरता है और गोबर की खाद-क्षमता भी नष्ट हो जाती है। वहीं बायोगैस संयंत्र में उसी गोबर से धुएँ-रहित, उच्च ऊष्मीय मान वाली गैस मिलती है और बचा हुआ गारा नाइट्रोजन-फ़ॉस्फ़ोरस युक्त उत्तम खाद के रूप में खेत को लौट जाता है — अर्थात ऊर्जा भी, खाद भी।
प्रश्न 5. NCERT की किताब (PDF) कहाँ से मिलेगी?
उत्तर: NCERT की आधिकारिक वेबसाइट ncert.nic.in से Class 10 Science की किताब का PDF बिल्कुल मुफ़्त डाउनलोड किया जा सकता है। बिहार Board के विद्यार्थियों के लिए यही पुरानी NCERT पुस्तक (16 अध्यायों वाली) लागू है, वहीं से आप इस अध्याय का मूल पाठ पढ़ सकते हैं।
🔗 Pichhla / Agla Adhyay – पिछले व अगले अध्याय पढ़ें
⬅️ पिछला अध्याय: अध्याय 13 — विद्युत धारा के चुंबकीय प्रभाव (Magnetic Effects of Electric Current): Class 10 Science Chapter 13 — वहाँ आपने जनित्र (generator) का सिद्धांत पढ़ा था; इस अध्याय के हर बिजली-संयंत्र में वही जनित्र काम करता है!
➡️ अगला अध्याय: अध्याय 15 — हमारा पर्यावरण (Our Environment): Class 10 Science Chapter 15
📚 सभी अध्यायों की सूची यहाँ देखें: NCERT Class 10 Bihar Board Science Book
🔚 Conclusion – निष्कर्ष
बधाई हो! आपने वह अध्याय पूरा कर लिया, जो सीधे हमारे भविष्य से जुड़ा है। अब आप जानते हैं कि अच्छा स्रोत और अच्छा ईंधन कैसे पहचाना जाता है, जीवाश्म ईंधन सुविधाजनक होकर भी समाप्य व प्रदूषणकारी क्यों हैं, बाँध और बायोगैस संयंत्र कैसे काम करते हैं, सौर कुकर में काले रंग व शीशे का क्या कमाल है, पवन के लिए 15 km/h की शर्त क्यों है, और नाभिकीय ऊर्जा की अपार शक्ति के पीछे कितना बड़ा जोखिम छिपा है।
सबसे बड़ी सीख एक ही है — कोई एक स्रोत हर समस्या का हल नहीं है; परिस्थितियों के अनुसार स्रोतों का विवेकपूर्ण मिश्रण और ऊर्जा की बचत ही सही रास्ता है। ऊपर दिए गए सभी 24 हल किए गए प्रश्नों (InText 14 + प्रश्नावली 10), क्रियाकलाप-आधारित उदाहरणों और 15 MCQ का अभ्यास कीजिए। किताब का मूल पाठ पढ़ने के लिए NCERT की आधिकारिक वेबसाइट ncert.nic.in से PDF ले सकते हैं। अब अगले अध्याय — हमारा पर्यावरण — की तैयारी शुरू कीजिए; वहाँ इस अध्याय की पर्यावरण-चर्चा और गहरी होगी। शुभकामनाएँ, मेहनत जारी रखिए!
