NCERT Class 10 Science Chapter 13 Magnetic Effects of Electric Current in Hindi | विद्युत धारा के चुंबकीय प्रभाव Notes, MCQ व प्रश्न-उत्तर

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परिचय – यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है?

Class 10 Science Chapter 13 Magnetic Effects of Electric Current के NCERT Solutions आपको इस पेज पर सरल हिंदी में, किताब के क्रम से मिलेंगे। Class 10 Science Chapter 13 Magnetic Effects of Electric Current यानी विद्युत धारा के चुंबकीय प्रभाव — यह भौतिकी का वह अध्याय है जो बताता है कि बिजली और चुंबकत्व अलग-अलग चीज़ें नहीं हैं, बल्कि एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।

ज़रा अपने घर की ओर देखिए — पंखा घूम रहा है, कूलर चल रहा है, पानी की मोटर टंकी भर रही है, दरवाज़े की घंटी बज रही है, फ्रिज का कंप्रेसर काम कर रहा है। इन सबके अंदर कहीं-न-कहीं एक विद्युत मोटर या विद्युत-चुंबक छिपा है। और जिस बिजली से ये सब चलते हैं, वह बिजली भी कहीं दूर किसी बिजली-घर में एक विशाल जनित्र (जनरेटर) में चुंबक और कुंडली की मदद से ही बनाई जाती है। यानी यह अध्याय पढ़ना मतलब है — अपने आस-पास की हर मशीन का रहस्य समझ लेना!

कहानी बहुत रोचक है। सन् 1820 में डेनमार्क के वैज्ञानिक हैंस क्रिश्चियन ऑर्स्टेड ने अनजाने में देखा कि जब किसी तार में विद्युत धारा बहती है तो पास रखी दिक्सूचक (कंपास) की सुई हिल जाती है। बस, यहीं से सिद्ध हो गया कि विद्युत धारा चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न करती है। इसके बाद माइकल फैराडे ने इसका उलटा करके दिखाया — बदलते चुंबकीय क्षेत्र से विद्युत धारा भी बनाई जा सकती है। इन्हीं दो खोजों पर आज की पूरी बिजली-तकनीक खड़ी है।

इस अध्याय में हम सीखेंगे कि चुंबकीय क्षेत्र रेखाएँ कैसी होती हैं, सीधे तार, वृत्ताकार पाश और परिनालिका (सोलनॉइड) के चारों ओर चुंबकीय क्षेत्र कैसा बनता है, दायाँ हाथ अँगूठा नियम, फ्लेमिंग के बाएँ और दाएँ हाथ के नियम कैसे काम करते हैं, विद्युत मोटर और विद्युत जनित्र कैसे चलते हैं, और घर की वायरिंग में फ्यूज़ व भू-तार हमारी जान की रक्षा कैसे करते हैं।

Bihar Board (BSEB) Class 10 की परीक्षा में इस अध्याय से हर साल भरपूर प्रश्न आते हैं — फ्लेमिंग के नियम, मोटर व जनित्र के नामांकित चित्र व कार्यविधि, परिनालिका, घरेलू परिपथ की सुरक्षा — ये सब Board के सबसे पसंदीदा प्रश्न हैं। एक अच्छी बात यह भी है कि इस अध्याय में कठिन गणित लगभग नहीं है; केवल अवधारणाएँ (concepts), नियम और चित्र समझने हैं। जो विद्यार्थी नियमों को हाथ की उँगलियों पर ठीक से बैठा लेता है, उसके लिए यह अध्याय पूरे अंक देने वाला अध्याय बन जाता है।

📌 खास बात: इस अध्याय के तीन नियम — दायाँ हाथ अँगूठा नियम, फ्लेमिंग का बायाँ हाथ नियम (मोटर के लिए) और फ्लेमिंग का दायाँ हाथ नियम (जनित्र के लिए) — ही लगभग आधे प्रश्नों की कुंजी हैं। इन्हें रटिए मत; अपने हाथ पर बार-बार लगाकर देखिए, उँगलियाँ खुद दिशा बताने लगेंगी।

📋 अध्याय की जानकारी (Chapter Information)

Board Bihar Board (BSEB)
Textbook NCERT
Class 10
Subject Science (विज्ञान)
Chapter 13
Chapter Name Magnetic Effects of Electric Current (विद्युत धारा के चुंबकीय प्रभाव)
कुल हल किए गए प्रश्न 39 (InText 21 + प्रश्नावली 18)

📚 इस Chapter में क्या-क्या है? (Topics)

  1. 13.1 चुंबकीय क्षेत्र और क्षेत्र रेखाएँ – चुंबकीय क्षेत्र की परिभाषा, दिक्सूचक सुई, दंड चुंबक का क्षेत्र, क्षेत्र रेखाओं के गुण
  2. 13.2 विद्युत धारा के कारण चुंबकीय क्षेत्र
    • 13.2.1 सीधे चालक से गुजरने वाली धारा का क्षेत्र व दायाँ हाथ अँगूठा नियम
    • 13.2.2 वृत्ताकार पाश (लूप) से गुजरने वाली धारा का क्षेत्र
    • 13.2.3 परिनालिका (सोलनॉइड) में प्रवाहित धारा का क्षेत्र व विद्युत-चुंबक
  3. 13.3 चुंबकीय क्षेत्र में धारावाही चालक पर बल – फ्लेमिंग का बायाँ हाथ नियम
  4. 13.4 विद्युत मोटर – सिद्धांत, संरचना, कार्यविधि व विभक्त वलय की भूमिका
  5. 13.5 विद्युतचुंबकीय प्रेरण – फैराडे का नियम, फ्लेमिंग का दायाँ हाथ नियम, प्रेरित धारा उत्पन्न करने के ढंग
  6. 13.6 विद्युत जनित्र – AC जनित्र व DC जनित्र, संरचना, कार्यविधि व दोनों में अंतर
  7. 13.7 घरेलू विद्युत परिपथ – तारों के रंग, भू-तार, फ्यूज़, लघुपथन (शॉर्ट सर्किट) व अतिभारण (ओवरलोडिंग)
  8. पाठ्य-पुस्तक के प्रश्न (InText) – 21 प्रश्न, NCERT क्रियाकलाप-आधारित उदाहरण, प्रश्नावली के 18 प्रश्न
  9. Case Study, Quick Revision, Common Mistakes, Bihar Board Exam Tips, MCQ Quiz व FAQ

📊 Key Concepts – मुख्य परिभाषाएँ व नियम

पद / नियम अर्थ (एक लाइन में)
चुंबकीय क्षेत्र (Magnetic Field) किसी चुंबक के चारों ओर का वह क्षेत्र, जहाँ तक उसके बल का प्रभाव अनुभव किया जा सकता है; यह एक सदिश राशि है — इसमें परिमाण और दिशा दोनों होते हैं।
क्षेत्र रेखाएँ (Field Lines) चुंबकीय क्षेत्र को दर्शाने वाली काल्पनिक रेखाएँ, जिनके किसी बिंदु पर खींची गई स्पर्श रेखा उस बिंदु पर क्षेत्र की दिशा बताती है।
दायाँ हाथ अँगूठा नियम दायाँ अँगूठा धारा की दिशा में हो तो मुड़ी हुई उँगलियाँ चुंबकीय क्षेत्र की दिशा बताती हैं।
परिनालिका (Solenoid) पास-पास लिपटे विद्युतरोधी ताँबे के तार की बेलनाकार कुंडली; धारा बहने पर यह दंड चुंबक की तरह व्यवहार करती है।
विद्युत-चुंबक (Electromagnet) परिनालिका के भीतर नर्म लोहे की क्रोड रखकर बनाया गया अस्थायी चुंबक, जो धारा बंद करते ही अपना चुंबकत्व खो देता है।
फ्लेमिंग का बायाँ हाथ नियम बाएँ हाथ में अँगूठा = बल (गति), तर्जनी = चुंबकीय क्षेत्र, मध्यमा = विद्युत धारा — चालक पर लगने वाले बल की दिशा बताता है (मोटर का नियम)।
विद्युत मोटर विद्युत ऊर्जा को यांत्रिक (गतिज) ऊर्जा में बदलने वाली युक्ति — चुंबकीय क्षेत्र में धारावाही कुंडली पर लगने वाले बल-युग्म पर आधारित।
विद्युतचुंबकीय प्रेरण किसी कुंडली से जुड़े चुंबकीय क्षेत्र (फ्लक्स) में परिवर्तन होने पर कुंडली में विद्युत धारा प्रेरित होने की घटना — फैराडे की खोज।
फ्लेमिंग का दायाँ हाथ नियम दाएँ हाथ में अँगूठा = चालक की गति, तर्जनी = चुंबकीय क्षेत्र, मध्यमा = प्रेरित धारा — प्रेरित धारा की दिशा बताता है (जनित्र का नियम)।
विद्युत जनित्र (Generator) यांत्रिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में बदलने वाली युक्ति — विद्युतचुंबकीय प्रेरण पर आधारित।
फ्यूज़ (Fuse) कम गलनांक वाले तार का सुरक्षा-उपाय, जो निर्धारित धारा से अधिक धारा बहने पर पिघलकर परिपथ तोड़ देता है।
भू-तार (Earth Wire) उपकरण के धात्विक आवरण को पृथ्वी से जोड़ने वाला हरे विद्युतरोधन वाला तार, जो धारा के रिसाव पर उसे सीधे भूमि में भेजकर झटके से बचाता है।

सबसे काम की बात: धारा चुंबकीय क्षेत्र बनाती है (ऑर्स्टेड) और बदलता चुंबकीय क्षेत्र धारा बनाता है (फैराडे)। पहला तथ्य मोटर चलाता है, दूसरा जनित्र — पूरा अध्याय इन्हीं दो पंक्तियों में समाया है!

चुंबकीय क्षेत्र व क्षेत्र रेखाएँ – अदृश्य बल की नक्शा-रेखाएँ

चुंबक को मेज़ पर रखिए और उसके पास लोहे की कीलें ले जाइए — कीलें दूर से ही खिंचने लगती हैं, बिना छुए! चुंबक के चारों ओर का यही अदृश्य प्रभाव-क्षेत्र चुंबकीय क्षेत्र कहलाता है। यह क्षेत्र जितना प्रबल होगा, कील पर उतना ही अधिक बल लगेगा। चुंबकीय क्षेत्र में परिमाण भी होता है और दिशा भी, इसलिए यह एक सदिश राशि है। इसके SI मात्रक को टेस्ला (T) कहते हैं।

अदृश्य चीज़ को देखा कैसे जाए? इसका सबसे सरल साधन है — दिक्सूचक (कंपास) सुई। यह सुई स्वयं एक छोटा-सा, हल्का चुंबक होती है जो एक धुरी पर स्वतंत्र रूप से घूम सकती है। जहाँ भी चुंबकीय क्षेत्र होगा, सुई उस क्षेत्र की दिशा में ठहर जाएगी। इसीलिए इसे चुंबक के पास लाने पर सुई विक्षेपित हो जाती है — क्योंकि पास आया चुंबक सुई के ध्रुवों पर आकर्षण-प्रतिकर्षण का बल लगाता है।

दंड चुंबक के चारों ओर क्षेत्र रेखाएँ कैसे खींचते हैं?

एक दंड (छड़) चुंबक को कागज़ पर रखिए। उसके उत्तरी ध्रुव के पास दिक्सूचक सुई रखकर सुई के दोनों सिरों के बिंदु अंकित कीजिए। फिर सुई को एक कदम आगे खिसकाइए — जहाँ सुई का दक्षिणी सिरा था, वहीं अब उसका उत्तरी सिरा रखिए — और नए बिंदु अंकित कीजिए। ऐसे कदम-दर-कदम आगे बढ़ते हुए चुंबक के दक्षिणी ध्रुव तक पहुँचिए। सारे बिंदुओं को मिलाने पर एक वक्र रेखा बन जाती है — यही चुंबकीय क्षेत्र रेखा है। ऐसे ही कई बिंदुओं से शुरू करके चुंबक के चारों ओर क्षेत्र रेखाओं का पूरा चित्र बन जाता है।

कागज़ पर लोहे का बुरादा छिड़ककर हल्का-सा थपथपाने से भी यही चित्र बनता है — बुरादे के कण क्षेत्र रेखाओं के अनुदिश कतारों में जम जाते हैं। ध्रुवों के पास ये कतारें बहुत घनी होती हैं, क्योंकि वहाँ क्षेत्र सबसे प्रबल होता है।

क्षेत्र रेखाओं के गुण – Board का प्रिय प्रश्न

  • दिशा: चुंबक के बाहर क्षेत्र रेखाएँ उत्तरी ध्रुव (N) से निकलकर दक्षिणी ध्रुव (S) की ओर जाती हैं, जबकि चुंबक के अंदर इनकी दिशा दक्षिणी ध्रुव से उत्तरी ध्रुव की ओर होती है। इस प्रकार क्षेत्र रेखाएँ बंद वक्र (closed curves) बनाती हैं।
  • कभी प्रतिच्छेद नहीं करतीं: दो क्षेत्र रेखाएँ एक-दूसरे को कभी नहीं काटतीं। यदि वे काटतीं, तो कटान-बिंदु पर क्षेत्र की दो दिशाएँ हो जातीं — जो संभव नहीं है, क्योंकि दिक्सूचक सुई एक समय में दो दिशाओं में नहीं ठहर सकती।
  • स्पर्श रेखा = क्षेत्र की दिशा: क्षेत्र रेखा के किसी बिंदु पर खींची गई स्पर्श रेखा उस बिंदु पर चुंबकीय क्षेत्र की दिशा दर्शाती है।
  • सघनता = प्रबलता: जहाँ क्षेत्र रेखाएँ अधिक सघन (पास-पास) होती हैं, वहाँ चुंबकीय क्षेत्र अधिक प्रबल होता है; जहाँ रेखाएँ दूर-दूर होती हैं, वहाँ क्षेत्र दुर्बल होता है। ध्रुवों के निकट क्षेत्र सबसे प्रबल होता है।
  • एकसमान क्षेत्र: यदि किसी क्षेत्र में रेखाएँ समांतर और बराबर दूरी पर हों, तो वहाँ चुंबकीय क्षेत्र एकसमान कहलाता है — जैसे किसी लंबी परिनालिका के अंदर के मध्य भाग में।

📌 याद रखें: क्षेत्र रेखाएँ वास्तविक तार नहीं हैं — ये काल्पनिक रेखाएँ हैं, जो केवल क्षेत्र का चित्र समझने के लिए बनाई गई हैं। परंतु परीक्षा में इन्हीं रेखाओं के गुणों पर सीधे प्रश्न आते हैं, इसलिए ऊपर के पाँचों गुण शब्दशः तैयार रखिए।

एक साँस में समझें — क्षेत्र रेखाएँ चुंबक के बाहर N से S की ओर, अंदर S से N की ओर चलती हैं; ये कभी काटती नहीं हैं और जहाँ घनी होती हैं, वहाँ क्षेत्र प्रबल होता है।

धारावाही चालक का चुंबकीय क्षेत्र – सीधा तार, पाश और परिनालिका

अब अध्याय का दिल समझिए। ऑर्स्टेड के प्रयोग का आधुनिक रूप क्रियाकलाप में इस प्रकार किया जाता है — एक सीधा मोटा ताँबे का तार कार्डबोर्ड के बीच से ऊर्ध्वाधर गुज़ारिए, उसे बैटरी, कुंजी और धारा-नियंत्रक से जोड़िए, और कार्डबोर्ड पर लोहे का बुरादा छिड़किए। कुंजी दबाते ही धारा बहेगी और बुरादा तार के चारों ओर संकेंद्री वृत्तों (concentric circles) में जम जाएगा। इसका अर्थ स्पष्ट है — सीधे धारावाही तार के चारों ओर चुंबकीय क्षेत्र की रेखाएँ तार को केंद्र मानकर बने संकेंद्री वृत्त होती हैं।

कुछ और बातें ध्यान दीजिए — तार से दूरी बढ़ने पर वृत्त बड़े और दूर-दूर होते जाते हैं, अर्थात क्षेत्र दुर्बल होता जाता है। धारा बढ़ाने पर क्षेत्र प्रबल हो जाता है। और धारा की दिशा उलटते ही वृत्तों की दिशा (दिक्सूचक सुई का विक्षेप) भी उलट जाती है। अर्थात क्षेत्र की दिशा धारा की दिशा पर निर्भर करती है।

दायाँ हाथ अँगूठा नियम (Right-Hand Thumb Rule) – शब्दों में पक्का करें

नियम: मान लीजिए आप धारावाही चालक को अपने दाएँ हाथ में इस प्रकार पकड़े हैं कि अँगूठा विद्युत धारा की दिशा की ओर संकेत करता हो। तब आपकी मुड़ी हुई उँगलियाँ चालक के चारों ओर चुंबकीय क्षेत्र रेखाओं की दिशा बताती हैं।

इसे मैक्सवेल का कॉर्क-स्क्रू नियम भी कहा जाता है — यदि कॉर्क-स्क्रू (पेच) को धारा की दिशा में आगे बढ़ाया जाए, तो उसके घूमने की दिशा ही चुंबकीय क्षेत्र की दिशा होती है। कागज़ पर चित्र बनाते समय दो संकेत याद रखिए — कागज़ के तल के अंदर जाती धारा या क्षेत्र को × (क्रॉस) से और कागज़ से बाहर आती दिशा को • (बिंदु) से दर्शाते हैं। सोचिए, तीर आपकी ओर आ रहा हो तो उसका अगला सिरा बिंदु दिखेगा, और जाता हुआ तीर पीछे से क्रॉस (पंख) दिखेगा — बस यही संकेत हैं!

वृत्ताकार पाश (लूप) का चुंबकीय क्षेत्र

अब उसी तार को मोड़कर एक वृत्ताकार पाश (loop) बना दीजिए। पाश के हर बिंदु पर क्षेत्र रेखाएँ संकेंद्री वृत्त होंगी, परंतु पाश के केंद्र पर सभी भागों से बनी रेखाएँ एक ही दिशा में जुड़कर लगभग सीधी रेखाओं जैसी हो जाती हैं। परिणाम — पाश के केंद्र पर चुंबकीय क्षेत्र काफी प्रबल हो जाता है और उसकी दिशा पाश के तल के लंबवत् होती है।

पाश में फेरों की संख्या बढ़ा दी जाए — यानी तार को कई बार लपेटकर कुंडली बना दी जाए — तो केंद्र का क्षेत्र उतने ही गुना प्रबल हो जाता है, क्योंकि हर फेरे का क्षेत्र एक ही दिशा में जुड़ता है। क्षेत्र की प्रबलता तीन बातों पर निर्भर करती है — धारा जितनी अधिक, फेरे जितने अधिक, क्षेत्र उतना प्रबल।

ध्रुव कैसे पहचानें? पाश के जिस सिरे को देखने पर धारा वामावर्त (anti-clockwise) बहती दिखे, वह सिरा उत्तरी ध्रुव की तरह और जिस सिरे पर धारा दक्षिणावर्त (clockwise) दिखे, वह सिरा दक्षिणी ध्रुव की तरह व्यवहार करता है। याद रखने की तरकीब — घड़ी की सुई से उलटा = उत्तर (N)। धारा उलटते ही ध्रुव भी उलट जाते हैं।

परिनालिका (Solenoid) – धारा से बना दंड चुंबक

पास-पास लिपटे हुए विद्युतरोधी (इनेमल चढ़े) ताँबे के तार की बेलन की आकृति की अनेक फेरों वाली कुंडली को परिनालिका कहते हैं। जब इसमें धारा बहती है, तो इसके चारों ओर का चुंबकीय क्षेत्र बिल्कुल दंड चुंबक के क्षेत्र जैसा बनता है — एक सिरा उत्तरी ध्रुव और दूसरा सिरा दक्षिणी ध्रुव की तरह व्यवहार करने लगता है।

परिनालिका की सबसे खास बात इसके अंदर का क्षेत्र है — अंदर क्षेत्र रेखाएँ परस्पर समांतर होती हैं, जिसका अर्थ है कि परिनालिका के अंदर (विशेषकर मध्य भाग में) चुंबकीय क्षेत्र सभी बिंदुओं पर एकसमान होता है। बाहर की ओर क्षेत्र रेखाएँ दंड चुंबक की भाँति N से S की ओर जाती हैं। धारा की दिशा उलटने पर परिनालिका के ध्रुव भी उलट जाते हैं — यही गुण इसे साधारण चुंबक से अलग और अधिक उपयोगी बनाता है।

विद्युत-चुंबक (Electromagnet) – परिनालिका का जादुई रूप

परिनालिका के भीतर नर्म लोहे (soft iron) की एक छड़ रख दीजिए और धारा बहाइए — लोहे की छड़ प्रबल चुंबक बन जाएगी! यही विद्युत-चुंबक है। नर्म लोहा इसलिए चुना जाता है, क्योंकि वह धारा बहते ही तुरंत प्रबल चुंबक बनता है और धारा बंद होते ही लगभग तुरंत अपना चुंबकत्व खो भी देता है। इस्पात (steel) ऐसा नहीं करता — वह स्थायी चुंबक बन जाता है, जो यहाँ नहीं चाहिए।

विद्युत-चुंबक की प्रबलता कैसे बढ़ाएँ? तीन तरीके हैं — (1) धारा का मान बढ़ाकर, (2) कुंडली के फेरों की संख्या बढ़ाकर, (3) नर्म लोहे की क्रोड का उपयोग करके।

उपयोग: विद्युत-चुंबक के उपयोग हमारे चारों ओर फैले हैं — बिजली की घंटी, विद्युत मोटर, जनित्र, लाउडस्पीकर, टेलीफोन के ईयरपीस, अस्पतालों में आँख से लोहे का कण निकालने के चुंबक, और कबाड़खानों की विशाल क्रेनें, जो एक स्विच दबाते ही टनों लोहा उठा लेती हैं और स्विच बंद करते ही गिरा देती हैं। स्थायी चुंबक से यह संभव नहीं होता, क्योंकि उसे “बंद” नहीं किया जा सकता!

📌 ध्यान दें: विद्युत-चुंबक अस्थायी चुंबक होता है — उसकी शक्ति धारा से नियंत्रित होती है और ध्रुव धारा उलटकर बदले जा सकते हैं। स्थायी चुंबक इस्पात का बना होता है, उसकी शक्ति न तो घटाई-बढ़ाई जा सकती है, न ध्रुव आसानी से बदले जा सकते हैं।

एक साँस में समझें — सीधा तार वृत्तीय क्षेत्र बनाता है, पाश केंद्र पर क्षेत्र को जोड़कर प्रबल करता है, और परिनालिका तो धारा बहते ही पूरा दंड चुंबक बन जाती है।

चुंबकीय क्षेत्र में धारावाही चालक पर बल – फ्लेमिंग का बायाँ हाथ नियम

पहले हमने देखा कि धारा चुंबकीय क्षेत्र बनाती है। अब इसका दूसरा पहलू देखिए — यदि किसी धारावाही चालक को किसी चुंबक के चुंबकीय क्षेत्र में रख दिया जाए, तो चुंबक का क्षेत्र चालक पर बल लगाता है! क्रियाकलाप में ऐलुमिनियम की एक छड़ को नाल-चुंबक (horse-shoe magnet) के दो ध्रुवों के बीच लटकाकर उसमें धारा बहाई जाती है — छड़ तुरंत एक ओर विस्थापित हो जाती है। धारा की दिशा उलटने पर छड़ विपरीत ओर हटती है, और चुंबक उलट देने पर भी विस्थापन की दिशा बदल जाती है।

इस बल का परिमाण किन बातों पर निर्भर करता है? प्रयोग से स्पष्ट होता है — बल, धारा (I) के, चुंबकीय क्षेत्र की प्रबलता (B) के और क्षेत्र में स्थित चालक की लंबाई (L) के समानुपाती होता है:

F = BIL (जब चालक क्षेत्र के लंबवत् हो)  |  सामान्य रूप में F = BIL sinθ, जहाँ θ चालक व क्षेत्र के बीच का कोण है। बल तब अधिकतम होता है जब चालक क्षेत्र के लंबवत् (θ = 90°) हो, और शून्य होता है जब चालक क्षेत्र के समांतर (θ = 0°) हो।

यह बल ही विद्युत मोटर की जान है। गतिमान आवेशों पर भी यही बल लगता है — किसी चुंबकीय क्षेत्र में गतिमान प्रोटॉन या इलेक्ट्रॉन की गति की दिशा (वेग व संवेग) बदल जाती है, परंतु उसकी चाल व द्रव्यमान नहीं बदलते, क्योंकि चुंबकीय बल गति के लंबवत् लगता है और कार्य नहीं करता।

फ्लेमिंग का बायाँ हाथ नियम – उँगलियाँ कभी न उलझें

नियम: अपने बाएँ हाथ की तर्जनी, मध्यमा और अँगूठे को एक-दूसरे के परस्पर लंबवत् इस प्रकार फैलाइए कि — तर्जनी (पहली उँगली) चुंबकीय क्षेत्र की दिशा में, मध्यमा (बीच वाली उँगली) विद्युत धारा की दिशा में हो। तब अँगूठा चालक पर लगने वाले बल की दिशा अर्थात चालक की गति की दिशा दर्शाता है।

याद रखने की सुपर-तरकीब — अंग्रेज़ी के अक्षरों से जोड़िए: Forefinger = Field (क्षेत्र), Centre finger = Current (धारा), Thumb = Thrust/Motion (बल/गति)। और यह भी याद रखिए — बायाँ हाथ = मोटर का नियम, क्योंकि मोटर में धारा पहले से दी जाती है और बल (गति) परिणाम में मिलता है। परीक्षा में जब भी “चालक पर बल की दिशा” पूछी जाए, बायाँ हाथ उठाइए और उँगलियाँ इसी क्रम में रखिए — अँगूठा खुद उत्तर बता देगा।

📌 सावधानी: फ्लेमिंग के नियम धारा की परंपरागत दिशा (धन आवेश के प्रवाह की दिशा) पर लागू होते हैं। इलेक्ट्रॉन के लिए धारा की दिशा उसके प्रवाह से विपरीत ली जाती है — प्रश्न में इलेक्ट्रॉन देखकर यही एक कदम अतिरिक्त सोचिए, वरना उत्तर उलटा हो जाएगा।

एक साँस में समझें — चुंबकीय क्षेत्र में रखा धारावाही चालक बल अनुभव करता है; बल F = BIL होता है और उसकी दिशा बाएँ हाथ की उँगलियाँ बताती हैं।

विद्युत मोटर – धारा से घूर्णन कैसे मिलता है?

विद्युत मोटर वह युक्ति है जो विद्युत ऊर्जा को यांत्रिक ऊर्जा (घूर्णन गति) में बदलती है। पंखा, कूलर, मिक्सर, वाशिंग मशीन, पानी का पंप, विद्युत वाहन — इन सबके हृदय में यही मोटर धड़कती है।

सिद्धांत: जब किसी आयताकार कुंडली को चुंबकीय क्षेत्र में रखकर उसमें विद्युत धारा प्रवाहित की जाती है, तो कुंडली की दो विपरीत भुजाओं पर बराबर परंतु विपरीत दिशाओं में बल लगते हैं। ये दो बल एक बल-युग्म (couple) बनाते हैं, जो कुंडली को उसकी अक्ष पर घुमाने का प्रयत्न करता है। कुंडली घूमने के लिए स्वतंत्र हो तो वह घूमने लगती है — यही विद्युत मोटर का सिद्धांत है।

संरचना (Construction) – नामांकित चित्र के भाग

  • आर्मेचर / कुंडली (ABCD): नर्म लोहे की क्रोड पर लिपटी विद्युतरोधी ताँबे के तार की आयताकार कुंडली, जो धुरी (axle) पर घूमती है। नर्म लोहे की क्रोड क्षेत्र को प्रबल करके बल बढ़ाती है।
  • क्षेत्र चुंबक (Field Magnet): कुंडली के दोनों ओर स्थित शक्तिशाली स्थायी चुंबक (या विद्युत-चुंबक), जिसके N व S ध्रुवों के बीच प्रबल चुंबकीय क्षेत्र बनता है।
  • विभक्त वलय / दिक्परिवर्तक (Split Ring Commutator, R1–R2): धुरी पर लगा ताँबे का वलय, जो बीच से दो आधे भागों में कटा होता है। कुंडली के दो सिरे इन्हीं दो अर्ध-वलयों से जुड़े होते हैं।
  • ब्रश (B1–B2): कार्बन (या धातु) के स्थिर ब्रश, जो घूमते अर्ध-वलयों को हल्के से छूते हुए बाहरी परिपथ (बैटरी) से धारा कुंडली तक पहुँचाते हैं।
  • बैटरी / DC स्रोत: कुंडली में धारा प्रवाहित करने का स्रोत।

कार्यविधि – चरण-दर-चरण

चरण 1: मान लीजिए कुंडली ABCD क्षैतिज स्थिति में है और उसमें धारा A से B की ओर तथा C से D की ओर (अर्थात भुजा AB में एक दिशा, भुजा CD में विपरीत दिशा) बह रही है। चुंबकीय क्षेत्र N ध्रुव से S ध्रुव की ओर है।

चरण 2: फ्लेमिंग के बाएँ हाथ के नियम से भुजा AB पर बल नीचे की ओर और भुजा CD पर बल ऊपर की ओर लगता है (आप स्वयं हाथ लगाकर जाँचिए)। ध्यान दें — भुजाएँ BC व DA क्षेत्र के लगभग समांतर रहती हैं, इसलिए उन पर प्रभावी बल नहीं लगता।

चरण 3: AB पर नीचे की ओर व CD पर ऊपर की ओर के ये दो समान-परंतु-विपरीत बल एक बल-युग्म बनाते हैं, जिससे कुंडली वामावर्त दिशा में घूमने लगती है (दिशा मोटर की बनावट के अनुसार निश्चित होती है)।

चरण 4: आधा चक्कर पूरा होने पर कुंडली ऊर्ध्वाधर स्थिति से आगे निकलती है। यदि धारा की दिशा कुंडली में वही बनी रहे, तो बल-युग्म उलट जाएगा और कुंडली वापस लौटने लगेगी — वह लगातार एक ही दिशा में नहीं घूम पाएगी। यहीं विभक्त वलय काम आता है।

चरण 5: आधा चक्कर पूरा होते ही अर्ध-वलय R1 व R2 ब्रश B1 व B2 से अपना संपर्क बदल लेते हैं। इससे कुंडली में धारा की दिशा ठीक उसी क्षण उलट जाती है, जब उसकी आवश्यकता होती है। अब जो भुजा ऊपर थी उस पर फिर नीचे की ओर बल और जो नीचे थी उस पर फिर ऊपर की ओर बल लगता है।

चरण 6: फलतः हर आधे चक्कर के बाद बल-युग्म की दिशा कुंडली के घूर्णन की दिशा में ही बनी रहती है और कुंडली लगातार एक ही दिशा में घूमती रहती है। धुरी से जुड़ा पंखा, पहिया या पंप भी साथ घूमता है — विद्युत ऊर्जा यांत्रिक कार्य में बदल जाती है।

विभक्त वलय की भूमिका (एक पंक्ति में): विभक्त वलय एक दिक्परिवर्तक (commutator) है — यह प्रत्येक आधे घूर्णन के बाद कुंडली में धारा की दिशा उलट देता है, जिससे बल-युग्म सदैव एक ही घूर्णन-दिशा में कार्य करता है और मोटर रुकती-लौटती नहीं, लगातार घूमती है।

📌 Board नोट: मोटर का प्रश्न लगभग हर वर्ष आता है और उसमें “विभक्त वलय का कार्य” अलग से पूछा जाता है। नामांकित चित्र बनाते समय कुंडली, ध्रुव (N–S), विभक्त वलय व ब्रश — चारों को अवश्य अंकित कीजिए; चित्र के अंक इन्हीं नामों पर मिलते हैं।

एक साँस में समझें — मोटर में कुंडली की दो भुजाओं पर विपरीत बलों का युग्म उसे घुमाता है और विभक्त वलय हर आधे चक्कर पर धारा उलटकर घूर्णन को एक ही दिशा में जारी रखता है।

विद्युतचुंबकीय प्रेरण – फैराडे की क्रांतिकारी खोज

सन् 1831 में माइकल फैराडे ने एक ऐसा प्रयोग किया जिसने संसार बदल दिया। उन्होंने एक कुंडली को गैल्वेनोमीटर (सूक्ष्म धारा मापने वाला यंत्र) से जोड़ा और एक दंड चुंबक को कुंडली की ओर तेज़ी से ले गए — गैल्वेनोमीटर की सुई हिल गई! बिना बैटरी, बिना किसी विद्युत स्रोत के कुंडली में धारा बह चली थी। चुंबक को दूर ले जाने पर सुई विपरीत दिशा में हिली, और चुंबक को स्थिर रखते ही सुई शून्य पर लौट आई।

इस घटना को ही विद्युतचुंबकीय प्रेरण (Electromagnetic Induction) कहते हैं — किसी कुंडली से संबद्ध चुंबकीय क्षेत्र (फ्लक्स) में परिवर्तन होने पर कुंडली में विद्युत वाहक बल व धारा प्रेरित हो जाती है। उत्पन्न धारा को प्रेरित धारा और विद्युत वाहक बल को प्रेरित विद्युत वाहक बल कहते हैं।

यहाँ सबसे महत्वपूर्ण शब्द है — परिवर्तन। न तो केवल चुंबक का होना काफी है, न केवल कुंडली का। जब तक कुंडली से गुज़रने वाली क्षेत्र रेखाओं की संख्या (फ्लक्स) बदलती रहती है, धारा बनती रहती है; बदलाव रुकते ही धारा भी रुक जाती है। परिवर्तन जितनी तेज़ी से होगा, प्रेरित विद्युत वाहक बल उतना ही अधिक होगा — यही फैराडे के नियम का सार है।

कुंडली में धारा प्रेरित करने के विभिन्न ढंग

  • ढंग 1: कुंडली के सापेक्ष चुंबक को गतिमान करना — चुंबक को कुंडली में धकेलना या बाहर खींचना।
  • ढंग 2: चुंबक को स्थिर रखकर कुंडली को ही गतिमान करना — चुंबक की ओर ले जाना या दूर ले जाना। असली बात आपेक्षिक गति है, कौन चल रहा है यह महत्वपूर्ण नहीं।
  • ढंग 3: कुंडली के पास रखी दूसरी धारावाही कुंडली में धारा बदलना — पहली कुंडली की धारा चालू-बंद करने या घटाने-बढ़ाने से उसका चुंबकीय क्षेत्र बदलता है, जिससे दूसरी कुंडली में धारा प्रेरित होती है। विद्युत-ट्रांसफ़ॉर्मर इसी सिद्धांत का प्रसिद्ध उपयोग है।

फ्लेमिंग का दायाँ हाथ नियम – जनित्र की दिशा-कुंजी

नियम: अपने दाएँ हाथ की तर्जनी, मध्यमा और अँगूठे को परस्पर लंबवत् इस प्रकार फैलाइए कि — अँगूठा चालक की गति की दिशा में, तर्जनी (पहली उँगली) चुंबकीय क्षेत्र की दिशा में हो। तब मध्यमा (बीच वाली उँगली) चालक में प्रेरित विद्युत धारा की दिशा दर्शाती है।

दोनों फ्लेमिंग नियमों को एक साथ याद रखने की विधि बहुत सुंदर है — बायाँ हाथ मोटर का है, दायाँ हाथ जनित्र (Generator) का। अंग्रेज़ी में भी लोग कहते हैं: “Left hand for Motor, Right hand for Generator।” दोनों नियमों में तर्जनी सदैव क्षेत्र की ओर रहती है और मध्यमा सदैव धारा की ओर; अंतर केवल अँगूठे का है — बाएँ हाथ में अँगूठा परिणाम (बल/गति) दिखाता है, क्योंकि मोटर में गति परिणाम है; दाएँ हाथ में अँगूठा कारण (दी गई गति) दिखाता है, क्योंकि जनित्र में गति हम देते हैं और धारा परिणाम में मिलती है। यह एक अंतर समझ लिया तो दोनों नियम जीवनभर नहीं उलझेंगे।

📌 ध्यान दें: प्रेरित धारा की दिशा इस बात पर भी निर्भर करती है कि फ्लक्स बढ़ रहा है या घट रहा है। चुंबक का उत्तरी ध्रुव कुंडली की ओर लाने पर जो दिशा होगी, वही ध्रुव दूर ले जाने पर ठीक उलटी होगी — गैल्वेनोमीटर के विपरीत विक्षेप से यही सिद्ध होता है।

एक साँस में समझें — बदलता चुंबकीय फ्लक्स ही प्रेरित धारा का पिता है; गति रुकते ही धारा भी रुक जाती है, और दिशा दाएँ हाथ की उँगलियाँ बताती हैं।

विद्युत जनित्र – गति से बिजली बनाना

विद्युत जनित्र (Electric Generator), जिसे डायनमो भी कहते हैं, वह युक्ति है जो यांत्रिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में बदलती है। ध्यान दीजिए — यह मोटर का ठीक उलटा काम है! मोटर में बिजली देकर गति लेते हैं, जनित्र में गति देकर बिजली लेते हैं। बिजली-घरों में टरबाइन बहते जल, भाप या वायु से घूमती है और उसी घूर्णन से विशाल जनित्र सारे शहर को बिजली देते हैं।

सिद्धांत: जनित्र विद्युतचुंबकीय प्रेरण पर कार्य करता है। जब किसी बंद कुंडली को शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र में तेज़ी से घुमाया जाता है, तो कुंडली से संबद्ध चुंबकीय फ्लक्स में निरंतर परिवर्तन होता रहता है, जिससे कुंडली में प्रेरित विद्युत वाहक बल व धारा उत्पन्न होती है। कुंडली को घुमाने में व्यय हुई यांत्रिक ऊर्जा ही विद्युत ऊर्जा में रूपांतरित हो जाती है।

AC जनित्र की संरचना

  • क्षेत्र चुंबक: N व S ध्रुवों वाला शक्तिशाली चुंबक (बड़े जनित्रों में विद्युत-चुंबक), जिसके ध्रुवों के बीच प्रबल क्षेत्र होता है।
  • आर्मेचर कुंडली (ABCD): नर्म लोहे की क्रोड पर लिपटी ताँबे के विद्युतरोधी तार की आयताकार कुंडली, जो ध्रुवों के बीच क्षैतिज अक्ष पर घूमती है। क्रोड फ्लक्स बढ़ाकर विद्युत वाहक बल बढ़ाती है।
  • वलय / सर्पी वलय (Slip Rings, R1–R2): कुंडली के दो सिरों से जुड़े दो पूर्ण (बिना कटे) धातु-वलय, जो कुंडली के साथ-साथ घूमते हैं। ध्यान दें — ये मोटर के विभक्त (आधे कटे) वलय से भिन्न हैं!
  • ब्रश (B1–B2): कार्बन के स्थिर ब्रश, जो घूमते वलयों को छूकर प्रेरित धारा को बाहरी परिपथ (बल्ब, घर की लाइन आदि) तक पहुँचाते हैं। ब्रशों का कार्य बिना झटके व बिना संपर्क टूटे घूर्णी कुंडली से धारा बाहर लाना है।

AC जनित्र की कार्यविधि – एक पूरा चक्कर

चरण 1 (0° स्थिति): कुंडली का तल क्षेत्र के समांतर — इस क्षण कुंडली से गुज़रने वाला फ्लक्स परिवर्तन की दर शून्य होती है, अतः प्रेरित विद्युत वाहक बल शून्य।

चरण 2 (0° से 90°): कुंडली घूमती है, फ्लक्स तेज़ी से बदलता है। फ्लेमिंग के दाएँ हाथ के नियम से भुजा AB में एक दिशा में और CD में विपरीत दिशा में धारा प्रेरित होती है। बाहरी परिपथ में धारा एक ब्रश से दूसरे की ओर बहती है। कुंडली के ऊर्ध्वाधर (90°) होने पर फ्लक्स-परिवर्तन की दर अधिकतम, अतः विद्युत वाहक बल भी अधिकतम।

चरण 3 (90° से 180°): फ्लक्स-परिवर्तन की दर घटती जाती है और 180° पर फिर शून्य हो जाती है। इस आधे चक्कर में धारा की दिशा बाहरी परिपथ में एक ही बनी रहती है।

चरण 4 (180° से 360°): अगले आधे चक्कर में कुंडली की भुजाएँ अपनी स्थिति बदल चुकी होती हैं, इसलिए प्रेरित धारा की दिशा उलट जाती है — बाहरी परिपथ में धारा अब पहले से विपरीत दिशा में बहती है। 270° पर विद्युत वाहक बल फिर अधिकतम (विपरीत चिह्न के साथ) होता है और 360° पर शून्य।

इस प्रकार प्रत्येक आधे परिभ्रमण के बाद धारा की दिशा बदल जाती है। निश्चित समयांतराल पर दिशा बदलने वाली इस धारा को प्रत्यावर्ती धारा (Alternating Current — AC) कहते हैं। भारत में घरों को मिलने वाली AC की आवृत्ति 50 Hz है, अर्थात धारा एक सेकंड में 50 बार अपना पूरा चक्र दोहराती है और 100 बार दिशा बदलती है।

DC जनित्र – केवल एक बदलाव

DC जनित्र की संरचना व सिद्धांत AC जनित्र जैसा ही है, बस एक अंतर है — इसमें सर्पी वलयों के स्थान पर विभक्त वलय (दिक्परिवर्तक) लगाया जाता है, बिल्कुल मोटर की तरह। विभक्त वलय हर आधे चक्कर पर बाहरी परिपथ से संबंध उलट देता है, जिससे कुंडली के भीतर धारा दिशा बदले, परंतु बाहरी परिपथ में धारा सदैव एक ही दिशा में बहती है। ऐसी धारा को दिष्ट धारा (Direct Current — DC) कहते हैं। सेल, बैटरी और DC जनित्र DC के स्रोत हैं, जबकि AC जनित्र, बिजली-घर (ताप, जल व परमाणु शक्ति संयंत्र) AC के स्रोत हैं।

बात AC जनित्र DC जनित्र
उत्पन्न धारा प्रत्यावर्ती धारा (AC) — दिशा निश्चित अंतराल पर बदलती है दिष्ट धारा (DC) — बाहरी परिपथ में दिशा सदैव एक ही रहती है
वलय दो पूर्ण सर्पी वलय (slip rings) एक विभक्त वलय — दो अर्ध-वलय (split ring / commutator)
सिद्धांत विद्युतचुंबकीय प्रेरण विद्युतचुंबकीय प्रेरण
ऊर्जा रूपांतरण यांत्रिक → विद्युत यांत्रिक → विद्युत
उपयोग / स्रोत-रूप बिजली-घरों से घरों व उद्योगों की आपूर्ति बैटरी-आवेशन, विद्युत-अपघटन आदि DC कार्यों में
बात विद्युत मोटर विद्युत जनित्र
ऊर्जा रूपांतरण विद्युत ऊर्जा → यांत्रिक ऊर्जा यांत्रिक ऊर्जा → विद्युत ऊर्जा
सिद्धांत चुंबकीय क्षेत्र में धारावाही चालक पर बल विद्युतचुंबकीय प्रेरण
नियम फ्लेमिंग का बायाँ हाथ नियम फ्लेमिंग का दायाँ हाथ नियम
उदाहरण उपयोग पंखा, पंप, मिक्सर, कूलर बिजली-घर, डायनमो, इन्वर्टर-जनरेटर

एक साँस में समझें — जनित्र में घूमती कुंडली का बदलता फ्लक्स धारा बनाता है; पूर्ण वलय लगे तो AC मिलती है और विभक्त वलय लगे तो बाहरी परिपथ में DC।

घरेलू विद्युत परिपथ – तारों के रंग, फ्यूज़ और सुरक्षा

ऊपर हमने बिजली बनाना और उससे काम लेना सीखा। अब अंतिम और जीवन-रक्षक पाठ — घर में बिजली का सुरक्षित उपयोग। हमारे घरों में विद्युत आपूर्ति 220 V विभवांतर पर 50 Hz की प्रत्यावर्ती धारा के रूप में आती है। बिजली खंभे से दो मुख्य तार घर के मीटर तक आते हैं और वहाँ से घर का परिपथ फैलता है।

तीन तार, तीन रंग – पहचान पक्की करें

तार विद्युतरोधन का रंग (NCERT परंपरा) कार्य
विद्युतमय तार (Live Wire) लाल विभव (220 V) वाला तार; विद्युत धारा इसी के माध्यम से उपकरणों तक पहुँचती है। स्विच व फ्यूज़ सदैव इसी तार में लगाए जाते हैं।
उदासीन तार (Neutral Wire) काला धारा की वापसी का मार्ग; इसका विभव सामान्यतः शून्य (भू-विभव) पर रहता है। उपकरण में धारा विद्युतमय तार से आकर इसी से लौटती है।
भू-संपर्क तार (Earth Wire) हरा सुरक्षा तार — उपकरण के धात्विक आवरण से जुड़ा रहता है और इसका दूसरा सिरा भूमि में गड़ी धातु-प्लेट से जुड़ा होता है।

📌 जानकारी के लिए: आधुनिक अंतरराष्ट्रीय रंग-संहिता में विद्युतमय तार भूरा, उदासीन तार नीला और भू-तार हरा-पीला होता है, परंतु NCERT व Bihar Board की परीक्षा के लिए ऊपर वाली परंपरागत पहचान — लाल = विद्युतमय, काला = उदासीन, हरा = भू-तार — ही याद रखिए।

भू-तार का महत्व – चुपचाप जान बचाने वाला

फ़्रिज, प्रेस, कूलर, वाशिंग मशीन जैसे उपकरणों का बाहरी आवरण धातु का होता है। यदि अंदर कहीं विद्युतरोधन खराब होकर विद्युतमय तार उस धात्विक आवरण को छू जाए, तो पूरा आवरण 220 V पर आ जाएगा — छूते ही भयंकर झटका लग सकता है। भू-तार ठीक इसी दुर्घटना से बचाता है। आवरण भू-तार से जुड़ा होने पर रिसी हुई धारा मनुष्य के शरीर के उच्च प्रतिरोध वाले रास्ते के बजाय कम प्रतिरोध वाले भू-तार से सीधे पृथ्वी में चली जाती है। आवरण का विभव भू-विभव के बराबर बना रहता है, व्यक्ति सुरक्षित रहता है, और प्रायः अधिक रिसाव-धारा से फ्यूज़ उड़कर चेतावनी भी दे देता है। इसीलिए धात्विक आवरण वाले हर उपकरण को भू-संपर्कित करना अनिवार्य है और तीन-पिन प्लग की सबसे मोटी व ऊपर वाली पिन यही भू-पिन होती है।

फ्यूज़ – बलिदान देकर बचाने वाला सिपाही

फ्यूज़ कम गलनांक वाली मिश्रधातु (सीसा-टिन) का बना एक पतला तार होता है, जो विद्युतमय तार में श्रेणीक्रम में लगाया जाता है। जब परिपथ में निर्धारित सीमा से अधिक धारा बहती है, तो उत्पन्न ऊष्मा (H = I2Rt) से फ्यूज़ तार गरम होकर पिघल जाता है और परिपथ टूट जाता है। धारा रुक जाती है — तारों में आग लगने और उपकरण जलने से पहले ही फ्यूज़ अपना “बलिदान” देकर घर को बचा लेता है। फ्यूज़ सदैव उस उपकरण या परिपथ के धारा-अनुमतांक (जैसे 5 A के प्रकाश-परिपथ और 15 A के शक्ति-परिपथ) के अनुसार ही लगाना चाहिए; फ्यूज़ की जगह मोटा ताँबे का तार लगाना अत्यंत खतरनाक भूल है, क्योंकि वह पिघलेगा ही नहीं!

लघुपथन (Short Circuit) व अतिभारण (Overloading) – दो बड़े ख़तरे

लघुपथन कब होता है? जब तारों का विद्युतरोधन (plastic का आवरण) घिसकर या क्षतिग्रस्त होकर विद्युतमय तार और उदासीन तार सीधे एक-दूसरे के संपर्क में आ जाते हैं, तो परिपथ का प्रतिरोध लगभग शून्य हो जाता है। ओम के नियम (I = V/R) के अनुसार धारा का मान अत्यंत अधिक बढ़ जाता है, तारें अत्यधिक गरम होकर चिंगारियाँ फेंकती हैं और आग लग सकती है। इसी घटना को लघुपथन कहते हैं। फ्यूज़ इसी क्षण पिघलकर परिपथ तोड़ देता है।

अतिभारण कब होता है? जब एक ही सॉकिट या परिपथ से उसकी क्षमता से अधिक शक्ति के बहुत-से उपकरण एक साथ जोड़ दिए जाते हैं — जैसे एक ही बोर्ड से प्रेस, हीटर, ओवन और गीज़र एक साथ चला देना — तो कुल धारा अनुमत सीमा से बढ़ जाती है। इसे अतिभारण कहते हैं। बचाव सरल है — एक सॉकिट से बहुत अधिक उपकरण न जोड़ें, अधिक शक्ति के उपकरण अलग-अलग परिपथों में चलाएँ, और सही अनुमतांक का फ्यूज़/MCB लगवाएँ। आधुनिक घरों में फ्यूज़ के स्थान पर MCB (Miniature Circuit Breaker) भी यही सुरक्षा-कार्य करता है — अधिक धारा पर वह स्वतः बंद (trip) हो जाता है और सुधार के बाद पुनः चालू किया जा सकता है।

घरेलू परिपथ के दो प्रमुख सुरक्षा उपाय (Board उत्तर): (1) विद्युत फ्यूज़ का उपयोग, (2) भू-संपर्क तार का उपयोग। साथ में — स्विच सदैव विद्युतमय तार में, उपकरण समांतर क्रम में (ताकि प्रत्येक को पूरा 220 V मिले और एक बंद करने से दूसरे बंद न हों), और उत्तम विद्युतरोधन वाले तारों का प्रयोग।

एक साँस में समझें — लाल तार जान है, काला वापसी है, हरा रक्षक है; फ्यूज़ अधिक धारा पर पिघलकर और भू-तार रिसाव को भूमि में भेजकर हमारी रक्षा करते हैं।

📘 पाठ्य-पुस्तक के प्रश्न (InText Questions)

ये वे प्रश्न हैं जो NCERT किताब के अनुच्छेदों के बीच-बीच में दिए गए हैं। Board में ये प्रश्न प्रायः वैसे-के-वैसे पूछ लिए जाते हैं, इसलिए इन्हें सबसे पहले और सबसे अच्छी तरह तैयार कीजिए। इस अध्याय में कुल 21 InText प्रश्न हैं, जो आठ अनुच्छेद-समूहों में बँटे हैं। सभी हल नीचे क्रम से दिए गए हैं।

(क) अनुच्छेद 13.1 पर आधारित प्रश्न (1 प्रश्न)

प्रश्न 1. चुंबक के निकट लाने पर दिक्सूचक की सुई विक्षेपित क्यों हो जाती है?

हल:

चरण 1: सबसे पहले यह समझिए कि दिक्सूचक की सुई कोई साधारण सुई नहीं है — वह स्वयं एक छोटा-सा दंड चुंबक है, जो धुरी पर स्वतंत्र रूप से घूम सकता है। उसका एक सिरा उत्तरी ध्रुव (उत्तर की ओर संकेत करने वाला) और दूसरा सिरा दक्षिणी ध्रुव होता है।

चरण 2: जब कोई चुंबक सुई के निकट लाया जाता है, तो उसका चुंबकीय क्षेत्र सुई के ध्रुवों पर बल लगाता है — समान ध्रुवों में प्रतिकर्षण और असमान ध्रुवों में आकर्षण होता है।

उत्तर: इन आकर्षण-प्रतिकर्षण बलों के कारण दिक्सूचक सुई अपने स्थान से घूमकर नए चुंबकीय क्षेत्र की दिशा में ठहरती है — यही उसका विक्षेपण है। निकट लाया गया चुंबक जितना प्रबल होगा, विक्षेप भी उतना ही अधिक होगा।

(ख) अनुच्छेद 13.1 से 13.2.2 पर आधारित प्रश्न (3 प्रश्न)

प्रश्न 1. किसी छड़ चुंबक के चारों ओर चुंबकीय क्षेत्र रेखाएँ खींचिए।

हल: छड़ चुंबक को कागज़ पर रखकर दिक्सूचक सुई की सहायता से बिंदु-दर-बिंदु रेखाएँ खींची जाती हैं (विधि ऊपर वाले खंड में विस्तार से समझाई गई है)। चित्र का सार इस प्रकार है — क्षेत्र रेखाएँ चुंबक के बाहर उत्तरी ध्रुव से निकलकर वक्र बनाती हुई दक्षिणी ध्रुव में प्रवेश करती हैं; चुंबक के अंदर ये दक्षिणी ध्रुव से उत्तरी ध्रुव की ओर जाती हैं; दोनों ध्रुवों के पास रेखाएँ सबसे सघन होती हैं और मध्य से दूर जाने पर विरल होती जाती हैं; कोई भी दो रेखाएँ परस्पर नहीं काटतीं। परीक्षा में चित्र बनाते समय रेखाओं पर तीर के निशान N से S की ओर अवश्य लगाएँ और दोनों ध्रुव अंकित करें।

प्रश्न 2. चुंबकीय क्षेत्र रेखाओं के गुणों की सूची बनाइए।

हल: क्षेत्र रेखाओं के प्रमुख गुण निम्नलिखित हैं —

  • क्षेत्र रेखाएँ चुंबक के बाहर उत्तरी ध्रुव से निकलती हैं और दक्षिणी ध्रुव पर समाप्त होती हैं; चुंबक के भीतर इनकी दिशा दक्षिणी ध्रुव से उत्तरी ध्रुव की ओर होती है, अतः ये बंद वक्र बनाती हैं।
  • क्षेत्र रेखा के किसी बिंदु पर खींची गई स्पर्श रेखा उस बिंदु पर चुंबकीय क्षेत्र की दिशा दर्शाती है।
  • दो क्षेत्र रेखाएँ एक-दूसरे को कभी प्रतिच्छेद नहीं करतीं।
  • जहाँ क्षेत्र रेखाएँ अधिक सघन होती हैं, वहाँ चुंबकीय क्षेत्र प्रबल होता है; जहाँ विरल होती हैं, वहाँ क्षेत्र दुर्बल होता है। ध्रुवों के समीप क्षेत्र सबसे प्रबल होता है।
  • क्षेत्र रेखाएँ काल्पनिक होती हैं और चुंबक के चारों ओर त्रि-आयामी रूप में फैली होती हैं।

प्रश्न 3. दो चुंबकीय क्षेत्र रेखाएँ एक-दूसरे को प्रतिच्छेद क्यों नहीं करतीं?

हल:

चरण 1: मान लीजिए दो रेखाएँ किसी बिंदु पर काटती हैं। उस बिंदु पर दोनों रेखाओं की अलग-अलग स्पर्श रेखाएँ खींची जा सकती हैं।

चरण 2: स्पर्श रेखा क्षेत्र की दिशा बताती है, अर्थात कटान-बिंदु पर चुंबकीय क्षेत्र की दो दिशाएँ एक साथ हो जाएँगी।

उत्तर: परंतु किसी बिंदु पर चुंबकीय क्षेत्र की दिशा केवल एक ही हो सकती है — दिक्सूचक सुई वहाँ रखी जाए तो वह एक ही दिशा में ठहरेगी, दो दिशाओं में एक साथ नहीं। अतः दो क्षेत्र रेखाएँ एक-दूसरे को कभी प्रतिच्छेद नहीं करतीं।

(ग) अनुच्छेद 13.2.3 और 13.2.4 पर आधारित प्रश्न (3 प्रश्न)

प्रश्न 1. मेज़ के तल में पड़े तार के वृत्ताकार पाश पर विचार कीजिए। मान लीजिए इस पाश में दक्षिणावर्त विद्युत धारा प्रवाहित हो रही है। दायाँ हाथ अँगूठा नियम लागू करके पाश के भीतर तथा बाहर चुंबकीय क्षेत्र की दिशा ज्ञात कीजिए।

हल:

चरण 1: पाश मेज़ के तल में है और धारा दक्षिणावर्त (clockwise) बह रही है — जैसे घड़ी की सुइयाँ घूमती हैं। पाश के किसी एक भाग पर ध्यान दीजिए, उदाहरण के लिए दाईं ओर वाले भाग में धारा नीचे की ओर बह रही है और बाईं ओर वाले भाग में ऊपर की ओर।

चरण 2: दायाँ हाथ अँगूठा नियम हर भाग पर लगाइए। दाईं ओर के भाग के लिए अँगूठा नीचे की ओर रखने पर मुड़ी उँगलियाँ पाश के अंदर की ओर (कागज़/मेज़ के तल के अंदर) क्षेत्र बताती हैं। बाईं ओर के भाग पर भी यही परीक्षण अंदर की ओर ही क्षेत्र देता है — अर्थात पाश के सभी भागों का क्षेत्र अंदर एक ही दिशा में जुड़ता है।

उत्तर: पाश के भीतर चुंबकीय क्षेत्र की दिशा मेज़ के तल के लंबवत् नीचे की ओर (तल के अंदर) होगी, और पाश के बाहर क्षेत्र की दिशा मेज़ के तल के लंबवत् ऊपर की ओर (तल से बाहर) होगी। ध्यान दें — दक्षिणावर्त धारा वाला पृष्ठ दक्षिणी ध्रुव की तरह व्यवहार करता है, यही बात इस निष्कर्ष से मेल खाती है।

प्रश्न 2. किसी दिए गए क्षेत्र में चुंबकीय क्षेत्र एकसमान है। इसे निरूपित करने के लिए आरेख खींचिए।

हल: एकसमान चुंबकीय क्षेत्र को निरूपित करने के लिए परस्पर समांतर, सीधी और बराबर-बराबर दूरी पर स्थित क्षेत्र रेखाएँ खींची जाती हैं, जिन पर एक ही दिशा में तीर के निशान लगे हों। रेखाओं की समान दूरी यह दर्शाती है कि क्षेत्र के हर बिंदु पर क्षेत्र का परिमाण व दिशा समान है। ऐसा क्षेत्र किसी लंबी धारावाही परिनालिका के भीतरी मध्य भाग में तथा दो विपरीत ध्रुवों के बीच के मध्य क्षेत्र में पाया जाता है। परीक्षा में आरेख बनाते समय कम-से-कम चार-पाँच समांतर रेखाएँ बराबर दूरी पर खींचें और सभी पर एक ही ओर तीर बनाएँ।

प्रश्न 3. सही विकल्प चुनिए — किसी विद्युत धारावाही सीधी लंबी परिनालिका के भीतर चुंबकीय क्षेत्र — (a) शून्य होता है (b) इसके सिरे की ओर जाने पर घटता है (c) इसके सिरे की ओर जाने पर बढ़ता है (d) सभी बिंदुओं पर समान होता है।

हल: लंबी परिनालिका के भीतर क्षेत्र रेखाएँ परस्पर समांतर होती हैं। समांतर व समान दूरी वाली रेखाओं का अर्थ है — क्षेत्र हर बिंदु पर समान। सिरों के अत्यंत निकट थोड़ा फैलाव होता है, परंतु NCERT के अनुसार परिनालिका के भीतर क्षेत्र एकसमान माना जाता है।

उत्तर: (d) सभी बिंदुओं पर समान होता है।

(घ) अनुच्छेद 13.3 पर आधारित प्रश्न (3 प्रश्न)

प्रश्न 1. किसी प्रोटॉन के निम्नलिखित में से कौन-सा गुण किसी चुंबकीय क्षेत्र में मुक्त गति करते समय परिवर्तित हो जाता है? (यहाँ एक से अधिक सही उत्तर हो सकते हैं।) (a) द्रव्यमान (b) चाल (c) वेग (d) संवेग

हल:

चरण 1: प्रोटॉन धनावेशित कण है। चुंबकीय क्षेत्र में गतिमान आवेश पर बल लगता है, जिसकी दिशा सदैव वेग के लंबवत् होती है (फ्लेमिंग के बाएँ हाथ के नियम से)।

चरण 2: गति की दिशा के लंबवत् लगने वाला बल कोई कार्य नहीं करता, इसलिए कण की गतिज ऊर्जा व चाल नहीं बदलती; केवल गति की दिशा निरंतर बदलती रहती है — कण वृत्ताकार पथ पर घूमने लगता है।

चरण 3: दिशा बदलने से वेग (जो सदिश है) बदलता है, और वेग बदलने से संवेग (p = mv) भी बदलता है। द्रव्यमान तो कण का अपना गुण है, वह कभी नहीं बदलता।

उत्तर: (c) वेग तथा (d) संवेग — केवल ये दो गुण परिवर्तित होते हैं; द्रव्यमान व चाल अपरिवर्तित रहते हैं।

प्रश्न 2. क्रियाकलाप 13.7 (चुंबकीय क्षेत्र में धारावाही छड़ AB का विस्थापन) में हमारे विचार से छड़ AB का विस्थापन किस प्रकार प्रभावित होगा, यदि — (i) छड़ AB में प्रवाहित विद्युत धारा में वृद्धि हो जाए, (ii) अधिक प्रबल नाल-चुंबक प्रयोग किया जाए, और (iii) छड़ AB की लंबाई में वृद्धि कर दी जाए?

हल: इस प्रश्न की कुंजी एक ही सूत्र है — चुंबकीय क्षेत्र में धारावाही चालक पर लगने वाला बल:

F = BIL  (B = क्षेत्र की प्रबलता, I = धारा, L = चालक की लंबाई)

(i) धारा I बढ़ाने पर बल F बढ़ेगा, अतः छड़ का विस्थापन बढ़ जाएगा। (ii) अधिक प्रबल चुंबक लेने पर B बढ़ेगा, बल बढ़ेगा, अतः विस्थापन बढ़ जाएगा। (iii) छड़ की लंबाई L बढ़ाने पर क्षेत्र में स्थित चालक की प्रभावी लंबाई बढ़ेगी, बल बढ़ेगा, अतः विस्थापन बढ़ जाएगा।

उत्तर: तीनों ही स्थितियों में छड़ AB का विस्थापन बढ़ेगा, क्योंकि बल तीनों राशियों — B, I व L — के समानुपाती होता है।

प्रश्न 3. पश्चिम की ओर प्रक्षेपित कोई धनावेशित कण (अल्फ़ा-कण) किसी चुंबकीय क्षेत्र द्वारा उत्तर की ओर विक्षेपित हो जाता है। चुंबकीय क्षेत्र की दिशा क्या है? (a) दक्षिण की ओर (b) पूर्व की ओर (c) अधोमुखी (d) उपरिमुखी

हल:

चरण 1: धनावेशित कण के लिए धारा की दिशा वही होती है, जो कण की गति की दिशा है — अर्थात धारा पश्चिम की ओर। कण पर लगने वाला बल उसे उत्तर की ओर विक्षेपित करता है, अर्थात बल की दिशा उत्तर है।

चरण 2: बाएँ हाथ की उँगलियाँ लगाइए — मध्यमा (धारा) पश्चिम की ओर और अँगूठा (बल) उत्तर की ओर रखिए।

उत्तर: (d) उपरिमुखी — इस स्थिति में तर्जनी (क्षेत्र) स्वतः ऊपर की ओर (उपरिमुखी) रहती है, अतः चुंबकीय क्षेत्र की दिशा उपरिमुखी है। स्वयं हाथ लगाकर जाँचने पर आप देखेंगे कि क्षेत्र नीचे की ओर रखने से बल दक्षिण की ओर आ जाता है — अतः सही उत्तर केवल उपरिमुखी ही हो सकता है।

(ङ) अनुच्छेद 13.4 पर आधारित प्रश्न (3 प्रश्न)

प्रश्न 1. फ्लेमिंग का वामहस्त (बायाँ हाथ) नियम लिखिए।

हल:

उत्तर: यदि हम अपने बाएँ हाथ के अँगूठे, तर्जनी तथा मध्यमा को एक-दूसरे के परस्पर लंबवत् इस प्रकार फैलाएँ कि तर्जनी चुंबकीय क्षेत्र की दिशा और मध्यमा चालक में प्रवाहित विद्युत धारा की दिशा दर्शाए, तो अँगूठा चालक पर लगने वाले बल की दिशा (चालक की गति की दिशा) दर्शाता है। यही फ्लेमिंग का वामहस्त नियम है।

📌 सावधानी: कुछ पुस्तकों व साइटों पर यह नियम गड़बड़ छपा मिलता है — अँगूठे को धारा और मध्यमा को बल बता दिया जाता है। सही क्रम अँगुलियों के नाम से याद रखिए — तर्जनी = क्षेत्र (Field), मध्यमा = धारा (Current), अँगूठा = बल (Force/Motion)। इसी क्रम से उत्तर लिखिए।

प्रश्न 2. विद्युत मोटर का क्या सिद्धांत है?

हल:

उत्तर: जब किसी कुंडली को चुंबकीय क्षेत्र में रखकर उसमें विद्युत धारा प्रवाहित की जाती है, तो कुंडली की विपरीत भुजाओं पर बराबर व विपरीत बल लगते हैं, जिनसे एक बल-युग्म बनता है। यह बल-युग्म कुंडली को उसकी अक्ष पर घुमाने का प्रयत्न करता है — कुंडली स्वतंत्र हो तो घूमने लगती है। इसी सिद्धांत पर विद्युत मोटर विद्युत ऊर्जा को यांत्रिक ऊर्जा में बदलती है।

प्रश्न 3. विद्युत मोटर में विभक्त वलय की क्या भूमिका है?

हल: विभक्त वलय मोटर में दिक्परिवर्तक (commutator) का कार्य करता है। कुंडली के आधा चक्कर पूरा करते ही विभक्त वलय के अर्ध-भाग ब्रशों से अपना संपर्क बदल लेते हैं, जिससे कुंडली में प्रवाहित धारा की दिशा ठीक उसी क्षण उलट जाती है। धारा उलटने से कुंडली की भुजाओं पर लगने वाले बलों की दिशा भी इस प्रकार बदलती है कि बल-युग्म सदैव एक ही घूर्णन-दिशा में कार्य करता रहे।

उत्तर: विभक्त वलय के बिना कुंडली आधा घूमकर वापस लौटने लगती; विभक्त वलय के कारण ही कुंडली लगातार एक ही दिशा में घूमती रहती है — यही उसकी भूमिका है।

(च) अनुच्छेद 13.5 पर आधारित प्रश्न (1 प्रश्न)

प्रश्न 1. किसी कुंडली में विद्युत धारा प्रेरित करने के विभिन्न ढंग स्पष्ट कीजिए।

हल: कुंडली में धारा तभी प्रेरित होती है, जब उससे संबद्ध चुंबकीय फ्लक्स में परिवर्तन हो। यह परिवर्तन निम्नलिखित ढंगों से किया जा सकता है —

  • (1) चुंबक व कुंडली के बीच आपेक्षिक गति द्वारा: दंड चुंबक को कुंडली की ओर ले जाने, कुंडली में धकेलने या बाहर खींचने से फ्लक्स बदलता है और धारा प्रेरित होती है। विक्षेप की दिशा धकेलने व खींचने पर विपरीत होती है।
  • (2) कुंडली को गतिमान करके: चुंबक स्थिर रखकर कुंडली को उसकी ओर या उससे दूर ले जाने पर भी आपेक्षिक गति के कारण फ्लक्स बदलता है और धारा प्रेरित होती है।
  • (3) निकटवर्ती कुंडली की धारा बदलकर: पास रखी दूसरी (प्राथमिक) कुंडली में धारा प्रारंभ करने, बंद करने या धारा-नियंत्रक से घटाने-बढ़ाने पर उसका चुंबकीय क्षेत्र बदलता है, जिससे पहली (द्वितीयक) कुंडली के फ्लक्स में परिवर्तन होकर धारा प्रेरित होती है।
  • (4) कुंडली को चुंबकीय क्षेत्र में घुमाकर: शक्तिशाली चुंबक के ध्रुवों के बीच कुंडली को लगातार घुमाने से फ्लक्स निरंतर बदलता रहता है — यही विद्युत जनित्र की कार्यप्रणाली है।

उत्तर (सार): हर ढंग में मूल बात एक ही है — फ्लक्स में परिवर्तन। चुंबक हिले, कुंडली हिले या पड़ोसी कुंडली की धारा बदले — फ्लक्स बदला तो धारा अवश्य प्रेरित होगी।

(छ) अनुच्छेद 13.6 पर आधारित प्रश्न (4 प्रश्न)

प्रश्न 1. विद्युत जनित्र का सिद्धांत लिखिए।

हल:

उत्तर: विद्युत जनित्र विद्युतचुंबकीय प्रेरण के सिद्धांत पर कार्य करता है। जब किसी बंद कुंडली को शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र में तेज़ी से घुमाया जाता है, तो कुंडली से संबद्ध चुंबकीय फ्लक्स में लगातार परिवर्तन होता है, जिसके कारण कुंडली में प्रेरित विद्युत वाहक बल व प्रेरित धारा उत्पन्न होती है। कुंडली को घुमाने में किया गया यांत्रिक कार्य ही विद्युत ऊर्जा में रूपांतरित होता है।

प्रश्न 2. दिष्ट धारा (DC) के कुछ स्रोतों के नाम लिखिए।

हल:

उत्तर: दिष्ट धारा के मुख्य स्रोत हैं — (1) विद्युत-रासायनिक सेल (शुष्क सेल आदि), (2) बैटरी व संचायक सेल (स्टोरेज सेल), (3) DC जनित्र (विभक्त वलय वाला जनित्र), तथा (4) सौर सेल। इन सभी से धारा बाहरी परिपथ में सदैव एक ही दिशा में बहती है।

प्रश्न 3. प्रत्यावर्ती विद्युत धारा (AC) उत्पन्न करने वाले स्रोतों के नाम लिखिए।

हल:

उत्तर: प्रत्यावर्ती धारा के मुख्य स्रोत हैं — (1) AC जनित्र (सर्पी वलय वाला जनित्र), (2) बिजली-घर — जल-विद्युत संयंत्र, ताप-विद्युत संयंत्र तथा परमाणु-विद्युत संयंत्र, जिनमें विशाल AC जनित्र ही लगे होते हैं और घरों तक आने वाली AC वहीं से आती है।

प्रश्न 4. सही विकल्प चुनिए — ताँबे के तार की एक आयताकार कुंडली किसी चुंबकीय क्षेत्र में घूर्णन कर रही है। इस कुंडली में प्रेरित विद्युत धारा की दिशा में कितने परिभ्रमण के पश्चात् परिवर्तन होता है? (a) दो (b) एक (c) आधे (d) चौथाई

हल: कुंडली के आधा चक्कर पूरा करते ही उसकी भुजाएँ क्षेत्र के सापेक्ष अपनी स्थिति बदल लेती हैं — जो भुजा ऊपर की ओर गतिमान थी, वह नीचे की ओर गतिमान होने लगती है। फ्लेमिंग के दाएँ हाथ के नियम से धारा की दिशा इसी क्षण उलट जाती है। यही कारण है कि जनित्र की धारा प्रत्येक आधे चक्कर पर दिशा बदलकर AC बनती है।

उत्तर: (c) आधे परिभ्रमण के पश्चात् प्रेरित धारा की दिशा बदल जाती है।

(ज) अनुच्छेद 13.7 पर आधारित प्रश्न (3 प्रश्न)

प्रश्न 1. विद्युत परिपथों तथा साधित्रों (उपकरणों) में सामान्यतः उपयोग होने वाले दो सुरक्षा उपायों के नाम लिखिए।

हल:

उत्तर: दो प्रमुख सुरक्षा उपाय हैं — (1) विद्युत फ्यूज़ — निर्धारित से अधिक धारा बहने पर पिघलकर परिपथ तोड़ देता है; (2) भू-संपर्क तार — धात्विक आवरण वाले उपकरणों में धारा के रिसाव को पृथ्वी में भेजकर विद्युत-झटके से बचाता है। (आजकल MCB भी फ्यूज़ के समान ही सुरक्षा-उपाय के रूप में प्रयुक्त होता है।)

प्रश्न 2. 2 kW शक्ति अनुमतांक का एक विद्युत तंदूर (ओवन) किसी घरेलू विद्युत परिपथ (220 V) में प्रचालित किया जाता है, जिसका विद्युत धारा अनुमतांक 5 A है। इससे आप किस परिणाम की अपेक्षा करते हैं? स्पष्ट कीजिए।

हल:

चरण 1: दिए गए मान लिखिए — शक्ति P = 2 kW = 2000 W, वोल्टता V = 220 V, परिपथ का धारा-अनुमतांक = 5 A।

चरण 2: सूत्र P = VI से तंदूर द्वारा ली जाने वाली धारा ज्ञात कीजिए:

I = P / V = 2000 W / 220 V ≈ 9.09 A

चरण 3: तुलना कीजिए — तंदूर लगभग 9.09 A धारा लेगा, जबकि परिपथ व फ्यूज़ की क्षमता केवल 5 A है। धारा सीमा से लगभग दोगुनी है।

उत्तर: जैसे ही तंदूर चालू होगा, अत्यधिक धारा से फ्यूज़ तार पिघलकर परिपथ तोड़ देगा और तंदूर बंद हो जाएगा। यदि फ्यूज़ न होता, तो तारें अत्यधिक गरम होकर आग का ख़तरा बन सकती थीं। निष्कर्ष — 2 kW जैसे अधिक शक्ति के उपकरण को 5 A वाले परिपथ में नहीं, 15 A के शक्ति-परिपथ में चलाना चाहिए।

प्रश्न 3. घरेलू विद्युत परिपथों में अतिभारण से बचाव के लिए क्या सावधानी बरतनी चाहिए?

हल:

उत्तर: अतिभारण से बचाव की प्रमुख सावधानियाँ हैं — (1) एक ही सॉकिट से बहुत-से उपकरण एक साथ न जोड़ें — विशेषकर प्रेस, हीटर, ओवन, गीज़र जैसे अधिक शक्ति वाले उपकरण एक ही बोर्ड से कभी न चलाएँ; (2) अधिक शक्ति के उपकरणों के लिए अलग 15 A का शक्ति-परिपथ व सॉकिट लगवाएँ; (3) प्रत्येक परिपथ में उसके अनुमतांक के अनुरूप सही क्षमता का फ्यूज़/MCB लगाएँ; (4) क्षतिग्रस्त तारों व ढीले सॉकिटों का प्रयोग न करें और समय-समय पर वायरिंग की जाँच कराते रहें।

इस InText भाग में हमने सीखा — 21 प्रश्नों में से अधिकांश केवल चार बातों पर घूमते हैं: क्षेत्र रेखाओं के गुण, दो फ्लेमिंग नियम, मोटर-जनित्र का सिद्धांत और घरेलू सुरक्षा। ये चार पक्के हैं, तो InText पूरा पक्का है।

📗 NCERT उदाहरण (Examples)

📌 स्पष्ट घोषणा: NCERT की इस पाठ्य-पुस्तक के अध्याय 13 में कोई क्रमांकित (numbered) उदाहरण नहीं दिए गए हैं — इस अध्याय की शिक्षा क्रियाकलापों (Activities) पर आधारित है। अतः नीचे पाठ्य-पुस्तक के प्रमुख क्रियाकलापों पर आधारित चार हल किए गए क्रियाकलाप-उदाहरण दिए जा रहे हैं, ताकि विद्यार्थी हर अवधारणा को करके-समझने के ढंग से दोहरा सके। ये उदाहरण उदाहरण-खंड के स्थान पर ही दिए गए हैं, कोई क्रमांकित उदाहरण छोड़ा नहीं गया है।

क्रियाकलाप-उदाहरण 1: धारा से दिक्सूचक का विक्षेप (ऑर्स्टेड का प्रयोग)। एक सीधा तार उत्तर-दक्षिण दिशा में फैलाकर उसके नीचे दिक्सूचक रखिए। धारा न बहने पर सुई उत्तर-दक्षिण में ठहरी रहती है। तार में धारा बहाते ही सुई विक्षेपित हो जाती है; धारा बढ़ाने पर विक्षेप बढ़ता है और धारा की दिशा उलटने पर विक्षेप की दिशा भी उलट जाती है। निष्कर्ष: धारावाही तार के चारों ओर चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न होता है, जिसकी दिशा व प्रबलता धारा पर निर्भर करती है।

क्रियाकलाप-उदाहरण 2: परिनालिका के ध्रुव पहचानना (घड़ी-नियम)। मान लीजिए परिनालिका के एक सिरे की ओर देखने पर उसमें धारा दक्षिणावर्त बहती दिखती है। नियम के अनुसार वह सिरा दक्षिणी ध्रुव होगा। जाँच के लिए दंड चुंबक का उत्तरी ध्रुव उस सिरे के पास लाइए — यदि वह आकर्षित होता है, तो निष्कर्ष सत्य है (असमान ध्रुव आकर्षित होते हैं)। धारा की दिशा उलट देने पर वही सिरा उत्तरी ध्रुव बन जाएगा और अब वह चुंबक के उत्तरी ध्रुव को प्रतिकर्षित करेगा। निष्कर्ष: परिनालिका के ध्रुव धारा की दिशा से तय होते हैं और धारा उलटते ही ध्रुव भी उलट जाते हैं।

क्रियाकलाप-उदाहरण 3: मोटर-कुंडली की एक भुजा पर बल की दिशा। मान लीजिए चुंबकीय क्षेत्र बाएँ से दाएँ (N से S की ओर) है और किसी भुजा में धारा कागज़ के तल के अंदर की ओर बह रही है। बाएँ हाथ की मध्यमा को तल के अंदर, तर्जनी को दाईं ओर (क्षेत्र की ओर) रखिए — अँगूठा नीचे की ओर आता है। अतः उस भुजा पर बल नीचे की ओर लगेगा। विपरीत भुजा में धारा तल से बाहर की ओर होती है, इसलिए वहाँ बल ऊपर की ओर लगेगा — और यही दो बल कुंडली को घुमाने वाला बल-युग्म बनाते हैं। निष्कर्ष: केवल हाथ लगाकर, बिना चित्र के भी, मोटर की घूर्णन-दिशा निकाली जा सकती है।

क्रियाकलाप-उदाहरण 4: जनित्र में आधे चक्कर का हिसाब। AC जनित्र की कुंडली 50 Hz की आपूर्ति के लिए एक सेकंड में 50 चक्कर लगाती है। प्रत्येक चक्कर में धारा दो बार शून्य और दो बार अधिकतम होती है तथा प्रत्येक आधे चक्कर पर दिशा बदलती है। अर्थात एक सेकंड में धारा 100 बार दिशा बदलती है, परंतु पूर्ण चक्र 50 ही पूरे होते हैं — इसीलिए आवृत्ति 50 Hz कहलाती है, 100 Hz नहीं। निष्कर्ष: आवृत्ति का अर्थ चक्रों की संख्या है, दिशा-परिवर्तनों की संख्या नहीं — यह छोटा-सा अंतर MCQ में बार-बार परखा जाता है।

✏️ प्रश्नावली (Exercise) – सभी 18 प्रश्नों के हल

अब अध्याय के अंत की प्रश्नावली हल करते हैं। इन 18 प्रश्नों में वस्तुनिष्ठ, लघु उत्तरीय और दीर्घ उत्तरीय — तीनों प्रकार के प्रश्न हैं। मोटर व जनित्र के चित्र वाले प्रश्न (प्रश्न 11 व 16) Board में लगभग हर वर्ष आते हैं, इन्हें चित्र बनाकर अभ्यास करें।

प्रश्न 1. निम्नलिखित में से कौन किसी लंबे विद्युत धारावाही तार के निकट चुंबकीय क्षेत्र का सही वर्णन करता है? (a) चुंबकीय क्षेत्र की क्षेत्र रेखाएँ तार के लंबवत् होती हैं (b) चुंबकीय क्षेत्र की क्षेत्र रेखाएँ तार के समांतर होती हैं (c) चुंबकीय क्षेत्र की क्षेत्र रेखाएँ अरीय होती हैं, जिनका उद्भव तार से होता है (d) चुंबकीय क्षेत्र की संकेंद्री क्षेत्र रेखाओं का केंद्र तार होता है

हल: लोहे के बुरादे वाले क्रियाकलाप से हम जानते हैं कि सीधे धारावाही तार के चारों ओर बुरादा संकेंद्री वृत्तों में जमता है। रेखाएँ न तो समांतर होती हैं, न अरीय (त्रिज्या जैसी); वे तार को केंद्र मानकर वृत्त बनाती हैं, जिनका तल तार के लंबवत् होता है।

उत्तर: (d) चुंबकीय क्षेत्र की संकेंद्री क्षेत्र रेखाओं का केंद्र तार होता है।

प्रश्न 2. वैद्युत-चुंबकीय प्रेरण की परिघटना — (a) किसी वस्तु को आवेशित करने की प्रक्रिया है (b) किसी कुंडली में विद्युत धारा प्रवाहित होने के कारण चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न करने की प्रक्रिया है (c) कुंडली तथा चुंबक के बीच आपेक्षिक गति के कारण कुंडली में प्रेरित विद्युत धारा उत्पन्न करना है (d) किसी विद्युत मोटर की कुंडली को घूर्णन कराने की प्रक्रिया है

हल: विकल्प (b) धारा द्वारा क्षेत्र बनने की बात है, जो ऑर्स्टेड का प्रभाव है — प्रेरण नहीं। प्रेरण का अर्थ है बदलते फ्लक्स (आपेक्षिक गति से उत्पन्न) द्वारा कुंडली में धारा प्रेरित होना।

उत्तर: (c) कुंडली तथा चुंबक के बीच आपेक्षिक गति के कारण कुंडली में प्रेरित विद्युत धारा उत्पन्न करना है।

प्रश्न 3. विद्युत धारा उत्पन्न करने की युक्ति को कहते हैं — (a) जनित्र (b) गैल्वेनोमीटर (c) ऐमीटर (d) मोटर

हल: गैल्वेनोमीटर धारा की उपस्थिति बताता है, ऐमीटर धारा मापता है और मोटर धारा को गति में बदलता है — धारा उत्पन्न केवल जनित्र करता है।

उत्तर: (a) जनित्र।

प्रश्न 4. किसी AC जनित्र तथा DC जनित्र में एक मूलभूत अंतर यह है कि — (a) AC जनित्र में विद्युत-चुंबक होता है, जबकि DC जनित्र में स्थायी चुंबक होता है (b) DC जनित्र उच्च वोल्टता का जनन करता है (c) AC जनित्र उच्च वोल्टता का जनन करता है (d) AC जनित्र में सर्पी वलय होते हैं, जबकि DC जनित्र में दिक्परिवर्तक होता है

हल: दोनों जनित्रों का सिद्धांत, कुंडली व चुंबक समान होते हैं; मूल अंतर केवल वलयों का है — AC में दो पूर्ण सर्पी वलय और DC में विभक्त वलय रूपी दिक्परिवर्तक। वोल्टता या चुंबक के प्रकार से यह अंतर तय नहीं होता।

उत्तर: (d) AC जनित्र में सर्पी वलय होते हैं, जबकि DC जनित्र में दिक्परिवर्तक होता है।

प्रश्न 5. लघुपथन के समय परिपथ में विद्युत धारा का मान — (a) बहुत कम हो जाता है (b) परिवर्तित नहीं होता (c) बहुत अधिक बढ़ जाता है (d) निरंतर परिवर्तित होता है

हल: लघुपथन में विद्युतमय व उदासीन तार सीधे जुड़ जाते हैं, प्रतिरोध लगभग शून्य हो जाता है, इसलिए I = V/R के अनुसार धारा अत्यधिक बढ़ जाती है।

उत्तर: (c) बहुत अधिक बढ़ जाता है।

प्रश्न 6. निम्नलिखित प्रकथनों में कौन-सा सही है तथा कौन-सा गलत है? इसे प्रकथन के सामने अंकित कीजिए — (a) विद्युत मोटर यांत्रिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में रूपांतरित करता है (b) विद्युत जनित्र वैद्युत-चुंबकीय प्रेरण के सिद्धांत पर कार्य करता है (c) किसी लंबी वृत्ताकार विद्युत धारावाही कुंडली के केंद्र पर चुंबकीय क्षेत्र समांतर सीधी क्षेत्र रेखाएँ होता है (d) हरे विद्युतरोधन वाला तार प्रायः विद्युतमय तार होता है

हल:

(a) गलत — मोटर इसका उलटा करती है: वह विद्युत ऊर्जा को यांत्रिक ऊर्जा में बदलती है। यांत्रिक से विद्युत बनाने का काम जनित्र का है।

(b) सही — जनित्र का सिद्धांत ही विद्युतचुंबकीय प्रेरण है।

(c) सही — वृत्ताकार कुंडली (अनेक फेरों वाले पाश) के केंद्र पर सभी फेरों की क्षेत्र रेखाएँ एक ही दिशा में जुड़कर समांतर सीधी रेखाओं जैसी हो जाती हैं।

(d) गलत — हरे विद्युतरोधन वाला तार भू-संपर्क तार होता है; विद्युतमय तार का विद्युतरोधन लाल होता है।

उत्तर: (a) असत्य, (b) सत्य, (c) सत्य, (d) असत्य। विशेष ध्यान दें: कुछ गाइडों व साइटों में (d) को सत्य छपा मिलता है — वह गलत है। हरा तार कभी विद्युतमय नहीं होता; हरा = भू-तार, लाल = विद्युतमय — यही सही पहचान है।

प्रश्न 7. चुंबकीय क्षेत्र को उत्पन्न करने के तीन तरीकों की सूची बनाइए।

हल:

उत्तर: चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न करने के तीन प्रमुख तरीके हैं — (1) स्थायी चुंबक द्वारा (दंड चुंबक, नाल-चुंबक आदि); (2) विद्युत धारावाही चालक द्वारा — सीधा तार, वृत्ताकार पाश, कुंडली या परिनालिका में धारा प्रवाहित करके; (3) गतिमान विद्युत आवेश द्वारा — गतिमान आवेश अपने चारों ओर चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न करता है, धारावाही तार का क्षेत्र भी वास्तव में उसी में गतिमान आवेशों (इलेक्ट्रॉनों) के कारण ही होता है।

प्रश्न 8. परिनालिका चुंबक की भाँति कैसे व्यवहार करती है? क्या आप किसी छड़ चुंबक की सहायता से किसी विद्युत धारावाही परिनालिका के उत्तर ध्रुव तथा दक्षिण ध्रुव का निर्धारण कर सकते हैं?

हल:

चरण 1: परिनालिका में धारा प्रवाहित करने पर उसके चारों ओर का चुंबकीय क्षेत्र छड़ चुंबक के क्षेत्र के समान बनता है — क्षेत्र रेखाएँ एक सिरे से निकलती और दूसरे सिरे में प्रवेश करती प्रतीत होती हैं। परिनालिका का एक सिरा उत्तरी ध्रुव और दूसरा सिरा दक्षिणी ध्रुव की तरह व्यवहार करता है तथा इसके भीतर क्षेत्र रेखाएँ समांतर होती हैं, अर्थात भीतर का क्षेत्र एकसमान व प्रबल होता है। अतः धारावाही परिनालिका पूर्णतः चुंबक की भाँति व्यवहार करती है।

चरण 2: ध्रुव ज्ञात करने की विधि — एक छड़ चुंबक को धागे से स्वतंत्र रूप से लटकाइए अथवा उसका ज्ञात उत्तरी ध्रुव परिनालिका के एक सिरे के समीप लाइए।

उत्तर: हाँ, निर्धारण किया जा सकता है। यदि परिनालिका का वह सिरा छड़ चुंबक के उत्तरी ध्रुव को प्रतिकर्षित करता है, तो वह सिरा परिनालिका का उत्तरी ध्रुव है (समान ध्रुव प्रतिकर्षित होते हैं) और दूसरा सिरा दक्षिणी ध्रुव होगा। यदि वह सिरा उत्तरी ध्रुव को आकर्षित करता है, तो वह सिरा दक्षिणी ध्रुव है। (याद रहे — निश्चित पहचान की कसौटी प्रतिकर्षण ही है, क्योंकि आकर्षण किसी अचुंबकित लोहे से भी हो सकता है।)

प्रश्न 9. किसी चुंबकीय क्षेत्र में स्थित विद्युत धारावाही चालक पर आरोपित बल कब अधिकतम होता है?

हल: चालक पर लगने वाला बल F = BIL sinθ होता है, जहाँ θ चालक (धारा की दिशा) व चुंबकीय क्षेत्र के बीच का कोण है। sinθ का अधिकतम मान 1 होता है, जब θ = 90° हो।

उत्तर: बल तब अधिकतम होता है, जब चालक को चुंबकीय क्षेत्र के लंबवत् (90° पर) रखा जाए। इसके विपरीत, चालक क्षेत्र के समांतर (θ = 0°) हो तो बल शून्य होता है।

प्रश्न 10. मान लीजिए आप किसी चैंबर में अपनी पीठ को किसी एक दीवार से लगाकर बैठे हैं। कोई इलेक्ट्रॉन पुंज आपके पीछे की दीवार से सामने वाली दीवार की ओर क्षैतिजतः गमन करते हुए किसी प्रबल चुंबकीय क्षेत्र द्वारा आपके दाईं ओर विक्षेपित हो जाता है। चुंबकीय क्षेत्र की दिशा क्या है?

हल:

चरण 1: इलेक्ट्रॉन पुंज पीछे से सामने की ओर जा रहा है। इलेक्ट्रॉन ऋणावेशित है, अतः परंपरागत धारा की दिशा पुंज की गति से विपरीत — अर्थात सामने से पीछे (आपकी पीठ की ओर) होगी। फ्लेमिंग के नियम में सदैव धारा की यही परंपरागत दिशा लगेगी।

चरण 2: बल की दिशा वही है, जिधर पुंज विक्षेपित हुआ — अर्थात आपके दाईं ओर।

चरण 3: बाएँ हाथ की मध्यमा (धारा) को अपने से दूर-पीछे की ओर अर्थात पुंज की गति के विपरीत रखिए और अँगूठा (बल) अपने दाईं ओर कीजिए।

उत्तर: इस स्थिति में तर्जनी (क्षेत्र) ऊर्ध्वाधरतः नीचे की ओर रहती है, अतः चुंबकीय क्षेत्र की दिशा ऊर्ध्वाधर नीचे की ओर (अधोमुखी) है। चेतावनी: यदि इलेक्ट्रॉन के स्थान पर धारा की दिशा भूलकर पुंज की दिशा ही लगा दी जाए, तो उत्तर ठीक उलटा (ऊपर की ओर) आ जाएगा — ऋणावेश वाले प्रश्नों में यही सबसे आम गलती है।

प्रश्न 11. विद्युत मोटर का नामांकित आरेख खींचिए। इसका सिद्धांत तथा कार्यविधि स्पष्ट कीजिए। विद्युत मोटर में विभक्त वलय का क्या महत्त्व है?

हल: (आरेख: कागज़ पर आयताकार कुंडली ABCD को N व S ध्रुवों के बीच धुरी पर दिखाइए; कुंडली के सिरों को दो अर्ध-वलयों R1–R2 से और उन्हें छूते ब्रश B1–B2 को बैटरी से जोड़कर अंकित कीजिए — नर्म लोहे की क्रोड, ध्रुव व घूर्णन-तीर अवश्य दर्शाएँ।)

सिद्धांत: चुंबकीय क्षेत्र में रखी धारावाही कुंडली की विपरीत भुजाओं पर बराबर व विपरीत बल लगते हैं, जिनका बल-युग्म कुंडली को घुमाता है — इस प्रकार मोटर विद्युत ऊर्जा को यांत्रिक ऊर्जा में बदलती है।

कार्यविधि: बैटरी से धारा ब्रशों व विभक्त वलय द्वारा कुंडली में पहुँचती है। फ्लेमिंग के बाएँ हाथ के नियम से भुजा AB पर बल एक ओर (मान लीजिए नीचे की ओर) और भुजा CD पर बल विपरीत ओर (ऊपर की ओर) लगता है। ये बल-युग्म बनाकर कुंडली को घुमाते हैं। कुंडली के साथ अर्ध-वलय भी घूमते हैं। आधा चक्कर पूर्ण होते ही अर्ध-वलयों का ब्रशों से संपर्क बदल जाता है, जिससे कुंडली में धारा की दिशा उलट जाती है और बल-युग्म फिर उसी घूर्णन-दिशा में कार्य करने लगता है। यह क्रिया प्रत्येक आधे चक्कर पर दोहराती है और कुंडली लगातार घूमती रहती है।

विभक्त वलय का महत्त्व: विभक्त वलय दिक्परिवर्तक का कार्य करता है — यह प्रत्येक आधे घूर्णन के पश्चात् कुंडली में धारा की दिशा परिवर्तित कर देता है, जिससे कुंडली पर लगने वाला बल-युग्म सदैव एक ही दिशा में घूर्णन उत्पन्न करता है। इसके बिना मोटर लगातार नहीं घूम सकती थी।

प्रश्न 12. ऐसी कुछ युक्तियों के नाम लिखिए, जिनमें विद्युत मोटर उपयोग किए जाते हैं।

हल:

उत्तर: विद्युत मोटर का उपयोग करने वाली युक्तियाँ हैं — विद्युत पंखा, कूलर, एयर कंडीशनर, रेफ्रिजरेटर (कंप्रेसर), वाशिंग मशीन, मिक्सर-ग्राइंडर, जल-पंप (मोटर), विद्युत सिलाई मशीन, कंप्यूटर की हार्ड डिस्क/पंखे, विद्युत वाहन व खिलौनों आदि में।

प्रश्न 13. कोई विद्युतरोधी ताँबे के तार की कुंडली किसी गैल्वेनोमीटर से संयोजित है। क्या होगा, यदि कोई छड़ चुंबक — (i) कुंडली में धकेला जाता है (ii) कुंडली के भीतर से बाहर खींचा जाता है (iii) कुंडली के भीतर स्थिर रखा जाता है?

हल:

(i) चुंबक धकेलने पर कुंडली से संबद्ध फ्लक्स बदलता (बढ़ता) है, अतः कुंडली में प्रेरित धारा उत्पन्न होती है और गैल्वेनोमीटर विक्षेप दर्शाता है।

(ii) चुंबक बाहर खींचने पर फ्लक्स फिर बदलता है (घटता है), अतः पुनः प्रेरित धारा उत्पन्न होती है और गैल्वेनोमीटर विक्षेप दर्शाता है, परंतु इस बार विक्षेप की दिशा पहले के विपरीत होती है, क्योंकि फ्लक्स-परिवर्तन की प्रकृति उलट गई है। चुंबक का दूसरा ध्रुव उपयोग करने पर दिशाएँ फिर बदल जाएँगी।

(iii) चुंबक स्थिर रखने पर फ्लक्स में कोई परिवर्तन नहीं होता, अतः कोई प्रेरित धारा उत्पन्न नहीं होती और गैल्वेनोमीटर कोई विक्षेप नहीं दर्शाता — सुई शून्य पर रहती है।

उत्तर (सार): गति है तो विक्षेप है, स्थिरता है तो विक्षेप नहीं — प्रेरण का मूल मंत्र ही फ्लक्स-परिवर्तन है।

प्रश्न 14. दो वृत्ताकार कुंडली A तथा B एक-दूसरे के निकट स्थित हैं। यदि कुंडली A में विद्युत धारा में कोई परिवर्तन करें, तो क्या कुंडली B में कोई विद्युत धारा प्रेरित होगी? कारण लिखिए।

हल:

चरण 1: कुंडली A में धारा बहने से उसके चारों ओर चुंबकीय क्षेत्र बनता है, जिसकी कुछ क्षेत्र रेखाएँ पास स्थित कुंडली B से भी गुज़रती हैं — अर्थात B, A के क्षेत्र से संबद्ध है।

चरण 2: A की धारा बदलने पर उसका चुंबकीय क्षेत्र भी उसी अनुपात में बदलता है, जिससे B से संबद्ध फ्लक्स में परिवर्तन होता है।

उत्तर: हाँ, कुंडली B में प्रेरित धारा अवश्य उत्पन्न होगी, क्योंकि A की धारा में परिवर्तन से B से संबद्ध चुंबकीय फ्लक्स में परिवर्तन होता है और विद्युतचुंबकीय प्रेरण द्वारा B में धारा प्रेरित हो जाती है। धारा-परिवर्तन जितना तीव्र होगा, प्रेरित धारा उतनी ही प्रबल होगी।

प्रश्न 15. निम्नलिखित की दिशा को निर्धारित करने वाला नियम लिखिए — (i) किसी विद्युत धारावाही सीधे चालक के चारों ओर उत्पन्न चुंबकीय क्षेत्र (ii) किसी चुंबकीय क्षेत्र में, क्षेत्र के लंबवत् स्थित, विद्युत धारावाही सीधे चालक पर आरोपित बल तथा (iii) किसी चुंबकीय क्षेत्र में किसी कुंडली के घूर्णन करने पर उस कुंडली में उत्पन्न प्रेरित विद्युत धारा।

हल:

(i) दायाँ हाथ अँगूठा नियम (मैक्सवेल का कॉर्क-स्क्रू नियम): धारावाही चालक को दाएँ हाथ में इस प्रकार पकड़िए कि अँगूठा धारा की दिशा में हो, तो मुड़ी हुई उँगलियाँ चालक के चारों ओर चुंबकीय क्षेत्र रेखाओं की दिशा बताती हैं।

(ii) फ्लेमिंग का वामहस्त (बायाँ हाथ) नियम: बाएँ हाथ की तर्जनी, मध्यमा व अँगूठे को परस्पर लंबवत् रखने पर — तर्जनी क्षेत्र की दिशा, मध्यमा धारा की दिशा और अँगूठा चालक पर आरोपित बल की दिशा दर्शाता है।

(iii) फ्लेमिंग का दक्षिणहस्त (दायाँ हाथ) नियम: दाएँ हाथ की तर्जनी, मध्यमा व अँगूठे को परस्पर लंबवत् रखने पर — अँगूठा चालक की गति की दिशा, तर्जनी क्षेत्र की दिशा और मध्यमा प्रेरित धारा की दिशा दर्शाती है।

उत्तर (सार तालिका): क्षेत्र की दिशा → दायाँ अँगूठा; बल की दिशा → बायाँ हाथ; प्रेरित धारा की दिशा → दायाँ हाथ। तीनों नियम एक साथ इसी क्रम में याद कर लीजिए — यह प्रश्न Board में बार-बार आता है।

प्रश्न 16. नामांकित आरेख खींचकर किसी विद्युत जनित्र का मूल सिद्धांत तथा कार्यविधि स्पष्ट कीजिए। इसमें ब्रशों का क्या कार्य है?

हल: (आरेख: N व S ध्रुवों के बीच धुरी पर स्थित आयताकार कुंडली ABCD बनाइए; उसके सिरों से जुड़े दो पूर्ण वलय R1–R2, उन्हें छूते ब्रश B1–B2 और ब्रशों से जुड़ा बाहरी परिपथ — बल्ब/भार — दर्शाकर सभी भाग अंकित कीजिए।)

सिद्धांत: विद्युत जनित्र विद्युतचुंबकीय प्रेरण पर आधारित है — चुंबकीय क्षेत्र में घुमाई जाने वाली कुंडली के फ्लक्स में निरंतर परिवर्तन से उसमें प्रेरित विद्युत वाहक बल व धारा उत्पन्न होती है; यांत्रिक ऊर्जा विद्युत ऊर्जा में बदलती है।

संरचना (संक्षेप में): क्षेत्र चुंबक (N–S), नर्म लोहे की क्रोड पर लिपटी आर्मेचर कुंडली, दो सर्पी वलय (AC के लिए) और दो कार्बन ब्रश — यही चार मुख्य भाग हैं।

कार्यविधि: कुंडली को बाहरी साधन (टरबाइन, इंजन आदि) से घुमाया जाता है। घूमने पर कुंडली से संबद्ध फ्लक्स निरंतर बदलता है। पहले आधे चक्कर में फ्लेमिंग के दाएँ हाथ के नियम के अनुसार एक दिशा में धारा प्रेरित होती है — बाहरी परिपथ में धारा एक ब्रश से दूसरे ब्रश की ओर बहती है। आधा चक्कर पूरा होते ही कुंडली की भुजाओं की गति-दिशा क्षेत्र के सापेक्ष उलट जाती है, इसलिए प्रेरित धारा की दिशा भी उलट जाती है। प्रत्येक आधे चक्कर पर यही क्रम दोहरता है — बाहरी परिपथ को प्रत्यावर्ती धारा (AC) मिलती है। एक पूरे चक्कर में विद्युत वाहक बल दो बार अधिकतम व दो बार शून्य होता है।

ब्रशों का कार्य: कार्बन ब्रश स्थिर रहते हुए घूमते हुए वलयों के साथ सतत विद्युत संपर्क बनाए रखते हैं और कुंडली में प्रेरित धारा को बिना संपर्क तोड़े बाहरी परिपथ तक पहुँचाते हैं। ब्रश न हों, तो घूमती कुंडली से धारा बाहर लाना संभव ही न हो — तारें घूमकर आपस में उलझ जाएँगी।

प्रश्न 17. किसी विद्युत परिपथ में लघुपथन कब होता है?

हल:

उत्तर: जब तारों का विद्युतरोधन क्षतिग्रस्त हो जाने से विद्युतमय तार व उदासीन तार सीधे एक-दूसरे के संपर्क में आ जाते हैं, तो परिपथ का प्रतिरोध लगभग शून्य हो जाता है और धारा का मान अत्यंत अधिक बढ़ जाता है। इसी घटना को लघुपथन (short circuit) कहते हैं। इस स्थिति में अत्यधिक ऊष्मा व चिंगारियाँ उत्पन्न होती हैं और फ्यूज़ पिघलकर परिपथ तोड़ देता है; फ्यूज़ न हो तो आग लग सकती है।

प्रश्न 18. भू-संपर्क तार का क्या कार्य है? धातु के आवरण वाले विद्युत साधित्रों को भू-संपर्कित करना क्यों आवश्यक है?

हल:

चरण 1: भू-संपर्क तार उपकरण के धात्विक आवरण को एक तार द्वारा पृथ्वी (भूमि में गड़े चालक) से जोड़ता है। यह धारा के लिए एक वैकल्पिक, अत्यंत कम प्रतिरोध वाला सुरक्षा-मार्ग प्रदान करता है।

चरण 2: यदि किसी खराबी से विद्युतमय तार उपकरण के धात्विक आवरण को छू जाए, तो आवरण विद्युतमय (220 V) हो सकता है। भू-संपर्क होने पर रिसाव-धारा आवरण से भू-तार द्वारा सीधे पृथ्वी में चली जाती है; आवरण का विभव भू-विभव के बराबर बना रहता है।

उत्तर: भू-संपर्क तार का कार्य सुरक्षा है। धात्विक आवरण वाले साधित्रों (प्रेस, फ्रिज, कूलर, वाशिंग मशीन आदि) को भू-संपर्कित करना इसलिए आवश्यक है, ताकि किसी भी प्रकार के धारा-रिसाव की स्थिति में धारा उपयोगकर्ता के शरीर से न गुज़रकर पृथ्वी में चली जाए और व्यक्ति विद्युत-झटके से सुरक्षित रहे। भू-संपर्क न हो तो आवरण को छूने वाले व्यक्ति के शरीर से धारा गुज़रकर गंभीर, यहाँ तक कि घातक, झटका लग सकता है।

इस प्रश्नावली में हमने देखा — 18 प्रश्नों में मोटर (प्र. 11) व जनित्र (प्र. 16) के दीर्घ प्रश्न सबसे भारी हैं; इन्हें सिद्धांत + संरचना + कार्यविधि + एक विशेष बिंदु (विभक्त वलय/ब्रश) के चार भागों में लिखने का अभ्यास कर लीजिए।

📖 Case Study – पंखे, जनरेटर और गाँव की एक शाम

गर्मी की एक शाम गाँव में बिजली चली गई। सीमा ने देखा कि छत का पंखा बिजली जाते ही धीरे-धीरे रुक गया। दादाजी ने बताया कि पंखे के अंदर एक विद्युत मोटर होती है, जो बिजली को घूर्णन में बदलती है — बिजली बंद, तो घूर्णन भी बंद। थोड़ी देर में पड़ोस के घर से जनरेटर की आवाज़ आने लगी और उनके बल्ब जल उठे। दादाजी ने समझाया कि जनरेटर मोटर का उलटा काम करता है — वह डीजल-इंजन की घूर्णन-गति से बिजली बनाता है। उसी समय सीमा के भाई ने जनरेटर के पास रखा एक दंड चुंबक उठाया और पास रखी दिक्सूचक की सुई नाचने लगी। सीमा मुस्कराई — आज का विज्ञान-वाला अध्याय तो उसके अपने घर-आँगन में ही घटित हो रहा था! इस गद्यांश के आधार पर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए:

Q1. पंखे की विद्युत मोटर में ऊर्जा का रूपांतरण होता है —

(A) यांत्रिक ऊर्जा से विद्युत ऊर्जा में
(B) विद्युत ऊर्जा से यांत्रिक ऊर्जा में
(C) विद्युत ऊर्जा से ऊष्मा ऊर्जा में
(D) यांत्रिक ऊर्जा से चुंबकीय ऊर्जा में

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (B) विद्युत ऊर्जा से यांत्रिक ऊर्जा में — मोटर धारावाही कुंडली पर लगने वाले बल-युग्म से घूर्णन उत्पन्न करती है।

Q2. पंखे की मोटर में विभक्त वलय का कार्य है —

(A) धारा का मान बढ़ाना
(B) चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न करना
(C) प्रत्येक आधे घूर्णन पर कुंडली में धारा की दिशा उलटना
(D) मोटर की गति मापना

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (C) प्रत्येक आधे घूर्णन पर कुंडली में धारा की दिशा उलटना — इससे बल-युग्म सदैव एक ही दिशा में कार्य करता है और पंखा लगातार घूमता है।

Q3. पड़ोस का जनरेटर किस सिद्धांत पर बिजली बनाता है? —

(A) विद्युतचुंबकीय प्रेरण
(B) धारा के तापीय प्रभाव
(C) धारा के रासायनिक प्रभाव
(D) प्रकाश-विद्युत प्रभाव

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (A) विद्युतचुंबकीय प्रेरण — घूमती कुंडली के फ्लक्स में परिवर्तन से प्रेरित धारा उत्पन्न होती है।

Q4. दिक्सूचक की सुई दंड चुंबक के पास नाचने लगी, क्योंकि —

(A) सुई में विद्युत धारा बहने लगी
(B) चुंबक का क्षेत्र सुई के ध्रुवों पर आकर्षण-प्रतिकर्षण बल लगाता है
(C) चुंबक ने सुई को गरम कर दिया
(D) सुई लोहे की बनी होती है, इसलिए वह पिघल गई

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (B) चुंबक का क्षेत्र सुई के ध्रुवों पर आकर्षण-प्रतिकर्षण बल लगाता है — सुई स्वयं एक छोटा चुंबक है, इसलिए वह क्षेत्र की दिशा में घूमकर ठहरती है।

⭐ Quick Revision – Important Points

  • ✅ चुंबकीय क्षेत्र सदिश राशि है; इसका SI मात्रक टेस्ला (T) है और दिक्सूचक सुई से इसकी दिशा जानी जाती है।
  • ✅ क्षेत्र रेखाएँ बाहर N → S, अंदर S → N जाती हैं; ये कभी काटती नहीं हैं; जहाँ सघन, वहाँ क्षेत्र प्रबल।
  • ✅ सीधे धारावाही तार का क्षेत्र तार को केंद्र मानकर बने संकेंद्री वृत्त होते हैं; धारा बढ़ाने से क्षेत्र प्रबल, दूरी बढ़ाने से दुर्बल होता है।
  • ✅ दायाँ हाथ अँगूठा नियम — अँगूठा = धारा की दिशा, मुड़ी उँगलियाँ = क्षेत्र की दिशा।
  • ✅ वृत्ताकार पाश के केंद्र पर क्षेत्र तल के लंबवत् व प्रबल होता है; वामावर्त धारा वाला पृष्ठ उत्तरी ध्रुव, दक्षिणावर्त वाला दक्षिणी ध्रुव।
  • ✅ परिनालिका के भीतर क्षेत्र एकसमान होता है; नर्म लोहे की क्रोड रखते ही वह विद्युत-चुंबक बन जाती है — धारा बंद, चुंबकत्व बंद।
  • ✅ धारावाही चालक पर बल F = BIL; चालक क्षेत्र के लंबवत् हो तो बल अधिकतम, समांतर हो तो शून्य।
  • ✅ फ्लेमिंग बायाँ हाथ (मोटर) — अँगूठा = बल, तर्जनी = क्षेत्र, मध्यमा = धारा।
  • ✅ मोटर विद्युत → यांत्रिक ऊर्जा बदलती है; विभक्त वलय हर आधे चक्कर पर धारा उलटकर घूर्णन जारी रखता है।
  • ✅ विद्युतचुंबकीय प्रेरण — बदलता फ्लक्स ही प्रेरित धारा बनाता है; स्थिर चुंबक-कुंडली में कोई धारा नहीं बनती।
  • ✅ फ्लेमिंग दायाँ हाथ (जनित्र) — अँगूठा = गति, तर्जनी = क्षेत्र, मध्यमा = प्रेरित धारा।
  • ✅ जनित्र यांत्रिक → विद्युत ऊर्जा बदलता है; AC जनित्र में सर्पी वलय, DC जनित्र में विभक्त वलय (दिक्परिवर्तक) होता है; कुंडली में धारा हर आधे चक्कर पर दिशा बदलती है।
  • ✅ भारत में घरेलू आपूर्ति 220 V, 50 Hz AC है; लाल = विद्युतमय, काला = उदासीन, हरा = भू-तार।
  • ✅ फ्यूज़ कम गलनांक का तार है, विद्युतमय तार में श्रेणी में लगता है; लघुपथन में धारा अत्यधिक बढ़ जाती है; अतिभारण का बचाव — एक सॉकिट से अनेक भारी उपकरण न जोड़ें।

⚠️ Aam Galtiyan (Common Mistakes)

  • बाएँ और दाएँ हाथ के नियम उलट देना — सबसे बड़ी गलती: विद्यार्थी जनित्र के प्रश्न में बायाँ हाथ और मोटर के प्रश्न में दायाँ हाथ लगा बैठते हैं। पक्का नियम — मोटर = बायाँ हाथ (धारा दी जाती है, बल मिलता है) और जनित्र = दायाँ हाथ (गति दी जाती है, धारा मिलती है)। दोनों में तर्जनी = क्षेत्र और मध्यमा = धारा समान रहती है, केवल अँगूठे का अर्थ बदलता है — बाएँ में अँगूठा बल (परिणाम), दाएँ में अँगूठा गति (कारण)।
  • फ्लेमिंग नियम में उँगलियों का क्रम बदल देना: अँगूठे को धारा और मध्यमा को बल लिखना गलत है। सही क्रम दोहराइए — तर्जनी = क्षेत्र, मध्यमा = धारा, अँगूठा = बल (बायाँ हाथ)। कई गाइडों में यह गड़बड़ छपा है, NCERT वाला क्रम ही लिखें।
  • हरे तार को विद्युतमय समझ लेना: हरा तार भू-तार है, विद्युतमय तार लाल होता है। प्रश्नावली के सत्य-असत्य प्रश्न में यही कथन सबसे अधिक गलत किया जाता है।
  • मोटर व जनित्र का ऊर्जा-रूपांतरण उलटा लिखना: मोटर विद्युत → यांत्रिक और जनित्र यांत्रिक → विद्युत बदलता है। “मोटर यांत्रिक से विद्युत बनाता है” कथन असत्य है।
  • सर्पी वलय व विभक्त वलय में भ्रम: AC जनित्र में पूर्ण सर्पी वलय और DC जनित्र व मोटर में विभक्त वलय होता है। नाम के साथ “पूर्ण/आधा कटा” जोड़कर याद करें।
  • स्थिर चुंबक से धारा की अपेक्षा करना: कुंडली के भीतर चुंबक स्थिर रखा हो तो फ्लक्स नहीं बदलता और कोई प्रेरित धारा नहीं बनती — गैल्वेनोमीटर शून्य ही दिखाएगा।
  • इलेक्ट्रॉन वाले प्रश्न में धारा की दिशा न उलटना: फ्लेमिंग नियम परंपरागत धारा पर लगता है; इलेक्ट्रॉन की गति की विपरीत दिशा को धारा मानकर ही नियम लगाएँ, वरना उत्तर उलटा होगा।
  • फ्यूज़ को उदासीन तार में या समांतर में लिखना: फ्यूज़ सदैव विद्युतमय तार में श्रेणीक्रम में लगता है और उसकी क्षमता परिपथ के अनुमतांक के अनुरूप होनी चाहिए — फ्यूज़ के स्थान पर मोटा ताँबे का तार लगाना खतरनाक है।

🎯 Bihar Board Exam Tips

  • चित्र वाले प्रश्न सबसे पहले तैयार करें: विद्युत मोटर व AC जनित्र के नामांकित चित्र, सिद्धांत व कार्यविधि — ये दो दीर्घ प्रश्न (प्रश्नावली प्र. 11 व 16) लगभग हर वर्ष पूछे जाते हैं। चित्र में भागों के नाम साफ़ अक्षरों में लिखना ही आधे अंक दिला देता है।
  • तीनों नियमों की तुलना-तालिका बनाकर याद करें: दायाँ अँगूठा (क्षेत्र की दिशा), बायाँ हाथ (बल की दिशा — मोटर), दायाँ हाथ (प्रेरित धारा — जनित्र)। परीक्षा-भवन में प्रश्न पढ़ते ही पहले तय करें कि पूछा क्या है — क्षेत्र, बल या प्रेरित धारा — फिर सही हाथ उठाएँ।
  • उँगलियों का क्रम शब्दशः लिखें: नियम लिखते समय “तर्जनी = क्षेत्र, मध्यमा = धारा, अँगूठा = बल/गति” स्पष्ट लिखें; केवल “फ्लेमिंग का नियम लागू करने से” लिखने पर पूरे अंक नहीं मिलते।
  • घरेलू परिपथ के तथ्य रट लें: तारों के रंग, 220 V व 50 Hz, फ्यूज़ की विशेषताएँ, लघुपथन व अतिभारण की परिभाषाएँ — ये वस्तुनिष्ठ व 2 अंकों के प्रश्नों में बार-बार आते हैं। तंदूर वाला संख्यात्मक प्रश्न (P = VI से 9.09 A) भी अभ्यास कर लें, यह InText का तैयार संख्यात्मक है।
  • सत्य-असत्य प्रश्नों में जाल पहचानें: “हरे तार = विद्युतमय” और “मोटर यांत्रिक → विद्युत बदलता है” — दोनों कथन गलत हैं, परंतु जल्दबाज़ी में सही लगते हैं। ऐसे प्रश्न धीरे पढ़कर हल करें।
  • पिछले वर्षों के BSEB प्रश्न-पत्रों से इस अध्याय के प्रश्न अवश्य हल करें — परिनालिका, ध्रुव-निर्धारण व भू-तार वाले प्रश्न प्रायः दोहराए जाते हैं।

📝 MCQ Quiz – 15 वस्तुनिष्ठ प्रश्न (स्वयं को जाँचें)

पहले बिना देखे हल करें, फिर “✅ उत्तर देखें” खोलकर मिलाएँ। अंत में Answer Key table दी गई है।

Q1. दंड चुंबक के बाहर चुंबकीय क्षेत्र रेखाओं की दिशा होती है —

(A) दक्षिणी ध्रुव से उत्तरी ध्रुव की ओर
(B) उत्तरी ध्रुव से दक्षिणी ध्रुव की ओर
(C) दोनों ध्रुवों से केंद्र की ओर
(D) कोई निश्चित दिशा नहीं होती

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (B) उत्तरी ध्रुव से दक्षिणी ध्रुव की ओर — चुंबक के अंदर दिशा S से N की ओर होती है, इसलिए रेखाएँ बंद वक्र बनाती हैं।

Q2. सीधे लंबे धारावाही तार के चारों ओर चुंबकीय क्षेत्र रेखाओं का आकार होता है —

(A) सीधी समांतर रेखाएँ
(B) अरीय रेखाएँ
(C) तार को केंद्र मानकर बने संकेंद्री वृत्त
(D) दीर्घवृत्त

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (C) तार को केंद्र मानकर बने संकेंद्री वृत्त — लोहे के बुरादे वाले क्रियाकलाप से यही स्पष्ट होता है।

Q3. दायाँ हाथ अँगूठा नियम में अँगूठा किसकी दिशा दर्शाता है? —

(A) विद्युत धारा की
(B) चुंबकीय क्षेत्र की
(C) बल की
(D) गति की

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (A) विद्युत धारा की — मुड़ी हुई उँगलियाँ चुंबकीय क्षेत्र की दिशा बताती हैं।

Q4. लंबी धारावाही परिनालिका के भीतर चुंबकीय क्षेत्र —

(A) शून्य होता है
(B) सिरों की ओर घटता है
(C) सिरों की ओर बढ़ता है
(D) सभी बिंदुओं पर समान होता है

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (D) सभी बिंदुओं पर समान होता है — भीतर क्षेत्र रेखाएँ परस्पर समांतर होती हैं।

Q5. विद्युत-चुंबक की क्रोड बनाने के लिए सबसे उपयुक्त पदार्थ है —

(A) इस्पात
(B) नर्म लोहा
(C) ताँबा
(D) ऐलुमिनियम

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (B) नर्म लोहा — यह धारा बहने पर प्रबल चुंबक बनता है और धारा बंद होते ही चुंबकत्व खो देता है।

Q6. चुंबकीय क्षेत्र में स्थित धारावाही चालक पर लगने वाले बल की दिशा किस नियम से ज्ञात की जाती है? —

(A) दायाँ हाथ अँगूठा नियम
(B) फ्लेमिंग के दाएँ हाथ के नियम
(C) फ्लेमिंग के बाएँ हाथ के नियम
(D) ओम के नियम

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (C) फ्लेमिंग के बाएँ हाथ के नियम — तर्जनी = क्षेत्र, मध्यमा = धारा, अँगूठा = बल।

Q7. धारावाही चालक पर चुंबकीय बल अधिकतम होता है, जब चालक क्षेत्र के —

(A) समांतर हो
(B) 45° पर हो
(C) विपरीत दिशा में हो
(D) लंबवत् (90°) हो

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (D) लंबवत् (90°) हो — F = BIL sinθ में θ = 90° पर sinθ = 1, अतः बल अधिकतम होता है।

Q8. विद्युत मोटर ऊर्जा का रूपांतरण करती है —

(A) यांत्रिक से विद्युत में
(B) विद्युत से यांत्रिक में
(C) विद्युत से ऊष्मा में
(D) रासायनिक से विद्युत में

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (B) विद्युत से यांत्रिक में — मोटर की कुंडली बल-युग्म से घूमती है।

Q9. विद्युत मोटर में प्रत्येक आधे घूर्णन पर कुंडली में धारा की दिशा उलटने का कार्य कौन करता है? —

(A) विभक्त वलय (दिक्परिवर्तक)
(B) क्षेत्र चुंबक
(C) नर्म लोहे की क्रोड
(D) बैटरी

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (A) विभक्त वलय (दिक्परिवर्तक) — यही कुंडली को लगातार एक ही दिशा में घुमाए रखता है।

Q10. किसी कुंडली में प्रेरित धारा उत्पन्न होने की आवश्यक शर्त है —

(A) कुंडली ताँबे की हो
(B) कुंडली के पास चुंबक रखा हो
(C) कुंडली से संबद्ध चुंबकीय फ्लक्स में परिवर्तन हो
(D) कुंडली में बैटरी जुड़ी हो

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (C) कुंडली से संबद्ध चुंबकीय फ्लक्स में परिवर्तन हो — स्थिर चुंबक से कोई धारा प्रेरित नहीं होती।

Q11. चुंबकीय क्षेत्र में गतिमान चालक में प्रेरित धारा की दिशा किस नियम से ज्ञात की जाती है? —

(A) फ्लेमिंग के बाएँ हाथ के नियम
(B) फ्लेमिंग के दाएँ हाथ के नियम
(C) दायाँ हाथ अँगूठा नियम
(D) मैक्सवेल के कॉर्क-स्क्रू नियम

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (B) फ्लेमिंग के दाएँ हाथ के नियम — अँगूठा = गति, तर्जनी = क्षेत्र, मध्यमा = प्रेरित धारा।

Q12. AC जनित्र तथा DC जनित्र में मूलभूत अंतर है —

(A) कुंडली के आकार का
(B) चुंबक की प्रबलता का
(C) ऊर्जा-रूपांतरण का
(D) AC में सर्पी वलय व DC में दिक्परिवर्तक (विभक्त वलय) का

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (D) AC में सर्पी वलय व DC में दिक्परिवर्तक (विभक्त वलय) का — दोनों का सिद्धांत विद्युतचुंबकीय प्रेरण ही है।

Q13. घरेलू विद्युत परिपथ में हरे विद्युतरोधन वाला तार होता है —

(A) भू-संपर्क तार
(B) विद्युतमय तार
(C) उदासीन तार
(D) फ्यूज़ तार

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (A) भू-संपर्क तार — लाल विद्युतमय और काला उदासीन तार होता है।

Q14. लघुपथन के समय परिपथ में धारा का मान —

(A) शून्य हो जाता है
(B) अपरिवर्तित रहता है
(C) बहुत अधिक बढ़ जाता है
(D) धीरे-धीरे घटता है

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (C) बहुत अधिक बढ़ जाता है — विद्युतमय व उदासीन तार के सीधे संपर्क से प्रतिरोध लगभग शून्य हो जाता है।

Q15. विद्युत फ्यूज़ के बारे में सही कथन है —

(A) यह उदासीन तार में समांतर क्रम में लगता है
(B) यह कम गलनांक वाला तार है, जो विद्युतमय तार में श्रेणी क्रम में लगता है
(C) यह उच्च गलनांक वाला मोटा ताँबे का तार होता है
(D) यह केवल DC परिपथों में लगता है

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (B) यह कम गलनांक वाला तार है, जो विद्युतमय तार में श्रेणी क्रम में लगता है — अधिक धारा पर पिघलकर परिपथ तोड़ देता है।

Answer Key – उत्तरमाला

प्रश्न 1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12 13 14 15
उत्तर B C A D B C D B A C B D A C B

❓ FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1. फ्लेमिंग के बाएँ और दाएँ हाथ के नियमों में अंतर कैसे याद रखें?
उत्तर: एक पंक्ति याद कर लीजिए — “मोटर बायाँ, जनरेटर दायाँ।” मोटर में धारा देकर बल (गति) प्राप्त करते हैं, इसलिए बाएँ हाथ में अँगूठा परिणाम (बल) दिखाता है। जनित्र में गति देकर धारा प्राप्त करते हैं, इसलिए दाएँ हाथ में अँगूठा कारण (गति) दिखाता है। दोनों नियमों में तर्जनी सदैव चुंबकीय क्षेत्र और मध्यमा सदैव विद्युत धारा की ओर रहती है — केवल हाथ और अँगूठे का अर्थ बदलता है।

प्रश्न 2. विद्युत-चुंबक और स्थायी चुंबक में क्या अंतर है?
उत्तर: विद्युत-चुंबक परिनालिका में नर्म लोहे की क्रोड रखकर बनाया गया अस्थायी चुंबक है — धारा बंद करते ही इसका चुंबकत्व समाप्त हो जाता है, धारा घटा-बढ़ाकर इसकी प्रबलता बदली जा सकती है और धारा उलटकर ध्रुव बदले जा सकते हैं। स्थायी चुंबक इस्पात का बना होता है; वह बिना धारा के चुंबक बना रहता है, परंतु उसकी प्रबलता व ध्रुव आसानी से नहीं बदले जा सकते। क्रेन से लोहा उठाना-गिराना विद्युत-चुंबक से ही संभव है।

प्रश्न 3. AC और DC में क्या अंतर है? हमारे घरों में कौन-सी धारा आती है?
उत्तर: प्रत्यावर्ती धारा (AC) निश्चित समयांतराल पर अपनी दिशा बदलती रहती है, जबकि दिष्ट धारा (DC) सदैव एक ही दिशा में बहती है। भारत के घरों में 220 V, 50 Hz की AC आती है। सेल व बैटरी DC देते हैं, जबकि बिजली-घर के AC जनित्र AC देते हैं। AC का एक बड़ा लाभ यह है कि ट्रांसफ़ॉर्मर से इसकी वोल्टता घटाई-बढ़ाई जा सकती है, जिससे बिजली दूर तक कम हानि के साथ भेजी जा सकती है।

प्रश्न 4. फ्यूज़ उड़ जाए तो क्या मोटा ताँबे का तार लगाकर काम चला सकते हैं?
उत्तर: बिल्कुल नहीं — यह अत्यंत खतरनाक है। फ्यूज़ जान-बूझकर कम गलनांक व निर्धारित क्षमता का बनाया जाता है, ताकि अधिक धारा पर वह स्वयं पिघलकर परिपथ तोड़ दे। मोटा ताँबे का तार अधिक धारा पर भी नहीं पिघलेगा, फलतः तारें अत्यधिक गरम होकर आग लग सकती है और उपकरण जल सकते हैं। फ्यूज़ सदैव उसी अनुमतांक (जैसे 5 A या 15 A) का नया फ्यूज़-तार लगाकर ही बदलें, और बार-बार फ्यूज़ उड़ रहा हो तो पहले खराबी का कारण खोजें।

प्रश्न 5. क्या केवल InText और प्रश्नावली के प्रश्न तैयार करना इस अध्याय के लिए काफ़ी है?
उत्तर: लगभग हाँ। इस अध्याय के Board प्रश्न अधिकतर इन्हीं 39 प्रश्नों (InText 21 + प्रश्नावली 18) से सीधे या हल्के बदलाव के साथ आते हैं। साथ में मोटर व जनित्र के नामांकित चित्रों का अभ्यास, तीनों नियमों की तुलना और ऊपर दिया 15 प्रश्नों का MCQ Quiz कर लें, तो वस्तुनिष्ठ प्रश्नों की तैयारी भी पूरी हो जाएगी। किताब का मूल पाठ पढ़ने के लिए NCERT की आधिकारिक वेबसाइट ncert.nic.in से Class 10 Science की किताब का PDF मुफ़्त डाउनलोड किया जा सकता है।

🔗 Pichhla / Agla Adhyay – पिछले व अगले अध्याय पढ़ें

⬅️ पिछला अध्याय: अध्याय 12 — विद्युत (Electricity) — धारा, विभवांतर, ओम का नियम व प्रतिरोध के हल वहाँ पढ़ें; इस अध्याय की धारा-वाली नींव वहीं से बनी है।

➡️ अगला अध्याय: अध्याय 14 — ऊर्जा के स्रोत (Sources of Energy) — जनित्र से बनी बिजली किन-किन स्रोतों से आती है, यह अगले अध्याय में विस्तार से मिलेगा।

📚 सभी अध्यायों की सूची यहाँ देखें: NCERT Class 10 Bihar Board Science Book — सभी 16 अध्याय

🔚 Conclusion – निष्कर्ष

बधाई हो! आपने भौतिकी का सबसे उपयोगी अध्याय पूरा कर लिया। अब आप जानते हैं कि धारा चुंबकीय क्षेत्र कैसे बनाती है, क्षेत्र रेखाएँ कैसे पढ़ी जाती हैं, परिनालिका चुंबक कैसे बनती है, मोटर में कुंडली क्यों घूमती है, जनित्र में बिजली कैसे जन्म लेती है, और घर की वायरिंग में लाल-काला-हरा तार व फ्यूज़ हमारी सुरक्षा कैसे करते हैं।

इस अध्याय को पक्का करने का सबसे अच्छा तरीका है — अपने दोनों हाथों से नियमों का अभ्यास। जब भी कोई दिशा-वाला प्रश्न दिखे, हाथ उठाइए, उँगलियाँ सही क्रम में रखिए और उत्तर स्वयं निकल आएगा। ऊपर दिए गए सभी 39 हल किए गए प्रश्नों (InText 21 + प्रश्नावली 18), क्रियाकलाप-उदाहरणों और 15 MCQ का अभ्यास कीजिए। किताब का मूल पाठ पढ़ने के लिए NCERT की आधिकारिक वेबसाइट ncert.nic.in से PDF ले सकते हैं। अब अगले अध्याय — ऊर्जा के स्रोत — की तैयारी शुरू कीजिए; वहाँ यही जनित्र बिजली-घरों में काम करता दिखेगा। शुभकामनाएँ, मेहनत जारी रखिए!