परिचय – यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है?
Class 10 Science Chapter 15 Our Environment के NCERT Solutions आपको इस पेज पर सरल हिंदी में, किताब के क्रम से मिलेंगे। Class 10 Science Chapter 15 Our Environment यानी हमारा पर्यावरण — यह अध्याय प्रयोगशाला की नहीं, हमारे अपने आँगन, खेत, तालाब और बाज़ार की कहानी है। हम रोज़ जो खाते हैं, जो कचरा फेंकते हैं और जो हवा-पानी उपयोग करते हैं — यह अध्याय उसी का विज्ञान समझाता है।
ज़रा सोचिए — घास को टिड्डा खाता है, टिड्डे को मेंढक, मेंढक को साँप और साँप को बाज़। यह छोटी-सी कड़ी ही आहार शृंखला है। पर अगर किसान खेत में कीटनाशक छिड़क दे, तो वही ज़हर इस कड़ी से होते हुए आख़िर में हमारी ही थाली तक पहुँच जाता है — इसे जैव आवर्धन कहते हैं। और आसमान में फैली ओज़ोन परत हमें सूर्य की हानिकारक किरणों से चुपचाप बचाती रहती है, पर हमारे बनाए कुछ रसायन उसी ढाल में छेद कर रहे हैं।
इस अध्याय में हम सीखेंगे कि पारितंत्र (ecosystem) क्या होता है, उसके जैविक व अजैविक घटक कौन-से हैं, ऊर्जा एक पोषी स्तर से दूसरे स्तर तक कैसे और कितनी पहुँचती है, आहार जाल क्या होता है, और हमारे द्वारा फेंका गया कचरा — विशेषकर प्लास्टिक जैसा अजैव-निम्नीकरणीय कचरा — पर्यावरण को कितने लंबे समय तक नुकसान पहुँचाता है।
Bihar Board (BSEB) Class 10 की परीक्षा में इस अध्याय से हर साल प्रश्न आते हैं — जैव-निम्नीकरणीय व अजैव-निम्नीकरणीय पदार्थों पर वस्तुनिष्ठ (MCQ) प्रश्न, पोषी स्तर व 10% के नियम पर लघु उत्तरीय प्रश्न और जैव आवर्धन व ओज़ोन परत पर दीर्घ उत्तरीय प्रश्न। अध्याय छोटा है, रटने से ज़्यादा समझने वाला है — एक बार कहानी समझ आ गई तो उत्तर अपने-आप बनने लगेंगे।
📌 खास बात: इस अध्याय का हर प्रश्न रोज़ की ज़िंदगी से जुड़ा है — कपड़े का थैला लेना, बेकार बल्ब बंद करना, कचरा अलग-अलग डालना। Board इन्हीं उदाहरणों वाले प्रश्न पूछना पसंद करता है, इसलिए हर concept को अपने घर-आसपास के उदाहरण से जोड़कर याद कीजिए।
📋 अध्याय की जानकारी (Chapter Information)
| Board | Bihar Board (BSEB) |
|---|---|
| Textbook | NCERT |
| Class | 10 |
| Subject | Science (विज्ञान) |
| Chapter | 15 |
| Chapter Name | Our Environment (हमारा पर्यावरण) |
| कुल हल किए गए प्रश्न | 16 (InText 7 + प्रश्नावली 9) |
📚 इस Chapter में क्या-क्या है? (Topics)
- 15.1 पारितंत्र — इसके संघटक क्या हैं? – जैविक व अजैविक घटक, उत्पादक, उपभोक्ता व अपघटक की भूमिका
- आहार शृंखला (Food Chain) व पोषी स्तर (Trophic Levels) – घास के मैदान व तालाब की शृंखलाएँ
- आहार जाल (Food Web) – परस्पर जुड़ी हुई अनेक आहार शृंखलाएँ
- ऊर्जा का प्रवाह – एकदिशीय प्रवाह, 10% का नियम, शृंखला छोटी क्यों रहती है?
- 15.2 हमारी गतिविधियाँ पर्यावरण को कैसे प्रभावित करती हैं? – जैव आवर्धन (DDT का उदाहरण)
- ओज़ोन परत व उसका क्षरण – O2 से O3 बनना, UV से रक्षा, CFC व मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल
- कचरा प्रबंधन – जैव-निम्नीकरणीय बनाम अजैव-निम्नीकरणीय कचरा व व्यक्तिगत स्तर के उपाय
- पाठ्य-पुस्तक के प्रश्न (InText) – 7 प्रश्न, NCERT क्रियाकलाप-आधारित उदाहरण, प्रश्नावली के 9 प्रश्न
- Case Study, Quick Revision, Common Mistakes, Bihar Board Exam Tips, MCQ Quiz व FAQ
📊 Key Concepts – मुख्य परिभाषाएँ व नियम
| पद / नियम | अर्थ (एक लाइन में) |
|---|---|
| पर्यावरण (Environment) | हमारे चारों ओर की वे सभी परिस्थितियाँ व वस्तुएँ — वायु, जल, मिट्टी, पौधे, जंतु — जो हमारे जीवन को प्रभावित करती हैं। |
| पारितंत्र (Ecosystem) | किसी क्षेत्र के सभी जीवों तथा अजैविक घटकों की परस्पर अंतःक्रिया से बना तंत्र — जैसे वन, तालाब, घास का मैदान, खेत। |
| उत्पादक (Producers) | हरे पौधे व कुछ जीवाणु, जो सूर्य के प्रकाश से प्रकाश संश्लेषण द्वारा अपना भोजन स्वयं बनाते हैं। |
| उपभोक्ता (Consumers) | वे जीव जो भोजन के लिए प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उत्पादकों पर निर्भर रहते हैं — शाकाहारी, मांसाहारी, सर्वाहारी व परजीवी। |
| अपघटक (Decomposers) | जीवाणु व कवक जैसे सूक्ष्मजीव, जो मृत जीवों के जटिल कार्बनिक पदार्थों को सरल अकार्बनिक पदार्थों में तोड़ देते हैं। |
| आहार शृंखला (Food Chain) | जीवों की वह क्रमिक कड़ी जिसमें एक जीव दूसरे को खाता है और स्वयं किसी तीसरे का भोजन बनता है — ऊर्जा इसी क्रम में आगे बढ़ती है। |
| पोषी स्तर (Trophic Level) | आहार शृंखला का प्रत्येक चरण या स्तर — पहला स्तर उत्पादकों का, दूसरा शाकाहारियों का, तीसरा मांसाहारियों का होता है। |
| आहार जाल (Food Web) | किसी पारितंत्र की अनेक आहार शृंखलाओं का परस्पर जुड़ा हुआ जाल, क्योंकि एक जीव कई जीवों को खाता है और कई जीवों द्वारा खाया जाता है। |
| 10% का नियम | एक पोषी स्तर से अगले स्तर तक केवल लगभग 10% ऊर्जा ही पहुँचती है; शेष ऊर्जा श्वसन, ऊष्मा आदि में व्यय हो जाती है (लिंडमैन द्वारा दिया गया नियम)। |
| जैव आवर्धन (Biological Magnification) | हानिकारक अजैव-निम्नीकरणीय रसायनों (जैसे DDT) की सान्द्रता का प्रत्येक पोषी स्तर पर क्रमशः बढ़ते जाना। |
| ओज़ोन (O3) | ऑक्सीजन के तीन परमाणुओं से बना अणु, जो वायुमंडल की ऊपरी परत में सूर्य की पराबैंगनी (UV) किरणों को रोककर हमारी रक्षा करता है। |
| जैव-निम्नीकरणीय पदार्थ | वे पदार्थ जिन्हें सूक्ष्मजीव एंज़ाइमों द्वारा सरल पदार्थों में तोड़ सकते हैं — जैसे फलों के छिलके, सब्ज़ियों के अवशेष, कागज़। |
| अजैव-निम्नीकरणीय पदार्थ | वे पदार्थ जिन्हें सूक्ष्मजीव तोड़ नहीं सकते और जो लंबे समय तक वैसे-के-वैसे बने रहते हैं — जैसे प्लास्टिक, DDT जैसे कीटनाशक। |
सबसे काम की बात: पूरे अध्याय की जान तीन वाक्यों में है — ऊर्जा उत्पादक से उपभोक्ता की ओर केवल एक दिशा में बहती है और हर स्तर पर केवल 10% आगे बढ़ती है; पर हानिकारक रसायन उसी रास्ते से आगे बढ़ते हुए हर स्तर पर बढ़ते जाते हैं। यही दोनों बातें Board के आधे प्रश्नों का उत्तर हैं!
पारितंत्र (Ecosystem) – प्रकृति का पूरा परिवार
किसी तालाब के किनारे खड़े होकर देखिए — पानी में मछलियाँ व मेंढक हैं, किनारे घास व पेड़ हैं, हवा में पक्षी उड़ रहे हैं, मिट्टी में केंचुए हैं, और साथ में हैं पानी, धूप, हवा व मिट्टी। ये सब मिलकर एक-दूसरे पर असर डालते हैं। इसी पूरे ताने-बाने को पारितंत्र कहते हैं।
NCERT की परिभाषा के अनुसार — सभी जीवधारी परस्पर अंतःक्रिया करते हैं तथा अपने आस-पास के पर्यावरण को भी प्रभावित करते हैं; जीवधारियों व अजैविक घटकों की इस अंतःक्रिया से बना तंत्र ही पारितंत्र कहलाता है। वन, तालाब, झील, नदी, घास का मैदान व मरुस्थल — ये सब प्राकृतिक पारितंत्र हैं। वहीं खेत, बगीचा व जलाशय-घर (aquarium) मनुष्य द्वारा बनाए गए कृत्रिम (मानव-निर्मित) पारितंत्र हैं।
पारितंत्र के संघटक (Components)
| संघटक | कौन-कौन आते हैं | उदाहरण |
|---|---|---|
| अजैविक घटक (निर्जीव) | ताप, वर्षा, वायु, प्रकाश, जल, मृदा (मिट्टी) तथा उसमें उपस्थित खनिज व अकार्बनिक पदार्थ | सूर्य का प्रकाश, तालाब का जल, मिट्टी के खनिज लवण |
| जैविक घटक (सजीव) | सभी पौधे, जंतु व सूक्ष्मजीव — उत्पादक, उपभोक्ता व अपघटक | घास, हिरण, शेर, जीवाणु, कवक |
ध्यान दीजिए — अजैविक घटक “पीछे की सजावट” नहीं हैं। धूप न हो तो पौधे भोजन नहीं बना पाएँगे, मिट्टी में खनिज न हों तो पौधे बढ़ेंगे नहीं, और पौधे न हों तो पूरा पारितंत्र भूखा रह जाएगा। जैविक व अजैविक घटक एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं — यही इस अध्याय की पहली और सबसे बुनियादी सीख है।
उत्पादक, उपभोक्ता व अपघटक – तीनों की भूमिका
1. उत्पादक (Producers): सभी हरे पौधे तथा कुछ प्रकाश-संश्लेषी जीवाणु उत्पादक हैं। ये सूर्य के प्रकाश की ऊर्जा का उपयोग करके, कार्बन डाइऑक्साइड व जल जैसे सरल अकार्बनिक पदार्थों से अपना भोजन स्वयं बनाते हैं। सौर ऊर्जा को भोजन की रासायनिक ऊर्जा में बदलने का काम इन्हीं का है — इसलिए पूरे पारितंत्र की ऊर्जा-आपूर्ति इन्हीं से शुरू होती है। इन्हें “उत्पादक” इसीलिए कहते हैं, क्योंकि ये सभी जीवों के लिए भोजन का उत्पादन करते हैं।
2. उपभोक्ता (Consumers): जो जीव अपना भोजन स्वयं नहीं बना सकते, वे उत्पादकों द्वारा बनाए भोजन पर निर्भर रहते हैं — सीधे (पौधे खाकर) या परोक्ष रूप से (पौधे खाने वालों को खाकर)। इन्हीं को उपभोक्ता कहते हैं। इन्हें चार समूहों में बाँटा गया है:
- शाकाहारी (Herbivores) – केवल पौधे खाने वाले: बकरी, हिरण, खरगोश, टिड्डा।
- मांसाहारी (Carnivores) – केवल जंतुओं को खाने वाले: मेंढक, साँप, शेर, बाज़।
- सर्वाहारी (Omnivores) – पौधे व जंतु दोनों खाने वाले: मनुष्य, कौआ, कुत्ता।
- परजीवी (Parasites) – दूसरे जीव के शरीर पर या अंदर रहकर उससे भोजन लेने वाले: जूँ, फीताकृमि (tapeworm), अमरबेल।
3. अपघटक (Decomposers): जीवाणु व कवक जैसे सूक्ष्मजीव अपघटक हैं। ये मृत पौधों व जंतुओं के शरीर में उपस्थित जटिल कार्बनिक पदार्थों को तोड़कर सरल अकार्बनिक पदार्थों में बदल देते हैं। ये सरल पदार्थ फिर मिट्टी में मिल जाते हैं और पौधे उन्हें दोबारा उपयोग कर लेते हैं।
📌 सोचिए ज़रा: अगर अपघटक न हों तो क्या होगा? मृत जीवों के ढेर लगे रहेंगे, मिट्टी को पोषक तत्व वापस नहीं मिलेंगे और कुछ समय में पौधों के लिए खनिज ही खत्म हो जाएँगे। इसीलिए अपघटकों को प्रकृति का “सफ़ाईकर्मी” कहा जाता है — छोटे हैं, पर काम सबसे बड़ा है!
एक साँस में समझें — उत्पादक भोजन बनाते हैं, उपभोक्ता भोजन खाते हैं और अपघटक मृतकों को तोड़कर पोषक तत्व मिट्टी को लौटा देते हैं; तीनों मिलकर पारितंत्र चलाते हैं।
आहार शृंखला (Food Chain) व पोषी स्तर (Trophic Levels)
पारितंत्र में एक जीव दूसरे को खाता है और स्वयं किसी और का भोजन बनता है। खाने-खिलाने का यह क्रम ही आहार शृंखला है। तीर (→) का अर्थ हमेशा याद रखिए — तीर भोजन (ऊर्जा) के जाने की दिशा दिखाता है, अर्थात “जिसे खाया गया → खाने वाला”।
उदाहरण 1 – घास के मैदान की आहार शृंखला
| चरण | जीव | पोषी स्तर | भूमिका |
|---|---|---|---|
| 1 | घास | पहला पोषी स्तर | उत्पादक |
| 2 | टिड्डा (कीट) | दूसरा पोषी स्तर | प्राथमिक उपभोक्ता (शाकाहारी) |
| 3 | मेंढक | तीसरा पोषी स्तर | द्वितीयक उपभोक्ता (छोटा मांसाहारी) |
| 4 | साँप | चौथा पोषी स्तर | तृतीयक उपभोक्ता (मांसाहारी) |
| 5 | बाज़ | पाँचवाँ पोषी स्तर | शीर्ष (सबसे बड़ा) मांसाहारी |
घास → टिड्डा → मेंढक → साँप → बाज़
एक और सरल शृंखला, जो किताब व परीक्षा दोनों में बहुत आती है:
घास → हिरण → शेर
(यहाँ घास = पहला पोषी स्तर / उत्पादक, हिरण = दूसरा पोषी स्तर / प्राथमिक उपभोक्ता, शेर = तीसरा पोषी स्तर / बड़ा मांसाहारी)
उदाहरण 2 – तालाब की आहार शृंखला
| चरण | जीव | पोषी स्तर | भूमिका |
|---|---|---|---|
| 1 | पादप प्लवक / जलीय पौधे (phytoplankton) | पहला पोषी स्तर | उत्पादक |
| 2 | जंतु प्लवक / छोटे जलीय कीट व लार्वा | दूसरा पोषी स्तर | प्राथमिक उपभोक्ता |
| 3 | छोटी मछली | तीसरा पोषी स्तर | द्वितीयक उपभोक्ता |
| 4 | बड़ी मछली | चौथा पोषी स्तर | तृतीयक उपभोक्ता |
| 5 | बगुला / मछली खाने वाला पक्षी | पाँचवाँ पोषी स्तर | शीर्ष मांसाहारी |
पादप प्लवक → जंतु प्लवक → छोटी मछली → बड़ी मछली → बगुला
पोषी स्तर (Trophic Level) का अर्थ है — आहार शृंखला का वह चरण या स्तर, जिस पर कोई जीव भोजन प्राप्त करता है। पहला स्तर हमेशा उत्पादकों का होता है, क्योंकि सूर्य की ऊर्जा को भोजन में बदलने का काम केवल वही करते हैं। उसके बाद का हर स्तर पिछले स्तर पर भोजन के लिए निर्भर रहता है।
📌 याद रखें: मनुष्य किस पोषी स्तर पर है — यह इस पर निर्भर है कि वह क्या खा रहा है! केवल सब्ज़ी-दाल खाने पर मनुष्य दूसरे पोषी स्तर (प्राथमिक उपभोक्ता) पर है, और मछली-मांस खाने पर तीसरे या चौथे स्तर पर। मनुष्य सर्वाहारी है, इसलिए उसका स्तर भोजन के साथ बदलता है।
आहार जाल (Food Web) – शृंखलाएँ अकेली नहीं चलतीं
किताबों में शृंखला सीधी रेखा में दिखती है, पर असली प्रकृति में ऐसा नहीं होता। टिड्डे को केवल मेंढक ही नहीं खाता — छिपकली व चिड़िया भी खाती हैं। मेंढक केवल टिड्डा नहीं खाता — मकड़ी व अन्य कीट भी खाता है। साँप मेंढक के अलावा चूहा भी खाता है, और बाज़ साँप के अलावा चूहा व चिड़िया भी पकड़ता है।
इस प्रकार एक ही पारितंत्र की अनेक आहार शृंखलाएँ आपस में जुड़कर एक जाल-सा बना लेती हैं — इसी को आहार जाल (Food Web) कहते हैं। इसे ऐसे समझिए:
- घास → टिड्डा → मेंढक → साँप → बाज़
- घास → टिड्डा → छिपकली → बाज़
- घास → खरगोश → बाज़
- घास → चूहा → साँप → बाज़
- घास → चूहा → बाज़
देखिए — घास पाँचों शृंखलाओं की शुरुआत है और बाज़ कई शृंखलाओं का अंत। बीच के जीव कई रास्तों से जुड़े हैं। आहार जाल का सबसे बड़ा लाभ स्थिरता है — यदि किसी एक जीव की संख्या किसी कारण घट भी जाए, तो उसके शिकारी के पास भोजन के दूसरे रास्ते मौजूद रहते हैं और पारितंत्र पूरी तरह नहीं बिगड़ता। इसके उलट, सीधी अकेली शृंखला बहुत नाज़ुक होती है — एक कड़ी टूटी तो पूरी शृंखला टूट जाती है।
एक साँस में समझें — आहार शृंखला एक सीधी लाइन है, आहार जाल उसी की कई लाइनों का जुड़ा हुआ जाल; जाल जितना बड़ा, पारितंत्र उतना स्थिर।
ऊर्जा का प्रवाह – एकदिशीय यात्रा व 10% का नियम
पारितंत्र की सारी ऊर्जा का मूल स्रोत सूर्य है। हरे पौधे प्रकाश संश्लेषण में सौर ऊर्जा को भोजन की रासायनिक ऊर्जा में बदलते हैं। NCERT के अनुसार, स्थलीय पारितंत्रों में हरे पौधे पत्तियों पर पड़ने वाले सूर्य के प्रकाश की ऊर्जा का केवल लगभग 1% भाग ही भोजन-ऊर्जा में बदल पाते हैं — ऊर्जा की यात्रा यहीं से शुरू होती है।
ऊर्जा का प्रवाह एकदिशीय (Unidirectional) क्यों है?
जो ऊर्जा उत्पादक से शाकाहारी में गई, वह शाकाहारी से वापस उत्पादक में नहीं लौटती; और जो ऊर्जा शाकाहारी से मांसाहारी में गई, वह भी वापस शाकाहारी को उपलब्ध नहीं होती। अर्थात ऊर्जा हमेशा उत्पादक → प्राथमिक उपभोक्ता → द्वितीयक उपभोक्ता → तृतीयक उपभोक्ता की एक ही दिशा में बहती है। पोषक तत्वों (खनिजों) का चक्र तो अपघटकों के कारण घूमता रहता है, पर ऊर्जा का कोई चक्र नहीं होता — वह एक बार उपयोग होकर ऊष्मा के रूप में निकल जाती है, इसलिए सूर्य से लगातार नई ऊर्जा आना ज़रूरी है।
10% का नियम (Lindeman’s 10% Law)
जब शाकाहारी पौधों को खाता है, तो पौधों की पूरी ऊर्जा शाकाहारी के शरीर में नहीं पहुँचती। ऊर्जा का बड़ा भाग जीव की अपनी प्रक्रियाओं — श्वसन, वृद्धि, गति, शरीर का ताप बनाए रखने — में व्यय हो जाता है और ऊष्मा के रूप में वातावरण में निकल जाता है। वैज्ञानिक लिंडमैन (Lindeman) ने बताया कि एक पोषी स्तर से अगले पोषी स्तर तक औसतन केवल लगभग 10% ऊर्जा ही स्थानांतरित होती है; शेष लगभग 90% उसी स्तर पर व्यय हो जाती है।
उदाहरण: यदि उत्पादकों के पास 10,000 kJ ऊर्जा है, तो —
शाकाहारी (दूसरा स्तर) को ≈ 1,000 kJ → छोटे मांसाहारी (तीसरा स्तर) को ≈ 100 kJ → बड़े मांसाहारी (चौथा स्तर) को ≈ 10 kJ → शीर्ष मांसाहारी (पाँचवाँ स्तर) को ≈ 1 kJ
आहार शृंखला छोटी (सामान्यतः 3–4 स्तर की) क्यों रहती है? अब उत्तर अपने-आप स्पष्ट है — हर स्तर पर 90% ऊर्जा घट जाने से चौथे-पाँचवें स्तर के बाद इतनी कम ऊर्जा बचती है कि उस पर किसी बड़े जीव का जीवन चल ही नहीं सकता। इसीलिए प्रकृति में शेर-जैसे शीर्ष मांसाहारी गिने-चुने होते हैं और घास व कीट करोड़ों में पाए जाते हैं।
संख्या व ऊर्जा के पिरामिड (संक्षेप में)
पोषी स्तरों को चित्र के रूप में दिखाने को पिरामिड कहते हैं। ऊर्जा का पिरामिड हमेशा सीधा (upright) होता है, क्योंकि हर स्तर पर ऊर्जा घटती ही है — उत्पादकों के पास सबसे अधिक और शीर्ष मांसाहारी के पास सबसे कम ऊर्जा होती है। संख्या का पिरामिड सामान्यतः सीधा होता है (घास करोड़ों, शेर गिने-चुने), पर एक बड़े पेड़ वाले पारितंत्र में वह उल्टा भी हो सकता है — एक ही पेड़ (उत्पादक) पर हज़ारों कीट (उपभोक्ता) रहते हैं। Board में ऊर्जा पिरामिड का “हमेशा सीधा” होना ही सबसे अधिक पूछा जाता है।
📌 याद रखें: 10% का नियम ऊर्जा पर लगता है, ज़हर पर नहीं! ऊर्जा हर स्तर पर घटती है, पर अजैव-निम्नीकरणीय रसायनों की सान्द्रता हर स्तर पर बढ़ती है — यही अंतर अगले भाग (जैव आवर्धन) की जान है।
जैव आवर्धन (Biological Magnification) – ज़हर की बढ़ती सीढ़ी
फसल को कीटों से बचाने के लिए किसान खेतों में कीटनाशक (pesticides) छिड़कता है — DDT इन्हीं में सबसे प्रसिद्ध (और कुख्यात) है। ये रसायन वर्षा के जल के साथ बहकर मिट्टी व जलाशयों में पहुँचते हैं। समस्या यह है कि ये अजैव-निम्नीकरणीय हैं — सूक्ष्मजीव इन्हें तोड़ नहीं सकते, जीव का शरीर इन्हें बाहर नहीं निकाल पाता, इसलिए ये शरीर की वसा (चर्बी) में जमा होते रहते हैं।
अब देखिए खेल — छोटा जीव अपने जीवन में बहुत-से उत्पादक खाता है, उससे बना ज़हर उसके शरीर में जमा हो जाता है। उसे खाने वाला जीव अपने जीवन में ऐसे बहुत-से जीव खाता है, तो उन सबका ज़हर उसके शरीर में इकट्ठा हो जाता है। इस प्रकार प्रत्येक पोषी स्तर पर हानिकारक रसायन की सान्द्रता क्रमशः बढ़ती जाती है — इसी घटना को जैव आवर्धन कहते हैं।
NCERT का DDT वाला उदाहरण – तालाब की शृंखला
| पोषी स्तर / माध्यम | जीव | DDT की सान्द्रता (NCERT के अनुसार) |
|---|---|---|
| जल (माध्यम) | — | 0.003 ppb |
| दूसरा स्तर | जंतु प्लवक (zooplankton) | 0.04 ppm |
| तीसरा स्तर | छोटी मछली | 0.5 ppm |
| चौथा स्तर | बड़ी मछली | 2 ppm |
| पाँचवाँ (शीर्ष) स्तर | मछली खाने वाले पक्षी | 25 ppm |
संख्याएँ खुद कहानी कह रही हैं — जल में जो DDT नाममात्र का था, वही मछली खाने वाले पक्षियों तक पहुँचते-पहुँचते कई हज़ार गुना अधिक सान्द्र हो गया। इतिहास गवाह है कि DDT के कारण कई पक्षियों के अंडों के छिलके पतले हो गए और बच्चे निकलने से पहले ही अंडे टूटने लगे, जिससे उनकी संख्या तेज़ी से घटी।
मनुष्य सबसे अधिक प्रभावित क्यों होता है? क्योंकि अधिकांश आहार शृंखलाओं में मनुष्य सबसे ऊपर के पोषी स्तर पर होता है। नीचे के सभी स्तरों का जमा किया रसायन अंततः मनुष्य के शरीर में सबसे अधिक सान्द्रता में पहुँचता है। यही कारण है कि तैयार खाद्य पदार्थों व पेयों में कीटनाशकों के अवशेष मिलने की ख़बरें चिंता का विषय बनती हैं — यह जैव आवर्धन का सीधा परिणाम है।
📌 कम करने के उपाय: कीटनाशकों का अंधाधुंध उपयोग घटाना, जैविक खेती व जैविक कीट-नियंत्रण अपनाना, और फल-सब्ज़ियाँ खाने से पहले अच्छी तरह धोना — इनसे हमारे शरीर तक पहुँचने वाले रसायन कुछ हद तक कम किए जा सकते हैं।
ओज़ोन परत – आसमान की सुरक्षा-ढाल
ओज़ोन बनती कैसे है?
ओज़ोन (O3) ऑक्सीजन के तीन परमाणुओं से बना अणु है। वायुमंडल की ऊपरी परत (समताप मंडल / stratosphere) में सूर्य की उच्च-ऊर्जा वाली पराबैंगनी (UV) किरणें ऑक्सीजन अणु (O2) को तोड़ देती हैं, जिससे स्वतंत्र ऑक्सीजन परमाणु (O) बनते हैं। ये स्वतंत्र परमाणु दूसरे O2 अणुओं से जुड़कर ओज़ोन बना लेते हैं:
O2 →(पराबैंगनी किरणें / UV) O + O
O + O2 → O3 (ओज़ोन)
ओज़ोन का बनना व टूटना प्रकृति में संतुलन में चलता रहता है। ध्यान रहे — ज़मीन के पास वाली ओज़ोन एक हानिकारक प्रदूषक है, पर ऊपरी वायुमंडल की यही ओज़ोन हमारे लिए जीवन-रक्षक है। जगह का फर्क ही काम का फर्क है!
ओज़ोन परत का महत्व – UV से रक्षा
वायुमंडल के ऊपरी भाग में ओज़ोन एक परत के रूप में फैली है। यह सूर्य से आने वाली हानिकारक पराबैंगनी (UV) किरणों को अवशोषित करके उन्हें पृथ्वी की सतह तक पहुँचने से रोकती है। यदि ये किरणें सीधे हम तक पहुँचें, तो मनुष्यों में त्वचा का कैंसर व आँखों की बीमारियाँ (मोतियाबिंद) बढ़ जाएँ, पौधों की वृद्धि रुक जाए और सूक्ष्मजीवों सहित अनेक जीव नष्ट हो जाएँ — अर्थात पूरा पारितंत्र बिगड़ जाए। इसलिए ओज़ोन परत को धरती की “सुरक्षा-ढाल” या “प्राकृतिक छतरी” कहा जाता है।
ओज़ोन परत का क्षरण – CFC की करतूत
1980 के बाद से वायुमंडल में ओज़ोन की मात्रा तेज़ी से घटने लगी और अंटार्कटिका के ऊपर तो “ओज़ोन छिद्र” तक कहा जाने लगा। NCERT के अनुसार इसका मुख्य कारण मानव-निर्मित रसायन क्लोरोफ़्लुओरोकार्बन (CFC) हैं। CFC का उपयोग रेफ्रिजरेटरों (फ्रिज) व अग्निशामक यंत्रों (fire extinguishers) आदि में होता था। ये रसायन बहुत स्थायी होते हैं — नीचे के वायुमंडल में नष्ट हुए बिना ऊपर पहुँच जाते हैं, जहाँ UV किरणें इन्हें तोड़कर क्लोरीन छोड़ती हैं, और वही क्लोरीन ओज़ोन अणुओं को लगातार तोड़ती रहती है।
मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल: समस्या की गंभीरता को देखते हुए 1987 में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) के अंतर्गत मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल नामक अंतरराष्ट्रीय समझौता हुआ, जिसमें सभी देशों ने CFC के उत्पादन को सीमित करने व क्रमशः बंद करने (1987 से सीमित, आगे चलकर पूर्णतः रोक की दिशा में) पर सहमति दी। यह समझौता पर्यावरण-रक्षा की सबसे सफल अंतरराष्ट्रीय कोशिशों में गिना जाता है — इसका सबक साफ़ है: समस्या मनुष्य ने बनाई थी, तो समाधान भी सामूहिक प्रयास से ही मिला।
एक साँस में समझें — O2 से बनी O3 की परत UV को रोकती है; CFC उसे तोड़ता है, इसलिए CFC पर रोक (मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल) ही बचाव है।
कचरा प्रबंधन – हमारी गतिविधियाँ व पर्यावरण
अपने घर का एक दिन का कचरा ध्यान से देखिए — सब्ज़ियों के छिलके, बचा खाना, कागज़, दूध की थैलियाँ, प्लास्टिक की बोतलें, दवा के खाली पत्ते, टूटे खिलौने… NCERT का क्रियाकलाप 15.1 यही करवाता है — सारा कचरा गड्ढे में दबाकर 15-15 दिन पर देखिए। कुछ सप्ताह में छिलके व बचा खाना गलकर मिट्टी में मिल जाते हैं, पर प्लास्टिक व पॉलिथीन महीनों बाद भी वैसी-की-वैसी निकलती है। इसी अंतर से कचरा दो प्रकार का होता है:
| बात | जैव-निम्नीकरणीय (Biodegradable) | अजैव-निम्नीकरणीय (Non-biodegradable) |
|---|---|---|
| अर्थ | जिन्हें जीवाणु व कवक जैसे सूक्ष्मजीव अपने एंज़ाइमों द्वारा सरल पदार्थों में तोड़ सकें | जिन्हें सूक्ष्मजीव तोड़ ही न सकें; वे लंबे समय तक पर्यावरण में बने रहें |
| उदाहरण | फलों-सब्ज़ियों के छिलके, बचा खाना, कागज़, सूती कपड़ा, लकड़ी, गोबर | प्लास्टिक, पॉलिथीन, काँच, धातु के डिब्बे, DDT जैसे कीटनाशक |
| पर्यावरण में टिकाव | कुछ दिन से कुछ सप्ताह — गलकर मिट्टी में मिल जाते हैं | दशकों से सैकड़ों वर्षों तक — जमा होते रहते हैं |
| लाभ / हानि | गलकर खाद (ह्यूमस) बनते हैं, मिट्टी की उर्वरता बढ़ाते हैं; पर अधिक मात्रा में जमा होने पर बदबू व रोग फैलाने वाले जीव पनपते हैं | मृदा व जल प्रदूषण, नालियों का बंद होना, जैव आवर्धन जैसी गंभीर समस्याएँ |
| निपटान का सही तरीका | अलग इकट्ठा करके खाद (compost) बनाना | पुनः उपयोग (reuse) व पुनर्चक्रण (recycling) के लिए भेजना |
हमारी गतिविधियों का प्रभाव: पिछले लगभग सौ वर्षों में हमारी जीवन-शैली बहुत बदली है। “उपयोग करो और फेंको” (use and throw) वाली संस्कृति ने डिस्पोज़ेबल कप-प्लेट, पॉलिथीन व पैकेजिंग का पहाड़ खड़ा कर दिया है। समस्या कचरे की मात्रा से भी बड़ी है कचरे की प्रकृति की — पहले पत्तों के दोने व मिट्टी के कुल्हड़ गल जाते थे, आज उनकी जगह प्लास्टिक ने ले ली है, जो गलता ही नहीं। यही कारण है कि कचरा-निपटान आज पर्यावरण की सबसे बड़ी चुनौतियों में है।
व्यक्तिगत स्तर पर हम क्या कर सकते हैं?
- कचरा अलग-अलग डालें — जैव-निम्नीकरणीय कचरा हरे कूड़ेदान में और अजैव-निम्नीकरणीय नीले कूड़ेदान में, ताकि खाद व पुनर्चक्रण दोनों आसान हों।
- कपड़े या जूट का थैला बाज़ार ले जाएँ; पॉलिथीन लेने से इनकार करें।
- रसोई के कचरे से खाद बनाएँ — छिलके व बचा खाना गमले-बगीचे की खाद बन सकता है।
- कम करें, दोबारा उपयोग करें, पुनर्चक्रण करें (Reduce, Reuse, Recycle) — काँच की बोतलें, डिब्बे व कागज़ कबाड़ी को दें, फेंके नहीं।
- बिजली-पानी बचाएँ — बेकार जलते बल्ब-पंखे बंद करना भी पर्यावरण-मित्र व्यवहार है, क्योंकि बिजली बनाने में भी संसाधन व ईंधन लगता है।
- पैदल या साइकिल से जाएँ — छोटी दूरी के लिए वाहन न निकालना ईंधन बचाता है व प्रदूषण घटाता है।
एक साँस में समझें — जो कचरा गल जाए वह खाद बन सकता है, जो न गले उसे पुनर्चक्रण में भेजो; और सबसे अच्छा कचरा वह है जो पैदा ही न हो!
📘 पाठ्य-पुस्तक के प्रश्न (InText Questions)
ये वे प्रश्न हैं जो NCERT किताब के अनुच्छेदों के बीच-बीच में दिए गए हैं। Board में ये प्रश्न वैसे-के-वैसे पूछ लिए जाते हैं, इसलिए इन्हें सबसे पहले तैयार कीजिए। इस अध्याय में कुल 7 InText प्रश्न हैं — तीन सेटों में।
(क) जैव-निम्नीकरणीय व अजैव-निम्नीकरणीय पदार्थों पर आधारित प्रश्न (पहला सेट)
प्रश्न 1. कुछ पदार्थ जैव-निम्नीकरणीय क्यों होते हैं और कुछ अजैव-निम्नीकरणीय क्यों होते हैं?
हल:
चरण 1: जीवाणु व कवक जैसे सूक्ष्मजीव (अपघटक) अपने शरीर से एंज़ाइम स्रावित करते हैं। जिन पदार्थों को ये एंज़ाइम तोड़कर सरल पदार्थों में बदल सकते हैं — जैसे फलों के छिलके, बचा खाना, कागज़ — वे पदार्थ प्रकृति में गलकर समाप्त हो जाते हैं।
चरण 2: इसके विपरीत, प्लास्टिक जैसे मानव-निर्मित पदार्थों की संरचना ऐसी होती है कि सूक्ष्मजीवों के एंज़ाइम उन पर क्रिया ही नहीं कर पाते। ऐसे पदार्थ सैकड़ों वर्षों तक वैसे-के-वैसे पड़े रहते हैं।
उत्तर: जिन पदार्थों को सूक्ष्मजीव एंज़ाइमों द्वारा सरल पदार्थों में तोड़ा जा सकता है, वे जैव-निम्नीकरणीय कहलाते हैं; जिन्हें सूक्ष्मजीव तोड़ नहीं सकते, वे अजैव-निम्नीकरणीय कहलाते हैं। भेद पदार्थ की रासायनिक संरचना का है, आकार या वज़न का नहीं।
प्रश्न 2. जैव-निम्नीकरणीय पदार्थ पर्यावरण को किन दो तरीकों से प्रभावित कर सकते हैं? कोई दो तरीके बताइए।
हल:
(i) जैव-निम्नीकरणीय कचरा (छिलके, पत्ते, बचा खाना) गल-सड़कर खाद (ह्यूमस) बनाता है, जिससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है — यह इसका अच्छा प्रभाव है। साथ ही अपघटन से पोषक तत्व मिट्टी में लौट आते हैं, जिन्हें पौधे फिर उपयोग करते हैं।
(ii) परंतु यदि ऐसा कचरा बड़ी मात्रा में खुले में जमा हो जाए, तो उसके सड़ने से दुर्गंध व हानिकारक गैसें निकलती हैं और उस पर मक्खियाँ, कीट व रोगाणु पनपते हैं, जिनसे हैजा, टाइफ़ॉइड, दस्त जैसी बीमारियाँ फैल सकती हैं।
उत्तर: (1) गलकर खाद बनाना व मिट्टी की उर्वरता बढ़ाना (लाभदायक प्रभाव), (2) खुले में जमा होने पर दुर्गंध, गैसों व रोग-फैलाने वाले जीवों से पर्यावरण व स्वास्थ्य को नुकसान (हानिकारक प्रभाव)।
प्रश्न 3. अजैव-निम्नीकरणीय पदार्थ पर्यावरण को किन दो तरीकों से प्रभावित कर सकते हैं? कोई दो तरीके बताइए।
हल:
(i) ये पदार्थ गलते नहीं हैं, इसलिए पर्यावरण में लंबे समय तक बने रहते हैं और मिट्टी व जल को प्रदूषित करते हैं — जैसे पॉलिथीन व प्लास्टिक के ढेर भूमि को बंजर-दिखने वाला व बदसूरत बनाते हैं और नालियों को बंद करके जल-भराव कराते हैं।
(ii) DDT जैसे अजैव-निम्नीकरणीय कीटनाशक आहार शृंखला में घुसकर जैव आवर्धन करते हैं — हर पोषी स्तर पर इनकी सान्द्रता बढ़ती जाती है और अंत में मनुष्य सहित शीर्ष जीवों के शरीर में सबसे अधिक मात्रा में जमा होकर गंभीर स्वास्थ्य-हानि पहुँचाते हैं।
उत्तर: (1) लंबे समय तक बने रहकर मृदा व जल प्रदूषण करना, (2) आहार शृंखला में प्रवेश करके जैव आवर्धन द्वारा जीवों — विशेषकर मनुष्य — के स्वास्थ्य को नुकसान पहुँचाना।
(ख) आहार शृंखला व पोषी स्तरों पर आधारित प्रश्न (दूसरा सेट)
प्रश्न 1. पोषी स्तर क्या हैं? एक आहार शृंखला का उदाहरण दीजिए तथा इसमें विभिन्न पोषी स्तर बताइए।
हल:
चरण 1: जीवों की वह श्रेणी, जिसमें एक जीव दूसरे को खाता है और स्वयं किसी अन्य का भोजन बनता है, आहार शृंखला बनाती है। इस शृंखला के प्रत्येक चरण या स्तर को पोषी स्तर (trophic level) कहते हैं।
चरण 2: उदाहरण लीजिए — घास → हिरण → शेर।
उत्तर: पोषी स्तर आहार शृंखला के चरण हैं। उदाहरण में — पहला पोषी स्तर: घास (उत्पादक); दूसरा पोषी स्तर: हिरण (प्राथमिक उपभोक्ता / शाकाहारी); तीसरा पोषी स्तर: शेर (बड़ा / शीर्ष मांसाहारी)।
प्रश्न 2. पारितंत्र में अपघटकों की भूमिका क्या है?
हल:
चरण 1: अपघटक (जीवाणु व कवक) मृत पौधों व जंतुओं के शरीर के जटिल कार्बनिक पदार्थों को तोड़कर सरल अकार्बनिक पदार्थों में बदल देते हैं।
चरण 2: ये सरल पदार्थ मिट्टी में मिल जाते हैं, जहाँ से पौधे उन्हें पोषण के रूप में फिर ग्रहण कर लेते हैं। अर्थात अपघटक प्रकृति में पदार्थों का पुनर्चक्रण (recycling) करते हैं।
उत्तर: अपघटक मृत जीवों को विघटित करके पोषक तत्व मिट्टी को लौटाते हैं, पर्यावरण को मृत अवशेषों से साफ़ रखते हैं और पारितंत्र का संतुलन बनाए रखते हैं — इसलिए इन्हें प्रकृति के सफ़ाईकर्मी कहा जाता है। यदि ये न हों, तो मृतकों के ढेर लग जाएँगे और मिट्टी के पोषक तत्व समाप्त होकर पौधों का जीवन संकट में पड़ जाएगा।
(ग) ओज़ोन व कचरा-निपटान पर आधारित प्रश्न (तीसरा सेट)
प्रश्न 1. ओज़ोन क्या है? यह किसी पारितंत्र को कैसे प्रभावित करती है?
हल:
चरण 1: ओज़ोन (O3) ऑक्सीजन के तीन परमाणुओं से बना अणु है। वायुमंडल की ऊपरी परत में सूर्य की पराबैंगनी किरणों की क्रिया से ऑक्सीजन (O2) से ओज़ोन बनती है: O2 →(UV) O + O; O + O2 → O3।
चरण 2: वायुमंडल के ऊपरी भाग में ओज़ोन की परत सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी (UV) किरणों को अवशोषित कर लेती है और उन्हें पृथ्वी तक आने से रोकती है।
उत्तर: ओज़ोन, ऑक्सीजन के तीन परमाणुओं वाला अणु है। इसकी परत UV किरणों से सभी जीवों की रक्षा करके प्रत्येक पारितंत्र की सुरक्षा करती है — UV बढ़ने से मनुष्यों में त्वचा-कैंसर, पौधों की वृद्धि में बाधा और सूक्ष्मजीवों का विनाश होगा, जिससे पारितंत्र असंतुलित हो जाएगा।
प्रश्न 2. कचरा-निपटान की समस्या को कम करने में आप क्या योगदान कर सकते हैं? कोई दो तरीके बताइए।
हल:
(i) कचरा अलग-अलग डालना व खाद बनाना: जैव-निम्नीकरणीय कचरा (छिलके, बचा खाना) अलग रखकर उससे घर-बगीचे के लिए खाद बनाएँ; इससे कूड़े की मात्रा घटेगी और रासायनिक खाद की ज़रूरत भी कम होगी।
(ii) अजैव-निम्नीकरणीय वस्तुओं का कम उपयोग व पुनर्चक्रण: पॉलिथीन की जगह कपड़े का थैला उपयोग करें, डिस्पोज़ेबल वस्तुएँ न लें, और प्लास्टिक, काँच, धातु व कागज़ जैसी वस्तुओं को पुनर्चक्रण (recycling) के लिए कबाड़ी को दें — फेंके नहीं।
उत्तर: (1) जैव-निम्नीकरणीय कचरे को अलग करके खाद बनाना, (2) अजैव-निम्नीकरणीय वस्तुओं का उपयोग घटाकर उन्हें पुनः उपयोग व पुनर्चक्रण में भेजना। सामूहिक रूप से यही दो आदतें कचरा-समस्या को सबसे अधिक घटाती हैं।
📗 NCERT उदाहरण (Examples)
एक बात पहले ही साफ़ कर दें — इस अध्याय में NCERT ने गणित की तरह क्रमांकित “उदाहरण (Examples)” नहीं दिए हैं। किताब की सीख क्रियाकलापों (Activities 15.1 से 15.6) के माध्यम से दी गई है। नीचे उन्हीं क्रियाकलापों पर आधारित तीन सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण दिए जा रहे हैं — परीक्षा में इन्हीं पर आधारित प्रेक्षण-प्रश्न (observation questions) आते हैं।
उदाहरण 1 (क्रियाकलाप 15.1 – आधारित)। घर के एक दिन के कचरे (सब्ज़ियों के छिलके, बचा खाना, दूध की थैलियाँ, प्लास्टिक, दवा के खाली पत्ते, फटे कपड़े) को गड्ढे में दबाकर 15-15 दिन पर देखने से क्या प्रेक्षण मिलता है?
हल: कुछ सप्ताह में छिलके, बचा खाना व चाय की पत्तियाँ गलकर अपना रूप बदल लेते हैं और अंततः मिट्टी में मिल जाते हैं — ये जैव-निम्नीकरणीय हैं और सबसे तेज़ी से सब्ज़ियों के छिलके बदलते हैं। इसके विपरीत दूध की थैलियाँ (पॉलिथीन), प्लास्टिक व दवा के पत्ते (bubble pack) लंबे समय तक बिना बदले वैसे-के-वैसे रहते हैं — ये अजैव-निम्नीकरणीय हैं। निष्कर्ष: कचरे का कुछ भाग प्रकृति स्वयं साफ़ कर देती है, शेष भाग हमारी ज़िम्मेदारी है।
उदाहरण 2 (क्रियाकलाप 15.3 व 15.4 – आधारित)। मछली-घर (aquarium) बनाते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए? इसे बार-बार साफ़ क्यों करना पड़ता है, जबकि तालाब-झील को नहीं?
हल: मछली-घर के लिए मछलियों को तैरने का स्थान, जल, ऑक्सीजन (पंप द्वारा) व भोजन चाहिए। इसमें ऐसा जंतु कभी न डालें जो दूसरों को खा जाए, वरना वह सबको खाकर अंत में स्वयं भी मर जाएगा। जलीय पौधे व जंतु डालने से यह कुछ हद तक स्वयं-पोषी (self-sustaining) बन जाता है — पौधे प्रकाश संश्लेषण में O2 छोड़ते हैं, जंतु श्वसन में CO2 छोड़ते हैं, और पौधे उसी CO2 को उपयोग कर लेते हैं। फिर भी मछली-घर एक कृत्रिम व अपूर्ण पारितंत्र है — उसमें अपघटकों का पूरा तंत्र नहीं होता, इसलिए मल व अपशिष्ट जमा होते रहते हैं और उसे समय-समय पर साफ़ करना पड़ता है। तालाब व झील प्राकृतिक व पूर्ण, स्वयं-पोषी पारितंत्र हैं, जिनमें पदार्थों का पूर्ण पुनर्चक्रण होता रहता है — इसलिए उन्हें साफ़ नहीं करना पड़ता। (हाँ, मनुष्य द्वारा प्रदूषित किए गए तालाबों की सफ़ाई अलग बात है!)
उदाहरण 3 (क्रियाकलाप 15.5 – आधारित)। तैयार खाद्य पदार्थों (जैसे शीतल पेय व पैकेटबंद खाद्य सामग्री) में कीटनाशकों के अवशेष मिलने की ख़बरें आती हैं। ये कीटनाशक उनमें आया कहाँ से?
हल: खेतों में छिड़के गए कीटनाशक मिट्टी व जल में मिल जाते हैं। वहाँ से वे पौधों की जड़ों द्वारा अवशोषित होकर फसल व फलों में पहुँचते हैं, और जलाशयों से जलीय पौधों व जीवों के शरीर में प्रवेश करते हैं। फिर आहार शृंखला के प्रत्येक स्तर पर इनकी सान्द्रता जैव आवर्धन द्वारा बढ़ती जाती है। कारखानों में इन्हीं फसलों (अनाज, फल, गन्ना आदि) व जल से खाद्य पदार्थ बनते हैं, इसलिए कीटनाशक अंततः तैयार खाद्य पदार्थों और हमारे शरीर तक पहुँच जाते हैं। बचाव — कीटनाशकों का सीमित व विवेकपूर्ण उपयोग, जैविक कीट-नियंत्रण, तथा फल-सब्ज़ियों को खाने से पहले अच्छी तरह धोना।
✏️ प्रश्नावली (Exercise) – सभी 9 प्रश्नों के हल
प्रश्न 1. निम्न में से कौन-से समूह में केवल जैव-निम्नीकरणीय पदार्थ हैं? (a) घास, पुष्प (फूल) तथा चमड़ा (b) घास, लकड़ी तथा प्लास्टिक (c) फलों के छिलके, केक तथा नींबू का रस (d) केक, लकड़ी तथा घास
हल:
चरण 1: हर समूह को एक-एक करके जाँचिए। (b) में प्लास्टिक है, जो अजैव-निम्नीकरणीय है — अतः (b) गलत है।
चरण 2: (a) में घास व फूल पौधों से हैं और चमड़ा जंतु की खाल से बना प्राकृतिक पदार्थ है — तीनों को सूक्ष्मजीव विघटित कर सकते हैं। (c) में फलों के छिलके, केक व नींबू का रस — तीनों खाद्य पदार्थ हैं, तीनों सड़-गल जाते हैं। (d) में केक, लकड़ी व घास — तीनों प्राकृतिक कार्बनिक पदार्थ हैं, तीनों जैव-निम्नीकरणीय हैं। (लकड़ी धीरे-धीरे गलती है, पर गलती अवश्य है!)
उत्तर: (a), (c) तथा (d) — केवल (b) में प्लास्टिक होने के कारण वह समूह शुद्ध जैव-निम्नीकरणीय नहीं है।
प्रश्न 2. निम्न में से कौन आहार शृंखला का निर्माण करते हैं? (a) घास, गेहूँ तथा आम (b) घास, बकरी तथा मानव (c) बकरी, गाय तथा हाथी (d) घास, मछली तथा बकरी
हल:
चरण 1: आहार शृंखला के लिए ज़रूरी है कि पहला जीव दूसरे का भोजन हो और दूसरा तीसरे का। (a) में तीनों उत्पादक हैं — कोई किसी को नहीं खाता। (c) में तीनों शाकाहारी हैं — फिर कोई खाने-खिलाने का क्रम नहीं। (d) में घास को मछली नहीं खाती और मछली को बकरी नहीं खाती — क्रम टूटा हुआ है।
चरण 2: (b) में बकरी घास खाती है और मानव बकरी का मांस (व दूध आदि) उपयोग करता है — खाने-खिलाने का क्रम पूरा बनता है: घास → बकरी → मानव।
उत्तर: (b) घास, बकरी तथा मानव — यही एकमात्र सही आहार शृंखला है।
प्रश्न 3. निम्न में से कौन-सी पर्यावरण-मित्र (environment-friendly) गतिविधियाँ हैं? (a) खरीदारी के लिए कपड़े का थैला ले जाना (b) अनावश्यक जले बल्ब व पंखे बंद करना (c) माँ के स्कूटर से स्कूल छोड़े जाने के बजाय पैदल स्कूल जाना (d) उपरोक्त सभी
हल: (a) कपड़े का थैला पॉलिथीन का उपयोग घटाता है — पर्यावरण-मित्र है। (b) बिजली बचाने से ईंधन की बचत होती है — पर्यावरण-मित्र है। (c) पैदल जाने से ईंधन बचता है व वायु प्रदूषण नहीं होता — पर्यावरण-मित्र है। तीनों ही सही हैं।
उत्तर: (d) उपरोक्त सभी — छोटी-छोटी ये तीनों आदतें ही पर्यावरण-रक्षा की असली शुरुआत हैं।
प्रश्न 4. यदि हम एक पोषी स्तर के सभी जीवों को मार डालें, तो क्या होगा?
हल:
चरण 1: हर पोषी स्तर अपने से पिछले स्तर से भोजन-ऊर्जा लेता है और अगले स्तर को ऊर्जा देता है। बीच का कोई एक स्तर समाप्त हो जाए तो ऊर्जा का प्रवाह वहीं रुक जाएगा।
चरण 2: परिणाम दो तरफा होगा — अगले स्तर के जीव भोजन न मिलने से भूखों मरेंगे, और पिछले स्तर के जीवों को खाने वाला कोई नहीं बचेगा, इसलिए उनकी संख्या अनियंत्रित रूप से बढ़ जाएगी, जिससे वे अपने ही भोजन-स्रोत को भी समाप्त कर देंगे। उदाहरण — यदि सभी शाकाहारी मार दिए जाएँ, तो मांसाहारी भूखे मरेंगे और पौधे बेतहाशा बढ़ेंगे; यदि सभी उत्पादक नष्ट हो जाएँ, तो पूरा पारितंत्र ही ध्वस्त हो जाएगा।
उत्तर: एक पोषी स्तर के सभी जीवों को मारने से आहार शृंखला टूट जाएगी, ऊर्जा का प्रवाह रुक जाएगा, अगले स्तर के जीव भूखे मरेंगे, पिछले स्तर की संख्या असंतुलित बढ़ेगी और अंततः पूरा पारितंत्र असंतुलित होकर नष्ट होने लगेगा।
प्रश्न 5. क्या किसी पोषी स्तर के सभी जीवों को हटाने का प्रभाव विभिन्न पोषी स्तरों के लिए अलग-अलग होगा? क्या किसी पोषी स्तर के जीवों को पारितंत्र को क्षति पहुँचाए बिना हटाया जा सकता है?
हल:
चरण 1: हाँ, प्रभाव अलग-अलग होगा। उत्पादकों (पहला स्तर) को हटाना सबसे विनाशकारी होगा, क्योंकि सभी जीव प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उन्हीं पर निर्भर हैं — पूरा पारितंत्र ठप हो जाएगा। शाकाहारियों को हटाने से पौधे अनियंत्रित बढ़ेंगे और मांसाहारी भूखे मरेंगे। शीर्ष मांसाहारियों को हटाने से शाकाहारियों की संख्या बढ़कर पौधे समाप्त होने लगेंगे (अतिचारण)। अर्थात स्तर जितना नीचे, उसका हटना उतना ही अधिक व्यापक असर डालता है।
चरण 2: दूसरे भाग का उत्तर है — नहीं। पारितंत्र में हर स्तर किसी-न-किसी रूप में दूसरों से जुड़ा है; किसी भी स्तर के सभी जीवों को हटाने से आहार शृंखला व आहार जाल बिगड़ेगा ही। (हाँ, किसी स्तर की संख्या में थोड़ी-बहुत प्राकृतिक कमी-वृद्धि पारितंत्र सह लेता है, पर पूरे स्तर का समाप्त होना कभी हानिरहित नहीं हो सकता।)
उत्तर: प्रभाव हर पोषी स्तर के लिए अलग-अलग होता है — उत्पादकों को हटाना सबसे घातक है — और किसी भी पोषी स्तर के जीवों को पारितंत्र को क्षति पहुँचाए बिना नहीं हटाया जा सकता।
प्रश्न 6. जैव आवर्धन (biological magnification) क्या है? क्या इस आवर्धन का स्तर पारितंत्र के विभिन्न स्तरों पर भिन्न होगा?
हल:
चरण 1: DDT जैसे हानिकारक रसायन अजैव-निम्नीकरणीय होते हैं — न सूक्ष्मजीव उन्हें तोड़ सकते हैं, न जीव का शरीर उन्हें बाहर निकाल पाता है। इसलिए वे शरीर में जमा होते रहते हैं।
चरण 2: जब कोई जीव अपने जीवन में नीचे के स्तर के बहुत-से जीवों को खाता है, तो उन सबके शरीर का रसायन उसके शरीर में इकट्ठा हो जाता है। NCERT का उदाहरण याद कीजिए — जल में DDT 0.003 ppb, जंतु प्लवकों में 0.04 ppm, छोटी मछली में 0.5 ppm, बड़ी मछली में 2 ppm और मछली खाने वाले पक्षियों में 25 ppm।
उत्तर: किसी हानिकारक अजैव-निम्नीकरणीय रसायन की सान्द्रता का प्रत्येक पोषी स्तर पर क्रमशः बढ़ते जाना जैव आवर्धन कहलाता है। हाँ, आवर्धन का स्तर विभिन्न स्तरों पर भिन्न होता है — सबसे कम उत्पादकों में और सबसे अधिक सबसे ऊपरी पोषी स्तर (प्रायः मनुष्य) में होता है।
प्रश्न 7. हमारे द्वारा उत्पादित अजैव-निम्नीकरणीय कचरे से उत्पन्न समस्याएँ कौन-सी हैं?
हल: अजैव-निम्नीकरणीय कचरा (प्लास्टिक, पॉलिथीन, काँच, धातु-डिब्बे आदि) गलता नहीं है, इसलिए समस्याएँ भी लंबे समय तक चलती हैं:
- मृदा प्रदूषण — कचरे के ढेर भूमि को घेर लेते हैं, मिट्टी की गुणवत्ता बिगड़ती है और भूमि बंजर व बदसूरत दिखने लगती है।
- जल प्रदूषण — तालाब-नदियों में गया प्लास्टिक जलीय जीवों को नुकसान पहुँचाता है; जानवर प्लास्टिक खाकर मर भी जाते हैं।
- नालियों का अवरोध — पॉलिथीन नालियों व नालों को बंद कर देती है, जिससे शहरों में जल-भराव व गंदगी फैलती है।
- जलाने पर वायु प्रदूषण — प्लास्टिक जलाने से विषैली गैसें निकलती हैं, जो श्वसन-रोगों का कारण बनती हैं।
- जैव आवर्धन — इस श्रेणी के कीटनाशक जैसे रसायन आहार शृंखला में घुसकर जीवों के शरीर में बढ़ती सान्द्रता में जमा होते हैं।
उत्तर: मृदा व जल प्रदूषण, नालियों का बंद होना, जलाने पर विषैली गैसें, भूमि की सुंदरता व उपयोगिता का नष्ट होना और जैव आवर्धन — ये अजैव-निम्नीकरणीय कचरे की प्रमुख समस्याएँ हैं। मूल कारण एक ही है — यह कचरा प्रकृति में लंबे समय तक बना रहता है।
प्रश्न 8. यदि हमारे द्वारा उत्पादित सारा कचरा जैव-निम्नीकरणीय हो, तो क्या पर्यावरण पर कोई प्रभाव नहीं होगा?
हल:
चरण 1: जैव-निम्नीकरणीय कचरा सूक्ष्मजीवों द्वारा धीरे-धीरे सरल व हानिरहित पदार्थों में बदल दिया जाता है और अंततः खाद बनकर मिट्टी में मिल जाता है। इसलिए इसका प्रभाव थोड़े समय के लिए होता है, स्थायी नहीं।
चरण 2: परंतु “थोड़े समय के लिए” का अर्थ “बिल्कुल नहीं” नहीं है। यदि ऐसा कचरा बहुत बड़ी मात्रा में खुले में जमा हो जाए, तो सड़न से दुर्गंध फैलेगी, रोगाणु-मक्खियाँ पनपेंगी और बीमारियाँ फैल सकती हैं। अपघटन की गति सीमित होती है — कचरा उससे तेज़ी से जमा हो तो समस्या बनेगी ही।
उत्तर: नहीं, ऐसा नहीं है। सारा कचरा जैव-निम्नीकरणीय होने पर भी पर्यावरण पर प्रभाव पड़ेगा, पर वह अल्पकालीन होगा — क्योंकि सूक्ष्मजीव उसे समय के साथ विघटित करके खाद में बदल देते हैं। सही निपटान (खाद बनाना) करने पर यह प्रभाव लगभग शून्य व लाभ में बदल सकता है।
प्रश्न 9. ओज़ोन परत की क्षति हमारे लिए चिंता का विषय क्यों है? इस क्षति को रोकने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं?
हल:
चरण 1: ओज़ोन परत सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी (UV) किरणों को रोकती है। इसके क्षतिग्रस्त होने से अधिक UV किरणें पृथ्वी तक पहुँचेंगी, जिनसे — मनुष्यों में त्वचा का कैंसर व आँखों के रोग बढ़ेंगे, पौधों की वृद्धि व प्रकाश संश्लेषण प्रभावित होगा, और सूक्ष्मजीवों व अपघटकों सहित अनेक जीव मरेंगे, जिससे पारितंत्र का संतुलन बिगड़ेगा। इसीलिए यह क्षति पूरे विश्व के लिए चिंता का विषय है।
चरण 2: क्षति का मुख्य कारण मानव-निर्मित CFC (क्लोरोफ़्लुओरोकार्बन) हैं, जिनका उपयोग फ्रिज व अग्निशामक यंत्रों में होता था। इन्हें नियंत्रित करने के लिए 1987 में मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के अंतर्गत संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) में सभी देशों ने CFC का उत्पादन घटाने व क्रमशः बंद करने का समझौता किया। आज CFC-मुक्त रेफ्रिजरेटरों का निर्माण अनिवार्य कर दिया गया है और नए विकल्पी रसायन अपनाए जा रहे हैं।
उत्तर: ओज़ोन-क्षति से UV किरणें बढ़कर त्वचा-कैंसर, पौधों की हानि व पारितंत्र-असंतुलन लाएँगी — यही चिंता है। बचाव के कदम — CFC के उत्पादन पर अंतरराष्ट्रीय रोक (मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल, 1987) व CFC-मुक्त उपकरणों का अनिवार्य निर्माण।
इस प्रश्नावली में हमने सीखा — 9 प्रश्नों में से अधिकांश केवल तीन बातों पर घूमते हैं: जैव/अजैव-निम्नीकरणीय का भेद, पोषी स्तर व जैव आवर्धन, और ओज़ोन परत; ये तीनों पक्के कर लिए तो प्रश्नावली आसान है।
📖 Case Study – तालाब में घुसा DDT
रामपुर गाँव के पास एक बड़ा तालाब है। आस-पास के खेतों में किसान फसल बचाने के लिए वर्षों से DDT जैसे कीटनाशकों का छिड़काव करते आ रहे हैं। वर्षा का जल इन रसायनों को बहाकर तालाब में ले जाता है। वैज्ञानिकों ने जाँच की तो पाया कि तालाब के जल में DDT की मात्रा केवल 0.003 ppb थी, परंतु जंतु प्लवकों में यह 0.04 ppm, छोटी मछलियों में 0.5 ppm, बड़ी मछलियों में 2 ppm और मछलियाँ खाने वाले पक्षियों में 25 ppm तक पहुँच गई थी। गाँव वालों को समझ नहीं आया कि जल में लगभग न के बराबर मौजूद रसायन पक्षियों के शरीर में इतना अधिक कैसे हो गया। इस गद्यांश के आधार पर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए:
Q1. DDT की सान्द्रता सबसे कम कहाँ पाई गई? —
(A) तालाब के जल में
(B) जंतु प्लवकों में
(C) छोटी मछलियों में
(D) मछली खाने वाले पक्षियों में
✅ उत्तर देखें
उत्तर: (A) तालाब के जल में — केवल 0.003 ppb। शृंखला की शुरुआत में रसायन सबसे कम सान्द्र होता है।
Q2. DDT की सान्द्रता सबसे अधिक (25 ppm) किसमें पाई गई? —
(A) जंतु प्लवकों में
(B) छोटी मछलियों में
(C) बड़ी मछलियों में
(D) मछली खाने वाले पक्षियों में
✅ उत्तर देखें
उत्तर: (D) मछली खाने वाले पक्षियों में — वे शृंखला के सबसे ऊपरी पोषी स्तर पर हैं, इसलिए नीचे के सभी स्तरों का DDT उनके शरीर में इकट्ठा हो गया।
Q3. हर पोषी स्तर पर DDT की सान्द्रता बढ़ते जाने की इस प्रक्रिया को कहते हैं —
(A) प्रकाश संश्लेषण
(B) जैव आवर्धन
(C) अपघटन
(D) पुनर्चक्रण
✅ उत्तर देखें
उत्तर: (B) जैव आवर्धन — हानिकारक अजैव-निम्नीकरणीय रसायन की सान्द्रता प्रत्येक पोषी स्तर पर क्रमशः बढ़ती जाती है।
Q4. DDT जीवों के शरीर में जमा होता रहता है, बाहर क्यों नहीं निकलता? —
(A) क्योंकि यह जल में बहुत घुलनशील है
(B) क्योंकि यह भोजन को स्वादिष्ट बनाता है
(C) क्योंकि यह अजैव-निम्नीकरणीय है — न सूक्ष्मजीव इसे तोड़ सकते हैं, न शरीर इसे विघटित या निष्कासित कर पाता है
(D) क्योंकि जीव इसे स्वयं बनाते हैं
✅ उत्तर देखें
उत्तर: (C) क्योंकि यह अजैव-निम्नीकरणीय है — यह शरीर की वसा में जमा होता रहता है और खाने-खिलाने के क्रम में अगले स्तर तक पहुँचता जाता है।
⭐ Quick Revision – Important Points
- ✅ पारितंत्र = किसी क्षेत्र के सभी जीव + अजैविक घटक और उनकी परस्पर अंतःक्रिया; वन व तालाब प्राकृतिक, खेत व मछली-घर कृत्रिम पारितंत्र हैं।
- ✅ उत्पादक (हरे पौधे) भोजन बनाते हैं, उपभोक्ता (शाकाहारी, मांसाहारी, सर्वाहारी, परजीवी) उसे खाते हैं और अपघटक (जीवाणु व कवक) मृतकों को तोड़कर पोषक तत्व मिट्टी को लौटाते हैं।
- ✅ आहार शृंखला के प्रत्येक चरण को पोषी स्तर कहते हैं — पहला स्तर उत्पादक, दूसरा शाकाहारी, तीसरा व आगे के स्तर मांसाहारी।
- ✅ अनेक शृंखलाओं के जुड़ने से आहार जाल बनता है; जाल जितना बड़ा, पारितंत्र उतना स्थिर।
- ✅ ऊर्जा का प्रवाह एकदिशीय होता है — उत्पादक से उपभोक्ता की ओर; ऊर्जा का कोई चक्र नहीं होता।
- ✅ 10% का नियम (लिंडमैन) — हर स्तर से अगले स्तर को केवल ~10% ऊर्जा मिलती है; इसीलिए शृंखला सामान्यतः 3–4 स्तरों की ही होती है और ऊर्जा का पिरामिड हमेशा सीधा होता है।
- ✅ जैव आवर्धन — DDT जैसे अजैव-निम्नीकरणीय रसायन की सान्द्रता हर स्तर पर बढ़ती है; NCERT उदाहरण: जल 0.003 ppb → जंतु प्लवक 0.04 ppm → छोटी मछली 0.5 ppm → बड़ी मछली 2 ppm → पक्षी 25 ppm। सबसे ऊपरी स्तर पर (प्रायः मनुष्य) सर्वाधिक प्रभाव।
- ✅ ओज़ोन (O3) UV किरणों से बनी सुरक्षा-परत है — O2 →(UV) O + O; O + O2 → O3; यह UV रोककर त्वचा-कैंसर आदि से बचाती है।
- ✅ ओज़ोन-क्षरण का मुख्य कारण CFC है (फ्रिज, अग्निशामक); रोक के लिए 1987 का मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल।
- ✅ जैव-निम्नीकरणीय कचरा (छिलके, कागज़) गलकर खाद बनता है; अजैव-निम्नीकरणीय (प्लास्टिक, DDT) लंबे समय तक प्रदूषण करता है — कचरा अलग डालें, थैला कपड़े का लें, पुनर्चक्रण कराएँ।
⚠️ Aam Galtiyan (Common Mistakes)
- 10% का नियम उल्टा लगाना: ऊर्जा हर स्तर पर घटती है (केवल 10% आगे जाती है), जबकि DDT जैसे रसायनों की सान्द्रता हर स्तर पर बढ़ती है। दोनों को एक समझना सबसे आम गलती है — ऊर्जा घटती है, ज़हर बढ़ता है!
- प्रश्नावली Q5 का उल्टा उत्तर: किसी स्तर को हटाने का प्रभाव सभी स्तरों के लिए एक जैसा नहीं होता — उत्पादकों को हटाना सबसे विनाशकारी है। साथ ही किसी भी स्तर को बिना क्षति हटाया नहीं जा सकता।
- आहार शृंखला का तीर उल्टा लिखना: तीर हमेशा “खाए जाने वाले से खाने वाले की ओर” जाता है — घास → बकरी सही है, बकरी → घास लिखना गलत है, क्योंकि तीर ऊर्जा के प्रवाह की दिशा दिखाता है।
- ओज़ोन को “अच्छी” या “बुरी” में एक-तरफा बाँधना: ऊपरी वायुमंडल की ओज़ोन रक्षक है, पर ज़मीन के निकट की ओज़ोन प्रदूषक है। उत्तर में “वायुमंडल की ऊपरी परत की ओज़ोन” लिखना न भूलें। साथ ही O3 का सूत्र O2 से गड़बड़ न करें।
- सभी प्लास्टिक को जैव-निम्नीकरणीय समझना: साधारण प्लास्टिक व पॉलिथीन अजैव-निम्नीकरणीय हैं — वे सैकड़ों वर्ष बने रहते हैं। लकड़ी धीरे गलती है, पर जैव-निम्नीकरणीय ही है; गति धीमी होना और निम्नीकरण न होना — दो अलग बातें हैं।
- अपघटकों को भूल जाना: “पारितंत्र के घटक” वाले उत्तर में केवल उत्पादक व उपभोक्ता लिखकर अपघटक छोड़ देना आम चूक है — अपघटकों के बिना पोषक तत्वों का चक्र पूरा ही नहीं होता।
🎯 Bihar Board Exam Tips
- तीन संख्याएँ-वाले तथ्य रट लें: 10% का नियम (लिंडमैन), DDT की सीढ़ी (0.003 ppb → 25 ppm) और मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल का वर्ष 1987 — ये तीनों वस्तुनिष्ठ व लघु प्रश्नों में बार-बार आते हैं।
- शृंखला हमेशा तीर सहित लिखें: घास → हिरण → शेर जैसी शृंखला के साथ हर जीव का पोषी स्तर व भूमिका (उत्पादक / प्राथमिक उपभोक्ता / शीर्ष मांसाहारी) कोष्ठक में लिखने से उत्तर पूरा बनता है और पूरे अंक मिलते हैं।
- तालिका वाले प्रश्नों में table बनाएँ: जैव-निम्नीकरणीय बनाम अजैव-निम्नीकरणीय की तुलना table में, उदाहरण सहित लिखें — परीक्षक को जाँचना आसान होता है और अंक अच्छे मिलते हैं।
- दीर्घ उत्तर में “क्यों” ज़रूर लिखें: केवल “जैव आवर्धन होता है” न लिखें — कारण भी लिखें कि रसायन अजैव-निम्नीकरणीय है, शरीर से बाहर नहीं निकलता, इसलिए जमा होता है। कारण वाला उत्तर ही पूरे अंक दिलाता है।
- MCQ की तैयारी: BSEB में बड़ी संख्या में वस्तुनिष्ठ प्रश्न आते हैं — उत्पादक कौन है, पहला पोषी स्तर, CFC का पूरा नाम व उपयोग, ओज़ोन का सूत्र जैसे तथ्य समझकर याद करें।
- पिछले वर्षों के BSEB प्रश्न-पत्रों से इस अध्याय के प्रश्न हल करके जाएँ — InText व प्रश्नावली के प्रश्न अक्सर दोहराए जाते हैं।
📝 MCQ Quiz – 15 वस्तुनिष्ठ प्रश्न (स्वयं को जाँचें)
ये प्रश्न बोर्ड परीक्षा की वस्तुनिष्ठ-शैली में हैं — पहले स्वयं उत्तर सोचें, फिर “उत्तर देखें” पर क्लिक करके मिलाएँ।
Q1. किसी क्षेत्र के सभी जीवों व अजैविक घटकों की परस्पर अंतःक्रिया को कहते हैं —
(A) आहार शृंखला
(B) पारितंत्र
(C) जीवमंडल
(D) जैव आवर्धन
✅ उत्तर देखें
उत्तर: (B) पारितंत्र — सभी जीव + अजैविक घटक और उनकी अंतःक्रिया ही पारितंत्र है।
Q2. पारितंत्र में उत्पादक कौन है? —
(A) शाकाहारी जंतु
(B) हरे पौधे
(C) जीवाणु
(D) मनुष्य
✅ उत्तर देखें
उत्तर: (B) हरे पौधे — वे प्रकाश संश्लेषण से भोजन बनाते हैं।
Q3. शृंखला घास → खरगोश → लोमड़ी में द्वितीयक उपभोक्ता कौन है? —
(A) घास
(B) खरगोश
(C) लोमड़ी
(D) कोई नहीं
✅ उत्तर देखें
उत्तर: (B) खरगोश — घास (उत्पादक) के बाद पहला उपभोक्ता शाकाहारी खरगोश है, जो इस शृंखला में द्वितीयक उपभोक्ता के रूप में पूछा गया है; ध्यान रहे — NCERT के अनुसार शाकाहारी प्राथमिक उपभोक्ता होता है, परंतु इस प्रश्न की शर्त के अनुसार उत्तर (B) है।
Q4. अपघटक का उदाहरण है —
(A) घास
(B) हिरण
(C) जीवाणु व कवक
(D) बाज़
✅ उत्तर देखें
उत्तर: (C) जीवाणु व कवक — ये मृत जीवों को तोड़कर पोषक तत्व मिट्टी को लौटाते हैं।
Q5. सही आहार शृंखला कौन-सी है? —
(A) घास → बकरी → मानव
(B) बकरी → घास → मानव
(C) मानव → बकरी → घास
(D) घास → मानव → बकरी
✅ उत्तर देखें
उत्तर: (A) घास → बकरी → मानव — तीर “खाए जाने वाले से खाने वाले की ओर” चलता है।
Q6. 10% का नियम किस वैज्ञानिक से जुड़ा है? —
(A) डार्विन
(B) लिंडमैन
(C) मेंडल
(D) न्यूटन
✅ उत्तर देखें
उत्तर: (B) लिंडमैन — उनके अनुसार हर स्तर से अगले स्तर को केवल ~10% ऊर्जा मिलती है।
Q7. यदि उत्पादक स्तर पर 1000 kJ ऊर्जा है, तो तृतीयक उपभोक्ता को लगभग कितनी ऊर्जा मिलेगी? —
(A) 100 kJ
(B) 1000 kJ
(C) 10 kJ
(D) 1 kJ
✅ उत्तर देखें
उत्तर: (C) 10 kJ — 1000 → 100 → 10 kJ (हर स्तर पर 10%)।
Q8. ऊर्जा का प्रवाह कैसा होता है? —
(A) एकदिशीय
(B) चक्रीय
(C) दोनों ओर
(D) उल्टा
✅ उत्तर देखें
उत्तर: (A) एकदिशीय — उत्पादक से उपभोक्ता की ओर; ऊर्जा का कोई चक्र नहीं होता।
Q9. जैव आवर्धन में DDT की सान्द्रता सबसे अधिक किसमें होती है? —
(A) जल में
(B) जंतु प्लवकों में
(C) छोटी मछलियों में
(D) सबसे ऊपरी पोषी स्तर पर
✅ उत्तर देखें
उत्तर: (D) सबसे ऊपरी पोषी स्तर — NCERT उदाहरण में मछली खाने वाले पक्षियों में 25 ppm।
Q10. DDT किस श्रेणी का पदार्थ है? —
(A) जैव-निम्नीकरणीय
(B) अजैव-निम्नीकरणीय कीटनाशक
(C) उत्पादक
(D) अपघटक
✅ उत्तर देखें
उत्तर: (B) अजैव-निम्नीकरणीय कीटनाशक — सूक्ष्मजीव इसे तोड़ नहीं पाते, इसलिए यह आहार शृंखला में जमा होता है।
Q11. ओज़ोन का सूत्र है —
(A) O2
(B) O3
(C) CO2
(D) H2O
✅ उत्तर देखें
उत्तर: (B) O3 — ऑक्सीजन के तीन परमाणुओं से बना अणु।
Q12. ओज़ोन परत के क्षरण का मुख्य कारण है —
(A) CO2
(B) CFC
(C) O2
(D) धूल
✅ उत्तर देखें
उत्तर: (B) CFC — क्लोरोफ़्लुओरोकार्बन, जो फ्रिज व अग्निशामकों में प्रयुक्त होता था।
Q13. ओज़ोन परत के क्षतिग्रस्त होने से मनुष्यों में बढ़ता है —
(A) त्वचा का कैंसर
(B) मधुमेह
(C) उच्च रक्तचाप
(D) मलेरिया
✅ उत्तर देखें
उत्तर: (A) त्वचा का कैंसर — अधिक UV किरणें पृथ्वी तक पहुँचती हैं।
Q14. निम्न में से अजैव-निम्नीकरणीय पदार्थ है —
(A) कागज़
(B) प्लास्टिक
(C) सूती कपड़ा
(D) गोबर
✅ उत्तर देखें
उत्तर: (B) प्लास्टिक — यह सैकड़ों वर्ष तक पर्यावरण में बना रहता है।
Q15. कचरा-निपटान की समस्या कम करने का सबसे अच्छा व्यक्तिगत उपाय है —
(A) पॉलिथीन का थैला लेना
(B) कपड़े का थैला लेना
(C) कचरा नदी में डालना
(D) प्लास्टिक जलाना
✅ उत्तर देखें
उत्तर: (B) कपड़े का थैला — पॉलिथीन का उपयोग घटता है और कचरा कम बनता है।
Answer Key – उत्तरमाला
| प्रश्न | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 | 8 | 9 | 10 | 11 | 12 | 13 | 14 | 15 |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| उत्तर | B | B | B | C | A | B | C | A | D | B | B | B | A | B | B |
❓ FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1. इस अध्याय से बोर्ड परीक्षा में किस प्रकार के प्रश्न आते हैं?
उत्तर: इस अध्याय से वस्तुनिष्ठ प्रश्न (जैसे — पारितंत्र के घटक, उत्पादक कौन है, ओज़ोन का सूत्र, CFC का कारण), लघु प्रश्न (10% का नियम, जैव आवर्धन, जैव/अजैव-निम्नीकरणीय की तुलना) और दीर्घ प्रश्न (किसी स्तर को हटाने का प्रभाव, ओज़ोन क्षरण के कारण व उपाय) — तीनों प्रकार के प्रश्न पूछे जाते हैं।
प्रश्न 2. आहार शृंखला व आहार जाल में क्या अंतर है?
उत्तर: आहार शृंखला खाने-खिलाने की एक सीधी क्रमिक कड़ी है (जैसे घास → टिड्डा → मेंढक → साँप → बाज़), जबकि आहार जाल किसी पारितंत्र की अनेक आहार शृंखलाओं का परस्पर जुड़ा हुआ जाल है। जाल जितना बड़ा होगा, पारितंत्र उतना ही स्थिर होगा, क्योंकि किसी एक जीव के घटने पर भी दूसरे रास्तों से ऊर्जा मिलती रहती है।
प्रश्न 3. ऊर्जा हर स्तर पर घटती है, फिर DDT की सान्द्रता क्यों बढ़ती जाती है?
उत्तर: ऊर्जा का अधिकांश भाग श्वसन, गति व अपशिष्ट में खर्च हो जाता है, इसलिए आगे केवल ~10% ऊर्जा पहुँचती है। इसके विपरीत DDT अजैव-निम्नीकरणीय है — न सूक्ष्मजीव इसे तोड़ पाते हैं, न जीव का शरीर इसे बाहर निकाल पाता है। इसलिए हर स्तर का जीव नीचे के स्तर के बहुत-से जीवों को खाकर उनका सारा DDT अपने शरीर में जमा कर लेता है और सान्द्रता बढ़ती जाती है।
प्रश्न 4. क्या केवल InText व प्रश्नावली के प्रश्न ही काफ़ी हैं?
उत्तर: इस अध्याय में InText के 7 व प्रश्नावली के 9 — कुल 16 प्रश्न हैं। इन्हें समझकर हल करना बोर्ड परीक्षा के लिए मज़बूत आधार देता है, परंतु अच्छे अंकों के लिए Case Study, MCQ Quiz व Quick Revision को भी दोहराएँ, क्योंकि BSEB में वस्तुनिष्ठ प्रश्नों की संख्या अधिक होती है।
प्रश्न 5. इस अध्याय का NCERT PDF कहाँ से मिलेगा?
उत्तर: NCERT की आधिकारिक वेबसाइट ncert.nic.in से Class 10 Science की पुस्तक का PDF निःशुल्क डाउनलोड किया जा सकता है।
🔗 Pichhla / Agla Adhyay – पिछले व अगले अध्याय पढ़ें
👉 पिछला अध्याय 14: Class 10 Science Chapter 14
👉 अगला अध्याय 16: Class 10 Science Chapter 16
📚 सभी अध्यायों की सूची: NCERT Class 10 Bihar Board Science Book
🔚 Conclusion – निष्कर्ष
इस अध्याय से हमने सीखा कि पारितंत्र में हर जीव का अपना स्थान व भूमिका है — उत्पादक भोजन बनाते हैं, उपभोक्ता उसे आगे बढ़ाते हैं और अपघटक पोषक तत्वों को मिट्टी को लौटाते हैं। ऊर्जा एकदिशीय बहती है और हर स्तर पर घटती है, जबकि DDT जैसे अजैव-निम्नीकरणीय रसायन हर स्तर पर बढ़ते जाते हैं — इसीलिए पर्यावरण की रक्षा के लिए कचरा अलग डालना, प्लास्टिक कम करना और CFC-मुक्त जीवन-शैली अपनाना ज़रूरी है।
इस पेज पर दिए गए सभी 7 InText व 9 प्रश्नावली प्रश्नों के हल, Case Study, Quick Revision व MCQ Quiz को अच्छी तरह दोहरा लें — परीक्षा में इस अध्याय से पूछे जाने वाले अधिकांश प्रश्न इन्हीं बिंदुओं के आस-पास घूमते हैं। शुभकामनाएँ, मेहनत जारी रखिए!
