NCERT Class 10 Science Chapter 11 The Human Eye and the Colourful World in Hindi | मानव नेत्र तथा रंगबिरंगा संसार Notes, MCQ व प्रश्न-उत्तर

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परिचय – यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है?

Class 10 Science Chapter 11 The Human Eye and the Colourful World के NCERT Solutions आपको इस पेज पर सरल हिंदी में, किताब के क्रम से मिलेंगे। Class 10 Science Chapter 11 The Human Eye and the Colourful World यानी मानव नेत्र तथा रंगबिरंगा संसार — यह अध्याय पिछले अध्याय में सीखे गए प्रकाश के परावर्तन व अपवर्तन को सीधे हमारी आँख से जोड़ता है, इसलिए यह समझने में भी आसान है और परीक्षा में अंक दिलाने में भी।

ज़रा सोचिए — हम दुनिया को देखते कैसे हैं? किताब के अक्षर आँख तक पहुँचते कैसे हैं? कुछ बच्चों को आगे की बेंच से भी ब्लैकबोर्ड धुंधला क्यों दिखता है और चश्मा लगाते ही सब साफ़ क्यों हो जाता है? आसमान नीला क्यों है, तारे टिमटिमाते क्यों हैं, बारिश के बाद सात रंगों वाला इंद्रधनुष क्यों बनता है और खतरे के संकेत लाल ही क्यों होते हैं? इन सब रोज़ के सवालों के जवाब इसी एक अध्याय में छिपे हैं।

इस अध्याय में हम पहले मानव नेत्र की बनावट को एक-एक भाग करके समझेंगे, फिर समंजन क्षमता, निकट बिंदु व दूर बिंदु जानेंगे। इसके बाद तीनों दृष्टि दोष — निकट दृष्टि दोष, दूर दृष्टि दोष व जरादृष्टि दोष — उनके कारणों व लेंस से सुधार के साथ पढ़ेंगे। अंत में प्रिज़्म से अपवर्तन व विक्षेपण, वायुमंडलीय अपवर्तन और प्रकाश के प्रकीर्णन जैसी सुंदर घटनाएँ समझेंगे, जिनसे आसमान के रंगों का रहस्य खुलता है।

Bihar Board (BSEB) Class 10 की परीक्षा में इस अध्याय से हर साल प्रश्न आते हैं — दृष्टि दोषों की पहचान व सुधार पर वस्तुनिष्ठ (MCQ) प्रश्न, लेंस की क्षमता (power) पर आधारित छोटे numerical, तारे टिमटिमाने व सूर्योदय पर सूर्य के लाल दिखने जैसे कारण-बताओ प्रश्न और नेत्र की संरचना पर लघु व दीर्घ उत्तरीय प्रश्न। अच्छी बात यह है कि इस अध्याय के numerical केवल एक ही सूत्र पर टिके हैं — P = 1/f — इसलिए थोड़ी-सी समझ से पूरे अंक लाए जा सकते हैं।

📌 खास बात: इस अध्याय को रटने की गलती कभी न करें। नेत्र को एक कैमरे की तरह कल्पना कीजिए — लेंस, पर्दा (रेटिना) और फोकस बदलने की व्यवस्था। हर दोष बस इतना बताता है कि प्रतिबिंब रेटिना पर बना, उससे आगे बना या उससे पीछे रह गया। बस यही एक बात समझ आ गई तो पूरा अध्याय आपके लिए खेल बन जाएगा।

📋 अध्याय की जानकारी (Chapter Information)

Board Bihar Board (BSEB)
Textbook NCERT
Class 10
Subject Science (विज्ञान)
Chapter 11
Chapter Name The Human Eye and the Colourful World (मानव नेत्र तथा रंगबिरंगा संसार)
कुल हल किए गए प्रश्न 17 (InText 4 + प्रश्नावली 13)

📚 इस Chapter में क्या-क्या है? (Topics)

  1. 11.1 मानव नेत्र (The Human Eye) – नेत्र की संरचना, प्रत्येक भाग का कार्य व देखने की प्रक्रिया
    • कॉर्निया, परितारिका (आइरिस) व पुतली
    • अभिनेत्र लेंस, पक्ष्माभी पेशियाँ व निलंबन स्नायु
    • दृष्टिपटल (रेटिना), शलाका व शंकु कोशिकाएँ, अंध बिंदु व दृक तंत्रिका
    • जलीय द्रव व काचाभ द्रव
  2. 11.2 समंजन क्षमता, निकट बिंदु व दूर बिंदु – लेंस की फोकस दूरी कैसे बदलती है; सुस्पष्ट दर्शन की अल्पतम दूरी (25 cm)
  3. 11.3 दृष्टि दोष तथा उनका संशोधन
    • निकट दृष्टि दोष (मायोपिया) – अवतल लेंस से सुधार
    • दूर दृष्टि दोष (हाइपरमेट्रोपिया) – उत्तल लेंस से सुधार
    • जरादृष्टि दोष (प्रेसबायोपिया) – द्विफोकसी (बाइफोकल) लेंस से सुधार
    • मोतियाबिंद व नेत्र दान (संक्षेप में)
  4. 11.4 प्रिज़्म से प्रकाश का अपवर्तन व विक्षेपण – विचलन कोण, वर्णक्रम (स्पेक्ट्रम), VIBGYOR, न्यूटन का प्रयोग व इंद्रधनुष
  5. 11.5 वायुमंडलीय अपवर्तन – तारों का टिमटिमाना, ग्रह क्यों नहीं टिमटिमाते, अग्रिम सूर्योदय व विलंबित सूर्यास्त
  6. 11.6 प्रकाश का प्रकीर्णन – टिंडल प्रभाव, आकाश का नीला रंग, खतरे के संकेतों का लाल रंग व सूर्योदय-सूर्यास्त पर सूर्य का रक्ताभ दिखना
  7. पाठ्य-पुस्तक के प्रश्न (InText) – 4 प्रश्न, लेंस-शक्ति के हल किए गए उदाहरण, प्रश्नावली के 13 प्रश्न
  8. Case Study, Quick Revision, Common Mistakes, Bihar Board Exam Tips, MCQ Quiz व FAQ

📊 Key Concepts – मुख्य परिभाषाएँ व नियम

पद / नियम अर्थ (एक लाइन में)
मानव नेत्र एक प्राकृतिक प्रकाशिक यंत्र (कैमरे जैसा) जो वस्तुओं का वास्तविक, उल्टा व छोटा प्रतिबिंब दृष्टिपटल (रेटिना) पर बनाता है।
कॉर्निया (स्वच्छ मंडल) नेत्र के सामने की पारदर्शी उभरी हुई झिल्ली; नेत्र में प्रवेश करने वाले प्रकाश का अधिकांश अपवर्तन यहीं होता है।
परितारिका (आइरिस) कॉर्निया के पीछे की गहरे रंग की पेशीय झिल्ली जो पुतली के आकार को नियंत्रित करती है; आँख का रंग यही तय करती है।
पुतली (Pupil) परितारिका के बीच का काला छिद्र, जिससे होकर प्रकाश नेत्र के अंदर जाता है; तेज़ रोशनी में सिकुड़ती है, अंधेरे में फैलती है।
अभिनेत्र लेंस रेशेदार, जेली-जैसे पदार्थ से बना पारदर्शी उत्तल लेंस, जो रेटिना पर स्पष्ट प्रतिबिंब बनाने के लिए फोकस दूरी बदलता है।
पक्ष्माभी पेशियाँ (सिलियरी पेशियाँ) लेंस को पकड़े रहने वाली पेशियाँ, जो सिकुड़कर या ढीली होकर लेंस की मोटाई व फोकस दूरी बदलती हैं।
दृष्टिपटल (रेटिना) नेत्र के पीछे की नाज़ुक झिल्ली, जिस पर प्रतिबिंब बनता है; इसमें प्रकाश-संवेदी शलाका (rod) व शंकु (cone) कोशिकाएँ होती हैं।
अंध बिंदु (Blind Spot) रेटिना का वह स्थान जहाँ से दृक तंत्रिका बाहर निकलती है; वहाँ कोई संवेदी कोशिका नहीं होती, इसलिए वहाँ बना प्रतिबिंब दिखाई नहीं देता।
समंजन क्षमता (Accommodation) नेत्र लेंस की वह क्षमता जिससे वह अपनी फोकस दूरी बदलकर निकट व दूर — दोनों की वस्तुओं को रेटिना पर फोकस कर लेता है।
निकट बिंदु (Near Point) वह निकटतम बिंदु जिसे नेत्र बिना तनाव के स्पष्ट देख सके; सामान्य नेत्र के लिए नेत्र से 25 cm दूर होता है।
दूर बिंदु (Far Point) वह दूरतम बिंदु जिसे नेत्र स्पष्ट देख सके; सामान्य नेत्र के लिए अनंत पर होता है।
निकट दृष्टि दोष (मायोपिया) दूर की वस्तुएँ धुंधली दिखती हैं; प्रतिबिंब रेटिना से पहले बन जाता है — सुधार अवतल (अपसारी) लेंस से होता है।
दूर दृष्टि दोष (हाइपरमेट्रोपिया) निकट की वस्तुएँ धुंधली दिखती हैं; प्रतिबिंब रेटिना के पीछे बनता है — सुधार उत्तल (अभिसारी) लेंस से होता है।
जरादृष्टि दोष (प्रेसबायोपिया) उम्र बढ़ने पर समंजन क्षमता घटने से निकट की वस्तुएँ (और कभी-कभी दूर की भी) साफ़ नहीं दिखतीं — सुधार द्विफोकसी लेंस से होता है।
विचलन कोण प्रिज़्म से निकलने वाली किरण, आपतित किरण की मूल दिशा से जितने कोण से मुड़ जाती है, वही विचलन कोण है।
विक्षेपण (Dispersion) श्वेत प्रकाश का प्रिज़्म से गुज़रकर अपने सात घटक रंगों में बँट जाना।
वर्णक्रम (Spectrum) विक्षेपण से बनी सात रंगों की पट्टी — बैंगनी, जामुनी, नीला, हरा, पीला, नारंगी, लाल (VIBGYOR)।
टिंडल प्रभाव कोलॉइडी कणों द्वारा प्रकाश के प्रकीर्णन से प्रकाश के मार्ग का दिखाई देने लगना।
प्रकीर्णन (Scattering) प्रकाश का वायु के अणुओं व सूक्ष्म कणों से टकराकर सभी दिशाओं में फैल जाना; नीले प्रकाश का प्रकीर्णन सबसे अधिक होता है।

सबसे काम की बात: इस अध्याय के सारे numerical एक ही सूत्र से बनते हैं — P = 1/f (f मीटर में)। उत्तल लेंस की क्षमता धनात्मक (+) और अवतल लेंस की क्षमता ऋणात्मक (−) होती है। चिह्न सही रख लिया, तो आधा प्रश्न वहीं सही हो गया!

मानव नेत्र – प्रकृति का बनाया हुआ कैमरा

हमारी आँख सचमुच एक जीता-जागता कैमरा है। कैमरे में लेंस होता है, हमारी आँख में भी लेंस है। कैमरे में परदा (स्क्रीन) होता है, आँख में रेटिना है। फ़र्क़ बस इतना है कि कैमरे का फोकस हमें हाथ से घुमाकर ठीक करना पड़ता है, जबकि आँख यह काम अपने आप, पलक झपकते ही कर लेती है — कभी किताब के अक्षरों पर, तो कभी दूर पहाड़ पर।

नेत्र एक लगभग गोलाकार गेंद जैसी रचना है, जिसका व्यास लगभग 2.3 cm होता है। इसका अगला भाग थोड़ा बाहर की ओर उभरा होता है। बाहर से हमें आँख का केवल अगला हिस्सा ही दिखता है — बाकी संरचना नेत्र-कोटर (आँख के गड्ढे) के अंदर सुरक्षित रहती है। चलिए, बाहर से अंदर की ओर चलते हुए हर भाग को एक-एक कदम करके समझते हैं। कल्पना कीजिए कि प्रकाश की एक किरण किसी किताब से चलकर हमारी आँख तक आ रही है — वह रास्ते में किन-किन भागों से गुज़रेगी, वही हमारा क्रम है।

चरण-दर-चरण: नेत्र की संरचना (शब्दों में चित्र)

चरण 1 – श्वेत पटल (स्क्लेरा): सबसे बाहर एक मज़बूत, सफ़ेद रंग की अपारदर्शी परत होती है, जिसे श्वेत पटल कहते हैं। यही आँख का “सफ़ेद भाग” है जो हमें बाहर से दिखता है। यह नेत्र-गोलक को आकार देती है और अंदर की नाज़ुक रचनाओं की रक्षा करती है।

चरण 2 – कॉर्निया (स्वच्छ मंडल): सामने की ओर श्वेत पटल का एक भाग पारदर्शी होकर बाहर की ओर उभर आता है — यही कॉर्निया है। यह बिल्कुल साफ़ काँच की तरह होता है। प्रकाश सबसे पहले कॉर्निया से ही नेत्र में प्रवेश करता है, और एक बहुत महत्वपूर्ण बात — नेत्र में होने वाले प्रकाश के अपवर्तन का सबसे बड़ा हिस्सा कॉर्निया पर ही होता है, क्योंकि यहीं वायु और नेत्र के माध्यम के घनत्व में सबसे अधिक अंतर होता है।

चरण 3 – जलीय द्रव (ऐक्वस ह्यूमर): कॉर्निया के ठीक पीछे एक साफ़, पानी-जैसा द्रव भरा होता है, जिसे जलीय द्रव कहते हैं। प्रकाश कॉर्निया के बाद इसी द्रव से गुज़रता है। यह द्रव नेत्र के अगले भाग को पोषण देता है और उसका आकार बनाए रखता है।

चरण 4 – परितारिका या आइरिस (Iris): जलीय द्रव के पीछे एक गहरे रंग की, पेशियों से बनी झिल्ली होती है — परितारिका। किसी की आँखें काली, किसी की भूरी और किसी की नीली क्यों होती हैं? यही परितारिका का रंग तय करता है। इसका असली काम कैमरे के छिद्र (aperture) जैसा है — यह आगे आने वाली पुतली का आकार घटाती-बढ़ाती है, जिससे नेत्र में जाने वाले प्रकाश की मात्रा नियंत्रित रहती है।

चरण 5 – पुतली (Pupil): परितारिका के ठीक बीच में एक छोटा-सा काला छिद्र होता है — यही पुतली है। असल में यह कोई “चीज़” नहीं, बस एक छेद है, इसलिए यह काला दिखाई देता है। तेज़ धूप में पुतली सिकुड़कर छोटी हो जाती है ताकि आँख के अंदर कम प्रकाश जाए, और अंधेरे कमरे में यह फैलकर बड़ी हो जाती है ताकि अधिक-से-अधिक प्रकाश अंदर आ सके। सिनेमा हॉल में घुसते ही कुछ देर कुछ न दिखना और फिर धीरे-धीरे दिखने लगना — यही पुतली का फैलना है!

चरण 6 – अभिनेत्र लेंस (Eye Lens): पुतली के ठीक पीछे पारदर्शी, रेशेदार और जेली-जैसे पदार्थ से बना एक उत्तल लेंस होता है। यह साधारण काँच के लेंस से अलग है, क्योंकि इसकी मोटाई बदल सकती है। यही लेंस प्रकाश की किरणों को मोड़कर (अपवर्तित करके) पीछे रेटिना पर केंद्रित करता है।

चरण 7 – पक्ष्माभी पेशियाँ व निलंबन स्नायु: अभिनेत्र लेंस को चारों ओर से निलंबन स्नायु (suspensory ligaments) नामक रेशे थामे रहते हैं, और ये रेशे पक्ष्माभी पेशियों (ciliary muscles) से जुड़े होते हैं। ये छोटी-सी पेशियाँ ही नेत्र की असली “फोकस-कारीगर” हैं — ये सिकुड़ती या ढीली होती हैं, तो लेंस मोटा या पतला हो जाता है और उसकी फोकस दूरी बदल जाती है। इसी क्रिया को आगे हम समंजन कहेंगे।

चरण 8 – काचाभ द्रव (विट्रियस ह्यूमर): लेंस के पीछे, नेत्र-गोलक का सबसे बड़ा भाग एक पारदर्शी, जेली-जैसे गाढ़े द्रव से भरा होता है — काचाभ द्रव। यह नेत्र-गोलक को गोल आकार व दृढ़ता देता है और लेंस से आती किरणों को रेटिना तक पहुँचने का साफ़ रास्ता देता है।

चरण 9 – रेटिना या दृष्टिपटल (Retina): नेत्र-गोलक की सबसे भीतरी, अत्यंत नाज़ुक झिल्ली ही रेटिना है — कैमरे की फ़िल्म या स्क्रीन समझिए। इसी पर वस्तु का वास्तविक, उल्टा व छोटा प्रतिबिंब बनता है। रेटिना में लाखों प्रकाश-संवेदी कोशिकाएँ होती हैं, जो प्रकाश पड़ते ही सक्रिय होकर विद्युत संकेत बना देती हैं।

चरण 10 – दृक तंत्रिका (Optic Nerve) व अंध बिंदु: रेटिना की कोशिकाओं से बने विद्युत संकेत दृक तंत्रिका द्वारा मस्तिष्क तक पहुँचते हैं। मस्तिष्क इन संकेतों की व्याख्या करता है और हमें वस्तु सीधी व स्पष्ट दिखाई देती है — ध्यान दीजिए, रेटिना पर प्रतिबिंब उल्टा बनता है, परंतु मस्तिष्क उसे सीधा “दिखाता” है! जिस स्थान से दृक तंत्रिका रेटिना को छोड़कर बाहर निकलती है, वहाँ कोई संवेदी कोशिका नहीं होती — उस स्थान को अंध बिंदु (blind spot) कहते हैं। वहाँ पड़ने वाला प्रतिबिंब हमें दिखाई नहीं देता। रेटिना के केंद्र के पास एक पीला-सा स्थान (पीत बिंदु / macula) भी होता है, जहाँ सबसे तीक्ष्ण दृष्टि बनती है — पढ़ते समय अक्षर ठीक यहीं फोकस होते हैं।

रेटिना की दो कोशिकाएँ – शलाका (Rods) व शंकु (Cones)

रेटिना की प्रकाश-संवेदी कोशिकाएँ दो प्रकार की होती हैं और इनका काम बँटा हुआ है। शलाका कोशिकाएँ (rods) प्रकाश की तीव्रता के प्रति संवेदनशील होती हैं — ये मंद रोशनी में काम करती हैं, इसलिए अंधेरे में हमें आकार तो दिखता है पर रंग धुंधले लगते हैं। शंकु कोशिकाएँ (cones) रंगों के प्रति संवेदनशील होती हैं — ये तेज़ प्रकाश में सक्रिय होती हैं और इन्हीं की वजह से हम लाल गुलाब, हरी घास और नीला आसमान अलग-अलग पहचान पाते हैं।

एक रोचक बात — मुर्गे-मुर्गियों की आँखों में शलाका कोशिकाएँ बहुत कम होती हैं, इसलिए वे भोर होते ही जाग जाते हैं और शाम ढलते ही उन्हें लगभग दिखना बंद हो जाता है। प्रकृति ने हर प्राणी की आँख उसकी ज़रूरत के हिसाब से बनाई है!

नेत्र के प्रत्येक भाग का कार्य – एक नज़र में

नेत्र का भाग कार्य
श्वेत पटल (स्क्लेरा) नेत्र-गोलक को आकार व सुरक्षा देना; आँख का सफ़ेद बाहरी आवरण।
कॉर्निया प्रकाश को नेत्र में प्रवेश देना और उसका अधिकांश अपवर्तन करना।
जलीय द्रव कॉर्निया व लेंस के बीच भरा द्रव; प्रकाश का मार्ग देना व अगले भाग का पोषण करना।
परितारिका (आइरिस) पुतली का आकार नियंत्रित करना — अर्थात नेत्र में जाने वाले प्रकाश की मात्रा तय करना; आँख का रंग देना।
पुतली वह छिद्र जिससे प्रकाश नेत्र के अंदर प्रवेश करता है; तेज़ प्रकाश में छोटी, अंधेरे में बड़ी हो जाती है।
अभिनेत्र लेंस किरणों को अपवर्तित करके रेटिना पर वास्तविक, उल्टा व छोटा प्रतिबिंब बनाना; फोकस दूरी बदलना।
पक्ष्माभी पेशियाँ लेंस की मोटाई बदलकर उसकी फोकस दूरी को समायोजित करना (समंजन क्रिया)।
काचाभ द्रव नेत्र-गोलक का आकार बनाए रखना और प्रकाश को रेटिना तक साफ़ मार्ग देना।
दृष्टिपटल (रेटिना) प्रतिबिंब बनना और प्रकाश-संवेदी कोशिकाओं द्वारा प्रकाश को विद्युत संकेतों में बदलना।
शलाका कोशिकाएँ प्रकाश की तीव्रता (मंद प्रकाश में देखना) के प्रति संवेदनशील।
शंकु कोशिकाएँ रंगों की पहचान के प्रति संवेदनशील।
दृक तंत्रिका रेटिना से बने विद्युत संकेतों को मस्तिष्क तक पहुँचाना।
अंध बिंदु रेटिना का वह स्थान जहाँ संवेदी कोशिकाएँ नहीं होतीं; वहाँ का प्रतिबिंब दिखाई नहीं देता।

📌 याद रखें: प्रतिबिंब रेटिना पर बनता है, कॉर्निया या पुतली पर नहीं — Board का यह MCQ हर साल घूम-फिरकर आता है। और फोकस दूरी बदलने का काम पक्ष्माभी पेशियाँ करती हैं, परितारिका नहीं — परितारिका केवल पुतली का आकार बदलती है। इन दो जोड़ियों को अलग-अलग याद कर लीजिए।

एक साँस में समझें — कॉर्निया प्रकाश को अंदर लेता है और अधिकांश अपवर्तन करता है, पुतली उसकी मात्रा तय करती है, लेंस उसे रेटिना पर फोकस करता है, रेटिना उसे संकेत बनाती है और दृक तंत्रिका उसे मस्तिष्क तक पहुँचाती है।

समंजन क्षमता – आँख का अपना ऑटो-फोकस

अब एक गहरी बात समझिए। कैमरे में दूर की चीज़ का फोटो लेने के लिए हमें लेंस को आगे-पीछे खिसकाना पड़ता है, क्योंकि स्क्रीन तो एक ही जगह टिकी होती है। हमारी आँख में भी रेटिना अपनी जगह पर स्थिर है — लेंस और रेटिना के बीच की दूरी कभी नहीं बदलती। तो फिर जब हम दूर का पहाड़ देखने के तुरंत बाद अपनी किताब पढ़ने लगते हैं, तो दोनों ही स्पष्ट कैसे दिख जाते हैं?

रहस्य है — आँख लेंस को खिसकाती नहीं, उसकी फोकस दूरी बदल देती है। नेत्र लेंस रेशेदार, लचीले पदार्थ का बना है, इसलिए उसका आकार बदल सकता है। इसी क्षमता को समंजन क्षमता (power of accommodation) कहते हैं — अभिनेत्र लेंस की वह क्षमता, जिससे वह अपनी फोकस दूरी को समायोजित करके विभिन्न दूरियों की वस्तुओं का प्रतिबिंब रेटिना पर ही बना लेता है।

समंजन कैसे काम करता है? – दो स्थितियाँ

स्थिति 1 – दूर की वस्तु देखना: दूर की वस्तु से किरणें लगभग समांतर आती हैं। ऐसी किरणों को रेटिना पर फोकस करने के लिए अधिक फोकस दूरी वाले पतले लेंस की ज़रूरत होती है। इसलिए पक्ष्माभी पेशियाँ शिथिल (ढीली) हो जाती हैं, निलंबन स्नायु खिंचकर लेंस को पतला कर देते हैं, लेंस की वक्रता घट जाती है और उसकी फोकस दूरी बढ़ जाती है। प्रतिबिंब ठीक रेटिना पर बन जाता है।

स्थिति 2 – निकट की वस्तु देखना: पास की वस्तु से किरणें फैलती हुई (अपसारी) आती हैं। इन्हें रेटिना तक पहुँचने से पहले अधिक मोड़ना पड़ता है, इसलिए कम फोकस दूरी वाले मोटे लेंस की ज़रूरत होती है। अब पक्ष्माभी पेशियाँ सिकुड़ती हैं, स्नायु ढीले पड़ते हैं, लेंस अपने लचीलेपन से मोटा हो जाता है, उसकी वक्रता बढ़ जाती है और फोकस दूरी घट जाती है। प्रतिबिंब फिर भी ठीक रेटिना पर ही बनता है।

सूत्र जैसी बात: दूर देखना → पेशियाँ शिथिल → लेंस पतला → फोकस दूरी अधिक। निकट देखना → पेशियाँ सिकुड़ीं → लेंस मोटा → फोकस दूरी कम।

यही कारण है कि लंबे समय तक लगातार पास की किताब या मोबाइल देखने से आँखों में थकान व दर्द होने लगता है — पक्ष्माभी पेशियाँ लगातार सिकुड़ी हुई अवस्था में मेहनत करती रहती हैं। बीच-बीच में दूर देखने से उन्हें आराम मिलता है। डॉक्टरों की “थोड़ी देर दूर देखो” वाली सलाह के पीछे यही विज्ञान है!

निकट बिंदु, दूर बिंदु व दृष्टि परिसर

निकट बिंदु (Near Point): वह न्यूनतम दूरी, जहाँ रखी वस्तु को नेत्र बिना अधिक तनाव के, समंजन का पूरा उपयोग करके, स्पष्ट देख सके — नेत्र का निकट बिंदु कहलाती है। एक स्वस्थ युवा वयस्क के लिए यह दूरी नेत्र से 25 cm होती है। इसी दूरी को सुस्पष्ट दर्शन की अल्पतम दूरी (least distance of distinct vision) भी कहते हैं। यदि किताब को 25 cm से भी अधिक पास ले आएँ, तो पेशियाँ लेंस को और मोटा नहीं कर पातीं, प्रतिबिंब रेटिना के पीछे बनने लगता है और अक्षर धुंधले दिखने लगते हैं — आप स्वयं प्रयोग करके देख सकते हैं!

दूर बिंदु (Far Point): वह अधिकतम दूरी, जहाँ तक की वस्तु नेत्र स्पष्ट देख सके — नेत्र का दूर बिंदु कहलाती है। सामान्य नेत्र के लिए दूर बिंदु अनंत पर होता है, अर्थात सामान्य आँख तारों जैसी अत्यंत दूर की वस्तुओं को भी स्पष्ट देख सकती है।

दृष्टि परिसर (Range of Vision): निकट बिंदु (25 cm) से दूर बिंदु (अनंत) के बीच की दूरी ही नेत्र का दृष्टि परिसर है। इस पूरे परिसर में रखी हर वस्तु को स्वस्थ नेत्र समंजन द्वारा स्पष्ट देख सकता है। ध्यान देने योग्य बात — छोटे बच्चों का निकट बिंदु लगभग 7–8 cm तक भी हो सकता है, जबकि उम्र बढ़ने पर यह दूरी बढ़ती जाती है; इसीलिए बुज़ुर्ग लोग अख़बार को दूर रखकर पढ़ते नज़र आते हैं। यह बात हमें आगे जरादृष्टि दोष तक ले जाएगी।

📌 ध्यान दें: वस्तु की दूरी बदलने पर भी प्रतिबिंब-दूरी (लेंस से रेटिना की दूरी) कभी नहीं बदलती — बदलती है केवल लेंस की फोकस दूरी। यही समंजन की आत्मा है और प्रश्नावली में सीधे पूछा भी जाता है।

एक साँस में समझें — समंजन यानी लेंस का स्वतः मोटा-पतला होकर फोकस दूरी बदलना; सामान्य नेत्र का निकट बिंदु 25 cm और दूर बिंदु अनंत होता है।

दृष्टि दोष – जब प्रतिबिंब रेटिना पर न बने

कभी-कभी नेत्र धीरे-धीरे अपनी समंजन क्षमता खोने लगता है या नेत्र-गोलक का आकार बदल जाता है। ऐसी स्थिति में प्रतिबिंब ठीक रेटिना पर नहीं बनता और वस्तुएँ धुंधली दिखने लगती हैं — यही दृष्टि दोष है। NCERT के अनुसार मुख्य दोष तीन हैं — निकट दृष्टि दोष, दूर दृष्टि दोष और जरादृष्टि दोष। हर दोष को हम एक ही क्रम से समझेंगे — लक्षण क्या है, कारण क्या है, किरणें कहाँ बनाती हैं प्रतिबिंब, और सुधार किस लेंस से होगा। यह क्रम याद कर लिया तो किरण-आरेख वाले प्रश्न अपने आप बन जाएँगे। आरेख की जगह हम किरणों का रास्ता शब्दों में इतना साफ़ बताएँगे कि आप कॉपी पर चित्र स्वयं बना सकेंगे।

1. निकट दृष्टि दोष (मायोपिया – Nearsightedness / Myopia)

लक्षण: इस दोष वाला व्यक्ति निकट की वस्तुएँ तो स्पष्ट देख सकता है, परंतु दूर की वस्तुएँ स्पष्ट नहीं देख पाता। कक्षा में पीछे बैठा विद्यार्थी ब्लैकबोर्ड नहीं पढ़ पाता, सड़क के दूर के बोर्ड धुंधले दिखते हैं — यही मायोपिया की पहचान है। ऐसे व्यक्ति का दूर बिंदु अनंत पर न होकर नेत्र के सामने किसी सीमित दूरी पर आ जाता है — जैसे 1.2 m, 2 m या 5 m पर। उस दूरी के भीतर की वस्तुएँ साफ़ दिखती हैं, उससे आगे की नहीं।

कारण (कोई एक या दोनों):

  • (i) अभिनेत्र लेंस की वक्रता का अत्यधिक बढ़ जाना — लेंस अधिक मोटा हो जाता है, जिससे उसकी फोकस दूरी घट जाती है और वह किरणों को आवश्यकता से अधिक मोड़ देता है।
  • (ii) नेत्र-गोलक का लंबा हो जाना — अर्थात लेंस और रेटिना के बीच की दूरी बढ़ जाना, जिससे किरणों के मिलने का स्थान रेटिना से पहले ही पड़ जाता है।

किरणों की कहानी (शब्दों में आरेख): दूर की वस्तु से आती समांतर किरणें नेत्र लेंस से अपवर्तित होकर रेटिना तक पहुँचने से पहले ही, रेटिना के सामने (नेत्र के अंदर के भाग में) मिल जाती हैं और फिर फैलने लगती हैं। परिणाम — रेटिना पर स्पष्ट बिंदु-प्रतिबिंब के बजाय एक धुंधला फैला हुआ धब्बा बनता है। इसलिए दूर की वस्तु धुंधली दिखती है। निकट की वस्तु से आती फैली हुई किरणें देर से मिलती हैं, ठीक रेटिना पर — इसलिए पास का सब साफ़ दिखता है।

संशोधन: इस दोष को उचित क्षमता के अवतल लेंस (अपसारी लेंस) के चश्मे से दूर किया जाता है। अवतल लेंस दूर से आती समांतर किरणों को नेत्र में घुसने से पहले थोड़ा फैला (अपसरित कर) देता है, मानो वे किरणें उस व्यक्ति के दूर बिंदु से आ रही हों। अब नेत्र लेंस उन्हें ठीक रेटिना पर फोकस कर देता है और दूर की वस्तु स्पष्ट दिखने लगती है। अवतल लेंस की क्षमता ऋणात्मक होती है — इसीलिए आपने चश्मे के पर्चे पर “−1.25 D” जैसा नंबर देखा होगा; ऋणात्मक चिह्न देखकर ही समझ जाइए कि व्यक्ति को मायोपिया है!

याद रखने की तरकीब: मायोपिया में प्रतिबिंब आगे बनता है, इसलिए किरणों को फैलाने वाला अवतल लेंस चाहिए। “मायोपिया – माइनस (ऋणात्मक) लेंस” — दोनों ‘म’ से शुरू होते हैं!

2. दूर दृष्टि दोष (हाइपरमेट्रोपिया – Farsightedness / Hypermetropia)

लक्षण: इस दोष वाला व्यक्ति दूर की वस्तुएँ तो स्पष्ट देख सकता है, परंतु निकट की वस्तुएँ स्पष्ट नहीं देख पाता। किताब पढ़ने में अक्षर धुंधले लगते हैं, सुई में धागा डालना कठिन हो जाता है। ऐसे व्यक्ति का निकट बिंदु 25 cm से अधिक दूरी पर खिसक जाता है — जैसे 50 cm या 1 m पर। उसे किताब को सामान्य से दूर रखकर पढ़ना पड़ता है।

कारण (कोई एक या दोनों):

  • (i) अभिनेत्र लेंस की फोकस दूरी का अधिक बढ़ जाना — लेंस आवश्यकता से अधिक पतला रह जाता है, वक्रता घट जाती है, इसलिए वह किरणों को पर्याप्त मोड़ नहीं पाता।
  • (ii) नेत्र-गोलक का छोटा हो जाना — अर्थात लेंस और रेटिना के बीच की दूरी कम हो जाना, जिससे किरणों को मिलने के लिए रेटिना से आगे की जगह चाहिए होती है जो मौजूद ही नहीं।

किरणों की कहानी (शब्दों में आरेख): निकट बिंदु (25 cm) पर रखी वस्तु से आती किरणें नेत्र लेंस से अपवर्तित होकर रेटिना पर मिलने के बजाय रेटिना के पीछे किसी काल्पनिक बिंदु पर मिलने की ओर बढ़ती हैं। रेटिना बीच में ही आ जाती है, जहाँ किरणें अभी मिली ही नहीं होतीं — परिणाम फिर वही धुंधला प्रतिबिंब। दूर की वस्तु की समांतर किरणें कम मोड़ माँगती हैं, इसलिए वे रेटिना पर मिल जाती हैं और दूर का दृश्य साफ़ रहता है।

संशोधन: इस दोष को उचित क्षमता के उत्तल लेंस (अभिसारी लेंस) के चश्मे से दूर किया जाता है। उत्तल लेंस निकट की वस्तु से आती किरणों को नेत्र में घुसने से पहले थोड़ा अभिसरित (इकट्ठा) कर देता है, जिससे नेत्र लेंस को कम अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ती है और किरणें ठीक रेटिना पर मिल जाती हैं। दूसरे शब्दों में — उत्तल लेंस 25 cm पर रखी वस्तु का आभासी प्रतिबिंब उस व्यक्ति के निकट बिंदु पर बना देता है, जहाँ से नेत्र उसे आराम से देख सकता है। उत्तल लेंस की क्षमता धनात्मक होती है — पर्चे पर “+3.00 D” दिखे तो समझिए हाइपरमेट्रोपिया का चश्मा है।

याद रखने की तरकीब: हाइपरमेट्रोपिया में प्रतिबिंब पीछे रह जाता है, इसलिए किरणों को इकट्ठा करने वाला उत्तल लेंस चाहिए। “दूर दृष्टि दोष – धनात्मक (प्लस) लेंस”।

3. जरादृष्टि दोष या जरा-दूरदृष्टिता (प्रेसबायोपिया – Presbyopia)

लक्षण: उम्र बढ़ने के साथ-साथ पक्ष्माभी पेशियाँ दुर्बल पड़ जाती हैं और अभिनेत्र लेंस का लचीलापन धीरे-धीरे घटता जाता है। परिणाम यह होता है कि नेत्र की समंजन क्षमता कम हो जाती है — व्यक्ति को निकट की वस्तुएँ बिना तनाव के स्पष्ट नहीं दिखतीं, निकट बिंदु लगातार दूर खिसकता जाता है। अख़बार को हाथ दूर करके पढ़ते बुज़ुर्ग इसी दोष के उदाहरण हैं। यह कोई बीमारी नहीं, उम्र का स्वाभाविक असर है — प्रायः 40–45 वर्ष की आयु के बाद यह शुरू होता है।

खास स्थिति: कभी-कभी एक ही व्यक्ति में निकट दृष्टि दोष और दूर दृष्टि दोष दोनों एक साथ हो जाते हैं — उसे दूर देखने के लिए अवतल लेंस चाहिए और पास पढ़ने के लिए उत्तल लेंस।

संशोधन: ऐसे व्यक्तियों के लिए द्विफोकसी लेंस (bifocal lens) वाले चश्मे बनाए जाते हैं। द्विफोकसी लेंस के ऊपरी भाग में अवतल लेंस होता है, जो दूर की वस्तुएँ देखने में काम आता है, और निचले भाग में उत्तल लेंस होता है, जो पढ़ने-लिखने जैसे निकट के कामों में सहायक होता है। बुज़ुर्गों के चश्मे में दिखने वाली वह हल्की-सी “लाइन” या अर्धचंद्राकार भाग — वही दो लेंसों की सीमा है। आजकल बिना लाइन वाले प्रोग्रेसिव लेंस भी मिलने लगे हैं, जिनमें क्षमता धीरे-धीरे बदलती है।

तीनों दृष्टि दोषों की तुलना – Board की पसंदीदा Table

बात निकट दृष्टि दोष (मायोपिया) दूर दृष्टि दोष (हाइपरमेट्रोपिया) जरादृष्टि दोष (प्रेसबायोपिया)
क्या साफ़ दिखता है? केवल निकट की वस्तुएँ केवल दूर की वस्तुएँ निकट की वस्तुएँ कठिनाई से (उम्र के साथ)
क्या धुंधला दिखता है? दूर की वस्तुएँ निकट की वस्तुएँ विशेषकर निकट की वस्तुएँ
प्रतिबिंब कहाँ बनता है? रेटिना के सामने (आगे) रेटिना के पीछे पर्याप्त फोकस ही नहीं हो पाता
मुख्य कारण लेंस की वक्रता अधिक या नेत्र-गोलक लंबा लेंस की फोकस दूरी अधिक या नेत्र-गोलक छोटा पक्ष्माभी पेशियों का दुर्बल होना व लेंस का लचीलापन घटना
कौन-सा बिंदु खिसकता है? दूर बिंदु अनंत से पास आ जाता है निकट बिंदु 25 cm से दूर चला जाता है निकट बिंदु दूर खिसकता जाता है
संशोधक लेंस अवतल लेंस (ऋणात्मक क्षमता) उत्तल लेंस (धनात्मक क्षमता) द्विफोकसी लेंस (ऊपर अवतल, नीचे उत्तल)

मोतियाबिंद (Cataract) – एक अन्य समस्या: कभी-कभी अधिक आयु के व्यक्तियों के नेत्र लेंस पर एक दूधिया व अपारदर्शी परत जम जाती है, जिसे मोतियाबिंद कहते हैं। इससे दृष्टि धीरे-धीरे धुंधली होती जाती है और कभी-कभी पूर्णतः चली भी जाती है। ध्यान दें — यह लेंस-संशोधन से ठीक होने वाला अपवर्तन दोष नहीं है; इसका उपचार शल्य क्रिया (operation) द्वारा अपारदर्शी लेंस हटाकर कृत्रिम लेंस लगाकर किया जाता है।

नेत्र दान – मृत्यु के बाद भी किसी की रोशनी

इस अध्याय का सबसे मानवीय भाग यही है। हमारे देश में लगभग 3.5 करोड़ लोग दृष्टिहीनता से प्रभावित हैं, जिनमें से बहुतों की दृष्टि कॉर्निया की क्षति के कारण गई है — और क्षतिग्रस्त कॉर्निया को दान में मिली स्वस्थ कॉर्निया से बदलकर उनकी दृष्टि लौटाई जा सकती है। कोई भी व्यक्ति — चाहे वह चश्मा पहनता हो, चाहे उसे मोतियाबिंद की शल्य क्रिया हुई हो, चाहे उसे मधुमेह या उच्च रक्तचाप ही क्यों न हो — नेत्र दान कर सकता है। केवल एड्स, हेपेटाइटिस, रेबीज़, ल्यूकीमिया, टेटनस, हैज़ा, मेनिनजाइटिस या एनसेफ़ेलाइटिस जैसी कुछ बीमारियों से ग्रस्त व्यक्ति नेत्र दान नहीं कर सकते।

कुछ ज़रूरी बातें याद रखिए — नेत्र दान की सहमति व्यक्ति अपने जीवनकाल में किसी भी नेत्र बैंक (eye bank) में पंजीकरण कराकर दे सकता है। मृत्यु के बाद 4–6 घंटे के भीतर नेत्र निकाल लिए जाने चाहिए, इसलिए परिवार को नेत्र बैंक को तुरंत सूचना देनी चाहिए। नेत्र निकालने की प्रक्रिया केवल 10–15 मिनट की होती है, चेहरे पर कोई विकृति नहीं आती, और दाता व ग्राही — दोनों की पहचान गोपनीय रखी जाती है। एक जोड़ी नेत्र से दो कॉर्निया-अंध व्यक्तियों को दृष्टि मिल सकती है। मरने के बाद भी किसी अंधेरे जीवन में रोशनी भर देना — इससे बड़ा दान और क्या होगा!

📌 याद रखें: दोष पहचानने का सबसे सरल क्रम यही है — पहले पूछिए “धुंधला क्या दिखता है — दूर का या पास का?” दूर का धुंधला = मायोपिया = अवतल (माइनस) लेंस। पास का धुंधला = हाइपरमेट्रोपिया = उत्तल (प्लस) लेंस। दोनों साथ हों या उम्र का असर हो = द्विफोकसी लेंस।

एक साँस में समझें — प्रतिबिंब आगे बने तो फैलाने वाला अवतल लेंस, पीछे रह जाए तो इकट्ठा करने वाला उत्तल लेंस, और उम्र से समंजन घटे तो ऊपर-नीचे दोनों लेंसों वाला द्विफोकसी चश्मा।

प्रिज़्म से अपवर्तन व विक्षेपण – श्वेत प्रकाश के सात रंग

पिछले अध्याय में आपने पढ़ा था कि प्रकाश एक माध्यम से दूसरे माध्यम में जाते समय मुड़ जाता है — यही अपवर्तन है। अब एक विशेष आकार की वस्तु से मिलिए — प्रिज़्म। प्रिज़्म काँच का बना एक ऐसा पारदर्शी ठोस होता है जिसके दो त्रिभुजाकार फलक और तीन आयताकार पार्श्व फलक होते हैं। आयताकार फलक एक-दूसरे की ओर झुके होते हैं; आमने-सामने के दो अपवर्तक फलकों के बीच के कोण को प्रिज़्म कोण कहते हैं। झुके हुए फलक ही प्रिज़्म का सारा कमाल करते हैं।

प्रिज़्म से किरण का रास्ता और विचलन कोण

मान लीजिए श्वेत प्रकाश की एक किरण प्रिज़्म के पहले फलक पर तिरछी पड़ती है। काँच से बाहर की तुलना में घना माध्यम होने से किरण पहले अपवर्तन में अभिलंब की ओर मुड़ती है। प्रिज़्म के अंदर चलकर वह दूसरे फलक पर पहुँचती है, जहाँ वह घने से विरल माध्यम (वायु) में निकलती है, इसलिए दूसरे अपवर्तन में अभिलंब से दूर मुड़ती है। दो बार मुड़ने के बाद निर्गत किरण अपनी मूल दिशा में नहीं रहती — वह प्रिज़्म के आधार (base) की ओर झुक जाती है।

यदि आपतित किरण को उसकी मूल दिशा में आगे बढ़ाएँ और निर्गत किरण को पीछे की ओर बढ़ाएँ, तो दोनों के बीच जो कोण बनता है, उसे ही विचलन कोण (angle of deviation) कहते हैं। सामान्य काँच की पट्टिका (स्लैब) में दोनों फलक समांतर होते हैं, इसलिए किरण दो बार मुड़कर भी मूल दिशा के समांतर ही निकलती है — केवल थोड़ा-सा पार्श्व विस्थापन होता है। प्रिज़्म में फलक झुके होने से दो बार का मुड़ना एक ही दिशा में जुड़ जाता है और किरण स्पष्ट रूप से भटक जाती है। यही अंतर स्लैब और प्रिज़्म का है — Board में यह तुलना पूछी जाती है।

विक्षेपण (Dispersion) – सात रंगों की पट्टी

अब असली जादू देखिए। जब सूर्य का श्वेत प्रकाश प्रिज़्म से गुज़रता है, तो बाहर निकलकर वह केवल मुड़ता ही नहीं — वह सात रंगों की एक सुंदर पट्टी में बँट जाता है! इस पट्टी को वर्णक्रम या स्पेक्ट्रम (spectrum) कहते हैं और श्वेत प्रकाश के अपने घटक रंगों में बँट जाने की इस घटना को प्रकाश का विक्षेपण कहते हैं।

रंगों का क्रम निश्चित होता है — प्रिज़्म के आधार की ओर से (अर्थात सबसे अधिक विचलन से सबसे कम की ओर): बैंगनी, जामुनी (इंडिगो), नीला, हरा, पीला, नारंगी, लाल। अंग्रेज़ी में इसे याद रखने का प्रसिद्ध शब्द है — VIBGYOR (Violet, Indigo, Blue, Green, Yellow, Orange, Red)। हिंदी में एक पंक्ति से याद करें — “बैं जा नी ह पी ना ला“। ध्यान दीजिए, बैंगनी रंग सबसे अधिक मुड़ता है और लाल रंग सबसे कम — यही क्रम इंद्रधनुष में भी दिखता है।

विक्षेपण होता क्यों है? कारण बहुत सुंदर है। श्वेत प्रकाश असल में सातों रंगों का मिश्रण है, और काँच जैसे माध्यम में प्रत्येक रंग की चाल अलग-अलग होती है। बैंगनी प्रकाश काँच में सबसे धीरे चलता है, इसलिए उसका अपवर्तनांक सबसे अधिक होता है और वह सबसे अधिक मुड़ता है। लाल प्रकाश सबसे तेज़ चलता है, अपवर्तनांक सबसे कम, इसलिए सबसे कम मुड़ता है। बस — मुड़ने की मात्रा में यही छोटा-सा अंतर प्रिज़्म से निकलते-निकलते सात रंगों को अलग-अलग फैला देता है। ध्यान रहे, खाली स्थान (निर्वात) में सभी रंगों की चाल बराबर (3 × 108 m/s) होती है; अंतर केवल माध्यम के अंदर पड़ता है।

न्यूटन का प्रयोग – रंग फिर से मिलकर श्वेत

सबसे पहले आइज़क न्यूटन ने सूर्य के प्रकाश का स्पेक्ट्रम प्राप्त करने के लिए काँच के प्रिज़्म का उपयोग किया था। परंतु न्यूटन यहीं नहीं रुके। उन्होंने एक दूसरा एकसमान प्रिज़्म पहले प्रिज़्म के उल्टा (अपवर्तक फलक उल्टा करके) उसके पास रख दिया। अब कमाल हुआ — पहले प्रिज़्म से बनी सात रंगों की पट्टी दूसरे प्रिज़्म से गुज़रते ही फिर से श्वेत प्रकाश में मिल गई!

इस प्रयोग से दो बड़ी बातें सिद्ध हुईं। एक — सूर्य का प्रकाश सात रंगों से मिलकर बना है; प्रिज़्म रंग बनाता नहीं, वह पहले से मिले रंगों को अलग करके दिखाता भर है। दो — स्पेक्ट्रम के किसी एक रंग को अलग करके दोबारा प्रिज़्म से गुज़ारने पर कोई नया रंग नहीं बनता; अर्थात हर रंग स्वयं शुद्ध है और आगे नहीं बँटता। इसीलिए स्पेक्ट्रम के रंगों को शुद्ध रंग कहते हैं। रंगीन टेलीविज़न और आपके मोबाइल की स्क्रीन भी इसी सिद्धांत का उल्टा रूप हैं — वहाँ केवल लाल, हरे व नीले प्रकाश को अलग-अलग तीव्रता में मिलाकर लाखों रंग बना लिए जाते हैं।

इंद्रधनुष (Rainbow) – आसमान का प्राकृतिक स्पेक्ट्रम

बारिश के बाद जब धूप निकलती है और सूर्य आपकी पीठ के पीछे होता है, तो सामने आसमान में सात रंगों का विशाल धनुष दिखाई देता है — इंद्रधनुष। यह प्रकृति का बनाया सबसे बड़ा स्पेक्ट्रम है। यह कैसे बनता है, चरणों में समझिए:

चरण 1: बारिश के बाद वायुमंडल में असंख्य छोटी-छोटी जल की बूँदें तैरती रहती हैं। हर बूँद एक छोटे प्रिज़्म की तरह व्यवहार करती है।

चरण 2: सूर्य का प्रकाश बूँद में प्रवेश करते समय अपवर्तित होता है और उसी क्षण विक्षेपित होकर सात रंगों में बँट जाता है।

चरण 3: बूँद के अंदर पीछे की सतह पर प्रकाश का आंतरिक परावर्तन होता है — प्रकाश बूँद के अंदर ही उछलकर वापस आगे की ओर आ जाता है।

चरण 4: बूँद से बाहर निकलते समय प्रकाश दूसरी बार अपवर्तित होता है, जिससे रंग और अधिक अलग हो जाते हैं, और यह रंगीन प्रकाश हमारी आँखों तक पहुँचता है।

लाखों बूँदों से मिलकर बना यही संयुक्त दृश्य हमें धनुष के आकार में दिखता है, जिसमें बाहरी किनारे पर लाल और भीतरी किनारे पर बैंगनी रंग होता है। याद रखिए — इंद्रधनुष हमेशा सूर्य के विपरीत दिशा में बनता है; सूर्य पीछे, इंद्रधनुष सामने। झरनों व फव्वारों के पास धूप में दिखने वाला छोटा-सा रंगीन धनुष भी ठीक इसी प्रक्रिया से बनता है — अगली बार फव्वारे के पास जाएँ तो सूर्य की ओर पीठ करके ज़रूर देखिएगा!

📌 याद रखें: इंद्रधनुष की तीन प्रक्रियाएँ क्रम से रट लीजिए — अपवर्तन + विक्षेपण → आंतरिक परावर्तन → पुनः अपवर्तन। और विक्षेपण में बैंगनी सबसे अधिक, लाल सबसे कम मुड़ता है — यह तथ्य MCQ में बार-बार आता है।

एक साँस में समझें — प्रिज़्म के झुके फलक किरण को आधार की ओर मोड़ देते हैं (विचलन), हर रंग की काँच में चाल अलग होने से श्वेत प्रकाश सात रंगों में बँट जाता है (विक्षेपण), और वर्षा की बूँदें यही काम करके इंद्रधनुष बना देती हैं।

वायुमंडलीय अपवर्तन – जब हवा ही लेंस बन जाए

हम जो कुछ देखते हैं, वह प्रकाश वायु से होकर हमारी आँख तक आता है। समस्या यह है कि पृथ्वी का वायुमंडल हर जगह एक जैसा नहीं है — नीचे की वायु ऊपर की वायु की तुलना में अधिक गर्म या ठंडी, अधिक घनी या कम घनी हो सकती है। गर्म हवा हल्की (कम अपवर्तनांक वाली) और ठंडी हवा भारी (अधिक अपवर्तनांक वाली) होती है। इसलिए वायुमंडल असल में अलग-अलग अपवर्तनांक वाली अनेक परतों का ढेर है। खगोलीय पिंडों से आता प्रकाश इन परतों से गुज़रते समय बार-बार मुड़ता रहता है — इसी को वायुमंडलीय अपवर्तन कहते हैं। गर्मियों में सड़क पर दूर “पानी” दिखना (मृगतृष्णा) भी इसी अपवर्तन का खेल है।

तारे क्यों टिमटिमाते हैं?

तारे हमसे इतनी अधिक दूर हैं कि उनसे आता प्रकाश हमारे लिए एक बिंदु-स्रोत जैसा होता है। तारों का प्रकाश पृथ्वी के वायुमंडल में घुसने के बाद, आँख तक पहुँचने से पहले, लगातार अपवर्तित होता रहता है। वायुमंडल प्रकाश को अभिलंब की ओर झुकाता है, इसलिए तारे की आभासी स्थिति उसकी वास्तविक स्थिति से कुछ हटकर (थोड़ी ऊपर) प्रतीत होती है।

अब असली बात — वायुमंडल कभी स्थिर नहीं रहता। हवा के बहाव, तापमान के उतार-चढ़ाव से परतों का अपवर्तनांक हर क्षण थोड़ा-थोड़ा बदलता रहता है। इससे कभी किरणें अधिक मुड़कर आँख में अधिक प्रकाश पहुँचा देती हैं — तारा चमकीला दिखता है; कभी किरणें भटककर कम प्रकाश पहुँचाती हैं — तारा मंद दिखता है। स्थिति भी क्षण-क्षण थोड़ी बदलती रहती है। बस, यही चमक का घटना-बढ़ना हमें टिमटिमाना लगता है। तारा स्वयं नहीं झिलमिलाता — झिलमिलाहट हमारी ही अशांत हवा का काम है!

ग्रह क्यों नहीं टिमटिमाते?

ग्रह तारों की तुलना में पृथ्वी के बहुत अधिक निकट हैं। इसलिए वे हमें बिंदु जैसे नहीं, बल्कि एक विस्तृत स्रोत (extended source) — अर्थात अनेक बिंदु-आकार के प्रकाश स्रोतों के समूह — जैसे दिखते हैं (ग्रह स्वयं प्रकाश नहीं बनाते, वे सूर्य के प्रकाश को परावर्तित करते हैं)। अब सोचिए — ग्रह के एक हिस्से से आता प्रकाश हवा के कारण मंद पड़ भी गया, तो उसी क्षण दूसरे हिस्से से आता प्रकाश उसका मुआवज़ा कर देता है। सभी बिंदु-स्रोतों से आने वाले प्रकाश में होने वाले परिवर्तन का कुल औसत प्रभाव शून्य हो जाता है। फलतः ग्रह हमें स्थिर चमक के साथ, बिना टिमटिमाए दिखते हैं। रात के आसमान में पहचान का आसान तरीका यही है — जो स्थिर चमके वह ग्रह, जो टिमटिमाए वह तारा!

अग्रिम सूर्योदय व विलंबित सूर्यास्त – दिन के मुफ़्त 4 मिनट

वायुमंडलीय अपवर्तन हमें रोज़ एक छोटा-सा उपहार देता है। जब सूर्य क्षितिज के ठीक नीचे होता है, तब भी उससे आता प्रकाश वायुमंडल की परतों से अपवर्तित होकर अभिलंब की ओर झुकता हुआ हमारी आँख तक पहुँच जाता है। इससे सूर्य हमें अपनी वास्तविक स्थिति से थोड़ा ऊपर उठा हुआ प्रतीत होता है। परिणाम — सूर्य हमें वास्तविक सूर्योदय से लगभग 2 मिनट पहले ही दिखने लगता है; इसे अग्रिम सूर्योदय कहते हैं। इसी प्रकार शाम को सूर्य वास्तव में क्षितिज के नीचे जा चुका होता है, फिर भी अपवर्तन के कारण हम उसे लगभग 2 मिनट बाद तक देखते रहते हैं — यह विलंबित सूर्यास्त है। अर्थात अपवर्तन की कृपा से हमारा दिन रोज़ लगभग 4 मिनट लंबा हो जाता है!

एक और सुंदर परिणाम — सूर्योदय व सूर्यास्त के समय सूर्य की चकती चपटी (अंडाकार) प्रतीत होती है। कारण यह है कि सूर्य के निचले किनारे से आता प्रकाश, ऊपरी किनारे के प्रकाश की तुलना में, घनी परतों से होकर अधिक अपवर्तित होता है; निचला किनारा अधिक ऊपर उठा प्रतीत होता है और पूरी चकती दबकर चपटी दिखने लगती है।

📌 याद रखें: “2 मिनट पहले सूर्योदय, 2 मिनट बाद सूर्यास्त” — यह जोड़ी और “तारे = बिंदु स्रोत इसलिए टिमटिमाते हैं, ग्रह = विस्तृत स्रोत इसलिए नहीं” — यह जोड़ी, इस भाग के दो सबसे प्रिय Board प्रश्न हैं।

एक साँस में समझें — वायुमंडल की बदलती परतें खगोलीय प्रकाश को लगातार मोड़ती हैं; तारे इसी से टिमटिमाते हैं, ग्रह औसत प्रभाव शून्य होने से नहीं टिमटिमाते, और इसी अपवर्तन से सूर्य हमें क्षितिज के नीचे होते हुए भी दिख जाता है।

प्रकाश का प्रकीर्णन – आसमान के रंगों का रहस्य

जब प्रकाश किसी ऐसे माध्यम से गुज़रता है जिसमें अत्यंत सूक्ष्म कण तैर रहे हों — जैसे वायु के अणु, धूल, धुएँ या जल की बूँदें — तो प्रकाश उन कणों से टकराकर सभी दिशाओं में फैल जाता है। इस घटना को प्रकाश का प्रकीर्णन (scattering of light) कहते हैं। प्रकीर्णन की एक महत्वपूर्ण विशेषता है — यह कणों के आकार पर बहुत निर्भर करता है। अत्यंत सूक्ष्म कण मुख्यतः छोटी तरंगदैर्घ्य (नीले रंग) का प्रकीर्णन अधिक करते हैं, जबकि बड़े कण सभी रंगों को लगभग समान रूप से प्रकीर्णित करते हैं। यही एक नियम आगे की सारी घटनाएँ समझा देगा।

टिंडल प्रभाव (Tyndall Effect)

जब प्रकाश का पुंज किसी कोलॉइडी विलयन (ऐसा मिश्रण जिसमें अत्यंत सूक्ष्म कण समान रूप से फैले हों) से गुज़रता है, तो उन सूक्ष्म कणों द्वारा प्रकाश के प्रकीर्णन के कारण प्रकाश का मार्ग स्वयं दिखाई देने लगता है — इसी घटना को टिंडल प्रभाव कहते हैं। आपने यह प्रभाव रोज़ देखा है, बस नाम आज पता चला:

  • अंधेरे कमरे में प्रकाश की किरण: बंद कमरे में छत के छोटे छिद्र या खिड़की की झिरी से घुसती सूर्य की किरण एक साफ़ “रास्ते” जैसी दिखती है, क्योंकि राह में तैरते धूल के कणों से प्रकाश प्रकीर्णित होकर हमारी आँख तक आता है।
  • घने जंगल की छतरी: घने पेड़ों के बीच से छनकर आती सूर्य की किरणें धुँध (कुहासे) की सूक्ष्म जल-बूँदों से प्रकीर्णित होकर सुंदर प्रकाश-स्तंभों जैसी दिखती हैं।
  • धुएँ या दूधिया जल में टॉर्च: हल्के धुएँ भरे कमरे या थोड़ा दूध मिले पानी में टॉर्च का प्रकाश एक चमकती धार की तरह अपना रास्ता दिखाता है।

एक परख भी याद रखिए — वास्तविक विलयन (जैसे नमक या चीनी का घोल) के कण इतने छोटे होते हैं कि वे प्रकाश को प्रकीर्णित नहीं कर पाते, इसलिए उनमें टिंडल प्रभाव नहीं दिखता; जबकि कोलॉइड (दूध, धुआँ, कोहरा, स्टार्च का घोल) में यह स्पष्ट दिखता है। यह अंतर रसायन विज्ञान में भी पूछा जाता है।

आकाश नीला क्यों दिखाई देता है?

अब अपने सबसे जिज्ञासु प्रश्न पर आइए। वायुमंडल में वायु के अणु और अन्य अत्यंत सूक्ष्म कण मौजूद हैं, जिनका आकार प्रकाश की तरंगदैर्घ्य से भी छोटा होता है। ऐसे सूक्ष्म कण छोटी तरंगदैर्घ्य के प्रकाश — विशेषकर नीले रंग — को सबसे अधिक प्रकीर्णित करते हैं, जबकि लाल रंग (बड़ी तरंगदैर्घ्य) लगभग बिना प्रकीर्णित हुए सीधा निकल जाता है। सूर्य का प्रकाश जब वायुमंडल में घुसता है, तो उसका नीला भाग हवा के अणुओं से टकराकर चारों ओर बिखर जाता है। यही बिखरा हुआ नीला प्रकाश हर दिशा से हमारी आँखों में प्रवेश करता है — और पूरा आकाश हमें नीला दिखाई देता है।

इसका उल्टा प्रमाण भी सुंदर है — यदि पृथ्वी पर वायुमंडल ही न होता, तो कोई प्रकीर्णन न होता और आकाश दिन में भी काला दिखाई देता। यही कारण है कि अधिक ऊँचाई पर उड़ते यात्रीगणों व अंतरिक्ष यात्रियों को आकाश काला प्रतीत होता है — वहाँ प्रकीर्णन करने वाले कण ही उपलब्ध नहीं होते। अगले ही प्रश्न में यह तथ्य प्रश्नावली में पूछा गया है!

सूर्योदय व सूर्यास्त पर सूर्य लाल क्यों दिखता है?

दोपहर में सूर्य सिर के ऊपर होता है — प्रकाश को वायुमंडल में कम दूरी तय करनी पड़ती है, केवल थोड़ा-सा नीला प्रकीर्णित होता है और सूर्य हमें लगभग श्वेत दिखता है। परंतु सूर्योदय व सूर्यास्त के समय सूर्य क्षितिज के पास होता है — प्रकाश को वायुमंडल में बहुत लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। इस लंबे रास्ते में अधिकांश नीला व छोटी तरंगदैर्घ्य वाला प्रकाश मार्ग में ही प्रकीर्णित होकर बिखर जाता है और हमारी आँख तक पहुँच ही नहीं पाता। जो प्रकाश अंत तक बचकर आँख तक पहुँचता है, वह मुख्यतः लंबी तरंगदैर्घ्य वाला लाल-नारंगी प्रकाश होता है — इसीलिए उगता व डूबता सूर्य रक्ताभ (लाल) प्रतीत होता है। आसपास के बादलों व पहाड़ों पर पड़ती वह सुनहरी-लाल चमक भी इसी बचे हुए प्रकाश की देन है।

खतरे के संकेत लाल ही क्यों होते हैं?

सड़क पर खतरे के बोर्ड, रेलवे सिग्नल, एम्बुलेंस व दमकल की बत्तियाँ — सब लाल क्यों? विज्ञान सीधा है। लाल रंग की तरंगदैर्घ्य सभी दृश्य रंगों में सबसे अधिक होती है, इसलिए वायु के अणुओं व धूल-धुएँ के कणों द्वारा इसका प्रकीर्णन सबसे कम होता है। कम प्रकीर्णन का अर्थ है — लाल प्रकाश कोहरे, धुएँ व धूल के बीच से भी सबसे दूर तक बिना बिखरे पहुँच जाता है और दूर से ही स्पष्ट दिख जाता है। खतरे की चेतावनी का काम ही दूर से दिखना है — इसलिए लाल रंग ही सबसे उपयुक्त है। क्या अब आप बता सकते हैं कि धुंध भरी सुबह में वाहनों की पीली (fog) बत्तियाँ क्यों कारगर होती हैं? पीले-लाल जैसे लंबे तरंगदैर्घ्य वाले रंग कम बिखरते हैं — बिल्कुल यही कारण!

📌 याद रखें: प्रकीर्णन का एक ही मूल नियम तीन उत्तर देता है — छोटे कण नीला सबसे अधिक बिखेरते हैं, इसलिए (1) आकाश नीला, (2) लंबा रास्ता तय करता प्रकाश नीला खोकर सूर्योदय-सूर्यास्त पर लाल दिखता है, और (3) लाल सबसे कम बिखरता है, इसलिए खतरे के संकेत लाल व दूर से दृश्य होते हैं।

एक साँस में समझें — सूक्ष्म कणों से प्रकाश का बिखरना ही प्रकीर्णन है; कमरे में किरण का रास्ता दिखना टिंडल प्रभाव है, बिखरा नीला प्रकाश आकाश को नीला करता है और न बिखर पाने वाला लाल प्रकाश सूर्य को उगते-डूबते लाल बनाता है।

📘 पाठ्य-पुस्तक के प्रश्न (InText Questions)

ये वे प्रश्न हैं जो NCERT किताब के अनुच्छेदों के बीच-बीच में दिए गए हैं। इस अध्याय में एक ही खंड (अनुच्छेद 11.1 व 11.2 पर आधारित) में कुल 4 InText प्रश्न हैं — Board में ये प्रश्न वैसे-के-वैसे पूछ लिए जाते हैं, इसलिए इन्हें सबसे पहले तैयार कीजिए।

(क) अनुच्छेद 11.1 व 11.2 पर आधारित प्रश्न

प्रश्न 1. नेत्र की समंजन क्षमता से क्या अभिप्राय है?

हल:

चरण 1: नेत्र लेंस अपनी फोकस दूरी को बदल सकता है, क्योंकि वह लचीले पदार्थ से बना है और पक्ष्माभी पेशियाँ उसका आकार बदलती हैं।

चरण 2: निकट की वस्तु देखते समय पेशियाँ सिकुड़कर लेंस को मोटा करती हैं (फोकस दूरी घटती है) और दूर की वस्तु देखते समय पेशियाँ शिथिल होकर लेंस को पतला करती हैं (फोकस दूरी बढ़ती है)। इस प्रकार प्रतिबिंब हर स्थिति में रेटिना पर ही बनता है।

उत्तर: अभिनेत्र लेंस की वह क्षमता, जिसके कारण वह अपनी फोकस दूरी को समायोजित करके निकट तथा दूर — दोनों प्रकार की वस्तुओं का स्पष्ट प्रतिबिंब रेटिना पर बना लेता है, नेत्र की समंजन क्षमता कहलाती है।

प्रश्न 2. निकट दृष्टि दोष का कोई व्यक्ति 1.2 m से अधिक दूरी पर रखी वस्तुओं को सुस्पष्ट नहीं देख सकता। इस दोष को दूर करने के लिए प्रयुक्त संशोधक लेंस किस प्रकार का होना चाहिए?

हल:

चरण 1: व्यक्ति को दूर की वस्तुएँ स्पष्ट नहीं दिखतीं और उसका दूर बिंदु 1.2 m पर है — यह निकट दृष्टि दोष (मायोपिया) है।

चरण 2: इस दोष में किरणें रेटिना से पहले ही मिल जाती हैं; उन्हें फैलाकर रेटिना तक पहुँचाना होता है, और किरणें फैलाने का काम अपसारी लेंस करता है।

उत्तर: संशोधक लेंस अवतल लेंस (अपसारी लेंस) होना चाहिए, जिसकी फोकस दूरी उस व्यक्ति के दूर बिंदु के बराबर, अर्थात 1.2 m (क्षमता = 1/−1.2 ≈ −0.83 D) हो, ताकि अनंत से आती किरणें लेंस से फैलकर मानो 1.2 m से आती हुई नेत्र में प्रवेश करें और रेटिना पर फोकस हो जाएँ।

प्रश्न 3. मानव नेत्र की सामान्य दृष्टि के लिए दूर बिंदु तथा निकट बिंदु नेत्र से कितनी दूरी पर होते हैं?

हल:

सामान्य (स्वस्थ) नेत्र की समंजन क्षमता पूरी तरह कार्य करती है, इसलिए उसका दृष्टि परिसर सबसे विस्तृत होता है — वह बहुत पास से लेकर तारों तक सब कुछ देख सकता है।

उत्तर: सामान्य दृष्टि के लिए दूर बिंदु अनंत पर तथा निकट बिंदु नेत्र से 25 cm दूरी पर होता है। 25 cm को ही सुस्पष्ट दर्शन की अल्पतम दूरी कहते हैं।

प्रश्न 4. अंतिम पंक्ति में बैठे किसी विद्यार्थी को श्यामपट्ट पढ़ने में कठिनाई होती है। यह विद्यार्थी किस दृष्टि दोष से पीड़ित है? इसे किस प्रकार संशोधित किया जा सकता है?

हल:

चरण 1: श्यामपट्ट दूर होता है। दूर की वस्तु न दिखना और निकट की (किताब की) वस्तु दिखना — यह स्पष्टतः निकट दृष्टि दोष (मायोपिया) के लक्षण हैं; ऐसे नेत्र में दूर की वस्तु का प्रतिबिंब रेटिना के सामने बन जाता है।

उत्तर: विद्यार्थी निकट दृष्टि दोष से पीड़ित है। इस दोष को उचित फोकस दूरी (उचित ऋणात्मक क्षमता) के अवतल लेंस का चश्मा पहनाकर संशोधित किया जा सकता है, जो दूर से आती किरणों को फैलाकर प्रतिबिंब को ठीक रेटिना पर बना देता है।

इस भाग में हमने सीखा — InText के चारों प्रश्न समंजन, निकट बिंदु-दूर बिंदु और मायोपिया की पहचान पर ही टिके हैं; ये चारों इस अध्याय की नींव हैं।

📗 NCERT उदाहरण (Examples) – लेंस-शक्ति के हल किए गए उदाहरण

इस अध्याय में NCERT की शैली के हल किए गए उदाहरण मुख्यतः लेंस की क्षमता (power) पर आधारित हैं — चश्मे के पर्चे पर लिखा नंबर फोकस दूरी में कैसे बदलता है, यही इनका विषय है। नीचे दिए गए दो उदाहरण उसी पद्धति से, चरण-दर-चरण हल किए गए हैं। सूत्र याद रखिए — P = 1/f, जहाँ f मीटर में हो तथा क्षमता की इकाई डायोप्टर (D) होती है।

उदाहरण 1. किसी व्यक्ति को दूर की दृष्टि के संशोधन के लिए −4.5 D क्षमता के लेंस की आवश्यकता है तथा निकट की दृष्टि के संशोधन के लिए +1.5 D क्षमता के लेंस की आवश्यकता है। दोनों लेंसों की फोकस दूरी ज्ञात कीजिए और बताइए कि लेंस किस प्रकार के हैं।

हल:

चरण 1: दूर की दृष्टि के लिए, P = −4.5 D। सूत्र P = 1/f से, f = 1/P = 1/(−4.5) m = −0.222 m।

चरण 2: सेंटीमीटर में बदलने पर, f = −0.222 × 100 cm = −22.2 cm। ऋणात्मक चिह्न बताता है कि फोकस दूरी ऋणात्मक है, अर्थात लेंस अवतल है — जैसा कि निकट दृष्टि दोष के संशोधन में होना भी चाहिए।

चरण 3: निकट की दृष्टि के लिए, P = +1.5 D। f = 1/P = 1/1.5 m = +0.667 m = +66.7 cm। धनात्मक चिह्न बताता है कि लेंस उत्तल है।

उत्तर: दूर की दृष्टि के लिए −22.2 cm फोकस दूरी का अवतल लेंस तथा निकट की दृष्टि के लिए +66.7 cm फोकस दूरी का उत्तल लेंस चाहिए। (व्यक्ति को दोनों दोष हैं, अतः उसे द्विफोकसी लेंस ही उपयुक्त होगा।)

उदाहरण 2. निकट दृष्टि दोष से पीड़ित किसी व्यक्ति का दूर बिंदु नेत्र से 2 m दूरी पर है। दोष के संशोधन के लिए आवश्यक लेंस की फोकस दूरी व क्षमता ज्ञात कीजिए।

हल:

चरण 1: संशोधक अवतल लेंस ऐसा होना चाहिए जो अनंत पर रखी वस्तु का आभासी प्रतिबिंब व्यक्ति के दूर बिंदु (2 m) पर बना दे, क्योंकि उस बिंदु तक की वस्तुएँ नेत्र स्वयं स्पष्ट देख सकता है। अर्थात लेंस की फोकस दूरी = −2 m (ऋणात्मक, क्योंकि लेंस अवतल होगा)।

चरण 2: क्षमता, P = 1/f = 1/(−2) D = −0.5 D।

उत्तर: आवश्यक लेंस 2 m फोकस दूरी का अवतल लेंस होगा, जिसकी क्षमता −0.5 D है।

📌 गणना की जाँच-विधि: क्षमता निकालने से पहले फोकस दूरी को हमेशा मीटर में बदलें। cm में रखकर P = 1/f लगाने से उत्तर 100 गुना गलत हो जाता है — Board में सबसे अधिक अंक इसी छोटी-सी चूक पर कटते हैं!

✏️ प्रश्नावली (Exercise) – सभी 13 प्रश्नों के हल

प्रश्न 1. मानव नेत्र अभिनेत्र लेंस की फोकस दूरी को समायोजित करके विभिन्न दूरियों पर रखी वस्तुओं को फोकसित कर सकता है। ऐसा हो पाने का कारण है — (a) जरा-दूरदृष्टिता (b) समंजन (c) निकट-दृष्टि (d) दीर्घ-दृष्टि

हल: विभिन्न दूरियों की वस्तुओं को रेटिना पर फोकस करने के लिए लेंस की फोकस दूरी बदलने की क्षमता ही समंजन कहलाती है; बाकी तीनों विकल्प दृष्टि दोषों के नाम हैं, किसी प्रक्रिया के नहीं।

उत्तर: (b) समंजन

प्रश्न 2. मानव नेत्र जिस भाग पर किसी वस्तु का प्रतिबिंब बनाते हैं, वह है — (a) कॉर्निया (b) परितारिका (c) पुतली (d) दृष्टिपटल

हल: कॉर्निया प्रकाश को अंदर लेता है, परितारिका व पुतली उसकी मात्रा नियंत्रित करते हैं, परंतु प्रतिबिंब बनने का स्थान नेत्र के पीछे स्थित प्रकाश-संवेदी परत ही है।

उत्तर: (d) दृष्टिपटल (रेटिना)

प्रश्न 3. सामान्य दृष्टि के वयस्क के लिए सुस्पष्ट दर्शन की अल्पतम दूरी होती है, लगभग — (a) 25 m (b) 2.5 cm (c) 25 cm (d) 2.5 m

हल: सुस्पष्ट दर्शन की अल्पतम दूरी ही नेत्र के निकट बिंदु की दूरी है, जो स्वस्थ युवा वयस्क के लिए निश्चित मानक के रूप में याद की जाती है।

उत्तर: (c) 25 cm

प्रश्न 4. अभिनेत्र लेंस की फोकस दूरी में परिवर्तन किया जाता है — (a) पुतली द्वारा (b) दृष्टिपटल द्वारा (c) पक्ष्माभी द्वारा (d) परितारिका द्वारा

हल: लेंस को थामे निलंबन स्नायु जिन पेशियों से जुड़े हैं, उन्हीं के सिकुड़ने-शिथिल होने से लेंस मोटा-पतला होता है; पुतली व परितारिका का काम प्रकाश की मात्रा से है, रेटिना का काम प्रतिबिंब ग्रहण करना है।

उत्तर: (c) पक्ष्माभी (सिलियरी) पेशियों द्वारा

प्रश्न 5. किसी व्यक्ति को अपनी दूर की दृष्टि को संशोधित करने के लिए −5.5 डायोप्टर क्षमता के लेंस की आवश्यकता है। अपनी निकट की दृष्टि को संशोधित करने के लिए उसे +1.5 डायोप्टर क्षमता के लेंस की आवश्यकता है। संशोधन के लिए आवश्यक लेंसों की फोकस दूरी क्या होगी — (i) दूर की दृष्टि के लिए (ii) निकट की दृष्टि के लिए?

हल:

दिया है: दूर के लिए P1 = −5.5 D; निकट के लिए P2 = +1.5 D। सूत्र: P = 1/f (f मीटर में), अर्थात f = 1/P।

(i) दूर की दृष्टि के लिए: f1 = 1/P1 = 1/(−5.5) m = −0.1818 m ≈ −0.18 m = −18.2 cm।

(ii) निकट की दृष्टि के लिए: f2 = 1/P2 = 1/1.5 m = +0.6667 m ≈ +0.67 m = +66.7 cm।

उत्तर: (i) दूर के लिए f = −18.2 cm (अवतल लेंस); (ii) निकट के लिए f = +66.7 cm (उत्तल लेंस)। ऋणात्मक चिह्न अवतल व धनात्मक चिह्न उत्तल लेंस को दर्शाता है — व्यक्ति को द्विफोकसी चश्मा चाहिए।

प्रश्न 6. किसी निकट-दृष्टि दोष से पीड़ित व्यक्ति का दूर बिंदु नेत्र के सामने 80 cm दूरी पर है। इस दोष को संशोधित करने के लिए आवश्यक लेंस की प्रकृति तथा क्षमता क्या होगी?

हल:

चरण 1 – लेंस की प्रकृति: निकट दृष्टि दोष का संशोधन अवतल (अपसारी) लेंस से होता है, जिसकी फोकस दूरी व्यक्ति के दूर बिंदु के बराबर होनी चाहिए ताकि अनंत की वस्तु का आभासी प्रतिबिंब 80 cm पर बन जाए।

चरण 2 – लेंस सूत्र लगाना: वस्तु अनंत पर है, इसलिए u = −∞; प्रतिबिंब दूर बिंदु पर (लेंस के उसी ओर) बनना है, इसलिए v = −80 cm; f = ज्ञात करना है। लेंस सूत्र: 1/f = 1/v − 1/u = 1/(−80) − 1/(−∞) = −1/80 − 0 = −1/80। अतः f = −80 cm = −0.80 m।

चरण 3 – क्षमता: P = 1/f (मीटर में) = 1/(−0.80) D = −1.25 D।

उत्तर: आवश्यक लेंस अवतल (अपसारी) लेंस होगा, जिसकी फोकस दूरी −80 cm तथा क्षमता −1.25 D है।

प्रश्न 7. चित्र बनाकर दर्शाइए कि दीर्घ-दृष्टि दोष कैसे संशोधित किया जाता है। एक दीर्घ-दृष्टि दोषयुक्त नेत्र का निकट बिंदु 1 m है। इस दोष को संशोधित करने के लिए आवश्यक लेंस की क्षमता क्या होगी? यह मान लीजिए कि सामान्य नेत्र का निकट-बिंदु 25 cm है।

हल:

चरण 1 – आरेख का शब्द-वर्णन (आप चित्र इसी क्रम से बनाएँ): (क) पहले दोषयुक्त नेत्र दिखाइए — निकट बिंदु N नेत्र से 1 m पर है; 25 cm पर रखी वस्तु से आती किरणें नेत्र लेंस से अपवर्तित होकर रेटिना के पीछे मिलने की ओर जाती हैं, इसलिए रेटिना पर धुंधला प्रतिबिंब बनता है। (ख) अब नेत्र के सामने उत्तल लेंस लगाइए — उत्तल लेंस 25 cm वाली वस्तु की किरणों को पहले अभिसरित करके नेत्र में ऐसे भेजता है मानो वे किरणें व्यक्ति के निकट बिंदु N (1 m) से आ रही हों; अब नेत्र लेंस उन्हें ठीक रेटिना पर फोकस कर देता है और वस्तु स्पष्ट दिखती है।

चरण 2 – मान रखना: उत्तल लेंस के लिए वस्तु-दूरी u = −25 cm (वस्तु सामान्य निकट बिंदु पर रखी है, जहाँ से पढ़ा जाना चाहिए) और प्रतिबिंब-दूरी v = −100 cm (आभासी प्रतिबिंब दोषयुक्त नेत्र के निकट बिंदु 1 m = 100 cm पर, लेंस के वस्तु वाली ओर ही बनना है)।

चरण 3 – लेंस सूत्र: 1/f = 1/v − 1/u = 1/(−100) − 1/(−25) = −1/100 + 1/25 = −1/100 + 4/100 = 3/100। अतः f = 100/3 cm = 33.3 cm = +0.33 m।

चरण 4 – क्षमता: P = 1/f = 1/(1/3) = +3.0 D।

उत्तर: दीर्घ-दृष्टि (दूर दृष्टि) दोष का संशोधन उत्तल लेंस से होता है; दिए गए नेत्र के लिए आवश्यक लेंस की क्षमता +3.0 D (फोकस दूरी +33.3 cm) होगी।

प्रश्न 8. सामान्य नेत्र 25 cm से निकट रखी वस्तुओं को सुस्पष्ट क्यों नहीं देख पाते?

हल:

चरण 1: वस्तु जितनी पास आती है, उसकी किरणें उतनी अधिक फैली हुई आती हैं; उन्हें रेटिना पर फोकस करने के लिए लेंस को उतना ही अधिक मोटा (कम फोकस दूरी का) होना पड़ता है।

चरण 2: परंतु पक्ष्माभी पेशियों के सिकुड़ने की एक सीमा है — 25 cm पर वे अपना अधिकतम प्रयास कर चुकी होती हैं। इससे पास की वस्तु के लिए लेंस और मोटा हो ही नहीं पाता।

उत्तर: 25 cm से निकट रखी वस्तु का प्रतिबिंब समंजन की अधिकतम सीमा के कारण रेटिना पर न बनकर रेटिना के पीछे बनने लगता है, जिससे वस्तु धुंधली दिखती है। इसीलिए सामान्य नेत्र 25 cm से निकट की वस्तुओं को सुस्पष्ट नहीं देख पाता — 25 cm ही उसका निकट बिंदु है।

प्रश्न 9. जब हम नेत्र से किसी वस्तु की दूरी को बढ़ा देते हैं, तो नेत्र में प्रतिबिंब-दूरी का क्या होता है?

हल:

चरण 1: प्रतिबिंब-दूरी अर्थात अभिनेत्र लेंस से रेटिना तक की दूरी — यह नेत्र-गोलक की बनावट से निश्चित है और बदल नहीं सकती।

चरण 2: वस्तु दूर जाने पर समंजन क्रिया से पक्ष्माभी पेशियाँ शिथिल होकर लेंस को पतला कर देती हैं, जिससे फोकस दूरी बढ़ जाती है और प्रतिबिंब फिर उसी निश्चित दूरी पर, ठीक रेटिना पर बन जाता है।

उत्तर: प्रतिबिंब-दूरी अपरिवर्तित रहती है — सदैव लेंस से रेटिना की दूरी के बराबर। वस्तु की दूरी बदलने पर नेत्र प्रतिबिंब-दूरी नहीं, बल्कि समंजन द्वारा लेंस की फोकस दूरी बदलता है।

प्रश्न 10. तारे क्यों टिमटिमाते हैं?

हल:

चरण 1: तारे अत्यंत दूर स्थित बिंदु-आकार के प्रकाश स्रोत हैं। उनका प्रकाश वायुमंडल में प्रवेश करके आँख तक पहुँचने में लगातार वायुमंडलीय अपवर्तन से मुड़ता रहता है।

चरण 2: वायुमंडल की परतों का घनत्व व तापमान हर क्षण बदलता रहता है, इसलिए अपवर्तन की मात्रा भी बदलती रहती है — कभी आँख में अधिक प्रकाश पहुँचता है, कभी कम; तारे की आभासी स्थिति भी थोड़ी-थोड़ी खिसकती रहती है।

उत्तर: तारों के प्रकाश के वायुमंडलीय अपवर्तन के कारण, तथा वायुमंडल की बदलती भौतिक अवस्थाओं से आँख में प्रवेश करने वाले प्रकाश की मात्रा में निरंतर उतार-चढ़ाव होने के कारण, तारे टिमटिमाते प्रतीत होते हैं।

प्रश्न 11. व्याख्या कीजिए कि ग्रह क्यों नहीं टिमटिमाते।

हल:

चरण 1: ग्रह पृथ्वी के तारों की अपेक्षा बहुत निकट हैं, इसलिए वे बिंदु-स्रोत न रहकर एक विस्तृत स्रोत — अनेक बिंदु-आकार के स्रोतों का समूह — माने जाते हैं।

चरण 2: वायुमंडलीय उतार-चढ़ाव से ग्रह के किसी एक बिंदु-भाग से आने वाला प्रकाश मंद पड़ता है, तो उसी क्षण किसी अन्य भाग से आने वाला प्रकाश बढ़ जाता है।

उत्तर: सभी बिंदु-स्रोतों से नेत्र में प्रवेश करने वाले प्रकाश की मात्रा में होने वाले परिवर्तनों का कुल औसत प्रभाव शून्य हो जाता है, जिससे टिमटिमाने का प्रभाव निष्प्रभावी (nullified) हो जाता है — इसलिए ग्रह नहीं टिमटिमाते और स्थिर चमकते हैं।

प्रश्न 12. सूर्योदय के समय सूर्य रक्ताभ क्यों प्रतीत होता है?

हल:

चरण 1: सूर्योदय के समय सूर्य क्षितिज के निकट होता है, इसलिए उसके प्रकाश को वायुमंडल में सबसे लंबी दूरी तय करनी पड़ती है।

चरण 2: इस लंबे मार्ग में वायु के सूक्ष्म कणों द्वारा नीले व अन्य छोटी तरंगदैर्घ्य वाले प्रकाश का अधिकांश भाग प्रकीर्णित होकर बिखर जाता है और आँख तक पहुँच ही नहीं पाता।

उत्तर: नेत्रों तक पहुँचने वाला प्रकाश मुख्यतः सबसे कम प्रकीर्णित होने वाला, लंबी तरंगदैर्घ्य का लाल प्रकाश होता है — इसीलिए सूर्योदय (और इसी कारण सूर्यास्त) के समय सूर्य रक्ताभ प्रतीत होता है।

प्रश्न 13. किसी अंतरिक्ष यात्री को आकाश नीले की अपेक्षा काला क्यों प्रतीत होता है?

हल:

चरण 1: आकाश का नीला रंग वायुमंडल के कणों द्वारा सूर्य के प्रकाश के प्रकीर्णन का परिणाम है — विशेषकर नीले प्रकाश का प्रकीर्णन सबसे अधिक होता है।

चरण 2: अंतरिक्ष में वायुमंडल ही नहीं होता; इतनी अधिक ऊँचाई पर प्रकीर्णन करने के लिए पर्याप्त कण उपलब्ध नहीं होते।

उत्तर: अंतरिक्ष में प्रकाश का प्रकीर्णन नहीं होता, इसलिए कोई बिखरा हुआ प्रकाश अंतरिक्ष यात्री के नेत्रों में प्रवेश नहीं करता और आकाश उसे नीले के स्थान पर काला प्रतीत होता है।

इस प्रश्नावली में हमने सीखा — 13 प्रश्नों में केंद्र तीन ही हैं: दोष-संशोधन के numerical (P = 1/f), समंजन की अवधारणा और प्रकीर्णन-अपवर्तन की घटनाएँ। ये तीनों पक्के कर लिए, तो प्रश्नावली आसान है।

📖 Case Study – रवि का चश्मा और दादाजी का द्विफोकसी

रवि कक्षा 10 का विद्यार्थी है। कुछ महीनों से वह देख रहा था कि कक्षा में पीछे की बेंच से ब्लैकबोर्ड के अक्षर उसे धुंधले दिखते हैं, जबकि अपनी किताब वह बिल्कुल साफ़ पढ़ लेता है। नेत्र चिकित्सक ने जाँच करके उसके लिए −1.25 D क्षमता का चश्मा बनाया। उसी दिन रवि के दादाजी ने बताया कि उनका चश्मा इससे अलग है — उसके चश्मे के ऊपर वाले भाग से वे दूर का टीवी साफ़ देखते हैं और नीचे वाले भाग से अख़बार पढ़ते हैं; डॉक्टर ने उम्र के कारण उनकी समंजन क्षमता कम होने की बात भी कही थी। इस गद्यांश के आधार पर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए:

Q1. रवि किस दृष्टि दोष से पीड़ित है? —

(A) दूर दृष्टि दोष
(B) निकट दृष्टि दोष
(C) मोतियाबिंद
(D) वर्णांधता

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (B) निकट दृष्टि दोष — दूर की वस्तु (ब्लैकबोर्ड) धुंधली और निकट की वस्तु (किताब) स्पष्ट दिखना मायोपिया का लक्षण है।

Q2. रवि के चश्मे में किस प्रकार का लेंस लगा होगा? —

(A) अवतल लेंस
(B) उत्तल लेंस
(C) बेलनाकार लेंस
(D) समतल काँच

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (A) अवतल लेंस — ऋणात्मक क्षमता (−1.25 D) ही बताती है कि लेंस अपसारी अर्थात अवतल है।

Q3. रवि के लेंस की फोकस दूरी कितनी है? —

(A) −125 cm
(B) +80 cm
(C) −80 cm
(D) −8 cm

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (C) −80 cm — f = 1/P = 1/(−1.25) m = −0.80 m = −80 cm; यही दूरी रवि के दूर बिंदु की भी है।

Q4. दादाजी के चश्मे का लेंस किस प्रकार का है और क्यों? —

(A) केवल उत्तल, क्योंकि उन्हें केवल पढ़ना है
(B) द्विफोकसी, क्योंकि उम्र से समंजन क्षमता घटने पर दूर व निकट दोनों के लिए अलग लेंस चाहिए
(C) केवल अवतल, क्योंकि बुज़ुर्गों को वही लगता है
(D) बिना क्षमता का काँच

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (B) द्विफोकसी — ऊपरी भाग का अवतल लेंस दूर देखने के लिए और निचले भाग का उत्तल लेंस पढ़ने के लिए होता है; जरादृष्टि में यही व्यवस्था काम करती है।

⭐ Quick Revision – Important Points

  • ✅ प्रतिबिंब रेटिना पर बनता है — वास्तविक, उल्टा व छोटा; रेटिना की शलाका कोशिकाएँ तीव्रता व शंकु कोशिकाएँ रंग पहचानती हैं।
  • ✅ कॉर्निया प्रकाश का अधिकांश अपवर्तन करता है; परितारिका पुतली का आकार बदलती है; पक्ष्माभी पेशियाँ लेंस की फोकस दूरी बदलती हैं।
  • ✅ समंजन: निकट देखते समय लेंस मोटा (फोकस दूरी कम), दूर देखते समय लेंस पतला (फोकस दूरी अधिक); प्रतिबिंब-दूरी सदैव स्थिर रहती है।
  • ✅ सामान्य नेत्र: निकट बिंदु = 25 cm, दूर बिंदु = अनंत; 25 cm ही सुस्पष्ट दर्शन की अल्पतम दूरी है।
  • ✅ मायोपिया: प्रतिबिंब रेटिना के आगे, दूर बिंदु पास आ जाता है — सुधार अवतल लेंस (ऋणात्मक D)।
  • ✅ हाइपरमेट्रोपिया: प्रतिबिंब रेटिना के पीछे, निकट बिंदु दूर चला जाता है — सुधार उत्तल लेंस (धनात्मक D)।
  • ✅ जरादृष्टि: उम्र से समंजन घटता है — सुधार द्विफोकसी लेंस (ऊपर अवतल, नीचे उत्तल)।
  • ✅ लेंस क्षमता का सूत्र: P = 1/f (f मीटर में); उत्तल = +, अवतल = −; इकाई डायोप्टर (D)।
  • ✅ प्रिज़्म में किरण आधार की ओर मुड़ती है; बैंगनी का विचलन सबसे अधिक, लाल का सबसे कम; वर्णक्रम का क्रम VIBGYOR है।
  • ✅ इंद्रधनुष = वर्षा-बूँदों में अपवर्तन व विक्षेपण + आंतरिक परावर्तन + पुनः अपवर्तन; सदैव सूर्य के विपरीत दिशा में बनता है।
  • ✅ तारे बिंदु-स्रोत हैं इसलिए वायुमंडलीय अपवर्तन से टिमटिमाते हैं; ग्रह विस्तृत स्रोत हैं, औसत प्रभाव शून्य होने से नहीं टिमटिमाते।
  • ✅ अपवर्तन से अग्रिम सूर्योदय व विलंबित सूर्यास्त — प्रत्येक लगभग 2 मिनट; दिन लगभग 4 मिनट लंबा हो जाता है।
  • ✅ प्रकीर्णन: नीला सबसे अधिक, लाल सबसे कम — इसलिए आकाश नीला, सूर्योदय-सूर्यास्त पर सूर्य लाल और खतरे के संकेत लाल होते हैं; कोलॉइड में प्रकाश का मार्ग दिखना टिंडल प्रभाव है।

⚠️ Aam Galtiyan (Common Mistakes)

  • दोष और लेंस उलट देना: मायोपिया में उत्तल लेंस लिख देना सबसे आम गलती है। याद रखें — प्रतिबिंब आगे (मायोपिया) तो किरणें फैलाने वाला अवतल लेंस, प्रतिबिंब पीछे (हाइपरमेट्रोपिया) तो किरणें इकट्ठा करने वाला उत्तल लेंस।
  • क्षमता के सूत्र में cm लगा देना: P = 1/f में f हमेशा मीटर में रखें। f = 80 cm के लिए P = 1/0.80 = 1.25 D होगा, 1/80 नहीं। पहले इकाई बदलें, फिर सूत्र लगाएँ।
  • चिह्न भूल जाना: अवतल लेंस की फोकस दूरी व क्षमता दोनों पर ऋणात्मक (−) चिह्न लगाना अनिवार्य है; चिह्न छूटा तो लेंस की प्रकृति ही गलत हो जाएगी और अंक कटेगा।
  • प्रतिबिंब-दूरी बदलती लिख देना: वस्तु की दूरी बदलने पर प्रतिबिंब-दूरी नहीं बदलती; बदलती है लेंस की फोकस दूरी (समंजन से)। प्रश्न 9 का यही मुख्य बिंदु है।
  • फोकस दूरी बदलने का श्रेय गलत भाग को देना: फोकस दूरी पक्ष्माभी पेशियाँ बदलती हैं; परितारिका केवल पुतली का आकार (प्रकाश की मात्रा) बदलती है — दोनों के कार्य आपस में न मिलाएँ।
  • विक्षेपण का क्रम उल्टा लिख देना: प्रिज़्म में बैंगनी सबसे अधिक व लाल सबसे कम मुड़ता है। क्रम VIBGYOR ही लिखें — बैंगनी से लाल की ओर विचलन घटता जाता है।
  • तारों के टिमटिमाने का कारण गलत बताना: कारण तारों की अपनी चमक का घटना-बढ़ना नहीं, बल्कि वायुमंडलीय अपवर्तन और हवा की बदलती परतें हैं — उत्तर में “अपवर्तन” शब्द आना ही चाहिए।

🎯 Bihar Board Exam Tips

  • Numerical की एक ही कुंजी: तीनों numerical प्रश्न (प्रश्नावली 5, 6, 7) केवल P = 1/f और लेंस सूत्र 1/f = 1/v − 1/u से बनते हैं। हल करते समय पहले “दिया है” लिखें, फिर सूत्र, फिर मीटर में मान, फिर चिह्न सहित उत्तर — चरणबद्ध हल पर पूरे अंक मिलते हैं।
  • किरण-आरेख का अभ्यास करें: मायोपिया व हाइपरमेट्रोपिया के दोष व संशोधन — दोनों के आरेख बारी-बारी से बनाकर देखें। आरेख में किरणों पर तीर के निशान और रेटिना की स्थिति स्पष्ट दिखाएँ; साथ में दो-तीन पंक्तियों का वर्णन अवश्य लिखें।
  • “क्यों” वाले प्रश्नों की सूची तैयार रखें: तारे टिमटिमाते क्यों हैं, ग्रह क्यों नहीं टिमटिमाते, आकाश नीला क्यों है, सूर्योदय पर सूर्य लाल क्यों है, अंतरिक्ष यात्री को आकाश काला क्यों दिखता है, खतरे के संकेत लाल क्यों हैं — ये छह प्रश्न इस अध्याय की जान हैं; प्रत्येक का उत्तर दो-तीन पंक्तियों में कारण सहित तैयार करें।
  • तुलना-Table से उत्तर बनाएँ: तीनों दृष्टि दोषों की तुलना वाली table याद कर लें — लक्षण, कारण, प्रतिबिंब की स्थिति व संशोधक लेंस। दीर्घ उत्तरीय प्रश्न में यही table अंक दिलाती है।
  • MCQ के तथ्य रटें नहीं, जोड़कर याद करें: 25 cm, अनंत, − का अर्थ अवतल, + का अर्थ उत्तल, बैंगनी = अधिकतम विचलन — ये तथ्य कहानी से जुड़े हैं, इसलिए उदाहरण से जोड़कर याद करें, भूलेंगे नहीं।
  • पिछले वर्षों के BSEB प्रश्न-पत्रों से इस अध्याय के प्रश्न हल करके जाएँ — InText व प्रश्नावली के प्रश्न अक्सर दोहराए जाते हैं।

📝 MCQ Quiz – 15 वस्तुनिष्ठ प्रश्न (स्वयं को जाँचें)

पहले बिना देखे हल करें, फिर “✅ उत्तर देखें” खोलकर मिलाएँ। अंत में Answer Key table दी गई है।

Q1. मानव नेत्र में वस्तु का प्रतिबिंब कहाँ बनता है? —

(A) कॉर्निया पर
(B) पुतली पर
(C) परितारिका पर
(D) दृष्टिपटल (रेटिना) पर

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (D) दृष्टिपटल (रेटिना) पर — वहीं प्रकाश-संवेदी कोशिकाएँ प्रतिबिंब को विद्युत संकेतों में बदलती हैं।

Q2. पुतली के आकार को नियंत्रित करने वाला भाग है —

(A) कॉर्निया
(B) परितारिका (आइरिस)
(C) दृष्टिपटल
(D) पक्ष्माभी पेशियाँ

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (B) परितारिका — यह पुतली को सिकोड़-फैलाकर नेत्र में जाने वाले प्रकाश की मात्रा नियंत्रित करती है।

Q3. सामान्य नेत्र के लिए निकट बिंदु की दूरी होती है —

(A) 2.5 cm
(B) 2.5 m
(C) 25 cm
(D) 25 m

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (C) 25 cm — यही सुस्पष्ट दर्शन की अल्पतम दूरी है; दूर बिंदु अनंत पर होता है।

Q4. निकट दृष्टि दोष के संशोधन के लिए उपयोग होता है —

(A) अवतल लेंस
(B) उत्तल लेंस
(C) द्विफोकसी लेंस
(D) बेलनाकार लेंस

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (A) अवतल लेंस — यह किरणों को फैलाकर प्रतिबिंब को रेटिना के सामने से खिसकाकर रेटिना पर बना देता है।

Q5. −2.0 D क्षमता वाले लेंस की फोकस दूरी है —

(A) +0.5 m
(B) −0.5 m
(C) −2 m
(D) +2 m

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (B) −0.5 m — f = 1/P = 1/(−2.0) = −0.5 m; ऋणात्मक चिह्न लेंस के अवतल होने को दर्शाता है।

Q6. प्रिज़्म से विक्षेपण में सबसे अधिक विचलित होने वाला रंग है —

(A) बैंगनी
(B) लाल
(C) हरा
(D) पीला

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (A) बैंगनी — काँच में इसकी चाल सबसे कम व अपवर्तनांक सबसे अधिक होता है; लाल सबसे कम विचलित होता है।

Q7. वर्णक्रम (VIBGYOR) के ठीक बीच में आने वाला रंग है —

(A) पीला
(B) नीला
(C) हरा
(D) नारंगी

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (C) हरा — क्रम है: बैंगनी, जामुनी, नीला, हरा, पीला, नारंगी, लाल।

Q8. तारों के टिमटिमाने का कारण है —

(A) प्रकाश का प्रकीर्णन
(B) वायुमंडलीय अपवर्तन
(C) पूर्ण आंतरिक परावर्तन
(D) प्रकाश का विक्षेपण

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (B) वायुमंडलीय अपवर्तन — हवा की बदलती परतों से आँख में पहुँचने वाले प्रकाश की मात्रा घटती-बढ़ती रहती है।

Q9. आकाश के नीले दिखाई देने का कारण है —

(A) लाल प्रकाश का सर्वाधिक प्रकीर्णन
(B) वायु द्वारा प्रकाश का अवशोषण
(C) नीले प्रकाश का सर्वाधिक प्रकीर्णन
(D) समुद्र के नीले जल का परावर्तन

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (C) नीले प्रकाश का सर्वाधिक प्रकीर्णन — सूक्ष्म कण छोटी तरंगदैर्घ्य वाले नीले प्रकाश को सबसे अधिक बिखेरते हैं।

Q10. खतरे के संकेतों के लिए लाल रंग चुने जाने का वैज्ञानिक कारण है —

(A) लाल रंग सबसे अधिक प्रकीर्णित होता है
(B) लाल प्रकाश का प्रकीर्णन सबसे कम होता है, इसलिए वह सबसे दूर तक दिखाई देता है
(C) लाल रंग आँख को सबसे अधिक चुभता है
(D) लाल रंग बनाना सबसे सस्ता है

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (B) लाल प्रकाश का प्रकीर्णन सबसे कम — सबसे अधिक तरंगदैर्घ्य के कारण यह धूल, धुएँ व कोहरे में भी दूर तक स्पष्ट दिखता है।

Q11. द्विफोकसी लेंस की आवश्यकता मुख्यतः किसमें होती है? —

(A) केवल मायोपिया में
(B) केवल हाइपरमेट्रोपिया में
(C) मोतियाबिंद में
(D) जरादृष्टि दोष में, जब दूर व निकट दोनों के लिए अलग लेंस चाहिए

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उत्तर: (D) जरादृष्टि दोष में — ऊपरी भाग में अवतल (दूर के लिए) व निचले भाग में उत्तल (निकट के लिए) लेंस होता है।

Q12. दूर दृष्टि दोष से पीड़ित व्यक्ति का निकट बिंदु होता है —

(A) 25 cm से कम दूरी पर
(B) 25 cm से अधिक दूरी पर
(C) ठीक 25 cm पर
(D) अनंत पर

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उत्तर: (B) 25 cm से अधिक दूरी पर — इसीलिए ऐसे व्यक्ति को किताब सामान्य से दूर रखकर पढ़नी पड़ती है।

Q13. दूर की वस्तु देखते समय समंजन में अभिनेत्र लेंस —

(A) पतला हो जाता है और उसकी फोकस दूरी बढ़ जाती है
(B) मोटा हो जाता है और उसकी फोकस दूरी घट जाती है
(C) आगे खिसक जाता है
(D) पीछे खिसक जाता है

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (A) पतला हो जाता है — पक्ष्माभी पेशियाँ शिथिल हो जाती हैं, वक्रता घटती है और फोकस दूरी बढ़ जाती है।

Q14. निम्न में से टिंडल प्रभाव का उदाहरण कौन-सा है? —

(A) प्रिज़्म से सात रंगों का बनना
(B) रेटिना पर उल्टा प्रतिबिंब बनना
(C) अंधेरे कमरे में छोटे छिद्र से आती सूर्य की किरण के मार्ग का दिखाई देना
(D) सूर्योदय का 2 मिनट पहले दिखना

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उत्तर: (C) किरण के मार्ग का दिखाई देना — धूल के कोलॉइडी कणों द्वारा प्रकाश के प्रकीर्णन से प्रकाश का पथ दृश्य हो जाता है, यही टिंडल प्रभाव है।

Q15. वायुमंडलीय अपवर्तन के कारण सूर्य हमें वास्तविक सूर्योदय से लगभग कितना पहले दिखाई देने लगता है? —

(A) लगभग 10 मिनट
(B) लगभग 2 मिनट
(C) लगभग 30 मिनट
(D) लगभग 1 घंटा

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उत्तर: (B) लगभग 2 मिनट — इसी प्रकार सूर्यास्त भी लगभग 2 मिनट विलंबित होता है, जिससे दिन लगभग 4 मिनट लंबा हो जाता है।

Answer Key – उत्तरमाला

प्रश्न 1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12 13 14 15
उत्तर D B C A B A C B C B D B A C B

❓ FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1. चश्मे के पर्चे पर लिखा “माइनस” और “प्लस” नंबर क्या बताता है?
उत्तर: ये नंबर लेंस की क्षमता (power) बताते हैं, जिसकी इकाई डायोप्टर (D) है। माइनस (−) नंबर का अर्थ है अवतल लेंस, जो निकट दृष्टि दोष (मायोपिया) के लिए लगता है; प्लस (+) नंबर का अर्थ है उत्तल लेंस, जो दूर दृष्टि दोष (हाइपरमेट्रोपिया) के लिए लगता है। नंबर का परिमाण जितना बड़ा, दोष उतना ही अधिक और लेंस की फोकस दूरी उतनी ही कम — क्योंकि P = 1/f, अर्थात क्षमता और फोकस दूरी एक-दूसरे के व्युत्क्रम हैं।

प्रश्न 2. क्या लगातार चश्मा पहनने से आँख का नंबर बढ़ जाता है?
उत्तर: यह एक आम भ्रम है। चश्मा केवल दोष को संशोधित करता है — वह प्रतिबिंब को रेटिना पर बना देता है; वह न तो दोष को बढ़ाता है और न ही नेत्र-गोलक के आकार को बदलकर दोष को ठीक कर देता है। बच्चों व किशोरों में नंबर शरीर की वृद्धि के साथ नेत्र-गोलक के आकार में बदलाव के कारण बदल सकता है, चाहे चश्मा पहना जाए या न पहना जाए। इसके विपरीत, बिना चश्मे के ज़ोर लगाकर देखने से आँखों में थकान व सिरदर्द होता है — इसलिए बताया गया चश्मा नियमित पहनना ही सही है, और समय-समय पर नेत्र-परीक्षण कराते रहना चाहिए।

प्रश्न 3. इंद्रधनुष हमेशा सूर्य के विपरीत दिशा में ही क्यों बनता है?
उत्तर: इंद्रधनुष बनने के लिए सूर्य का प्रकाश वर्षा की बूँदों में घुसकर अपवर्तित व विक्षेपित हो, बूँद के अंदर आंतरिक परावर्तन से पीछे की ओर लौटे और फिर अपवर्तित होकर हमारी आँख तक आए — यह ज्यामिति तभी बनती है जब सूर्य हमारे पीछे हो और बूँदें हमारे सामने हों। इसीलिए सुबह का इंद्रधनुष पश्चिम में और शाम का इंद्रधनुष पूर्व में दिखाई देता है — हमेशा सूर्य की उल्टी दिशा में।

प्रश्न 4. क्या केवल InText और प्रश्नावली के प्रश्न तैयार करना काफ़ी है?
उत्तर: इस अध्याय के लिए लगभग हाँ — Board के अधिकांश प्रश्न इन्हीं 17 प्रश्नों (InText 4 + प्रश्नावली 13) से सीधे या हल्के बदलाव के साथ आते हैं। साथ में तीनों दोषों की तुलना-table, P = 1/f के numerical और छह “क्यों” वाले कारण-प्रश्न (तारे, ग्रह, नीला आकाश, लाल सूर्य, काला अंतरिक्ष-आकाश, लाल संकेत) तैयार कर लें, तो वस्तुनिष्ठ व लघु उत्तरीय — दोनों की तैयारी पूरी हो जाएगी।

प्रश्न 5. NCERT की किताब (PDF) कहाँ से मिलेगी?
उत्तर: NCERT की आधिकारिक वेबसाइट ncert.nic.in से Class 10 Science की किताब का PDF बिल्कुल मुफ़्त डाउनलोड किया जा सकता है। वहीं से आप हर अध्याय की मूल किताब पढ़ सकते हैं।

🔗 Pichhla / Agla Adhyay – पिछले व अगले अध्याय पढ़ें

⬅️ पिछला अध्याय: अध्याय 10 — प्रकाश – परावर्तन तथा अपवर्तन (Light – Reflection and Refraction): Class 10 Science Chapter 10

➡️ अगला अध्याय: अध्याय 12 — विद्युत (Electricity): Class 10 Science Chapter 12

📚 सभी अध्यायों की सूची यहाँ देखें: NCERT Class 10 Bihar Board Science Book

🔚 Conclusion – निष्कर्ष

बधाई हो! आपने भौतिकी का सबसे सुंदर अध्याय पूरा कर लिया। अब आप जानते हैं कि नेत्र के हर भाग का काम क्या है, समंजन से आँख निकट-दूर दोनों को कैसे फोकस करती है, तीनों दृष्टि दोष क्यों होते हैं और किस लेंस से ठीक होते हैं, प्रिज़्म श्वेत प्रकाश को सात रंगों में कैसे बाँटता है, वर्षा की बूँदें इंद्रधनुष कैसे बनाती हैं, और तारों के टिमटिमाने से लेकर आकाश के नीले रंग तक — हर घटना के पीछे अपवर्तन व प्रकीर्णन का कौन-सा नियम काम करता है।

ऊपर दिए गए सभी 17 हल किए गए प्रश्नों (InText 4 + प्रश्नावली 13), लेंस-शक्ति के उदाहरणों और 15 MCQ का अभ्यास कीजिए। किताब का मूल पाठ पढ़ने के लिए NCERT की आधिकारिक वेबसाइट ncert.nic.in से PDF ले सकते हैं। अब अगले अध्याय — विद्युत — की तैयारी शुरू कीजिए; वहाँ धारा और विभवांतर की नई दुनिया आपका इंतज़ार कर रही है। शुभकामनाएँ, मेहनत जारी रखिए!