NCERT Class 10 Science Chapter 9 Heredity and Evolution in Hindi | आनुवंशिकता एवं जैव विकास Notes, MCQ व प्रश्न-उत्तर

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परिचय – यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है?

Class 10 Science Chapter 9 Heredity and Evolution के NCERT Solutions आपको इस पेज पर सरल हिंदी में, किताब के क्रम से मिलेंगे। Class 10 Science Chapter 9 Heredity and Evolution यानी आनुवंशिकता एवं जैव विकास — यह अध्याय उन दो बड़े सवालों के जवाब देता है जो हर बच्चे के मन में कभी-न-कभी आते हैं: “मैं अपने माता-पिता जैसा क्यों दिखता हूँ?” और “धरती पर इतने तरह के जीव आए कहाँ से?”

ज़रा अपने परिवार को देखिए — किसी की आँखें माँ जैसी हैं, किसी की नाक पिता जैसी, और दादी कहती हैं, “बिल्कुल अपने दादा पर गया है!” यह कोई संयोग नहीं है — यह आनुवंशिकता है। माता-पिता के लक्षण बच्चों में उतरते कैसे हैं, यही इस अध्याय के पहले भाग में हम मेंडल के मटर वाले प्रसिद्ध प्रयोगों से सीखेंगे।

अध्याय का दूसरा भाग और भी रोमांचक है — जैव विकास। आज से करोड़ों वर्ष पहले धरती पर केवल सरल जीव थे; फिर धीरे-धीरे मछलियाँ, मेंढक, छिपकलियाँ, पक्षी, स्तनधारी और अंत में मानव आए। यह बदलाव हुआ कैसे? इसके प्रमाण हमें जीवाश्मों, समजात व समवृत्ति अंगों से मिलते हैं। सच मानिए, यह अध्याय किताब का सबसे कहानी-भरा अध्याय है!

Bihar Board (BSEB) Class 10 की परीक्षा में इस अध्याय से हर साल प्रश्न आते हैं — मेंडल के संकरण व अनुपात (3:1, 9:3:3:1) पर वस्तुनिष्ठ (MCQ) प्रश्न, लिंग निर्धारण व समजात-समवृत्ति अंगों पर लघु उत्तरीय प्रश्न और प्राकृतिक चयन व जाति उद्भव पर दीर्घ उत्तरीय प्रश्न। यह अध्याय समझ-आधारित है — एक बार कहानी समझ आ गई तो उत्तर अपने आप बनने लगते हैं।

📌 खास बात: ध्यान रखिए, Bihar Board की किताब में यह अध्याय पुरानी NCERT किताब वाला है — इसमें आनुवंशिकता के साथ-साथ जैव विकास का पूरा भाग (समजात/समवृत्ति अंग, जीवाश्म, मानव विकास) भी है। Board में विकास वाले भाग से भी नियमित प्रश्न आते हैं, इसलिए इस पेज पर दोनों भाग पूरे-पूरे दिए गए हैं — कुछ भी छोड़ा नहीं गया है।

📋 अध्याय की जानकारी (Chapter Information)

Board Bihar Board (BSEB)
Textbook NCERT
Class 10
Subject Science (विज्ञान)
Chapter 9
Chapter Name Heredity and Evolution (आनुवंशिकता एवं जैव विकास)
कुल हल किए गए प्रश्न 26 (InText 14 + प्रश्नावली 12)

📚 इस Chapter में क्या-क्या है? (Topics)

  1. 9.1 जनन के समय उत्पन्न विभिन्नताएँ – अलैंगिक व लैंगिक जनन में विभिन्नता, आनुवंशिक लक्षण बनाम अर्जित लक्षण
  2. 9.2 आनुवंशिकता
    • आनुवंशिक लक्षण व नियम — मेंडल का योगदान
    • एक-संकर संकरण (Monohybrid Cross) – 3:1 व 1:2:1 अनुपात
    • द्वि-संकर संकरण (Dihybrid Cross) – 9:3:3:1 अनुपात व स्वतंत्र अपव्यूहन
    • लक्षण अपने-आप को कैसे प्रकट करते हैं? – जीन, DNA व प्रोटीन
    • लिंग निर्धारण (Sex Determination) – XX व XY गुणसूत्र
  3. 9.3 जैव विकास
    • एक दृष्टांत से समझें — भृंगों (beetles) वाला उदाहरण व प्राकृतिक चयन
    • अर्जित लक्षण बनाम आनुवंशिक लक्षण, जाति उद्भव (Speciation)
    • जैव विकास व वर्गीकरण, विकासीय संबंधों का अनुरेखण
    • समजात अंग, समवृत्ति अंग व अवशेषी अंग
    • जीवाश्म (Fossils) — बनना व आयु निर्धारण (Dating)
    • मानव विकास (Human Evolution)
  4. पाठ्य-पुस्तक के प्रश्न (InText) – 14 प्रश्न, NCERT क्रियाकलाप-आधारित उदाहरण, प्रश्नावली के 12 प्रश्न
  5. Case Study, Quick Revision, Common Mistakes, Bihar Board Exam Tips, MCQ Quiz व FAQ

📊 Key Concepts – मुख्य परिभाषाएँ व नियम

पद / नियम अर्थ (एक लाइन में)
आनुवंशिकता (Heredity) माता-पिता के लक्षणों का संतानों में उतरना — एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में लक्षणों का संचरण।
विभिन्नता (Variation) एक ही जाति के जीवों के बीच पाए जाने वाले अंतर — जैसे कद, आँखों का रंग, कान की लोलकी का जुड़ा या मुक्त होना।
लक्षण (Trait / Character) जीव की कोई पहचान योग्य विशेषता — जैसे पौधे की लंबाई, फूल का रंग, बीज की आकृति।
जीन (Gene) DNA का वह खंड जो किसी एक प्रोटीन के बनने की सूचना रखता है और किसी लक्षण को नियंत्रित करता है — आनुवंशिकता की इकाई।
गुणसूत्र (Chromosome) कोशिका के केंद्रक में स्थित धागे-जैसी संरचना, जिस पर जीन लगे होते हैं; जीन गुणसूत्रों द्वारा ही संतानों में जाते हैं।
प्रभावी लक्षण (Dominant) वह लक्षण जो संकर (विषमयुग्मजी) अवस्था में भी प्रकट हो जाता है — जैसे मटर की लंबाई (T)।
अप्रभावी लक्षण (Recessive) वह लक्षण जो प्रभावी लक्षण की उपस्थिति में छिपा रहता है और केवल शुद्ध अवस्था में ही प्रकट होता है — जैसे बौनापन (t)।
जीनप्ररूप (Genotype) किसी लक्षण के लिए जीव की जीन-जोड़ी — जैसे TT, Tt या tt।
प्ररूप / लक्षणप्ररूप (Phenotype) बाहर से दिखने वाला लक्षण — जैसे लंबा या बौना पौधा। TT व Tt दोनों का प्ररूप “लंबा” ही होता है।
युग्मक (Gamete) जनन कोशिका — नर में शुक्राणु व मादा में अंडाणु; प्रत्येक युग्मक में हर जीन की केवल एक प्रति जाती है।
विसंयोजन का नियम (Law of Segregation) युग्मक बनते समय जीन की जोड़ी के दोनों कारक अलग-अलग हो जाते हैं, ताकि हर युग्मक को एक ही कारक मिले।
स्वतंत्र अपव्यूहन (Independent Assortment) एक लक्षण की वंशागति दूसरे लक्षण से स्वतंत्र होती है — द्वि-संकर संकरण का 9:3:3:1 अनुपात इसी का प्रमाण है।
प्राकृतिक चयन (Natural Selection) प्रकृति उन जीवों को चुनती है जिनके लक्षण उस पर्यावरण में जीवित रहने व जनन करने में सहायक हों — डार्विन का सिद्धांत।
जाति उद्भव (Speciation) किसी जाति की जनसंख्या का विभाजित होकर नई जाति का बनना, जब दो समूह आपस में जनन ही न कर सकें।
समजात अंग (Homologous Organs) वे अंग जिनकी मूल संरचना समान, परंतु कार्य भिन्न होते हैं — जैसे मानव की भुजा व कुत्ते का अगला पैर।
समवृत्ति अंग (Analogous Organs) वे अंग जिनका कार्य समान, परंतु मूल संरचना व उत्पत्ति भिन्न होती है — जैसे पक्षी के पंख व तितली के पंख।
जीवाश्म (Fossil) मृत जीवों के वे अवशेष या छाप जो लाखों-करोड़ों वर्षों तक मिट्टी-पत्थर की परतों में सुरक्षित रह गए।
जैव विकास (Evolution) पीढ़ी-दर-पीढ़ी छोटे-छोटे बदलावों से समय के साथ जीवों में बड़ा परिवर्तन आना और नई जातियों का बनना।

सबसे काम की बात: इस पूरे अध्याय की कुंजी एक ही वाक्य है — लक्षण जीन से बनते हैं, जीन DNA पर होते हैं, और युग्मकों द्वारा जीन ही माता-पिता से संतानों में जाते हैं। जो बदलाव केवल शरीर की साधारण कोशिकाओं में हो और युग्मक के DNA तक न पहुँचे, वह अगली पीढ़ी में नहीं जाता!

विभिन्नता कैसे बनती है? – अलैंगिक व लैंगिक जनन

आइए शुरुआत एक सवाल से करें — गन्ने के खेत के सारे पौधे लगभग एक जैसे क्यों दिखते हैं, जबकि एक ही कक्षा के बच्चे सब एक-दूसरे से अलग क्यों दिखते हैं? जवाब जनन की विधि में छिपा है।

अलैंगिक जनन (Asexual Reproduction) में केवल एक ही जनक होता है। संतानें जनक की लगभग हू-ब-हू प्रतियाँ (copies) बनती हैं, क्योंकि नया जीव जनक के DNA की प्रतिलिपि से ही बनता है। प्रतिलिपि बनाते समय कभी-कभी बहुत छोटी-सी त्रुटि हो जाती है — बस, वही छोटी-सी विभिन्नता है। इसलिए अलैंगिक जनन में विभिन्नताएँ बहुत कम होती हैं। ईख (गन्ना), आलू, गुलाब की कलम — सब इसी के उदाहरण हैं।

लैंगिक जनन (Sexual Reproduction) में दो जनक होते हैं — नर व मादा। संतान को आधे जीन पिता से और आधे माता से मिलते हैं। दो अलग-अलग जीवों के जीनों का यह नया मेल हर संतान को एक नई पहचान देता है। ऊपर से, युग्मक बनते समय जीनों का अदला-बदली व मिश्रण भी होता है। इसीलिए लैंगिक जनन से उत्पन्न संतानों में विभिन्नताएँ बहुत अधिक होती हैं — भाई-बहन भी एक जैसे नहीं होते!

बात अलैंगिक जनन लैंगिक जनन
जनक केवल एक दो (नर व मादा)
संतान जनक की लगभग समान प्रतिलिपि दोनों जनकों का मिश्रित रूप
विभिन्नता बहुत कम — केवल DNA प्रतिलिपि की छोटी त्रुटियों से बहुत अधिक — दो जनकों के जीनों के नए संयोजन से
उदाहरण अमीबा, ईख, आलू, गुलाब की कलम मानव, कुत्ता, मटर, आम का पेड़

विभिन्नता जीवित रहने के लिए क्यों ज़रूरी है?

मान लीजिए किसी जीवाणु-समूह के सभी जीव बिल्कुल एक जैसे हैं और अचानक वातावरण गरम हो जाए। यदि किसी भी जीव में गरमी सहने की विभिन्नता नहीं है, तो सारे जीव एक साथ मर जाएँगे और जाति ही समाप्त हो जाएगी। परंतु यदि कुछ जीवों में पहले से ही गरमी सहने वाला लक्षण (विभिन्नता) मौजूद है, तो वे जीवित रहकर जनन करेंगे और जाति बच जाएगी।

निष्कर्ष: विभिन्नता किसी जाति की बीमा पॉलिसी है — वातावरण बदलने पर वही विभिन्नताएँ कुछ जीवों को जीवित रखकर जाति को विलुप्त होने से बचाती हैं।

📌 याद रखें: अलैंगिक जनन में भी विभिन्नता शून्य नहीं होती — DNA की प्रतिलिपि बनने की त्रुटियाँ हर पीढ़ी में कुछ-न-कुछ नया बदलाव लाती रहती हैं। अंतर केवल मात्रा का है — अलैंगिक में कम, लैंगिक में बहुत अधिक।

एक साँस में समझें — एक जनक हो तो प्रतियाँ लगभग समान; दो जनक हों तो हर संतान एक नया संयोजन, इसीलिए विभिन्नता अधिक।

आनुवंशिक लक्षण बनाम अर्जित लक्षण

अब एक बहुत ही महत्वपूर्ण अंतर समझिए, क्योंकि इसी पर अध्याय के कई प्रश्न टिके हैं।

आनुवंशिक लक्षण (Inherited Traits) वे हैं जो हमें जन्म से, जीनों के माध्यम से माता-पिता से मिलते हैं — आँखों का रंग, बालों का घुँघरालापन, कान की लोलकी (earlobe) का जुड़ा या मुक्त होना, लंबाई की प्रवृत्ति आदि। ये लक्षण युग्मकों के DNA में लिखे होते हैं, इसलिए पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलते हैं।

अर्जित लक्षण (Acquired Traits) वे हैं जो कोई जीव अपने जीवनकाल में, अपने अनुभव व अभ्यास से प्राप्त करता है — तैरना सीखना, साइकिल चलाना, पहलवान की मज़बूत माँसपेशियाँ, पढ़कर ज्ञान बढ़ाना या भुखमरी से वज़न कम होना। ये बदलाव शरीर की साधारण कोशिकाओं में होते हैं, युग्मक (जनन कोशिकाओं) के DNA में नहीं।

सुनहरा नियम: जो बदलाव युग्मक के DNA में नहीं पहुँचा, वह संतान को मिल ही नहीं सकता। इसीलिए अर्जित लक्षण वंशानुगत नहीं होते — पहलवान का बेटा अपने-आप पहलवान नहीं बनता, उसे भी व्यायाम करना पड़ता है!

NCERT का प्रसिद्ध उदाहरण याद रखिए — यदि भृंगों (beetles) की किसी जनसंख्या में भोजन की कमी (भुखमरी) के कारण भृंगों का औसत वज़न कुछ पीढ़ियों तक कम रह जाए, तो यह बदलाव अर्जित है। भोजन फिर से पर्याप्त मिलते ही भृंगों का वज़न सामान्य हो जाएगा, क्योंकि उनके जीनों में कोई बदलाव हुआ ही नहीं था। इसके विपरीत, यदि किसी भृंग में जीन बदलने से हरा रंग आ जाए (आनुवंशिक बदलाव), तो वह रंग उसकी संतानों में भी जाएगा।

बात आनुवंशिक लक्षण अर्जित लक्षण
कैसे मिलता है? जन्म से — माता-पिता के जीनों द्वारा जीवनकाल में — अनुभव, अभ्यास या वातावरण से
DNA में बदलाव? हाँ — युग्मकों के DNA में होता है नहीं — केवल साधारण कोशिकाओं/शरीर में होता है
संतान में जाएगा? हाँ नहीं
उदाहरण आँखों का रंग, घुँघराले बाल, मुक्त कान-लोलकी तैरना, पहलवान की माँसपेशियाँ, भुखमरी से कम वज़न

एक साँस में समझें — जीन से मिला तो आनुवंशिक और पीढ़ियों तक चलेगा; जीवन में कमाया तो अर्जित और उसी जीव के साथ समाप्त।

मेंडल के प्रयोग – बगीचे के मटर से निकले प्रकृति के नियम

लगभग 160 वर्ष पहले, ग्रेगर जॉहन मेंडल (Gregor Johann Mendel) नाम के एक वैज्ञानिक-पुजारी ने अपने मठ के बगीचे में मटर (Pisum sativum) के पौधों पर वर्षों तक प्रयोग किए। उन्होंने एक-एक लक्षण को बारीकी से गिना और प्रायः हर बार कुछ निश्चित अनुपात पाए। इन्हीं गिनतियों से आनुवंशिकता के नियम बने — इसीलिए मेंडल को “आनुवंशिकता का जनक (Father of Genetics)” कहा जाता है।

मेंडल ने मटर ही क्यों चुना? क्योंकि मटर में कई लक्षण स्पष्ट दो रूपों में मिलते हैं — पौधा या तो लंबा होगा या बौना; बीज या तो गोल होगा या झुर्रीदार; फूल या तो बैंगनी होगा या सफ़ेद। बीच का कोई धुंधला रूप नहीं! साथ ही मटर का पौधा जल्दी बढ़ता है और उसमें स्व-परागण व पर-परागण दोनों आसानी से कराए जा सकते हैं।

आगे बढ़ने से पहले तीन शब्द पक्के कर लीजिए:

  • शुद्ध (Pure / समयुग्मजी, Homozygous): जब किसी लक्षण के दोनों कारक एक जैसे हों — TT या tt। ऐसा पौधा हमेशा अपने जैसा ही लक्षण देता है।
  • संकर (Hybrid / विषमयुग्मजी, Heterozygous): जब दोनों कारक अलग-अलग हों — Tt।
  • F1 व F2 पीढ़ी: जनकों (P) की संतानों को प्रथम संतानीय पीढ़ी (F1) और F1 के आपसी संकरण से बनी संतानों को द्वितीय संतानीय पीढ़ी (F2) कहते हैं।

एक-संकर संकरण (Monohybrid Cross) – केवल एक लक्षण का खेल

मान लीजिए हम केवल एक ही लक्षण — पौधे की लंबाई — को देखें। मेंडल ने शुद्ध लंबे (TT) पौधे का संकरण शुद्ध बौने (tt) पौधे से कराया।

पहली पीढ़ी (F1): लंबे पौधे से हर युग्मक में T कारक गया और बौने पौधे से हर युग्मक में t कारक। इसलिए सभी संतानों का जीनप्ररूप Tt बना — और चमत्कार यह कि सभी पौधे लंबे हुए! बौनापन कहीं दिखा ही नहीं। इससे मेंडल ने निष्कर्ष निकाला कि T (लंबाई) प्रभावी (dominant) है और t (बौनापन) अप्रभावी (recessive) — अप्रभावी लक्षण प्रभावी की उपस्थिति में छिप जाता है, मिटता नहीं।

दूसरी पीढ़ी (F2): अब मेंडल ने F1 के दो Tt पौधों का आपस में संकरण कराया। हर Tt पौधा दो तरह के युग्मक बनाता है — आधे में T, आधे में t। इनके मेल को Punnett वर्ग (Punnett Square) से देखिए:

युग्मक ♀ \ ♂ T t
T TT (लंबा) Tt (लंबा)
t Tt (लंबा) tt (बौना)

वर्ग के चार खानों को गिनिए:

जीनप्ररूप अनुपात (Genotypic Ratio): TT : Tt : tt = 1 : 2 : 1
प्ररूप अनुपात (Phenotypic Ratio): लंबे पौधे (TT + Tt + Tt = 3) : बौना पौधा (tt = 1) = 3 : 1

देखा आपने! F1 में गायब हुआ बौनापन F2 में फिर से प्रकट हो गया — वह भी निश्चित अनुपात 3 : 1 में। यही प्रयोग सिद्ध करता है कि:

  • लक्षण कारकों (जीनों) के जोड़े द्वारा नियंत्रित होते हैं — हर संतान को एक कारक माता से, एक पिता से मिलता है।
  • प्रभावी लक्षण संकर अवस्था में भी दिखता है; अप्रभावी केवल शुद्ध (tt) अवस्था में ही दिखता है।
  • युग्मक बनते समय जोड़ी के कारक अलग (विसंयोजित) हो जाते हैं — यही विसंयोजन का नियम (Law of Segregation) है। इसीलिए Tt पौधा भी शुद्ध T व शुद्ध t — दोनों तरह के युग्मक बनाता है।

📌 सबसे आम भ्रम: 3 : 1 प्ररूप (दिखने वाले लक्षण) का अनुपात है, जबकि 1 : 2 : 1 जीनप्ररूप (जीन-जोड़ी) का अनुपात है। दोनों को उलटा लिख देना Board में अंक कटवाता है — गिनकर दोनों दोबारा जाँचने की आदत डालिए: 3 लंबे + 1 बौना; और TT एक, Tt दो, tt एक।

द्वि-संकर संकरण (Dihybrid Cross) – दो लक्षण एक साथ

अब मेंडल ने दो लक्षण एक साथ लिए — बीज की आकृति (गोल R = प्रभावी, झुर्रीदार r = अप्रभावी) और बीज का रंग (पीला Y = प्रभावी, हरा y = अप्रभावी)। शुद्ध गोल-पीले (RRYY) पौधे का संकरण शुद्ध झुर्रीदार-हरे (rryy) पौधे से कराया।

F1 पीढ़ी: सभी संतानें RrYy बनीं और सभी के बीज गोल व पीले हुए — फिर से दोनों प्रभावी लक्षण ही दिखे।

F2 पीढ़ी: दो RrYy पौधों का संकरण कराया। यहाँ जादू यह है कि RrYy पौधा चार प्रकार के युग्मक बनाता है — RY, Ry, rY, ry — क्योंकि गोल-झुर्रीदार वाले कारक और पीला-हरा वाले कारक एक-दूसरे से स्वतंत्र रूप से युग्मकों में जाते हैं। 4 × 4 = 16 खानों वाला Punnett वर्ग देखिए:

♀ \ ♂ RY Ry rY ry
RY RRYY RRYy RrYY RrYy
Ry RRYy RRyy RrYy Rryy
rY RrYY RrYy rrYY rrYy
ry RrYy Rryy rrYy rryy

अब 16 खानों को दिखने वाले लक्षण (प्ररूप) के हिसाब से गिनिए:

गोल व पीले (R_ Y_) = 9  |  गोल व हरे (R_ yy) = 3  |  झुर्रीदार व पीले (rr Y_) = 3  |  झुर्रीदार व हरे (rryy) = 1
F2 प्ररूप अनुपात = 9 : 3 : 3 : 1

इस परिणाम में दो बातें गौर करने वाली हैं। पहली — गोल-हरे और झुर्रीदार-पीले जैसे बिल्कुल नए संयोजन बने, जो दोनों जनकों में नहीं थे। दूसरी — आकृति का लक्षण रंग के लक्षण से बिल्कुल स्वतंत्र रूप से संतानों में बँटा।

स्वतंत्र अपव्यूहन का नियम (Law of Independent Assortment): जब दो (या अधिक) लक्षणों में भिन्न पौधों में संकरण कराया जाता है, तो एक लक्षण की वंशागति दूसरे लक्षण की वंशागति से स्वतंत्र होती है — हर लक्षण अपने-अपने 3 : 1 के हिसाब से अलग-अलग बँटता है और इसीलिए नए-नए संयोजन बनते हैं।

एक साँस में समझें — एक लक्षण का F2 हिसाब 3 : 1 है; दो लक्षण साथ चलें तो (3 : 1) × (3 : 1) = 9 : 3 : 3 : 1 हो जाता है, और बीच-बीच में नए संयोजन भी बनते हैं।

जीन, गुणसूत्र और DNA – लक्षण प्रकट कैसे होते हैं?

मेंडल ने जिन “कारकों” की बात कही थी, आज हम उन्हें जीन के नाम से जानते हैं। कहानी को क्रम से समझिए:

हर कोशिका के केंद्रक में गुणसूत्र (chromosomes) होते हैं। गुणसूत्र DNA नामक लंबे अणु से बने होते हैं। DNA का वह छोटा-सा खंड, जिसमें किसी एक प्रोटीन को बनाने की सूचना लिखी होती है, जीन कहलाता है।

अब लंबाई वाला उदाहरण ही लीजिए। पौधे की लंबाई उसमें बनने वाले एक वृद्धि-हॉर्मोन की मात्रा पर निर्भर करती है। इस हॉर्मोन को बनाने वाला एंज़ाइम (प्रोटीन) यदि कुशलता से काम करे, तो हॉर्मोन पर्याप्त बनेगा और पौधा लंबा होगा। यदि जीन में बदलाव आ जाए और एंज़ाइम कम कुशल हो जाए, तो हॉर्मोन कम बनेगा और पौधा बौना रह जाएगा। बस — यही है जीन से लक्षण तक का पूरा रास्ता:

जीन (DNA का खंड) → प्रोटीन / एंज़ाइम बनता है → कोशिका का कार्य तय होता है → लक्षण प्रकट होता है

संतान को माता-पिता दोनों से बराबर हिस्सा कैसे मिलता है?

साधारण कोशिकाओं में हर गुणसूत्र की दो प्रतियाँ होती हैं — एक माता से आई, एक पिता से। परंतु युग्मक (शुक्राणु व अंडाणु) विशेष कोशिकाएँ हैं — उनमें हर गुणसूत्र की केवल एक प्रति जाती है। निषेचन के समय शुक्राणु (23 गुणसूत्र) व अंडाणु (23 गुणसूत्र) मिलते हैं और युग्मनज (zygote) में फिर से पूरे 46 गुणसूत्र (23 जोड़े) हो जाते हैं।

इसी व्यवस्था से दो बातें सुनिश्चित होती हैं — (1) हर संतान को माता व पिता से बराबर आनुवंशिक योगदान मिलता है, और (2) पीढ़ी-दर-पीढ़ी गुणसूत्रों की संख्या स्थिर बनी रहती है, दोगुनी नहीं होती। मानव में गुणसूत्रों के 23 जोड़े होते हैं — 22 जोड़े सामान्य (अलैंगिक) गुणसूत्र और 1 जोड़ा लिंग गुणसूत्र।

लिंग निर्धारण (Sex Determination) – बच्चा लड़का होगा या लड़की?

यह वह प्रश्न है जिसमें समाज में सबसे बड़ी गलतफ़हमी है, इसलिए इसे बहुत ध्यान से समझिए। मानव में लिंग, लिंग गुणसूत्रों से तय होता है:

  • महिला में लिंग गुणसूत्र = XX — दोनों एक जैसे। इसलिए महिला के सभी अंडाणुओं में केवल X गुणसूत्र ही जाता है।
  • पुरुष में लिंग गुणसूत्र = XY — दो अलग-अलग। इसलिए पुरुष के शुक्राणु दो प्रकार के बनते हैं — आधे में X और आधे में Y गुणसूत्र।
अंडाणु \ शुक्राणु X वाला शुक्राणु Y वाला शुक्राणु
X अंडाणु XX — लड़की XY — लड़का

तालिका से साफ है — यदि अंडाणु को X वाला शुक्राणु निषेचित करे तो XX = लड़की, और यदि Y वाला शुक्राणु निषेचित करे तो XY = लड़का बनता है। दोनों की संभावना बिल्कुल बराबर — 50 : 50।

सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष: बच्चे का लिंग इस बात पर निर्भर करता है कि पिता से X वाला शुक्राणु मिला या Y वाला — अर्थात आनुवंशिक रूप से बच्चे का लिंग पिता से तय होता है, क्योंकि माता के पास देने के लिए केवल X ही है। इसलिए लड़का या लड़की होने के लिए माँ को दोष देना वैज्ञानिक रूप से पूरी तरह गलत है।

📌 नोट: हर जीव में लिंग निर्धारण मानव-जैसा नहीं होता! कुछ सरीसृपों में निषेचित अंडे का तापमान लिंग तय करता है, और घोंघे (snail) जैसे जीव तो अपने जीवनकाल में लिंग बदल भी सकते हैं। मानव में लिंग पूरी तरह आनुवंशिक (XX/XY) रूप से तय होता है।

एक साँस में समझें — माँ हमेशा X देती है; पिता X दे तो लड़की, Y दे तो लड़का — निर्णय पिता के शुक्राणु का है।

जैव विकास – विभिन्नता से नई जाति तक का सफ़र

अब अध्याय के दूसरे बड़े भाग में आइए। सोचिए — यदि किसी जाति की हर संतान अपने जनकों जैसी ही होती, तो धरती पर आज भी केवल वही प्राचीन जीव होते जो अरबों वर्ष पहले बने थे। परंतु हम देखते हैं कि समय के साथ जीव बदले हैं — यही धीमा, पीढ़ियों तक चलने वाला बदलाव जैव विकास (Evolution) कहलाता है।

विकास की इंजन-रूम में तीन चीज़ें काम करती हैं:

  • विभिन्नताओं का बनना: DNA प्रतिलिपि की त्रुटियों और लैंगिक जनन में जीनों के नए संयोजनों से हर पीढ़ी में कुछ नए लक्षण आते रहते हैं।
  • चयन (Selection): जो विभिन्नता उस समय के वातावरण में लाभ देती है, उसके धारक अधिक जीवित रहते हैं और अधिक संतानें छोड़ते हैं — वह लक्षण जनसंख्या में बढ़ता जाता है।
  • समय: पीढ़ी-दर-पीढ़ी लक्षणों की आवृत्ति (frequency) बदलते-बदलते इतना अंतर आ जाता है कि अंततः नई जाति ही बन जाती है।

NCERT का भृंगों (Beetles) वाला उदाहरण – प्राकृतिक चयन समझिए

NCERT ने विकास समझाने के लिए एक बहुत सुंदर काल्पनिक उदाहरण दिया है। कल्पना कीजिए — लाल रंग के भृंग एक झाड़ी (bush) पर रहते हैं और पत्ते खाते हैं। इन भृंगों को कौए खाते हैं। अब तीन स्थितियाँ देखिए:

स्थिति 1 — हरा भृंग: भृंगों में जनन के समय (DNA प्रतिलिपि की त्रुटि से) एक भृंग हरा पैदा हो गया। हरी पत्तियों के बीच लाल भृंग कौओं को आसानी से दिख जाते थे, परंतु हरा भृंग नहीं दिखा — इसलिए कौए लाल भृंगों को खाते रहे और हरे भृंग बचे रहे। धीरे-धीरे हरे भृंगों की संतानों से हरे भृंगों की संख्या बढ़ गई। यह लाभदायक विभिन्नता थी — प्रकृति ने उसे चुन लिया।

स्थिति 2 — नीला भृंग: इसी बीच एक अन्य बदलाव से कुछ भृंग नीले भी बन गए। कौए लाल व नीले — दोनों को बराबर देख सकते थे, इसलिए दोनों समान रूप से खाए गए। नीले भृंगों की संख्या न तो बढ़ी, न घटी — यह विभिन्नता न लाभदायक थी, न हानिकारक। वह जनसंख्या में केवल संयोग (आनुवंशिक विचलन / genetic drift) से फैल या घट सकती है।

स्थिति 3 — हाथी का आना: अब मान लीजिए एक हाथी आया और झाड़ी को कुचल गया। अधिकांश भृंग मर गए — बचे केवल वे थोड़े-से जो संयोग से उस समय वहाँ नहीं थे या बच निकले, चाहे उनका रंग कुछ भी हो। भूख व दुर्घटना से घटी इस छोटी-सी बची हुई जनसंख्या से जब नई पीढ़ी बनेगी, तो उसकी जीन-संरचना दुर्घटना से पहले वाली जनसंख्या से बहुत अलग हो सकती है। यही आनुवंशिक विचलन (genetic drift) है — बिना किसी लाभ-हानि के, केवल दुर्घटना व संयोग से लक्षणों की आवृत्ति का बदल जाना।

स्थिति 4 — झाड़ी का रंग बदलना: कुछ वर्षों बाद पादप-रोग से झाड़ी की पत्तियाँ पीली पड़ने लगीं और साथ ही कौओं की संख्या भी घट गई। अब भोजन कम होने से भृंगों का औसत वज़न घटा (यह अर्जित बदलाव है — जीन नहीं बदले)। दूसरी ओर, बदले हुए परिवेश में अब तक जो विभिन्नताएँ चल रही थीं, उनका चयन का दबाव भी बदल गया। अर्थ यह है कि कौन-सी विभिन्नता “लाभदायक” है, यह पर्यावरण तय करता है — वातावरण बदला तो लाभदायक लक्षण भी बदल जाता है।

प्राकृतिक चयन (Natural Selection): चार्ल्स डार्विन के अनुसार, प्रकृति उन जीवों का चयन करती है जिनके लक्षण उस समय के पर्यावरण में जीवित रहने व जनन के लिए अधिक अनुकूल होते हैं। ऐसे जीव अधिक संताने छोड़ते हैं, इसलिए उनके जीन अगली पीढ़ियों में बढ़ते जाते हैं — यही प्रक्रिया लंबे समय में विकास का कारण बनती है।

📌 अंतर पकड़िए: प्राकृतिक चयन में लक्षण इसलिए बढ़ता है क्योंकि वह लाभ देता है (हरा रंग → कौए से बचना)। आनुवंशिक विचलन में लक्षण केवल संयोग/दुर्घटना से बढ़ या घट जाता है, लाभ से उसका कोई लेना-देना नहीं (हाथी वाली स्थिति)। Board में यह अंतर बहुत पूछा जाता है।

जाति उद्भव (Speciation) – नई जाति बनती कैसे है?

मान लीजिए भृंगों की एक बड़ी जनसंख्या किसी विस्तृत पर्वत-श्रृंखला पर फैली है। बीच में एक बड़ी नदी आ जाने से जनसंख्या दो भागों में बँट गई और भृंग नदी पार नहीं कर पाते। अब देखिए क्या होगा:

  • दोनों भागों में जनन तो चलेगा, परंतु जीन-प्रवाह (gene flow) रुक जाएगा — दोनों समूहों के जीन आपस में मिल नहीं पाएँगे।
  • दोनों किनारों का पर्यावरण थोड़ा अलग है, इसलिए प्राकृतिक चयन अलग-अलग दिशा में काम करेगा; साथ ही छोटी जनसंख्याओं में आनुवंशिक विचलन भी अलग बदलाव लाएगा।
  • पीढ़ियों तक ऐसा चलते रहने से दोनों समूहों के DNA में इतना अंतर आ जाएगा कि यदि वे फिर मिलें भी, तो आपस में जनन करके उपजाऊ संतानें पैदा ही न कर सकें।

जाति उद्भव: जब एक जाति की दो जनसंख्याएँ इतनी बदल जाएँ कि वे आपस में जनन न कर सकें, तो उन्हें दो अलग जातियाँ माना जाता है — और इसी प्रक्रिया को जाति उद्भव कहते हैं। इसके मुख्य कारक हैं — भौगोलिक पृथक्करण (geographical isolation), जीन-प्रवाह का रुकना, प्राकृतिक चयन और आनुवंशिक विचलन।

ध्यान दें — भौगोलिक पृथक्करण हर जीव पर एक जैसा असर नहीं करता। जो जीव स्व-परागण करने वाले पौधे हैं, उनमें तो जीन-प्रवाह पहले से ही बहुत सीमित होता है; और अलैंगिक जनन करने वाले जीवों में विभिन्नता इतनी कम होती है कि पृथक्करण अकेले नई जाति का मुख्य कारक नहीं बन पाता। ये दो बातें InText में भी पूछी गई हैं — आगे हल देखिए।

वर्गीकरण और जैव विकास – दो विषय, एक कहानी

वर्गीकरण (Classification) में हम जीवों को उनकी समानताओं व असमानताओं के आधार पर समूहों में बाँटते हैं। जितनी अधिक विशेषताएँ दो जातियों में समान मिलती हैं, उतना ही निकट उनका विकासीय संबंध माना जाता है — अर्थात उनका उभयनिष्ठ पूर्वज (common ancestor) उतना ही हाल का होगा। इसलिए वर्गीकरण असल में विकास के इतिहास का ही दर्पण है — जो जीव एक ही समूह में रखे जाते हैं, वे एक ही पूर्वज से विकसित माने जाते हैं। विकास को पीछे की ओर अनुरेखित (trace) करने के लिए वैज्ञानिक इन्हीं समानताओं, जीवाश्मों और DNA की तुलना का सहारा लेते हैं।

एक साँस में समझें — विभिन्नता बनती है, प्रकृति चुनती है, संयोग भी भूमिका निभाता है; पृथक्करण व समय मिल जाए तो नई जाति बन जाती है।

समजात अंग, समवृत्ति अंग व अवशेषी अंग – विकास के जीवित प्रमाण

अलग-अलग जीवों के अंगों की तुलना करने से विकास के सबसे मज़बूत प्रमाण मिलते हैं। तुलना करती हुई ये तीन श्रेणियाँ अच्छी तरह समझ लीजिए — Board की सबसे पसंदीदा table यही है।

समजात बनाम समवृत्ति — मुख्य table

बात समजात अंग (Homologous) समवृत्ति अंग (Analogous)
मूल संरचना (बनावट) समान होती है भिन्न होती है
कार्य भिन्न होते हैं समान होता है
उत्पत्ति / पूर्वज एक ही उभयनिष्ठ पूर्वज से विकसित अलग-अलग पूर्वजों से, स्वतंत्र रूप से विकसित
क्या सिद्ध करता है? अपसारी विकास (divergent evolution) — एक पूर्वज से अलग-अलग दिशाओं में विकास अभिसारी विकास (convergent evolution) — समान वातावरण में समान आवश्यकता से समान अंग बनना
उदाहरण मानव की भुजा, कुत्ते का अगला पैर, व्हेल का फ़्लिपर, चमगादड़ का पंख, मेंढक का अगला पैर — सबकी हड्डियों की मूल योजना एक जैसी, काम अलग-अलग (पकड़ना, दौड़ना, तैरना, उड़ना, कूदना) पक्षी के पंख व तितली (कीट) के पंख — दोनों उड़ने के काम आते हैं, परंतु बनावट बिल्कुल अलग; शकरकंद (जड़) व आलू (तना) — दोनों भोजन जमा करते हैं, परंतु उत्पत्ति अलग

याद रखने की तरकीब — “समजात = संरचना समान, कार्य भिन्न” और “समवृत्ति = कार्य समान, संरचना भिन्न”। शब्द पर ध्यान दें: जात यानी उत्पत्ति/वंश — जिनका वंश एक, वे समजात।

अवशेषी अंग (Vestigial Organs) – शरीर में छिपा इतिहास

कुछ अंग ऐसे भी होते हैं जो हमारे पूर्वजों में तो उपयोगी थे, परंतु अब हमारे लिए लगभग बेकार हो गए हैं — इन्हें अवशेषी अंग कहते हैं। मानव में अपेंडिक्स (appendix), अक्कल दाढ़ (wisdom teeth) और कान हिलाने वाली माँसपेशियाँ इसके उदाहरण हैं। ये अंग अपने अस्तित्व से बताते हैं कि हमारे पूर्वजों की जीवन-शैली अलग थी — समय के साथ आवश्यकता खत्म हुई तो अंग छोटे व निष्क्रिय होते गए, परंतु पूरी तरह मिटे नहीं। अवशेषी अंग भी विकास का सुंदर प्रमाण हैं।

📌 ध्यान दें: चमगादड़ का पंख समजात की सूची में (अन्य स्तनधारियों के अगले पैर से तुलना पर) और समवृत्ति की सूची में (कीट के पंख से तुलना पर) — दोनों जगह आ सकता है! उत्तर इस पर निर्भर करता है कि तुलना किससे की जा रही है। परीक्षा में हमेशा जोड़ी देखकर उत्तर लिखें।

जीवाश्म (Fossils) – पत्थरों में लिखी धरती की डायरी

जब कोई जीव मरता है, तो प्रायः उसके अवशेष सड़-गलकर नष्ट हो जाते हैं। परंतु कभी-कभी मृत जीव कीचड़-मिट्टी में ऐसा दब जाता है कि वह सड़ने से बच जाता है। हज़ारों-लाखों वर्षों में मिट्टी की परतें चट्टान बन जाती हैं और जीव के अवशेष या उसकी छाप पत्थर में सुरक्षित रह जाती है — यही जीवाश्म है। किसी जीव की हड्डी, दाँत, खोल — या केवल उसके पैरों के निशान भी जीवाश्म हो सकते हैं।

जीवाश्मों की आयु कैसे पता चलती है? (Dating)

विधि 1 — सापेक्ष विधि (Relative Method): धरती खोदने पर जो जीवाश्म गहरी परतों में मिलते हैं, वे अधिक पुराने होते हैं; सतह के पास मिलने वाले जीवाश्म अपेक्षाकृत नए होते हैं। यह विधि जीवाश्मों को पुराने-नए के क्रम में रखने में काम आती है।

विधि 2 — कार्बन काल-निर्धारण (Carbon Dating): जीवाश्म में उपस्थित कार्बन के समस्थानिकों (isotopes) के अनुपात को मापकर उसकी निरपेक्ष आयु का अनुमान लगाया जाता है। जीवित अवस्था में जीव कार्बन-14 ग्रहण करता रहता है; मृत्यु के बाद वह एक निश्चित दर से घटता रहता है — शेष मात्रा से ही समय गिना जाता है।

जीवाश्मों से हमें वे जीव भी जानने को मिलते हैं जो आज विलुप्त हो चुके हैं — जैसे डायनासोर, विशाल ऐमोनाइट (समुद्री जीव जिनके सर्पिल खोल के जीवाश्म मिलते हैं) आदि। और कुछ जीवाश्म तो दो वर्गों के बीच की कड़ी (connecting link) जैसे हैं — आर्किऑप्टेरिक्स (Archaeopteryx) में सरीसृपों जैसे दाँत व पूँछ भी थे और पक्षियों जैसे पंख भी — यह बताता है कि पक्षियों का विकास सरीसृपों से हुआ।

मानव विकास (Human Evolution) – संक्षिप्त झलक

मानव विकास का अध्ययन भी उन्हीं औज़ारों से होता है — उत्खनन (excavation), जीवाश्मों का काल-निर्धारण और DNA अनुक्रमों की तुलना। इन अध्ययनों से पता चलता है कि आधुनिक मानव, Homo sapiens, की उत्पत्ति अफ़्रीका में हुई। हमारे सबसे प्राचीन पूर्वज वहीं रहे; बाद में वे धीरे-धीरे अफ़्रीका से निकलकर एशिया, यूरोप व अन्य महाद्वीपों में फैलते गए।

रास्ते में कुछ समूह अलग-थलग हुए तो कुछ आगे बढ़े — इसी प्रवास के दौरान विभिन्न भागों में रहने वाले मानवों में त्वचा के रंग, कद-काठी जैसी सतही विभिन्नताएँ आईं। परंतु ये अंतर केवल सतही हैं — सभी मानव एक ही जाति Homo sapiens के सदस्य हैं और उनमें आपस में जनन संभव है। NCERT स्पष्ट कहता है — मानव “नस्लों” की कोई जैविक श्रेष्ठता या क्रम नहीं है; मानव विकास की कहानी यात्रा व फैलाव की कहानी है, किसी दौड़ की नहीं।

याद रखें: विकास का अर्थ “प्रगति” या “बेहतर बनना” नहीं है। विकास से जटिल संरचनाएँ बनीं, यह सत्य है — परंतु सरल जीव भी समाप्त नहीं हुए। जीवाणु आज भी गर्म झरनों व बर्फ़ीले प्रदेशों जैसे कठिन स्थानों में सफलतापूर्वक जीवित हैं। हर जीव अपने पर्यावरण के हिसाब से “उपयुक्त” है — कोई सार्वभौमिक रूप से “श्रेष्ठ” नहीं है।

एक साँस में समझें — समजात-समवृत्ति अंग, अवशेषी अंग, जीवाश्म और DNA — चारों गवाह एक ही कहानी कहते हैं: सभी जीव साझा पूर्वजों से विकसित हुए हैं।

📘 पाठ्य-पुस्तक के प्रश्न (InText Questions)

ये वे प्रश्न हैं जो NCERT किताब के अनुच्छेदों के बीच-बीच में दिए गए हैं। इस अध्याय में कुल 14 InText प्रश्न हैं, जो पाँच समूहों में आए हैं — Board में ये वैसे-के-वैसे पूछ लिए जाते हैं, इसलिए इन्हें सबसे पहले तैयार कीजिए।

(क) विभिन्नता पर आधारित प्रश्न

प्रश्न 1. यदि किसी अलैंगिक जनन वाली जाति की जनसंख्या में लक्षण ‘A’ 10% जीवों में और लक्षण ‘B’ 60% जीवों में पाया जाता है, तो कौन-सा लक्षण पहले उत्पन्न हुआ होगा?

हल:

चरण 1: अलैंगिक जनन में संतानें जनक की प्रतिलिपियाँ होती हैं और कोई नया लक्षण DNA प्रतिलिपि की त्रुटि से केवल एक जीव में उत्पन्न होता है।

चरण 2: वह लक्षण जितना पुराना होगा, उसकी प्रतियाँ उतनी ही अधिक पीढ़ियों से बनी होंगी — अर्थात वह जनसंख्या के उतने ही अधिक प्रतिशत जीवों में फैला होगा। लक्षण ‘B’ 60% जीवों में है, जबकि ‘A’ केवल 10% में।

उत्तर: लक्षण ‘B’ पहले उत्पन्न हुआ होगा, क्योंकि उसे फैलने के लिए अधिक समय मिला और वह 60% जनसंख्या तक पहुँच गया। लक्षण ‘A’ अपेक्षाकृत नया है, इसलिए केवल 10% जीवों में है।

प्रश्न 2. किसी जाति में विभिन्नताओं के उत्पन्न होने से उसके जीवित रहने की संभावना क्यों बढ़ जाती है?

हल: वातावरण लगातार बदलता रहता है — ताप, वर्षा, भोजन, रोग, सब कुछ। यदि जनसंख्या के सभी जीव एक जैसे होंगे, तो वातावरण के एक ही बड़े बदलाव में सभी एक साथ मर सकते हैं। विभिन्नताओं के कारण कुछ जीवों में ऐसे लक्षण मौजूद होते हैं जो बदले हुए वातावरण के अनुकूल होते हैं — उदाहरण के लिए, यदि क्षेत्र गरम हो जाए तो जिन जीवाणुओं में पहले से ही गरमी सहने की क्षमता (विभिन्नता) है, वे जीवित रहेंगे और जनन करके जाति को आगे बढ़ाएँगे।

उत्तर: विभिन्नताएँ किसी जाति के लिए सुरक्षा-कवच का काम करती हैं — वे यह संभावना बढ़ा देती हैं कि वातावरण बदलने पर भी जाति के कुछ जीव बचकर जनन कर सकें और जाति विलुप्त न हो।

(ख) आनुवंशिकता पर आधारित प्रश्न

प्रश्न 1. मेंडल के प्रयोगों से कैसे पता चला कि लक्षण प्रभावी या अप्रभावी हो सकते हैं?

हल: मेंडल ने शुद्ध लंबे (TT) व शुद्ध बौने (tt) मटर के पौधों में संकरण कराया। F1 पीढ़ी के सभी पौधे लंबे हुए — बौनापन दिखा ही नहीं। परंतु जब F1 पौधों (Tt) का आपस में संकरण कराया, तो F2 में लंबे व बौने पौधे 3 : 1 के अनुपात में आए — अर्थात बौनापन मिटा नहीं था, वह F1 में छिपा हुआ था।

उत्तर: इससे सिद्ध हुआ कि कुछ लक्षण प्रभावी होते हैं — वे संकर अवस्था (Tt) में भी प्रकट हो जाते हैं (लंबाई); और कुछ अप्रभावी होते हैं — वे प्रभावी लक्षण की उपस्थिति में छिपे रहते हैं और केवल शुद्ध अवस्था (tt) में प्रकट होते हैं (बौनापन)।

प्रश्न 2. मेंडल के प्रयोगों से कैसे पता चला कि लक्षण स्वतंत्र रूप से वंशानुगत होते हैं?

हल: द्वि-संकर संकरण में मेंडल ने दो लक्षण एक साथ लिए — बीज की आकृति (गोल/झुर्रीदार) व रंग (पीला/हरा)। यदि दोनों लक्षण एक-दूसरे से बँधे होते, तो F2 में केवल जनक-जैसे संयोजन (गोल-पीले व झुर्रीदार-हरे) ही मिलते। परंतु F2 में 9 : 3 : 3 : 1 अनुपात में नए संयोजन — गोल-हरे व झुर्रीदार-पीले बीज — भी बने।

उत्तर: नए संयोजनों के बनने से सिद्ध हुआ कि एक लक्षण की वंशागति दूसरे लक्षण से स्वतंत्र होती है — यही स्वतंत्र अपव्यूहन का नियम है।

प्रश्न 3. रक्त वर्ग ‘A’ वाला एक व्यक्ति रक्त वर्ग ‘O’ वाली एक स्त्री से विवाह करता है और उनकी पुत्री का रक्त वर्ग ‘O’ है। क्या यह सूचना पर्याप्त है यह बताने के लिए कि रक्त वर्ग ‘A’ या ‘O’ प्रभावी है? क्यों या क्यों नहीं?

हल:

चरण 1: पुत्री का रक्त वर्ग ‘O’ है, अर्थात उसे माता से ‘O’ कारक और पिता से भी ‘O’ कारक मिला होगा — क्योंकि ‘O’ लक्षण तभी प्रकट होता है जब दोनों कारक ‘O’ हों।

चरण 2: इसका अर्थ है कि पिता, जिसका रक्त वर्ग ‘A’ दिख रहा है, अपने जीनप्ररूप में विषमयुग्मजी है — उसके पास ‘A’ व ‘O’ दोनों कारक हैं (AO)। परंतु इतने से ही यह निश्चित नहीं होता कि सामान्यतः ‘A’ ही प्रभावी है — निष्कर्ष पक्का करने के लिए हमें यह भी जानना होगा कि पिता के पास ‘A’ कारक एक है या दो, और ऐसे और भी परिवारों के आँकड़े देखने होंगे। केवल एक संतान के आधार पर निर्णय विश्वसनीय नहीं बनता।

उत्तर: नहीं, यह सूचना पर्याप्त नहीं है। क्योंकि हम पिता का जीनप्ररूप (AA है या AO) व परिवार के अन्य आँकड़े नहीं जानते, एक ही उदाहरण से यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि ‘A’ प्रभावी है या ‘O’। (हाँ, पुत्री का ‘O’ होना यह ज़रूर बताता है कि पिता में ‘O’ कारक छिपा हुआ मौजूद था।)

प्रश्न 4. मनुष्यों में बच्चे का लिंग निर्धारण कैसे होता है?

हल: मानव में लिंग, लिंग गुणसूत्रों द्वारा तय होता है। महिला में XX गुणसूत्र होते हैं, इसलिए उसके सभी अंडाणुओं में X गुणसूत्र ही जाता है। पुरुष में XY गुणसूत्र होते हैं, इसलिए उसके आधे शुक्राणुओं में X और आधे में Y गुणसूत्र रहता है। निषेचन के समय यदि अंडाणु (X) से X-वाला शुक्राणु मिले तो XX — लड़की, और Y-वाला शुक्राणु मिले तो XY — लड़का बनता है। दोनों की प्रायिकता 50%–50% है।

उत्तर: बच्चे का लिंग पिता के शुक्राणु (X या Y) से निर्धारित होता है — माता हमेशा X ही देती है, अतः लिंग निर्धारण में माता की कोई भूमिका नहीं होती।

(ग) जैव विकास की कार्यप्रणाली पर आधारित प्रश्न

प्रश्न 1. वे कौन-से विभिन्न तरीके हैं जिनके द्वारा किसी विशेष लक्षण वाले जीवों की संख्या किसी जनसंख्या में बढ़ सकती है?

हल:

तरीका 1 — प्राकृतिक चयन: यदि वह लक्षण जीवित रहने में लाभ देता हो (जैसे हरे भृंगों का कौओं से बचना), तो उस लक्षण वाले जीव अधिक जीवित रहकर अधिक संतानें छोड़ेंगे और लक्षण फैल जाएगा।

तरीका 2 — आनुवंशिक विचलन (Genetic Drift): यदि कोई दुर्घटना (जैसे हाथी द्वारा झाड़ी कुचला जाना) जनसंख्या को बहुत छोटा कर दे, तो संयोग से बचे हुए जीवों के लक्षण — चाहे लाभदायक हों या न हों — अगली पीढ़ियों में प्रमुख हो सकते हैं। छोटे समूह में संयोग से भी किसी लक्षण की आवृत्ति बढ़ सकती है।

उत्तर: किसी लक्षण वाले जीवों की संख्या मुख्यतः दो तरीकों से बढ़ती है — (1) प्राकृतिक चयन द्वारा, जब लक्षण लाभदायक हो; और (2) आनुवंशिक विचलन द्वारा, जब दुर्घटना या संयोग से बचे हुए जीवों में वह लक्षण हो।

प्रश्न 2. किसी जीव के जीवनकाल में अर्जित लक्षण सामान्यतः अगली पीढ़ी में वंशानुगत क्यों नहीं होते?

हल: अर्जित लक्षण जीवनकाल में शरीर की साधारण (अजनन) कोशिकाओं व ऊतकों में आने वाले बदलाव हैं — जैसे माँसपेशियों का बढ़ना या ज्ञान अर्जित करना। ये बदलाव जनन कोशिकाओं (युग्मकों) के DNA में नहीं होते। संतान को केवल युग्मकों का DNA ही मिलता है, जिसमें अर्जित बदलाव लिखा ही नहीं गया होता।

उत्तर: क्योंकि अर्जित लक्षण युग्मकों के DNA को नहीं बदलते, इसलिए वे संतानों में वंशानुगत नहीं होते और विकास की दिशा भी तय नहीं कर सकते।

प्रश्न 3. बाघों की घटती हुई संख्या आनुवंशिकी के दृष्टिकोण से चिंता का विषय क्यों है?

हल: बाघों की संख्या बहुत कम रह जाने का अर्थ है कि जीवित बाघों के समूह में जीनों की विविधता (विभिन्नता) बहुत घट गई है। यदि वातावरण में कोई बड़ा बदलाव आए — कोई नया रोग फैल जाए या जलवायु बदल जाए — तो आवश्यक है कि कुछ बाघों में उससे बचने के अनुकूल जीन मौजूद हों। विविधता कम होने से ऐसी संभावना भी घट जाती है। साथ ही, छोटी जनसंख्या में निकट संबंधियों के बीच जनन बढ़ता है, जिससे हानिकारक अप्रभावी लक्षण भी प्रकट होने लगते हैं।

उत्तर: बाघों की घटती संख्या से आनुवंशिक विविधता घटती है, जिससे जाति की वातावरण के बदलावों से अनुकूलन की क्षमता कम हो जाती है और विलुप्ति का खतरा बढ़ जाता है — यही चिंता का कारण है।

(घ) जाति उद्भव पर आधारित प्रश्न

प्रश्न 1. वे कौन-से कारक हैं जो एक नई जाति के उद्भव में सहायक होते हैं?

हल:

उत्तर: नई जाति के उद्भव के मुख्य कारक हैं — (1) भौगोलिक पृथक्करण (नदी, पर्वत आदि से जनसंख्या का बँट जाना), (2) जीन-प्रवाह का रुकना (दोनों समूहों के जीनों का आपस में न मिलना), (3) प्राकृतिक चयन का दोनों समूहों पर अलग-अलग पर्यावरण के कारण अलग दिशा में कार्य करना, और (4) आनुवंशिक विचलन — इन सबके मिले-जुले प्रभाव से दोनों समूह इतने बदल जाते हैं कि आपस में जनन ही न कर सकें।

प्रश्न 2. क्या स्व-परागण (self-pollination) वाली पादप जाति के जाति-उद्भव में भौगोलिक पृथक्करण एक प्रमुख कारक होगा? क्यों या क्यों नहीं?

हल: स्व-परागण वाले पौधों में परागकण प्रायः उसी पौधे के फूल को परागित करते हैं — अर्थात उनमें पहले से ही दूसरे पौधों से जीन-प्रवाह बहुत कम होता है। जब जीनों का आदान-प्रदान पहले से ही न के बराबर है, तो भौगोलिक पृथक्करण से स्थिति में कोई विशेष बड़ा परिवर्तन नहीं आएगा।

उत्तर: नहीं, स्व-परागण वाली जातियों में भौगोलिक पृथक्करण जाति-उद्भव का प्रमुख कारक नहीं होगा, क्योंकि उनमें जीन-प्रवाह पहले से ही बहुत सीमित होता है।

प्रश्न 3. क्या अलैंगिक जनन करने वाले जीवों के जाति-उद्भव में भौगोलिक पृथक्करण एक प्रमुख कारक होगा? क्यों या क्यों नहीं?

हल: अलैंगिक जनन में एक ही जनक से संतानें बनती हैं और उनमें विभिन्नताएँ केवल DNA प्रतिलिपि की छोटी त्रुटियों से आती हैं — अत्यंत कम। जीन-प्रवाह जैसी कोई प्रक्रिया यहाँ होती ही नहीं, और नई जाति बनने के लिए आवश्यक आनुवंशिक अंतर भी अत्यंत धीरे जमा होता है।

उत्तर: नहीं, अलैंगिक जनन वाले जीवों में भौगोलिक पृथक्करण जाति-उद्भव का प्रमुख कारक नहीं होगा, क्योंकि उनमें विभिन्नता बहुत कम होती है और जीन-प्रवाह की प्रक्रिया ही नहीं होती।

(ङ) मानव व विकास-संबंधों पर आधारित प्रश्न

प्रश्न 1. आकार, रंग व दिखावट में इतने भिन्न होते हुए भी सभी मनुष्यों को एक ही जाति का क्यों कहा जाता है?

हल:

चरण 1: जाति की सबसे बड़ी पहचान यह है कि उसके सदस्य आपस में जनन करके उपजाऊ संतानें उत्पन्न कर सकते हैं। संसार के किसी भी भाग के मनुष्य आपस में विवाह करके बच्चे पैदा कर सकते हैं — इस कसौटी पर सभी मानव एक ही जाति के हैं।

चरण 2: आकार, रंग व दिखावट के अंतर सतही विभिन्नताएँ हैं, जो अलग-अलग क्षेत्रों के पर्यावरण के अनुकूलन से आई हैं। सभी मानवों का उभयनिष्ठ पूर्वज एक है और उनके DNA अनुक्रमों में अत्यधिक समानता है।

उत्तर: क्योंकि सभी मनुष्य आपस में सफलतापूर्वक जनन कर सकते हैं, एक ही पूर्वज से उत्पन्न हुए हैं और उनके मूल जीन-समूह एक हैं — इसलिए आकार-रंग के सतही अंतरों के बावजूद सभी मनुष्य एक ही जाति, Homo sapiens, के सदस्य हैं।

प्रश्न 2. विकासीय दृष्टिकोण से क्या हम कह सकते हैं कि जीवाणु, मकड़ी, मछली व चिंपैंज़ी में से किसका शारीरिक अभिकल्प (body design) “अधिक उत्तम” है? क्यों या क्यों नहीं?

हल: जीवाणु धरती के सबसे प्राचीन व सरल जीवों में हैं, परंतु वे आज भी गर्म झरनों, गहरे समुद्र के तापीय छिद्रों व अंटार्कटिका की बर्फ़ जैसे अत्यंत कठिन स्थानों में जीवित हैं — जहाँ मछली, मकड़ी या चिंपैंज़ी जीवित नहीं रह सकते। दूसरी ओर, जटिल अभिकल्प वाले जीव अपने-अपने पर्यावरण में अत्यंत सफल हैं। हर जीव का अभिकल्प उसके अपने पर्यावरण के लिए उपयुक्त है; विकास का अर्थ ही “और बेहतर होना” नहीं, “पर्यावरण के अनुकूल होना” है।

उत्तर: नहीं, हम किसी एक को “अधिक उत्तम” नहीं कह सकते। चारों ही अपने-अपने पर्यावरण में सफलतापूर्वक जीवित हैं — विकास को प्रगति या श्रेष्ठता की सीढ़ी नहीं माना जा सकता; सरल अभिकल्प वाले जीव भी उतने ही सफल हो सकते हैं जितने जटिल अभिकल्प वाले।

इस भाग में हमने सीखा — InText के 14 प्रश्नों में अध्याय के सभी मूल विचार — विभिन्नता, मेंडल के नियम, लिंग निर्धारण, प्राकृतिक चयन, जाति उद्भव व मानव विकास — एक-एक करके आ गए हैं; इन्हें तैयार कर लिया तो अध्याय आधा तैयार समझिए।

📗 NCERT उदाहरण (Examples)

एक बात पहले ही साफ़ कर दें — इस अध्याय में NCERT ने क्रमांकित “उदाहरण (Examples)” नहीं दिए हैं। किताब की सीख क्रियाकलापों और मेंडल के वर्णित प्रयोगों के माध्यम से दी गई है। नीचे उन्हीं पर आधारित तीन सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण दिए जा रहे हैं — परीक्षा में इन्हीं पर आधारित प्रश्न आते हैं।

उदाहरण 1 (क्रियाकलाप-आधारित). अपनी कक्षा के विद्यार्थियों के कान की लोलकी (earlobe) का सर्वेक्षण करने पर क्या निष्कर्ष निकलता है?

हल: कुछ विद्यार्थियों की कान-लोलकी सिर से जुड़ी हुई (attached) होती है और कुछ की मुक्त (free) होती है। जिन विद्यार्थियों की लोलकी मुक्त होती है, उनके माता-पिता में से कम-से-कम एक की लोलकी भी प्रायः मुक्त पाई जाती है — क्योंकि मुक्त लोलकी एक प्रभावी लक्षण है। जिनके माता-पिता दोनों की लोलकी जुड़ी (अप्रभावी, शुद्ध) हो, उनके बच्चों की लोलकी भी जुड़ी ही होती है। यह छोटा-सा सर्वेक्षण ही दिखा देता है कि लक्षण जीनों द्वारा नियमों के अनुसार वंशानुगत होते हैं — और कक्षा में दोनों प्रकार के विद्यार्थियों का होना ही विभिन्नता का जीवित प्रमाण है।

उदाहरण 2 (प्रयोग-आधारित). मेंडल का द्वि-संकर प्रयोग संख्याओं में समझाइए — 16 खानों में 9 : 3 : 3 : 1 कैसे बना?

हल:

चरण 1: F1 पौधा (RrYy) चार प्रकार के युग्मक बनाता है — RY, Ry, rY, ry — क्योंकि दो लक्षण युग्मक बनते समय स्वतंत्र रूप से बँटते हैं।

चरण 2: नर व मादा दोनों ओर से चार-चार युग्मक आने से Punnett वर्ग में 16 संयोजन बनते हैं (ऊपर विषय-वस्तु में दी गई table देखिए)।

चरण 3: गिनती कीजिए — जिनमें कम-से-कम एक R और एक Y है (गोल-पीले) = 9; R है परंतु yy (गोल-हरे) = 3; rr परंतु Y है (झुर्रीदार-पीले) = 3; और rryy (झुर्रीदार-हरे) = 1।

निष्कर्ष: 9 : 3 : 3 : 1 = (3 : 1) × (3 : 1) — अर्थात प्रत्येक लक्षण अलग-अलग 3 : 1 में बँटता है और दोनों लक्षण एक-दूसरे से स्वतंत्र हैं। नए संयोजनों (गोल-हरे, झुर्रीदार-पीले) का बनना ही स्वतंत्र अपव्यूहन का सबसे बड़ा प्रमाण है।

उदाहरण 3 (क्रियाकलाप-आधारित). जीवाश्मों से मिले दो प्रमाण लिखिए जो विकास को दर्शाते हैं।

हल: (1) आर्किऑप्टेरिक्स के जीवाश्म में सरीसृपों जैसे लक्षण (दाँत, लंबी पूँछ, पंजे) और पक्षियों जैसे लक्षण (पंख) दोनों मिलते हैं — यह सरीसृपों व पक्षियों के बीच की संयोजी कड़ी है और बताता है कि पक्षी सरीसृपों से विकसित हुए। (2) धरती की गहरी परतों से सरल जीवों के और ऊपरी परतों से जटिल जीवों के जीवाश्म मिलते हैं — यह क्रम दर्शाता है कि समय के साथ सरल से जटिल जीवों का विकास हुआ। ऐमोनाइट जैसे आज विलुप्त जीवों के जीवाश्म यह भी बताते हैं कि भूमंडल पर जीवन हमेशा एक-जैसा नहीं रहा।

✏️ प्रश्नावली (Exercise) – सभी 12 प्रश्नों के हल

प्रश्न 1. एक मेंडलीय प्रयोग में बैंगनी फूलों वाले लंबे मटर के पौधों का संकरण सफ़ेद फूलों वाले बौने पौधों से कराया गया। संतानों में सभी में बैंगनी फूल आए, परंतु उनमें से लगभग आधे पौधे बौने थे। इससे कहा जा सकता है कि लंबे जनक का जीनप्ररूप था — (a) TTWW (b) TTww (c) TtWW (d) TtWw

हल:

चरण 1: फूलों का रंग देखें — सभी संतानों में बैंगनी फूल आए, कोई सफ़ेद नहीं। सफ़ेद (अप्रभावी) तभी छिपा रह सकता है जब बैंगनी जनक शुद्ध प्रभावी (WW) हो; यदि वह Ww होता तो कुछ संतानों में ww बनकर सफ़ेद फूल भी आते।

चरण 2: लंबाई देखें — लगभग आधे पौधे बौने (tt) बने। बौना पौधा बनने के लिए उसे माता (बौनी, tt) से t और पिता से भी t मिलना चाहिए — अर्थात लंबा जनक अपने अंदर t भी रखता है, अर्थात वह Tt है।

उत्तर: (c) TtWW — लंबाई के लिए विषमयुग्मजी (Tt) और फूल के रंग के लिए शुद्ध प्रभावी (WW)।

प्रश्न 2. समजात अंगों का एक उदाहरण है — (a) हमारी भुजा व कुत्ते का अगला पैर (b) हमारे दाँत व हाथी के दाँत (tusks) (c) आलू व घास के उपरिभूस्तारी (runners) (d) उपर्युक्त सभी

हल: (a) मानव भुजा व कुत्ते के अगले पैर की हड्डियों की मूल संरचना एक जैसी है — समजात। (b) हाथी के बड़े दाँत (tusks) वास्तव में रूपांतरित दाँत ही हैं — मनुष्य के दाँतों से मूल संरचना में समान — समजात। (c) आलू (तने का रूपांतरण) व घास के उपरिभूस्तारी (तने का ही फैलाव) — दोनों तने के रूपांतरण हैं, मूल संरचना समान — समजात। तीनों ही उदाहरण समजात अंगों के हैं।

उत्तर: (d) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 3. विकासीय दृष्टिकोण से, हममें से किसमें अधिक समानता है? (a) चीन के एक विद्यालय जाने वाले लड़के में (b) चिंपैंज़ी में (c) मकड़ी में (d) जीवाणु में

हल: जितना निकट का उभयनिष्ठ पूर्वज, उतनी अधिक समानता। चिंपैंज़ी हमारा निकट संबंधी अवश्य है, परंतु एक अन्य मनुष्य तो हमारी स्वयं की जाति का सदस्य है — उसका पूर्वज-संबंध हमसे सबसे निकट (वर्तमान) का है। मकड़ी व जीवाणु के साथ पूर्वज बहुत-बहुत पुराने हैं।

उत्तर: (a) चीन के एक विद्यालय जाने वाले लड़के में — क्योंकि वह भी Homo sapiens है; देश या रंग बदलने से जातीय संबंध नहीं बदलता।

प्रश्न 4. एक अध्ययन में पाया गया कि हल्के रंग की आँखों वाले बच्चों के माता-पिता की आँखें भी हल्के रंग की होती हैं। इसके आधार पर क्या हम कह सकते हैं कि आँखों का हल्का रंग प्रभावी है या अप्रभावी? क्यों या क्यों नहीं?

हल: ध्यान से सोचिए — यदि हल्का रंग अप्रभावी हो, तो हल्की आँखों वाले माता-पिता दोनों शुद्ध अप्रभावी (समयुग्मजी) होंगे और उनके सभी बच्चों की आँखें हल्की ही होंगी — अध्ययन का निष्कर्ष इससे पूरी तरह मेल खाता है। यदि हल्का रंग प्रभावी होता और माता-पिता विषमयुग्मजी होते, तो कुछ बच्चों की आँखें गहरे रंग की भी आ सकती थीं। परंतु माता-पिता के जीनप्ररूप व परिवार के पूरे आँकड़े जाने बिना पक्का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।

उत्तर: केवल इस अध्ययन के आधार पर निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि हल्का रंग प्रभावी है या अप्रभावी। संकेत यह मिलता है कि यह अप्रभावी हो सकता है (दोनों माता-पिता शुद्ध अप्रभावी होने पर सभी बच्चे समान लक्षण वाले होते हैं), परंतु प्रभावी होने की संभावना को भी पूरी जानकारी के बिना नकारा नहीं जा सकता — इसलिए और आँकड़े आवश्यक हैं।

प्रश्न 5. जैव विकास व वर्गीकरण के अध्ययन क्षेत्र कैसे परस्पर संबद्ध हैं?

हल: वर्गीकरण में जीवों को उनकी समानताओं व असमानताओं के आधार पर समूहों में बाँटा जाता है। दो जातियों में जितनी अधिक साझा विशेषताएँ होती हैं, उनका उभयनिष्ठ पूर्वज उतना ही हाल का माना जाता है — अर्थात वे उतनी ही निकटता से विकासीय रूप से संबद्ध होती हैं। इसलिए जीवों का वर्गीकरण, उनके विकासीय इतिहास को ही प्रतिबिंबित करता है। उलटे दिशा में, विकासीय संबंध ज्ञात होने से वर्गीकरण अधिक वैज्ञानिक बनता है।

उत्तर: वर्गीकरण व जैव विकास परस्पर संबद्ध हैं — वर्गीकरण के समूह विकास के रिश्तों को दर्शाते हैं, और विकास का ज्ञान वर्गीकरण को आधार देता है। दोनों मिलकर हमें जीवों के बीच संबंध व उनके पूर्वजों की कहानी बताते हैं।

प्रश्न 6. समजात व समवृत्ति अंगों को उदाहरणों सहित समझाइए।

हल:

समजात अंग: वे अंग जिनकी मूल संरचना समान होती है, परंतु कार्य भिन्न होते हैं। उदाहरण: मानव की भुजा (पकड़ना), कुत्ते का अगला पैर (दौड़ना), व्हेल का फ़्लिपर (तैरना), चमगादड़ का पंख (उड़ना) व मेंढक का अगला पैर (कूदना-तैरना) — सभी की हड्डियों की मूल योजना एक है, क्योंकि ये सब एक ही उभयनिष्ठ पूर्वज से विकसित हुए हैं।

समवृत्ति अंग: वे अंग जिनका कार्य समान होता है, परंतु मूल संरचना व उत्पत्ति भिन्न होती है। उदाहरण: पक्षी के पंख (हड्डी-पेशी से बने) व तितली के पंख (पतली झिल्ली) — दोनों उड़ने के काम आते हैं, पर बनावट पूरी तरह अलग है; इसी प्रकार शकरकंद (जड़) व आलू (तना) दोनों भोजन संचित करते हैं, परंतु उत्पत्ति अलग-अलग अंगों से है।

याद रखें: समजात = संरचना एक, कार्य अलग → साझा पूर्वज का प्रमाण। समवृत्ति = कार्य एक, संरचना अलग → समान वातावरण में स्वतंत्र विकास का प्रमाण।

प्रश्न 7. कुत्तों में प्रभावी रोम-रंग (coat colour) ज्ञात करने के लिए एक परियोजना (project) की रूपरेखा दीजिए।

हल:

चरण 1 — लक्षण चुनें: मान लीजिए हमें ज्ञात करना है कि कुत्तों में काला रोम-रंग प्रभावी है या सफ़ेद। दो शुद्ध नस्लों के कुत्ते चुनें — एक काले रोम वाला, दूसरा सफ़ेद रोम वाला, जिनके कई पीढ़ियों के रिकॉर्ड उपलब्ध हों।

चरण 2 — संकरण कराएँ व गिनें: दोनों नस्लों के बीच संकरण (mating) कराकर पैदा हुए सभी पिल्लों के रोम-रंग गिनकर लिखें। यदि सभी पिल्ले काले हुएँ, तो काला रंग प्रभावी है; यदि सभी सफ़ेद हुएँ, तो सफ़ेद प्रभावी है।

चरण 3 — F2 पीढ़ी जाँचें (यदि संभव हो): पहली पीढ़ी के पिल्लों के आपसी संकरण से अगली पीढ़ी में यदि रंग लगभग 3 : 1 के अनुपात में आएँ, तो जो रंग 3 भाग में आया वही प्रभावी सिद्ध होगा और निष्कर्ष पक्का हो जाएगा।

चरण 4 — रिकॉर्ड रखें: हर पीढ़ी के आँकड़े table में लिखें, केवल एक-दो पिल्लों के आधार पर निष्कर्ष न निकालें — संख्या जितनी बड़ी, निष्कर्ष उतना विश्वसनीय।

निष्कर्ष की विधि: जो रंग F1 पीढ़ी के सभी पिल्लों में दिखाई दे, वही प्रभावी है — यही मेंडल की विधि है, बस पौधे की जगह कुत्ते हैं!

प्रश्न 8. विकासीय संबंध निर्धारित करने में जीवाश्मों का महत्व समझाइए।

हल: जीवाश्म मृत जीवों के वे अवशेष हैं जो चट्टानों की परतों में सुरक्षित रह गए। इनका महत्व इस प्रकार है — (1) जीवाश्मों से हमें विलुप्त जीवों (जैसे डायनासोर, ऐमोनाइट) का पता चलता है, जिनसे आज के जीवों की तुलना की जा सकती है। (2) परतों का क्रम विकास का क्रम बताता है — गहरी परतों में सरल व पुराने जीव, ऊपरी परतों में जटिल व नए जीव मिलते हैं। (3) कुछ जीवाश्म दो वर्गों की संयोजी कड़ी होते हैं — जैसे आर्किऑप्टेरिक्स (सरीसृप + पक्षी) — जिनसे यह पता चलता है कि एक वर्ग का विकास दूसरे से कैसे हुआ होगा। (4) जीवाश्मों के काल-निर्धारण से हम यह भी जान पाते हैं कि कोई जीव धरती पर कब अस्तित्व में था।

उत्तर: जीवाश्म विकास के प्रत्यक्ष ऐतिहासिक प्रमाण हैं — उनके बिना हम केवल आज के जीवों से अनुमान लगाते; जीवाश्म हमें समय का क्रम, विलुप्त कड़ियाँ और वर्गों के पारस्परिक संबंध — तीनों देते हैं।

प्रश्न 9. निर्जीव पदार्थों से जीवन की उत्पत्ति के हमारे पास क्या प्रमाण हैं?

हल: इस प्रश्न का उत्तर एक प्रसिद्ध प्रयोग से मिलता है। वैज्ञानिक जे.बी.एस. हाल्डेन ने सुझाव दिया था कि पृथ्वी के प्रारंभिक वातावरण में सरल अकार्बनिक पदार्थों से पहले सरल कार्बनिक अणु और फिर धीरे-धीरे जटिल अणु बने होंगे। इस सुझाव को मिलर व यूरे (Miller and Urey, 1953) ने प्रयोगशाला में जाँचा — उन्होंने प्रारंभिक पृथ्वी जैसी परिस्थितियाँ बनाईं (मीथेन, अमोनिया, हाइड्रोजन व जलवाष्प के मिश्रण में विद्युत स्फुलिंग (sparking) की गई) और कुछ ही दिनों में पाया कि मिश्रण में अमीनो अम्ल जैसे कार्बनिक पदार्थ बन गए — अमीनो अम्ल ही प्रोटीन की इकाइयाँ हैं, और प्रोटीन जीवन का आधार है।

उत्तर: मिलर-यूरे प्रयोग से प्रमाण मिला कि पृथ्वी की प्रारंभिक परिस्थितियों में निर्जीव (अकार्बनिक) पदार्थों से जीवन के लिए आवश्यक कार्बनिक अणु (अमीनो अम्ल) बन सकते थे — यही निर्जीव पदार्थों से जीवन की उत्पत्ति की दिशा में हमारा प्रमुख प्रयोगात्मक प्रमाण है।

प्रश्न 10. समझाइए कि लैंगिक जनन से अलैंगिक जनन की अपेक्षा अधिक स्थायी (उपयोगी) विभिन्नताएँ कैसे उत्पन्न होती हैं। यह लैंगिक जनन वाले जीवों के विकास को कैसे प्रभावित करता है?

हल:

चरण 1: अलैंगिक जनन में संतान एक ही जनक की प्रतिलिपि होती है — विभिन्नता केवल DNA प्रतिलिपि की छोटी त्रुटियों से आती है। लैंगिक जनन में संतान को दो अलग जनकों से आधे-आधे जीन मिलते हैं, और युग्मक बनते समय जीनों का नया-नया मिश्रण बनता है — इसलिए विभिन्नताएँ कहीं अधिक संख्या व प्रकार में उत्पन्न होती हैं।

चरण 2: अधिक विभिन्नता का अर्थ है — वातावरण बदलने पर जनसंख्या में पहले से मौजूद ऐसी विभिन्नताओं की अधिक संभावना, जो बदले माहौल में लाभ दें। ऐसी विभिन्नताएँ प्राकृतिक चयन द्वारा चुनी जाती हैं।

उत्तर: लैंगिक जनन अधिक व विविध विभिन्नताएँ देता है, इसलिए लैंगिक जनन वाले जीवों में अनुकूलन तेज़ी से होता है और उनका विकास अपेक्षाकृत तीव्र गति से होता है — नई परिस्थितियों में भी जाति के बचे रहने की संभावना बढ़ जाती है।

प्रश्न 11. संतान में नर व मादा जनकों द्वारा आनुवंशिक योगदान की समानता कैसे सुनिश्चित होती है?

हल: युग्मक बनते समय एक विशेष कोशिका-विभाजन होता है, जिससे प्रत्येक युग्मक में गुणसूत्रों की संख्या आधी रह जाती है — अर्थात हर गुणसूत्र की केवल एक प्रति युग्मक में जाती है। नर युग्मक (शुक्राणु) व मादा युग्मक (अंडाणु) दोनों में गुणसूत्रों की संख्या समान (आधी) होती है। निषेचन में दोनों युग्मक मिलते हैं, तो युग्मनज में गुणसूत्रों की पूरी संख्या पुनः स्थापित हो जाती है — आधी माता से, आधी पिता से।

उत्तर: युग्मकों में गुणसूत्र-संख्या आधी-आधी होने से ही सुनिश्चित होता है कि संतान को माता व पिता से बराबर-बराबर आनुवंशिक योगदान मिले और जाति में पीढ़ी-दर-पीढ़ी गुणसूत्रों की संख्या स्थिर बनी रहे।

प्रश्न 12. “केवल वे विभिन्नताएँ ही किसी जनसंख्या में जीवित रहती हैं जो किसी जीव को लाभ देती हैं।” क्या आप इस कथन से सहमत हैं? क्यों या क्यों नहीं?

हल: यह कथन आंशिक रूप से ही सत्य है। यह सही है कि लाभदायक विभिन्नताएँ प्राकृतिक चयन द्वारा चुनी जाती हैं और जनसंख्या में बढ़ती हैं। परंतु तटस्थ (neutral) विभिन्नताएँ — जो न लाभ देती हैं, न हानि — भी जनसंख्या में आनुवंशिक विचलन (genetic drift) द्वारा संयोग से फैल सकती हैं और पीढ़ियों तक बनी रह सकती हैं (नीले भृंगों वाला उदाहरण याद कीजिए)। इसके अतिरिक्त, जो विभिन्नता आज लाभदायक नहीं है, वातावरण बदलने पर वही कल लाभदायक हो सकती है — इसलिए तटस्थ विभिन्नताओं का बना रहना जाति के भविष्य के लिए भी उपयोगी है।

उत्तर: पूर्णतः सहमत नहीं। लाभदायक विभिन्नताएँ चयन द्वारा निश्चित रूप से बढ़ती हैं, परंतु तटस्थ विभिन्नताएँ भी आनुवंशिक विचलन से जनसंख्या में बनी रह सकती हैं — अतः जीवित रहने वाली विभिन्नताएँ केवल लाभदायक ही नहीं होतीं।

इस प्रश्नावली में हमने सीखा — 12 प्रश्नों में मेंडल के अनुपात, अंगों की तुलना, जीवाश्म व विकास के मूल सिद्धांत — सब आ गए हैं; ये 12 प्रश्न ही Board की तैयारी की रीढ़ हैं।

📖 Case Study – मेंडल के बगीचे की एक सुबह

ग्राम के विद्यालय के विज्ञान-शिक्षक ने अपने बगीचे में मटर बोए। कुछ पौधे शुद्ध लंबे (TT) थे और कुछ शुद्ध बौने (tt)। परागण के बाद जो पहली पीढ़ी (F1) आई, उसके सभी पौधे लंबे थे — कक्षा की छात्रा सुमन हैरान थी कि बौनापन गया कहाँ? अगले वर्ष F1 पौधों के बीज बोने पर दूसरी पीढ़ी (F2) में लंबे और बौने पौधे लगभग 3 : 1 के अनुपात में आए। सुमन के शिक्षक ने मुस्कुराकर कहा — “जो छिपा था, वह मिटा नहीं था!” इसी गद्यांश के आधार पर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए:

Q1. F1 पीढ़ी के सभी पौधे लंबे क्यों हुए? —

(A) क्योंकि बौने पौधों के जीन नष्ट हो गए थे
(B) क्योंकि लंबाई एक प्रभावी लक्षण है, जो संकर (Tt) अवस्था में भी प्रकट हो जाता है
(C) क्योंकि बगीचे की मिट्टी उपजाऊ थी
(D) क्योंकि सभी बीज केवल लंबे पौधों से ही आए थे

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (B) क्योंकि लंबाई एक प्रभावी लक्षण है — F1 पौधों का जीनप्ररूप Tt था, जिसमें प्रभावी T ने अप्रभावी t को छिपा दिया और सभी पौधे लंबे दिखे।

Q2. F2 पीढ़ी में बौने पौधे फिर से प्रकट क्यों हो गए? —

(A) वातावरण बदल जाने के कारण
(B) बौने पौधे बाहर से फिर आ गए
(C) F1 पौधों (Tt) के संकरण में tt जीनप्ररूप बनने पर अप्रभावी लक्षण प्रकट हो गया
(D) उत्परिवर्तन से नए बौने पौधे बन गए

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (C) Tt × Tt के संकरण में चार संयोजनों में से एक tt बनता है — शुद्ध अप्रभावी अवस्था आते ही बौनापन प्रकट हो जाता है। यही विसंयोजन के नियम का प्रमाण है।

Q3. यदि बीज की आकृति (गोल/झुर्रीदार) व रंग (पीला/हरा) वाले द्वि-संकर संकरण (RrYy × RrYy) में F2 का प्ररूप अनुपात होगा —

(A) 9 : 3 : 3 : 1
(B) 3 : 1
(C) 1 : 2 : 1
(D) 1 : 1 : 1 : 1

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (A) 9 : 3 : 3 : 1 — गोल-पीले 9, गोल-हरे 3, झुर्रीदार-पीले 3 और झुर्रीदार-हरे 1।

Q4. गद्यांश के प्रयोगों में बने नए संयोजन (जैसे गोल-हरे व झुर्रीदार-पीले बीज) किस नियम को दर्शाते हैं? —

(A) विसंयोजन का नियम
(B) द्रव्यमान संरक्षण का नियम
(C) प्राकृतिक चयन
(D) स्वतंत्र अपव्यूहन का नियम

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (D) स्वतंत्र अपव्यूहन का नियम — एक लक्षण की वंशागति दूसरे लक्षण से स्वतंत्र होती है, इसीलिए जनकों से अलग, नए संयोजन बनते हैं।

⭐ Quick Revision – Important Points

  • ✅ अलैंगिक जनन में विभिन्नता बहुत कम (केवल DNA प्रतिलिपि की त्रुटियों से); लैंगिक जनन में दो जनकों के जीनों के नए संयोजन से विभिन्नता बहुत अधिक।
  • ✅ अर्जित लक्षण वंशानुगत नहीं होते, क्योंकि वे युग्मकों के DNA को नहीं बदलते।
  • ✅ मेंडल = आनुवंशिकता का जनक; प्रयोग-पौधा = मटर (Pisum sativum); प्रत्येक लक्षण के दो विपरीत रूप लिए।
  • ✅ एक-संकर F2 — प्ररूप अनुपात 3 : 1, जीनप्ररूप अनुपात 1 : 2 : 1 (TT : Tt : tt)।
  • ✅ द्वि-संकर F2 — प्ररूप अनुपात 9 : 3 : 3 : 1; नए संयोजन बनना = स्वतंत्र अपव्यूहन का प्रमाण।
  • ✅ जीन = DNA का वह खंड जो एक प्रोटीन की सूचना रखता है; लक्षण जीन → प्रोटीन → कोशिकीय कार्य के क्रम से प्रकट होता है।
  • ✅ मानव में 46 गुणसूत्र (23 जोड़े); महिला XX, पुरुष XY; बच्चे का लिंग पिता के X/Y शुक्राणु से तय — 50 : 50 संभावना।
  • ✅ प्राकृतिक चयन (डार्विन) = लाभदायक विभिन्नता का चुना जाना; आनुवंशिक विचलन = संयोग/दुर्घटना से आवृत्ति बदलना।
  • ✅ जाति उद्भव के कारक — भौगोलिक पृथक्करण, जीन-प्रवाह का रुकना, प्राकृतिक चयन व आनुवंशिक विचलन।
  • ✅ समजात अंग = संरचना समान, कार्य भिन्न; समवृत्ति अंग = कार्य समान, संरचना भिन्न; अवशेषी अंग = अब लगभग अनुपयोगी, जैसे अपेंडिक्स।
  • ✅ जीवाश्मों की आयु — सापेक्ष विधि (गहरी परत = पुराना जीवाश्म) व कार्बन काल-निर्धारण; आर्किऑप्टेरिक्स = सरीसृप-पक्षी संयोजी कड़ी।
  • ✅ आधुनिक मानव (Homo sapiens) की उत्पत्ति अफ़्रीका से मानी जाती है; सभी मानव एक ही जाति के हैं।

⚠️ Aam Galtiyan (Common Mistakes)

  • 3 : 1 व 1 : 2 : 1 उलट देना: 3 : 1 प्ररूप (दिखने वाला — 3 लंबे : 1 बौना) का अनुपात है; 1 : 2 : 1 जीनप्ररूप (TT : Tt : tt) का है। दोनों को गिनकर जाँचें — लंबे तीनों खाने (TT, Tt, Tt) लंबे ही दिखते हैं।
  • लिंग निर्धारण में माता को ज़िम्मेदार मानना: माता हमेशा X ही देती है; लड़का-लड़की का निर्णय पिता के शुक्राणु (X या Y) से होता है। यह प्रश्न सामाजिक गलतफ़हमी पर आधारित होकर बार-बार पूछा जाता है।
  • समजात-समवृत्ति में उलझना: परिभाषा रटने के बजाय “संरचना देखो” — संरचना एक जैसी तो समजात, कार्य एक जैसा परंतु संरचना अलग तो समवृत्ति। चमगादड़ के पंख में तुलना की जोड़ी देखना न भूलें।
  • अर्जित लक्षण को वंशानुगत लिख देना: पहलवान की माँसपेशियाँ, सीखा हुआ कौशल या भुखमरी से घटा वज़न — ये संतानों में नहीं जाते, क्योंकि युग्मकों का DNA नहीं बदला।
  • विकास = प्रगति समझना: विकास का अर्थ “श्रेष्ठ बनना” नहीं है — जीवाणु जैसे सरल जीव भी अत्यंत सफल हैं। “चिंपैंज़ी से मानव बना है” कहना भी गलत है — दोनों का उभयनिष्ठ पूर्वज था।
  • 9 : 3 : 3 : 1 की गिनती में चूक: 16 खानों में से गोल-पीले 9 ही होते हैं — Punnett वर्ग बनाकर गिनने का अभ्यास करें, रटने से गलती होगी।

🎯 Bihar Board Exam Tips

  • Punnett वर्ग बनाना सीखें, अनुपात नहीं रटें: परीक्षा में TT/Tt/tt व RrYy के वर्ग बनाकर 3 : 1, 1 : 2 : 1 व 9 : 3 : 3 : 1 निकालने का अभ्यास करें — संकरण वाले प्रश्न हर वर्ष आते हैं और पूरे अंक देते हैं।
  • लिंग निर्धारण का चार्ट अवश्य बनाएँ: XX × XY वाला तालिका-चित्र उत्तर में बनाने से लघु उत्तरीय प्रश्न में पूरे अंक मिलते हैं — साथ में एक पंक्ति यह भी लिखें कि लिंग पिता से निर्धारित होता है।
  • समजात-समवृत्ति की table तैयार रखें: परिभाषा + संरचना/कार्य + दो-दो उदाहरण — यह प्रश्न दीर्घ उत्तरीय में बार-बार आता है।
  • NCERT के उदाहरण शब्दशः याद करें: भृंगों (हरा/नीला/हाथी) वाला दृष्टांत प्राकृतिक चयन व आनुवंशिक विचलन दोनों के लिए काम आता है — Board इन्हीं पर आधारित प्रश्न बनाता है।
  • MCQ की तेज़ तैयारी: मेंडल, मटर, 46 गुणसूत्र, XX/XY, Homo sapiens, आर्किऑप्टेरिक्स, मिलर-यूरे प्रयोग (1953) — ये तथ्य वस्तुनिष्ठ प्रश्नों में सबसे अधिक दोहराए जाते हैं।
  • पिछले वर्षों के BSEB प्रश्न-पत्रों के इस अध्याय के प्रश्न हल करके जाएँ — InText व प्रश्नावली के प्रश्न अक्सर हू-ब-हू दोहराए जाते हैं।

📝 MCQ Quiz – 15 वस्तुनिष्ठ प्रश्न (स्वयं को जाँचें)

पहले बिना देखे हल करें, फिर “✅ उत्तर देखें” खोलकर मिलाएँ। अंत में Answer Key table दी गई है।

Q1. आनुवंशिकता का जनक किसे कहा जाता है? —

(A) चार्ल्स डार्विन
(B) ग्रेगर जॉहन मेंडल
(C) लैमार्क
(D) ह्यूगो डि व्रीज़

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उत्तर: (B) ग्रेगर जॉहन मेंडल — मटर के पौधों पर किए गए संकरण प्रयोगों से उन्होंने आनुवंशिकता के नियम दिए।

Q2. मेंडल ने अपने प्रयोगों के लिए किस पौधे को चुना था? —

(A) गुलाब
(B) आम
(C) मटर (Pisum sativum)
(D) गेहूँ

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (C) मटर — इसमें कई लक्षण स्पष्ट विपरीत जोड़ों में मिलते हैं, जैसे लंबा/बौना, गोल/झुर्रीदार बीज।

Q3. एक-संकर संकरण की F2 पीढ़ी में प्ररूप (phenotypic) अनुपात होता है —

(A) 3 : 1
(B) 1 : 2 : 1
(C) 9 : 3 : 3 : 1
(D) 1 : 1

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उत्तर: (A) 3 : 1 — तीन भाग लंबे पौधे (TT व Tt) और एक भाग बौना पौधा (tt)।

Q4. एक-संकर संकरण की F2 पीढ़ी में जीनप्ररूप (genotypic) अनुपात होता है —

(A) 3 : 1
(B) 9 : 3 : 3 : 1
(C) 1 : 2 : 1
(D) 2 : 1

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उत्तर: (C) 1 : 2 : 1 — TT : Tt : tt = 1 : 2 : 1।

Q5. द्वि-संकर संकरण की F2 पीढ़ी का प्ररूप अनुपात होता है —

(A) 3 : 1
(B) 9 : 3 : 3 : 1
(C) 1 : 2 : 1
(D) 1 : 1 : 1 : 1

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (B) 9 : 3 : 3 : 1 — गोल-पीले 9, गोल-हरे 3, झुर्रीदार-पीले 3, झुर्रीदार-हरे 1।

Q6. मानव की एक सामान्य कोशिका में गुणसूत्रों की कुल संख्या होती है —

(A) 46 (23 जोड़े)
(B) 44
(C) 48
(D) 23

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उत्तर: (A) 46 — 23 गुणसूत्र माता से और 23 पिता से मिलते हैं; युग्मकों में संख्या आधी (23) रहती है।

Q7. मानव में बच्चे का लिंग किस पर निर्भर करता है? —

(A) माता के अंडाणु पर
(B) केवल माता के गुणसूत्रों पर
(C) गर्भ के पर्यावरण पर
(D) पिता के X या Y गुणसूत्र वाले शुक्राणु पर

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उत्तर: (D) पिता के शुक्राणु पर — X वाला शुक्राणु मिले तो लड़की (XX), Y वाला मिले तो लड़का (XY) बनता है।

Q8. महिला में लिंग गुणसूत्रों की जोड़ी होती है —

(A) XY
(B) XX
(C) YY
(D) XO

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (B) XX — इसीलिए माता के सभी अंडाणुओं में केवल X गुणसूत्र जाता है; पुरुष में XY होता है।

Q9. DNA का वह खंड जो किसी एक प्रोटीन के बनने की सूचना रखता है, कहलाता है —

(A) गुणसूत्र
(B) केंद्रक
(C) जीन
(D) राइबोसोम

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (C) जीन — यही आनुवंशिकता की इकाई है; जीन में बदलाव से प्रोटीन बदलता है और लक्षण बदल जाता है।

Q10. निम्न में से समजात अंगों का उदाहरण कौन-सा है? —

(A) मनुष्य का हाथ व पक्षी का पंख
(B) पक्षी का पंख व तितली का पंख
(C) आलू व शकरकंद
(D) कीट का पंख व चमगादड़ का पंख

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (A) मनुष्य का हाथ व पक्षी का पंख — दोनों की हड्डियों की मूल संरचना एक जैसी है, परंतु कार्य भिन्न हैं (पकड़ना बनाम उड़ना)। बाकी तीनों जोड़े समवृत्ति अंगों के हैं।

Q11. निम्न में से समवृत्ति अंगों का उदाहरण कौन-सा है? —

(A) मनुष्य की भुजा व कुत्ते का अगला पैर
(B) व्हेल का फ़्लिपर व मनुष्य का हाथ
(C) हाथी के दाँत (tusks) व मनुष्य के दाँत
(D) पक्षी के पंख व तितली के पंख

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (D) पक्षी के पंख व तितली के पंख — दोनों का कार्य (उड़ना) समान है, परंतु मूल संरचना व उत्पत्ति बिल्कुल भिन्न है।

Q12. जीवाश्मों की आयु निर्धारित करने की एक प्रमुख विधि है —

(A) एक्स-किरण विधि
(B) कार्बन काल-निर्धारण (Carbon Dating)
(C) पराध्वनि (अल्ट्रासाउंड) विधि
(D) सूक्ष्मदर्शी विधि

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (B) कार्बन काल-निर्धारण — जीवाश्म में कार्बन के समस्थानिकों के अनुपात को मापकर आयु का अनुमान लगाया जाता है। इसके अलावा गहरी परतों के जीवाश्म पुराने माने जाते हैं (सापेक्ष विधि)।

Q13. निम्न में से अर्जित लक्षण का उदाहरण कौन-सा है? —

(A) आँखों का रंग
(B) घुँघराले बाल
(C) भुखमरी के कारण भृंगों के औसत वज़न का घट जाना
(D) मुक्त कान-लोलकी

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (C) भुखमरी से वज़न घटना — यह जीवनकाल का बदलाव है, जीनों में कोई परिवर्तन नहीं होता; भोजन मिलते ही वज़न सामान्य हो जाता है और यह लक्षण संतानों में नहीं जाता।

Q14. प्राकृतिक चयन का सिद्धांत किसने प्रतिपादित किया? —

(A) चार्ल्स डार्विन
(B) ग्रेगर जॉहन मेंडल
(C) लैमार्क
(D) स्टैनले मिलर

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (A) चार्ल्स डार्विन — प्रकृति पर्यावरण के अनुकूल लक्षणों वाले जीवों का चयन करती है, यही विकास की मुख्य प्रक्रिया है।

Q15. आधुनिक मानव का वैज्ञानिक नाम है —

(A) Pisum sativum
(B) Mangifera indica
(C) Homo sapiens
(D) Rana tigrina

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (C) Homo sapiens — सभी आधुनिक मानव इसी एक जाति के सदस्य हैं, जिनकी उत्पत्ति अफ़्रीका से मानी जाती है। (Pisum sativum मटर का नाम है।)

Answer Key – उत्तरमाला

प्रश्न 1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12 13 14 15
उत्तर B C A C B A D B C A D B C A C

❓ FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1. मेंडल ने अपने प्रयोगों के लिए मटर का पौधा ही क्यों चुना?
उत्तर: तीन कारण हैं — (1) मटर में कई लक्षण स्पष्ट विपरीत जोड़ों में मिलते हैं (लंबा/बौना, गोल/झुर्रीदार, पीला/हरा), बीच का धुंधला रूप नहीं होता, इसलिए गिनती आसान रहती है; (2) मटर का जीवन-चक्र छोटा होता है, इसलिए कम समय में कई पीढ़ियाँ देखी जा सकती हैं; (3) इसके फूलों में स्व-परागण स्वाभाविक रूप से होता है और इच्छानुसार पर-परागण भी कराया जा सकता है।

प्रश्न 2. क्या केवल InText और प्रश्नावली के प्रश्न तैयार करना काफ़ी है?
उत्तर: इस अध्याय के लिए लगभग हाँ — Board के अधिकांश प्रश्न इन्हीं 26 प्रश्नों (InText 14 + प्रश्नावली 12) से सीधे या हल्के बदलाव के साथ आते हैं। साथ में तीनों अनुपात (3 : 1, 1 : 2 : 1, 9 : 3 : 3 : 1) Punnett वर्ग से निकालने का अभ्यास और समजात-समवृत्ति की table तैयार कर लें, तो वस्तुनिष्ठ व दीर्घ — दोनों प्रकार के प्रश्नों की तैयारी पूरी हो जाएगी।

प्रश्न 3. क्या अर्जित लक्षण कभी वंशानुगत हो सकते हैं?
उत्तर: सामान्यतः नहीं। अर्जित लक्षण शरीर की साधारण कोशिकाओं में हुए बदलाव होते हैं; जब तक बदलाव जनन कोशिकाओं (युग्मकों) के DNA में न हो, वह संतान तक पहुँच ही नहीं सकता। यदि किसी कारण से DNA में ही बदलाव (उत्परिवर्तन) हो जाए, तो वह बदलाव अर्जित नहीं, आनुवंशिक कहलाएगा और वंशानुगत हो सकता है।

प्रश्न 4. क्या मानव चिंपैंज़ी से विकसित हुआ है?
उत्तर: नहीं — यह सबसे बड़ी गलतफ़हमियों में से एक है। मानव व चिंपैंज़ी दोनों किसी एक उभयनिष्ठ पूर्वज से अलग-अलग शाखाओं में विकसित हुए हैं। चिंपैंज़ी हमारा “पूर्वज” नहीं, विकास-वृक्ष पर हमारा निकट “संबंधी” है — जैसे दो भाई एक ही माता-पिता से होते हैं, एक भाई दूसरे का पिता नहीं होता।

प्रश्न 5. NCERT की किताब (PDF) कहाँ से मिलेगी?
उत्तर: NCERT की आधिकारिक वेबसाइट ncert.nic.in से Class 10 Science की किताब का PDF बिल्कुल मुफ़्त डाउनलोड किया जा सकता है। वहीं से आप हर अध्याय की मूल किताब पढ़ सकते हैं।

🔗 Pichhla / Agla Adhyay – पिछले व अगले अध्याय पढ़ें

⬅️ पिछला अध्याय: अध्याय 8 — जीव जनन कैसे करते हैं (How do Organisms Reproduce?): Class 10 Science Chapter 8

➡️ अगला अध्याय: अध्याय 10 — प्रकाश – परावर्तन तथा अपवर्तन (Light – Reflection and Refraction): Class 10 Science Chapter 10

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🔚 Conclusion – निष्कर्ष

बधाई हो! आपने जीवविज्ञान का सबसे विचारोत्तेजक अध्याय पूरा कर लिया। अब आप जानते हैं कि लक्षण माता-पिता से संतानों में जीनों द्वारा कैसे जाते हैं, मेंडल के 3 : 1 व 9 : 3 : 3 : 1 अनुपात Punnett वर्ग से कैसे निकलते हैं, बच्चे का लिंग पिता के शुक्राणु से क्यों तय होता है, और प्राकृतिक चयन, आनुवंशिक विचलन व जाति उद्भव की प्रक्रियाओं से धरती पर जीवन कैसे बदलता आया है। समजात-समवृत्ति अंग और जीवाश्म हमें बताते हैं कि विकास केवल विचार नहीं, प्रमाणों पर खड़ी कहानी है।

ऊपर दिए गए सभी 26 हल किए गए प्रश्नों (InText 14 + प्रश्नावली 12), क्रियाकलाप-आधारित उदाहरणों और 15 MCQ का अभ्यास कीजिए। किताब का मूल पाठ पढ़ने के लिए NCERT की आधिकारिक वेबसाइट ncert.nic.in से PDF ले सकते हैं। अब अगले अध्याय — प्रकाश – परावर्तन तथा अपवर्तन — की तैयारी शुरू कीजिए; वहाँ जीवविज्ञान से भौतिकी की रोचक दुनिया में प्रवेश होगा। शुभकामनाएँ, मेहनत जारी रखिए!