NCERT Class 10 Science Chapter 8 How do Organisms Reproduce? in Hindi | जीव जनन कैसे करते हैं Notes, MCQ व प्रश्न-उत्तर

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परिचय – यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है?

Class 10 Science Chapter 8 How do Organisms Reproduce के NCERT Solutions आपको इस पेज पर सरल हिंदी में, किताब के क्रम से मिलेंगे। Class 10 Science Chapter 8 How do Organisms Reproduce यानी जीव जनन कैसे करते हैं — यह जीव विज्ञान (Biology) का सबसे रोचक अध्याय है, क्योंकि यह बताता है कि धरती पर जीवन की धारा एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक बहती कैसे है।

ज़रा सोचिए — एक छोटा-सा अमीबा दो में बँटकर दो अमीबा कैसे बन जाता है? गमले में लगी गुलाब की एक टहनी काटकर लगाने से पूरा नया पौधा कैसे खड़ा हो जाता है? ब्रेड पर फफूँद इतनी तेज़ी से कैसे फैल जाती है? फूल से फल और बीज कैसे बनते हैं, और माँ के गर्भ में बच्चा नौ महीने तक पोषण कहाँ से पाता है? इन सब सवालों का एक ही उत्तर है — जनन (Reproduction)। यही इस अध्याय की कहानी है।

इस अध्याय में हम सबसे पहले समझेंगे कि जनन की सबसे मूल घटना DNA की प्रतिकृति बनाना है और इसी प्रतिकृति में होने वाली छोटी-छोटी गलतियों से विविधताएँ (Variations) पैदा होती हैं, जो किसी प्रजाति के बचे रहने और जैव विकास की नींव हैं। इसके बाद हम अलैंगिक जनन की सभी विधियाँ — विखंडन, खंडन, पुनर्जनन, मुकुलन, बीजाणु निर्माण और कायिक प्रवर्धन — उदाहरण सहित पढ़ेंगे। फिर पुष्पी पौधों में लैंगिक जनन, परागण, निषेचन, बीज व फल का निर्माण समझेंगे और अंत में मानव जनन तंत्र, यौवनारंभ, अपरा (placenta) के कार्य और जनन स्वास्थ्य व गर्भनिरोधक विधियों को संवेदनशील व वैज्ञानिक ढंग से जानेंगे।

Bihar Board (BSEB) Class 10 की परीक्षा में इस अध्याय से हर साल अच्छे अंक के प्रश्न आते हैं — अलैंगिक जनन की विधियों और उदाहरणों पर वस्तुनिष्ठ (MCQ) प्रश्न, पुष्प की अनुदैर्ध्य काट (Longitudinal Section) का नामांकित चित्र बनाने का दीर्घ उत्तरीय प्रश्न, मानव जनन तंत्र व अपरा के कार्यों पर लघु उत्तरीय प्रश्न और गर्भनिरोधक विधियों पर आधारित प्रश्न। अच्छी बात यह है कि यह अध्याय पूरी तरह समझ पर आधारित है — रटने के बजाय रोज़ के उदाहरणों से जोड़कर पढ़िए, चित्र बनाना सीखिए, तो पूरे अंक आपके होंगे।

📌 खास बात: Board में इस अध्याय से पुष्प की अनुदैर्ध्य काट का नामांकित चित्र और अलैंगिक जनन की विधि–उदाहरण की जोड़ियाँ सबसे अधिक पूछी जाती हैं। पढ़ते समय हर विधि के साथ उसका एक पक्का उदाहरण जोड़ी बनाकर याद कीजिए — जैसे विखंडन–अमीबा, मुकुलन–हाइड्रा, बीजाणु–राइजोपस। यही जोड़ी-याददाश्त MCQ में सबसे तेज़ काम करती है।

📋 अध्याय की जानकारी (Chapter Information)

Board Bihar Board (BSEB)
Textbook NCERT
Class 10
Subject Science (विज्ञान)
Chapter 8
Chapter Name How do Organisms Reproduce? (जीव जनन कैसे करते हैं)
कुल हल किए गए प्रश्न 22 (InText 11 + प्रश्नावली 11)

📚 इस Chapter में क्या-क्या है? (Topics)

  1. 8.1 क्या जीव बिल्कुल अपनी प्रतिकृति बनाते हैं? – DNA प्रतिकृति का महत्व, विविधताएँ व प्रजाति के लिए उनका लाभ
  2. 8.2 अलैंगिक जनन की विधियाँ
    • 8.2.1 विखंडन (Fission) – द्विखंडन व बहुखंडन
    • 8.2.2 खंडन (Fragmentation) – स्पाइरोगायरा
    • 8.2.3 पुनर्जनन (Regeneration) – हाइड्रा व प्लेनेरिया
    • 8.2.4 मुकुलन (Budding) – हाइड्रा व यीस्ट
    • 8.2.5 कायिक प्रवर्धन (Vegetative Propagation) – प्राकृतिक व कृत्रिम विधियाँ
    • 8.2.6 बीजाणु निर्माण (Spore Formation) – राइजोपस
    • ऊतक संवर्धन (Tissue Culture) – संक्षिप्त परिचय
  3. 8.3 लैंगिक जनन – लैंगिक जनन क्यों लाभदायक है? युग्मक, गुणसूत्र संख्या की स्थिरता
    • 8.3.1 पुष्पी पौधों में लैंगिक जनन – पुष्प की संरचना, परागण, निषेचन, बीज व फल, अंकुरण
    • 8.3.2 मानव में लैंगिक जनन – यौवनारंभ, नर व मादा जनन तंत्र, निषेचन से आरोपण तक, अपरा
    • 8.3.3 जनन स्वास्थ्य – सुरक्षित यौन व्यवहार, यौन संचारित रोग, गर्भनिरोधक विधियाँ
  4. पाठ्य-पुस्तक के प्रश्न (InText) – 11 प्रश्न, NCERT क्रियाकलाप-आधारित उदाहरण, प्रश्नावली के 11 प्रश्न
  5. Case Study, Quick Revision, Common Mistakes, Bihar Board Exam Tips, MCQ Quiz व FAQ

📊 Key Concepts – मुख्य परिभाषाएँ व नियम

पद / नियम अर्थ (एक लाइन में)
जनन (Reproduction) वह जैविक प्रक्रिया जिससे जीव अपने जैसे नए जीव उत्पन्न करते हैं और प्रजाति की निरंतरता बनी रहती है।
DNA प्रतिकृति (DNA Copying) जनन की मूल घटना — कोशिका अपने DNA की एक और प्रति बनाती है, जो नई कोशिका (संतति) को मिलती है।
विविधता (Variation) DNA प्रतिकृति में हुई छोटी त्रुटियों से संतति में आए हल्के अंतर — यही जैव विकास की कच्ची सामग्री हैं।
अलैंगिक जनन (Asexual Reproduction) केवल एक जनक से, बिना युग्मकों के संलयन के, नए जीव का बनना — संतति जनक की लगभग हूबहू प्रतिकृति होती है।
लैंगिक जनन (Sexual Reproduction) दो जनकों के नर व मादा युग्मकों के संलयन (निषेचन) से नए जीव का बनना — संतति में दोनों जनकों के लक्षण व अधिक विविधता आती है।
युग्मक (Gamete) विशेष जनन कोशिका जिसमें गुणसूत्रों की संख्या आधी (अगुणित) होती है — नर युग्मक व मादा युग्मक।
युग्मनज (Zygote) नर व मादा युग्मक के संलयन से बनी पहली कोशिका, जिसमें गुणसूत्रों की पूरी (द्विगुणित) संख्या पुनः स्थापित हो जाती है।
विखंडन (Fission) एककोशिकीय जीव का विभाजित होकर दो (द्विखंडन) या अनेक (बहुखंडन) संतति कोशिकाएँ बनाना।
पुनर्जनन (Regeneration) शरीर के कटे-टूटे भागों से विशिष्ट कोशिकाओं द्वारा संपूर्ण नया जीव बना लेने की क्षमता — जैसे प्लेनेरिया।
कायिक प्रवर्धन (Vegetative Propagation) पौधे के कायिक भागों — जड़, तना, पत्ती — से बिना बीज के नया पौधा बनना या बनाना।
परागण (Pollination) परागकणों का परागकोश से उसी फूल या दूसरे फूल के वर्तिकाग्र तक पहुँचना।
निषेचन (Fertilisation) नर व मादा युग्मकों का संलयन, जिससे युग्मनज बनता है।
अपरा (Placenta) गर्भाशय की दीवार में धँसा वह विशेष ऊतक (चक्रिका) जिसके माध्यम से भ्रूण माँ के रक्त से पोषण व ऑक्सीजन पाता है और अपशिष्ट लौटाता है।
यौवनारंभ (Puberty) वह आयु-अवस्था जब शरीर में जनन-परिपक्वता के लक्षण प्रकट होने लगते हैं और लैंगिक परिवर्तन दिखाई देते हैं।

सबसे काम की बात: जनन जीव के अपने जीवित रहने के लिए नहीं है — खाना, साँस लेना और बढ़ना जीव को ज़िंदा रखते हैं, पर जनन प्रजाति को ज़िंदा रखता है। इसीलिए NCERT कहता है — जनन मूलतः व्यक्ति के अस्तित्व के लिए नहीं, प्रजाति की स्थिरता (stability) के लिए आवश्यक घटना है।

जनन की नींव – DNA प्रतिकृति और विविधता का महत्व

सबसे पहला सवाल — कोई जीव अपने जैसा ही जीव क्यों बनाता है? गाय का बच्चा बछड़ा ही क्यों होता है, बिल्ली का बच्चा पिल्ला क्यों नहीं? उत्तर छिपा है कोशिका के केंद्रक (nucleus) में रखे DNA में। DNA में शरीर की बनावट का पूरा ब्लूप्रिंट (रूपरेखा) लिखा होता है — आँख कैसी होगी, पत्ती का आकार कैसा होगा, बाल घुँघराले होंगे या सीधे — यह सारी जानकारी DNA के रूप में एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक जाती है।

जनन के समय कोशिका पहले अपने DNA की एक और प्रति बनाती है। फिर दो प्रतियाँ दो अलग कोशिकाओं में बँट जाती हैं और हर प्रति के चारों ओर नई कोशिकीय संरचना बन जाती है। इस प्रकार एक कोशिका से दो कोशिकाएँ बनती हैं और आनुवंशिक जानकारी आगे बढ़ जाती है। इसीलिए DNA की प्रतिकृति बनाना जनन की सबसे मूल घटना है — इसके बिना लक्षण आगे जा ही नहीं सकते।

विविधता क्यों ज़रूरी है? – प्रजाति बचेगी तो अंतर से ही

अब एक बारीक बात समझिए। DNA की प्रतिकृति बनते समय कोशिका की रासायनिक क्रियाओं में कभी-कभी छोटी-छोटी त्रुटियाँ हो जाती हैं। इसलिए नई प्रति मूल प्रति से बहुत मिलती-जुलती तो होती है, पर पूरी तरह एक समान (identical) नहीं होती। इन्हीं हल्के अंतरों को विविधता (Variation) कहते हैं।

कुछ विविधताएँ इतनी गंभीर हो सकती हैं कि नई कोशिका जीवित ही न रह पाए — ऐसी संतति समाप्त हो जाती है। लेकिन जो संततियाँ बच जाती हैं, वे आपस में हल्की-हल्की भिन्न होती हैं। यही भिन्नता लंबे समय में प्रजाति के लिए वरदान बन जाती है। कैसे? कल्पना कीजिए — किसी जीवाणु-समूह में सभी जीवाणु बिल्कुल एक जैसे हैं। वातावरण में अचानक तापमान बहुत बढ़ जाए, तो संभव है सभी एक साथ मर जाएँ और प्रजाति ही समाप्त हो जाए। लेकिन यदि समूह में कुछ जीवाणु पहले से ऐसे हों जिनमें गर्मी सहने की क्षमता थोड़ी अधिक हो (विविधता के कारण), तो वे बच जाएँगे, बढ़ेंगे और प्रजाति को आगे चलाएँगे।

अर्थात विविधता किसी एक व्यक्ति के लिए लाभदायक हो, यह आवश्यक नहीं — कभी-कभी तो वह व्यक्ति के लिए हानिकारक भी हो सकती है — लेकिन पूरी प्रजाति के अस्तित्व, अनुकूलन और जैव विकास के लिए विविधता अनिवार्य है। समय के साथ जमा होती ये छोटी विविधताएँ ही नई प्रजातियों के उद्भव (evolution) की दिशा खोलती हैं। अगले अध्याय — आनुवंशिकता एवं जैव विकास — में आप यही कहानी विस्तार से पढ़ेंगे।

📌 याद रखें: जीव अपने पर्यावास (niche) में रहते हैं — मिट्टी में, जल में, हवा में। जनन से जन्म और मृत्यु के बीच संतुलन बना रहता है, इसलिए किसी प्रजाति की जनसंख्या (population) स्थिर रहती है। जनन रुक जाए तो धीरे-धीरे वह प्रजाति समाप्त हो जाएगी — इसीलिए जनन को प्रजाति की स्थिरता से जोड़ा जाता है।

एक साँस में समझें — DNA प्रतिकृति लक्षणों को आगे ले जाती है और उसी में हुई हल्की त्रुटियाँ विविधता बनकर प्रजाति को बदलते वातावरण में बचाए रखती हैं।

अलैंगिक जनन – एक ही जनक से नया जीव

जिस जनन में केवल एक ही जनक भाग लेता है, युग्मक नहीं बनते और निषेचन नहीं होता, उसे अलैंगिक जनन कहते हैं। इसमें संतति जनक की लगभग हूबहू प्रतिकृति होती है, क्योंकि उसे DNA केवल एक ही जनक से मिलता है। यह विधि तेज़ होती है — कम समय में बहुत सारी संततियाँ बन जाती हैं — इसलिए सरल व एककोशिकीय जीवों और कई पौधों में यह खूब पाई जाती है। इसकी कमी यही है कि विविधता बहुत कम आती है।

NCERT ने अलैंगिक जनन की छह प्रमुख विधियाँ दी हैं। नीचे की table Board के लिए सोने जैसी है — इसे बिल्कुल रट लीजिए:

विधि क्या होता है? पक्का उदाहरण
विखंडन (Fission) एककोशिकीय जीव की कोशिका विभाजित होकर दो या अनेक संतति कोशिकाएँ बनाती है। अमीबा, पैरामीशियम, जीवाणु (द्विखंडन); प्लाज़्मोडियम (बहुखंडन); लीशमैनिया (द्विखंडन)
खंडन (Fragmentation) बहुकोशिकीय सरल जीव परिपक्व होकर टुकड़ों में टूट जाता है; हर टुकड़ा नया जीव बन जाता है। स्पाइरोगायरा (तालाब की हरी शैवाल)
पुनर्जनन (Regeneration) शरीर के कटे भाग विशिष्ट कोशिकाओं से बढ़कर पूरा नया जीव बना लेते हैं। हाइड्रा, प्लेनेरिया
मुकुलन (Budding) शरीर पर एक उभार (कलिका/मुकुल) बनता है, वह बढ़कर छोटा जीव बनता है और अलग हो जाता है। हाइड्रा, यीस्ट
बीजाणु निर्माण (Spore Formation) बीजाणुधानी में असंख्य मोटी भित्ति वाले बीजाणु बनते हैं; अनुकूल नम सतह पाकर अंकुरित हो जाते हैं। राइजोपस (ब्रेड की फफूँद)
कायिक प्रवर्धन (Vegetative Propagation) जड़, तना या पत्ती जैसे कायिक भागों से नया पौधा बनता है। गुलाब (तना), आलू (तना), ब्रायोफिलम (पत्ती), गन्ना, अदरक

1. विखंडन (Fission) – द्विखंडन व बहुखंडन

एककोशिकीय जीवों में कोशिका-विभाजन ही जनन है — एक कोशिका बँटती है और दो (या अधिक) नई कोशिकाएँ, अर्थात नए जीव, बन जाते हैं।

द्विखंडन (Binary Fission): इसमें जीव दो बराबर भागों में बँटता है। अमीबा में विभाजन किसी भी तल (plane) से हो सकता है — पहले केंद्रक बँटता है, फिर कोशिका द्रव्य बीच से सिकुड़कर दो संतति अमीबा बना देता है। लीशमैनिया (जिससे काला-अज़ार रोग होता है) में भी द्विखंडन होता है, परंतु इसमें विभाजन एक निश्चित तल में होता है, क्योंकि इस जीव के एक सिरे पर चाबुक जैसी संरचना (whip-like structure) होती है — इसलिए इसकी दिशा तय रहती है। पैरामीशियम व जीवाणुओं में भी द्विखंडन ही होता है।

बहुखंडन (Multiple Fission): इसमें एक ही जीव एक साथ अनेक संतति कोशिकाओं में बँट जाता है। मलेरिया परजीवी प्लाज़्मोडियम इसका प्रसिद्ध उदाहरण है — इसका केंद्रक बार-बार बँटकर कई केंद्रक बनाता है और चारों ओर कोशिका द्रव्य बँटकर एक साथ कई संतति जीव बन जाते हैं।

द्विखंडन बनाम बहुखंडन: द्विखंडन में एक बार में 2 संततियाँ बनती हैं (अमीबा), बहुखंडन में एक बार में अनेक संततियाँ बनती हैं (प्लाज़्मोडियम)। दोनों ही अलैंगिक जनन हैं, दोनों में जनक एक ही है।

2. खंडन (Fragmentation) – टूटा टुकड़ा, नया जीव

सरल बहुकोशिकीय जीवों में, जैसे तालाब में पाई जाने वाली हरी शैवाल स्पाइरोगायरा, शरीर एक लंबी शृंखला (तंतु/filament) जैसा होता है। जब यह जीव परिपक्व होता है, तो इसका शरीर कई टुकड़ों में टूट जाता है और हर टुकड़ा बढ़कर एक नया, पूर्ण जीव बन जाता है। इसे खंडन कहते हैं।

📌 ध्यान दें: खंडन हर बहुकोशिकीय जीव में संभव नहीं है — यह केवल उन्हीं सरल जीवों में होता है जिनकी कोशिकाओं में भिन्नता (differentiation) कम होती है, यानी हर कोशिका लगभग एक जैसा काम कर सकती है। जटिल जीवों में कोशिकाएँ विशेष कामों में बँटी होती हैं, इसलिए टुकड़ा नया जीव नहीं बन पाता।

3. पुनर्जनन (Regeneration) – कटे भाग से पूरा जीव

कुछ सरल जीवों में ऐसी विशेष कोशिकाएँ होती हैं जो विभाजित होकर शरीर के खोए भागों को फिर से बना सकती हैं। उदाहरण के लिए प्लेनेरिया को अगर कई टुकड़ों में काट दिया जाए, तो हर टुकड़ा बढ़कर एक नया पूर्ण प्लेनेरिया बन जाता है। इसी तरह हाइड्रा का कटा भाग भी नए हाइड्रा में विकसित हो जाता है।

लेकिन यह शक्ति जटिल जीवों में नहीं होती — मनुष्य का कटा हाथ दोबारा नहीं उगता, हालाँकि उसकी घाव-भरने की क्षमता उसी पुनर्जनन की बहुत सीमित झलक है। Board में इस अंतर पर प्रश्न खूब आते हैं: “सरल जीवों में पुनर्जनन से पूरा जीव क्यों बन जाता है, मनुष्य में क्यों नहीं?” — उत्तर है विशेष कोशिकाओं का विभेदन और जटिल संगठन।

4. मुकुलन (Budding) – शरीर पर उगा छोटा जीव

हाइड्रा में जनन की एक और विधि है — मुकुलन। हाइड्रा के शरीर के किसी भाग पर एक छोटा उभार (मुकुल/bud) बनता है। यह उभार बार-बार कोशिका विभाजन से धीरे-धीरे बढ़ता है, उस पर छोटे-छोटे स्पर्शक (tentacles) विकसित होते हैं और अंततः वह जनक से अलग होकर एक स्वतंत्र, नया हाइड्रा बन जाता है।

यीस्ट (एककोशिकीय कवक) में भी मुकुलन होता है — यीस्ट कोशिका से एक छोटा उभार निकलता है, जो बढ़कर जनक कोशिका से अलग हो जाता है। कभी-कभी मुकुल अलग होने से पहले ही उस पर दूसरा मुकुल बन जाता है, जिससे यीस्ट कोशिकाओं की शृंखला (chain) बनती दिखाई देती है — यही वह क्रियाकलाप है जो चीनी के घोल में यीस्ट डालकर देखा जाता है।

5. बीजाणु निर्माण (Spore Formation) – राइजोपस की कहानी

रोटी को कुछ दिन नम जगह पर छोड़ दीजिए — उस पर काले-भूरे धब्बे उग आते हैं। यह राइजोपस नामक कवक है। राइजोपस के ऊपर की ओर उठे धागेनुमा भागों (हाइफा) पर छोटे-छोटे गोल, बीजाणुधानी (sporangia) जैसी संरचनाएँ होती हैं, जिनमें असंख्य बीजाणु (spores) भरे होते हैं।

बीजाणु बहुत हल्के होते हैं और उनकी भित्ति मोटी होती है — इस मोटी भित्ति के दो बड़े लाभ हैं: (1) बीजाणु प्रतिकूल परिस्थितियों (सूखा, गर्मी, ठंड) में सुरक्षित रहते हैं, (2) हवा में उड़कर दूर-दूर तक फैल जाते हैं। जब वे किसी नम, भोजनयुक्त सतह (जैसे रोटी) पर गिरते हैं, तो अंकुरित होकर नया राइजोपस बना देते हैं। एक ही बीजाणुधानी से हज़ारों बीजाणु निकलते हैं, इसलिए यह विधि बहुत तेज़ी से प्रसार करती है — इसीलिए ब्रेड की एक फफूँद पूरी रोटी पर कुछ ही दिनों में फैल जाती है।

एक साँस में समझें — अलैंगिक जनन में जनक एक, युग्मक नहीं, संतति लगभग हूबहू; विधियाँ छह — विखंडन, खंडन, पुनर्जनन, मुकुलन, बीजाणु निर्माण व कायिक प्रवर्धन।

कायिक प्रवर्धन (Vegetative Propagation) – जड़, तना, पत्ती से नया पौधा

पौधों में एक विशेष तरह का अलैंगिक जनन होता है जिसमें पौधे के कायिक भागों (जड़, तना या पत्ती) से नया पौधा बनता है। इसमें बीज की ज़रूरत नहीं होती और नया पौधा जनक पौधे के गुणों का हूबहू होता है। कायिक प्रवर्धन दो तरह से होता है — प्राकृतिक और कृत्रिम।

प्राकृतिक कायिक प्रवर्धन

तने से: आलू के भूमिगत तने (कंद) पर आँखें (कलियाँ) होती हैं, जिनमें से हर आँख से नया आलू का पौधा उग सकता है। अदरक और गन्ने के तनों से भी नए पौधे उगते हैं। मनी-प्लांट की बेल के हर पर्व (node) से जड़ें निकलकर नया पौधा बना सकती हैं।

जड़ से: शकरकंद और डहेलिया की जड़ों से भी नए पौधे उग सकते हैं।

पत्ती से: ब्रायोफिलम की पत्ती के किनारों पर छोटी-छोटी कलियाँ (बड्स) होती हैं, जो गिरकर नम मिट्टी में जड़ पकड़कर नया पौधा बना लेती हैं। Board की प्रसिद्ध जोड़ी: ब्रायोफिलम – पत्ती।

कृत्रिम कायिक प्रवर्धन

कलम लगाना (Cutting): पौधे की एक टहनी काटकर उसे नम मिट्टी में लगा देते हैं। कुछ दिनों में उससे जड़ें निकल आती हैं और वह एक नया पौधा बन जाता है। गुलाब, गुड़हल, गन्ना और मनी-प्लांट इसी विधि से लगाए जाते हैं।

दाब कलम (Layering): इसमें पौधे की एक टहनी को बिना काटे, झुकाकर मिट्टी में दबा दिया जाता है। कुछ दिनों में दबे भाग से जड़ें निकल आती हैं, तब उसे जनक से काटकर अलग पौधा बना दिया जाता है। चमेली और बोगनवेलिया इसी विधि से उगाए जाते हैं।

रोपण (Grafting): इसमें दो पौधों को जोड़ा जाता है — नीचे वाला पौधा मूलवृंत (stock) कहलाता है, जो मज़बूत जड़ तंत्र देता है, और ऊपर लगाया गया भाग कलम (scion) कहलाता है, जो इच्छित फल-फूल के गुण देता है। आम, नींबू और गुलाब की नई किस्में इसी विधि से तैयार की जाती हैं।

कायिक प्रवर्धन के लाभ

  • ऐसे पौधे उगाए जा सकते हैं जो बीज नहीं बनाते — जैसे केला, संतरा, गुलाब और चमेली।
  • नया पौधा जनक के सभी गुण हूबहू प्राप्त करता है — अच्छी किस्म की एकरूपता बनी रहती है।
  • बीज से उगाने की तुलना में जल्दी फल-फूल मिलते हैं।
  • प्रसार तेज़ व सस्ता होता है — एक ही पौधे से कई नए पौधे तैयार हो जाते हैं।

📌 कमज़ोरी: कायिक प्रवर्धन से बनी संततियों में विविधता नहीं आती, इसलिए रोग लगने पर पूरी फसल एक साथ प्रभावित हो सकती है।

ऊतक संवर्धन (Tissue Culture)

यह कायिक प्रवर्धन की आधुनिक तकनीक है। इसमें पौधे की एक छोटी-सी ऊतक (या कुछ कोशिकाएँ) लेकर उसे विशेष पोषक माध्यम में उगाया जाता है। यह ऊतक अनियमित कोशिका समूह कैलस (callus) बनाता है, जिससे आगे चलकर छोटी-छोटी पौधियाँ (plantlets) विकसित की जाती हैं। इस विधि से रोग-मुक्त पौधे बड़ी संख्या में तैयार किए जा सकते हैं — आर्किड (ऑर्किड) जैसे सजावटी पौधे इसी विधि से उगाए जाते हैं।

एककोशिकीय बनाम बहुकोशिकीय जीवों में जनन का अंतर

पहलू एककोशिकीय जीव बहुकोशिकीय जीव
शरीर संगठन एक ही कोशिका से पूरा शरीर अनेक कोशिकाएँ, विशेष अंग व तंत्र
जनन का अर्थ कोशिका का बँटना ही जनन है जनन विशेष कोशिकाओं व अंगों का कार्य है
प्रमुख विधियाँ विखंडन, मुकुलन (यीस्ट) खंडन, पुनर्जनन, मुकुलन, बीजाणु निर्माण, कायिक प्रवर्धन, लैंगिक जनन
उदाहरण अमीबा, पैरामीशियम, यीस्ट हाइड्रा, स्पाइरोगायरा, गुलाब, मानव

एक साँस में समझें — एककोशिकीय जीव में कोशिका बँटना ही जनन है, जबकि बहुकोशिकीय जीवों में जनन विशेष कोशिकाओं व अंगों का कार्य है।

लैंगिक जनन – दो जनक, दुगुनी विविधता

जिस जनन में दो जनकों के विशेष जनन कोशिकाओं — नर युग्मक व मादा युग्मक — का संलयन (निषेचन) होता है, उसे लैंगिक जनन कहते हैं। नर व मादा युग्मकों के मिलने से बनी पहली कोशिका युग्मनज (zygote) कहलाती है, जो बार-बार विभाजित होकर नया जीव बनाती है।

लैंगिक जनन की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह विविधता पैदा करता है — संतति में दोनों जनकों के लक्षणों का मिश्रण आता है, इसलिए वह न तो पिता की हूबहू प्रति होती है, न माता की। यही विविधता जैव विकास (evolution) की कच्ची सामग्री है।

एक और महत्वपूर्ण बात: युग्मकों में गुणसूत्रों की संख्या आधी होती है। मानव में शरीर की कोशिकाओं में 46 गुणसूत्र होते हैं, परंतु युग्मकों (शुक्राणु व अंडाणु) में केवल 23-23 होते हैं। यह संख्या अर्धसूत्री विभाजन (meiosis) द्वारा आधी की जाती है — तभी निषेचन के समय 23 + 23 = 46 होकर प्रजाति की गुणसूत्र संख्या पीढ़ी-दर-पीढ़ी स्थिर रहती है।

लैंगिक जनन के लाभ: (1) विविधता अधिक — नई परिस्थितियों से अनुकूलन की क्षमता बढ़ती है, (2) हानिकारक लक्षणों का प्रभाव कम हो सकता है, (3) जैव विकास को गति मिलती है। इसकी कमी यह है कि यह धीमा है और इसमें दो जनकों व युग्मकों की ज़रूरत पड़ती है।

पहलू अलैंगिक जनन लैंगिक जनन
जनक एक ही दो (नर व मादा)
युग्मक नहीं बनते बनते हैं (नर व मादा)
संतति जनक की हूबहू प्रति दोनों जनकों से भिन्न, विविध
विविधता बहुत कम अधिक
गति तेज़ अपेक्षाकृत धीमी
उदाहरण अमीबा, हाइड्रा, गुलाब (कलम) मानव, पुष्पी पौधे, अधिकांश जंतु

पुष्पी पौधों में लैंगिक जनन – फूल से बीज तक की यात्रा

पुष्पी पौधों (angiosperms) का जनन अंग है — फूल (पुष्प)। फूल में ही नर व मादा युग्मक बनते हैं। आइए फूल की बनावट को शब्दों में ऐसे समझें कि आप बोर्ड में इसका नामांकित चित्र आसानी से बना सकें।

पुष्प की अनुदैर्ध्य काट – भागों का शब्द-चित्र (Diagram वर्णन)

फूल को बीच से लंबाई में काटकर (अनुदैर्ध्य काट, Longitudinal Section) देखने पर नीचे से ऊपर की ओर ये भाग दिखाई देते हैं — चित्र बनाते समय ठीक इसी क्रम में बनाइए:

सबसे नीचे — पुष्पासन व बाह्यदल: फूल डंठल (वृंत) के ऊपर टिकता है। सबसे बाहरी हरा घेरा बाह्यदलपुंज (calyx) है, जिसकी इकाई बाह्यदल (sepal) है — हरे, पत्ती-जैसे ये भाग कली अवस्था में फूल की रक्षा करते हैं।

उसके अंदर — दल: रंगीन पंखुड़ियों का घेरा दलपुंज (corolla) है, इकाई दल (petal) — ये प्रायः रंगीन व सुगंधित होते हैं ताकि परागण के लिए कीट आकर्षित हों।

नर भाग — पुंकेसर (Stamen): दलपुंज के अंदर कई पुंकेसर होते हैं — यह फूल का नर जनन अंग है। प्रत्येक पुंकेसर के दो भाग हैं: पतला डंठल जैसा तंतु (filament) और उसके सिरे पर स्थित दो पालियों वाली थैली — परागकोश (anther)। परागकोश के अंदर ही परागकण (pollen grains) बनते हैं, जो नर युग्मक बनाते/ले जाते हैं। चित्र में परागकोश को तंतु के ऊपर छोटी थैली के रूप में बनाइए।

मादा भाग — स्त्रीकेसर (Pistil/Carpel): फूल के ठीक केंद्र में स्थित यह मादा जनन अंग है। इसके तीन भाग हैं — सबसे ऊपर चिपचिपा सिरा वर्तिकाग्र (stigma), जहाँ परागकण आकर चिपकते हैं; बीच की नली जैसी वर्तिका (style); और सबसे नीचे फूला हुआ भाग अंडाशय (ovary)। अंडाशय के अंदर बीजांड (ovules) होते हैं और प्रत्येक बीजांड में मादा युग्मक (अंड कोशिका) होती है।

चित्र के लिए क्रम याद रखें (बाहर से केंद्र की ओर): बाह्यदल → दल → पुंकेसर (तंतु + परागकोश) → स्त्रीकेसर (वर्तिकाग्र + वर्तिका + अंडाशय, अंदर बीजांड)। यही चार चक्र (whorls) हैं — पहले दो सहायक, अंतिम दो वास्तविक जनन अंग।

एकलिंगी व द्विलिंगी पुष्प

एकलिंगी पुष्प (Unisexual flower): जिस फूल में केवल पुंकेसर या केवल स्त्रीकेसर हो — जैसे तरबूज, ककड़ी व पपीता के फूल। ऐसे फूलों में परागण अनिवार्यतः दूसरे फूल तक होगा।

द्विलिंगी पुष्प (Bisexual flower): जिस फूल में पुंकेसर व स्त्रीकेसर दोनों हों — जैसे गुड़हल (Hibiscus) व सरसों के फूल।

परागण (Pollination) – स्व-परागण व पर-परागण

परागकण का परागकोश से वर्तिकाग्र तक पहुँचना परागण कहलाता है। इसके बिना नर युग्मक मादा युग्मक तक पहुँच ही नहीं सकता, इसलिए परागण न हो तो निषेचन असंभव है।

स्व-परागण (Self-pollination): परागकण उसी फूल के (या उसी पौधे के दूसरे फूल के) वर्तिकाग्र पर गिरें। इसमें माध्यम की आवश्यकता कम होती है, पर विविधता कम आती है।

पर-परागण (Cross-pollination): परागकण एक पौधे के फूल से दूसरे पौधे के फूल के वर्तिकाग्र पर जाएँ। इसके लिए माध्यम चाहिए — कीट, वायु, जल या पक्षी। पर-परागण से अधिक विविधता आती है, इसलिए यह अधिक लाभदायक माना जाता है। रंगीन, सुगंधित व मकरंद वाले फूल कीटों को बुलाते हैं, जबकि हल्के व सूखे परागकण वाले फूल प्रायः वायु से परागित होते हैं।

निषेचन – पराग नलिका से युग्मनज तक

चरण 1: परागकण वर्तिकाग्र पर पहुँचकर अंकुरित होता है और उससे एक पराग नलिका (pollen tube) निकलती है, जो वर्तिका के अंदर-ही-अंदर बढ़ती हुई अंडाशय तक पहुँचती है। नर युग्मक इसी नलिका से यात्रा करता है।

चरण 2: पराग नलिका बीजांड में प्रवेश करती है और नर युग्मक, बीजांड की मादा युग्मक (अंड कोशिका) से संलयन कर लेता है — यही निषेचन है।

चरण 3: संलयन से युग्मनज (zygote) बनता है, जिसमें गुणसूत्रों की पूरी संख्या स्थापित हो जाती है।

सूत्र रूप में: परागकण (नर युग्मक) + अंड कोशिका (मादा युग्मक) —निषेचन→ युग्मनज → भ्रूण (बीज के अंदर) | निषेचन का स्थल: बीजांड, निषेचन का उत्पाद: युग्मनज।

बीज व फल का निर्माण – निषेचन के बाद क्या-क्या बदलता है?

निषेचन के बाद फूल में बड़े बदलाव आते हैं:

  • युग्मनज बार-बार विभाजित होकर भ्रूण (embryo) बनाता है।
  • बीजांड के चारों ओर एक मज़बूत आवरण बन जाता है और बीजांड धीरे-धीरे बीज (seed) में बदल जाता है।
  • अंडाशय तेज़ी से बढ़कर फल (fruit) बन जाता है — अंडाशय की दीवार फल-भित्ति बनती है।
  • फूल के बाकी भाग — बाह्यदल, दल, पुंकेसर, वर्तिका व वर्तिकाग्र — प्रायः मुरझाकर गिर जाते हैं। (कुछ फलों में बाह्यदल बना रहता है, जैसे बैंगन व अमरूद में दिखने वाला हरा भाग।)

बीज की संरचना व अंकुरण (Germination)

बीज के अंदर भविष्य का पौधा — भ्रूण — सोया हुआ रहता है। भीगे चने को काटकर आप इसके भाग स्वयं देख सकते हैं (NCERT क्रियाकलाप):

  • बीजपत्र (Cotyledons): चने-मटर जैसे द्विबीजपत्री बीजों में दो मोटे बीजपत्र होते हैं, जिनमें भ्रूण के लिए भोजन संचित रहता है।
  • प्रांकुर (Plumule): भ्रूण का वह भाग जो अंकुरण पर ऊपर बढ़कर तना व पत्तियाँ बनाता है।
  • मूलांकुर (Radicle): भ्रूण का वह भाग जो नीचे बढ़कर जड़ बनाता है।

अनुकूल परिस्थितियाँ — नमी (जल), वायु (ऑक्सीजन) व उचित तापमान — मिलने पर बीज के अंदर का भ्रूण सक्रिय होकर बढ़ने लगता है; मूलांकुर पहले बाहर आकर जड़ बनाता है और प्रांकुर ऊपर उठकर प्ररोह बनाता है। बीज से नए पौधे के निकलने की यही प्रक्रिया अंकुरण कहलाती है। तब तक भ्रूण बीजपत्रों के संचित भोजन से पोषण पाता है, जब तक पत्तियाँ स्वयं भोजन (प्रकाश-संश्लेषण) बनाना शुरू न कर दें।

एक साँस में समझें — फूल में परागण → पराग नलिका → बीजांड में निषेचन → युग्मनज → भ्रूण; बीजांड बनता है बीज और अंडाशय बनता है फल।

मानव में लैंगिक जनन – यौवनारंभ से जन्म तक

मानव में जनन लैंगिक होता है — नर युग्मक (शुक्राणु) व मादा युग्मक (अंड) के संलयन से संतान बनती है। लेकिन इसके लिए शरीर का परिपक्व होना ज़रूरी है। आइए क्रम से समझें — पहले यौवनारंभ, फिर दोनों जनन तंत्र, फिर निषेचन से आरोपण तक की यात्रा।

यौवनारंभ (Puberty) – शरीर में होने वाले परिवर्तन

किशोरावस्था में प्रवेश करते ही शरीर में धीरे-धीरे कई परिवर्तन दिखाई देते हैं। इनमें कुछ परिवर्तन लड़के-लड़कियों दोनों में सामान्य होते हैं और कुछ लिंग-विशिष्ट। सामान्य वृद्धि — लंबाई-वज़न बढ़ना, शरीर का आकार बदलना — सामान्य वृद्धि (general growth) है, जबकि जनन-अंगों की परिपक्वता से जुड़े परिवर्तन लैंगिक परिपक्वता (sexual maturation) कहलाते हैं — दोनों में यही अंतर है।

दोनों में सामान्य परिवर्तन: बगल व जननांग क्षेत्र में बाल आना, त्वचा का तैलीय होना व मुहाँसे आना, शरीर की गंध में परिवर्तन, आवाज़ व व्यवहार में धीरे-धीरे बदलाव और विपरीत लिंग के प्रति जागरूकता बढ़ना।

लड़कों में विशिष्ट परिवर्तन: आवाज़ का भारी होना (आवाज़ फटना), चेहरे पर दाढ़ी-मूँछ आना, कंधे चौड़े होना और वृषण द्वारा शुक्राणु निर्माण व हॉर्मोन (टेस्टोस्टेरॉन) का बनना प्रारंभ होना।

लड़कियों में विशिष्ट परिवर्तन: स्तनों का विकास, नितंबों का चौड़ा होना, अंडाशय से अंड का परिपक्व होना प्रारंभ होना और मासिक धर्म (ऋतुस्राव) की शुरुआत।

📌 समझें: ये सभी परिवर्तन प्राकृतिक व सामान्य हैं और धीरे-धीरे, कई वर्षों में होते हैं — किसी में जल्दी, किसी में देर से; यह पूरी तरह सामान्य है। मानव में जनन-क्षमता स्त्रियों में एक निश्चित आयु के बाद समाप्त हो जाती है, जबकि पुरुषों में यह लंबी अवधि तक बनी रहती है — यह भी एक सामान्य जैविक तथ्य है।

नर जनन तंत्र (Male Reproductive System)

वृषण (Testis): नर जनन तंत्र का मुख्य अंग। दो वृषण उदर-गुहा के बाहर वृषण-कोष (scrotum) नामक थैली में स्थित होते हैं। बाहर होने का कारण बहुत महत्वपूर्ण है — शुक्राणु बनने के लिए शरीर के सामान्य तापमान से लगभग 2–3°C कम तापमान चाहिए, और वृषण-कोष यही ठंडक उपलब्ध कराता है। वृषण के दो कार्य हैं: (1) शुक्राणुओं (नर युग्मकों) का निर्माण और (2) टेस्टोस्टेरॉन हॉर्मोन का स्राव, जो लड़कों में लैंगिक लक्षण व शुक्राणु-निर्माण को नियंत्रित करता है। शुक्राणु बहुत छोटी कोशिका है — इसमें मुख्यतः आनुवंशिक पदार्थ (DNA) होता है और एक लंबी पूँछ होती है, जिसकी सहायता से वह तैरकर मादा युग्मक तक पहुँचता है।

शुक्रवाहिनी (Vas Deferens): वृषण से निकलने वाली लंबी नलिका, जो शुक्राणुओं को आगे ले जाती है। यह मूत्राशय के चारों ओर घूमकर मूत्रमार्ग से जुड़ती है — इस प्रकार मूत्रमार्ग, शुक्राणुओं व मूत्र दोनों का सामान्य मार्ग बन जाता है।

ग्रंथियाँ – शुक्राशय व प्रोस्टेट: शुक्राणुओं के मार्ग में शुक्राशय (seminal vesicle) व प्रोस्टेट ग्रंथि (prostate gland) अपना स्राव मिलाती हैं। ये स्राव मिलकर वीर्य (semen) का मुख्य भाग बनाते हैं और इनसे शुक्राणुओं को पोषण मिलता है तथा उनका परिवहन आसान हो जाता है — अर्थात ग्रंथियों का कार्य शुक्राणुओं को सक्रिय, पोषित व गतिशील बनाए रखना है।

शुक्राणु का मार्ग (याद रखें): वृषण → शुक्रवाहिनी → मूत्रमार्ग → शरीर से बाहर।

मादा जनन तंत्र (Female Reproductive System)

अंडाशय (Ovary): उदर के निचले भाग में स्थित दो अंडाशय मादा जनन तंत्र के मुख्य अंग हैं। इनका कार्य है — अंड (मादा युग्मक) का निर्माण व मादा हॉर्मोनों का स्राव। जन्म के समय ही लड़की के अंडाशयों में हज़ारों अपरिपक्व अंड होते हैं; यौवनारंभ के बाद उनमें से प्रतिमाह सामान्यतः एक अंड परिपक्व होकर निकलता है।

अंडवाहिनी (Oviduct / Fallopian Tube): अंडाशय के पास की कीप-जैसी संरचना से शुरू होने वाली नलिका। अंडाशय से निकला अंड इसी में प्रवेश करता है और निषेचन सामान्यतः अंडवाहिनी में ही होता है — यह परीक्षा का प्रिय तथ्य है। नलिका की भीतरी रोमक (cilia) अंड को गर्भाशय की ओर धकेलती हैं।

गर्भाशय (Uterus): नाशपाती के आकार का पेशीय अंग, जहाँ निषेचित अंड (भ्रूण) आरोपित होकर नौ माह तक विकसित होता है। गर्भाशय की भीतरी परत प्रतिमाह मोटी व स्पंजी होकर भ्रूण के स्वागत की तैयारी करती है। दोनों अंडवाहिनियाँ गर्भाशय के ऊपरी भाग में खुलती हैं।

ग्रीवा व योनि (Cervix & Vagina): गर्भाशय का निचला संकरा भाग ग्रीवा है, जो योनि में खुलती है। योनि वह मार्ग है जहाँ शुक्राणु प्रवेश करते हैं और जन्म के समय शिशु भी इसी मार्ग से बाहर आता है।

मादा तंत्र — कार्य सहित क्रम: अंडाशय (अंड बनाना) → अंडवाहिनी (निषेचन का स्थल) → गर्भाशय (आरोपण व भ्रूण विकास का स्थल) → योनि (शुक्राणुओं का प्रवेश मार्ग व जन्म मार्ग)। प्रश्नावली/Exemplar में यही चार जोड़ियाँ बार-बार पूछी जाती हैं।

निषेचन से आरोपण तक – चरण-दर-चरण

चरण 1: यौवनारंभ के बाद प्रतिमाह एक अंड अंडाशय से निकलकर अंडवाहिनी में आता है।

चरण 2: शुक्राणु योनि मार्ग से प्रवेश करके गर्भाशय से होते हुए अंडवाहिनी तक पहुँचते हैं।

चरण 3: अंडवाहिनी में यदि शुक्राणु अंड से मिल जाए, तो दोनों का संलयन होता है — यही निषेचन है और इससे युग्मनज बनता है, जिसमें गुणसूत्रों की संख्या 46 पुनः स्थापित हो जाती है। ध्यान दें — अंड प्रतिमाह एक ही निकलता है, इसलिए निषेचन का अवसर भी सामान्यतः महीने में एक बार ही बनता है।

चरण 4: युग्मनज विभाजित होना शुरू करता है और कोशिकाओं की एक गेंद-सी संरचना (भ्रूण) बनती है; यह संरचना अंडवाहिनी से होती हुई गर्भाशय तक पहुँचती है।

चरण 5: भ्रूण गर्भाशय की मोटी, रक्त-समृद्ध भीतरी परत में धँस जाता है — इस प्रक्रिया को आरोपण (Implantation) कहते हैं। इसके बाद भ्रूण का विकास गर्भाशय में ही होता है।

अपरा (Placenta) – माँ व भ्रूण के बीच जीवन-सेतु

आरोपण के बाद गर्भाशय की दीवार में एक विशेष ऊतक विकसित होता है — अपरा (Placenta)। यह गर्भाशय की दीवार में धँसी हुई एक चक्रिका (disc) जैसी संरचना है। भ्रूण की ओर इसमें प्रवर्ध (villi) होते हैं और माँ की ओर रक्त-कोटर (blood spaces) इन्हें घेरे रहते हैं — इससे विनिमय के लिए बहुत बड़ा सतह-क्षेत्र मिल जाता है।

अपरा के कार्य:

  • माँ के रक्त से ग्लूकोज़, ऑक्सीजन व अन्य पोषक पदार्थ भ्रूण तक पहुँचाना — भ्रूण का सारा पोषण इसी से मिलता है।
  • भ्रूण में बने अपशिष्ट पदार्थों को माँ के रक्त में लौटाना, जहाँ से वे माँ के शरीर द्वारा बाहर निकाले जाते हैं।
  • भ्रूण को गर्भाशय से जोड़े रखना व उसके विकास के लिए आवश्यक वातावरण देना।

📌 ध्यान दें: माँ व भ्रूण का रक्त सीधे मिलता नहीं है; पदार्थ रक्त-कोटरों व प्रवर्धों की पतली दीवारों से विसरण द्वारा आदान-प्रदान होते हैं। बोर्ड उत्तर में “अपरा से पोषण मिलता है” के साथ यह क्रियाविधि (villi व blood spaces) लिखने पर उत्तर पूर्ण व प्रभावी बनता है।

यदि निषेचन न हो तो? – मासिक धर्म (ऋतुस्राव) क्यों होता है?

गर्भाशय प्रतिमाह निषेचित अंड के स्वागत की तैयारी करता है — उसकी भीतरी परत मोटी व स्पंजी हो जाती है और उसमें रक्त-वाहिनियों का जाल बिछ जाता है। यदि अंड का निषेचन न हो, तो अंड लगभग एक दिन तक जीवित रहकर नष्ट हो जाता है और तैयार परत की आवश्यकता समाप्त हो जाती है। तब यह मोटी परत धीरे-धीरे टूटकर रक्त व श्लेष्मा के रूप में योनि मार्ग से बाहर आ जाती है — इसी चक्रीय प्रक्रिया को मासिक धर्म या ऋतुस्राव (Menstruation) कहते हैं। यह चक्र सामान्यतः 28–30 दिनों का होता है और स्राव 2–8 दिन रहता है। यह पूर्णतः प्राकृतिक प्रक्रिया है — इसमें कोई अशुद्धि नहीं है; यह तो जनन-तंत्र के स्वस्थ काम करने का संकेत है।

युग्मक बनाम युग्मनज: युग्मक जनन कोशिका है — अगुणित (आधी गुणसूत्र संख्या), नर या मादा; युग्मनज निषेचन का उत्पाद है — द्विगुणित (पूरी गुणसूत्र संख्या), अगली पीढ़ी की पहली कोशिका। साथ ही याद रखें — अंड में लिंग-गुणसूत्र सदैव X होता है, जबकि शुक्राणु में X या Y हो सकता है; अंड व शुक्राणु के गुणसूत्रों का अनुपात 1 : 1 और अंड व युग्मनज का अनुपात 1 : 2 होता है।

जनन स्वास्थ्य – सुरक्षा, रोग व गर्भनिरोधक विधियाँ

जनन केवल संतान उत्पन्न करना नहीं है — इससे जुड़ा स्वास्थ्य, सुरक्षा व ज़िम्मेदारी समझना भी उतना ही ज़रूरी है। NCERT ने इस भाग को वैज्ञानिक व संवेदनशील दृष्टि से रखा है; हम भी उसी भाषा में समझेंगे।

गर्भनिरोधक विधियाँ क्यों अपनाई जाती हैं?

बढ़ती जनसंख्या के साथ हर व्यक्ति के जीवन-स्तर को सुधारना कठिन हो जाता है — संसाधन सीमित हैं। इसलिए अनेक दंपति परिवार का आकार सीमित रखने व बच्चों के बीच उचित अंतर रखने के लिए गर्भनिरोधक विधियाँ अपनाते हैं। इन विधियों का सिद्धांत सरल है — निषेचन को रोकना: या तो शुक्राणु को अंड तक पहुँचने से रोको, या अंड बनने/निकलने को रोको, या निषेचित अंड को गर्भाशय में आरोपित होने से रोको।

गर्भनिरोधक की चार प्रमुख विधियाँ

1. अवरोधक विधियाँ (Barrier Methods): इनमें शुक्राणु व अंड के बीच भौतिक रुकावट खड़ी कर दी जाती है। कंडोम — शिश्न पर पहना जाने वाला आवरण — शुक्राणुओं को योनि में जाने से रोकता है। इसी प्रकार योनि में पहने जाने वाले आवरण (डायाफ्राम आदि) भी अवरोध का कार्य करते हैं। इस विधि का एक अतिरिक्त व अत्यंत महत्वपूर्ण लाभ है — यह यौन संचारित रोगों से भी सुरक्षा देती है, जो अन्य विधियाँ नहीं देतीं।

2. रासायनिक विधियाँ / गोलियाँ (Chemical Methods / Oral Pills): मुँह से ली जाने वाली ये गोलियाँ शरीर के हॉर्मोन-संतुलन को बदल देती हैं, जिससे अंड परिपक्व होकर निकलता ही नहीं और निषेचन हो ही नहीं सकता। ये चिकित्सक की सलाह से ही लेनी चाहिए, क्योंकि हॉर्मोन बदलने से कुछ दुष्प्रभाव भी हो सकते हैं।

3. IUCD – अंतःगर्भाशयी युक्ति (Copper-T): कॉपर-T (Copper-T) जैसी युक्ति चिकित्सक द्वारा गर्भाशय में स्थापित की जाती है। यह निषेचित अंड के आरोपण को रोककर गर्भधारण नहीं होने देती। ध्यान रहे — गर्भाशय में जलन/परेशानी जैसे दुष्प्रभाव संभव हैं, और महत्वपूर्ण बात यह कि Copper-T यौन संचारित रोगों से कोई सुरक्षा नहीं देती, क्योंकि यह शुक्राणु-संपर्क को नहीं रोकती।

4. शल्यक्रिया विधियाँ (Surgical Methods): पुरुषों में शुक्रवाहिनी को अवरुद्ध कर दिया जाता है (नसबंदी/Vasectomy), जिससे शुक्राणु बाहर आ ही नहीं पाते; स्त्रियों में अंडवाहिनी को अवरुद्ध कर दिया जाता है (Tubectomy), जिससे अंड गर्भाशय तक पहुँच ही नहीं पाता। दोनों ही स्थितियों में निषेचन असंभव हो जाता है। ये विधियाँ अत्यंत प्रभावी हैं, परंतु सामान्यतः स्थायी मानी जाती हैं — इन्हें उलटना कठिन हो सकता है, इसलिए यह निर्णय सोच-समझकर, परिवार पूर्ण होने के बाद ही लिया जाता है। साथ ही, शल्य-क्रिया में स्वच्छता की कमी से संक्रमण का जोखिम भी रहता है, इसलिए प्रशिक्षित चिकित्सक से ही करानी चाहिए।

सुरक्षित यौन व्यवहार व यौन संचारित रोग (STI) – संक्षिप्त व वैज्ञानिक परिचय

यौन संपर्क के दौरान एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में कुछ संक्रमण फैल सकते हैं — इन्हें यौन संचारित रोग/संक्रमण (Sexually Transmitted Diseases/Infections — STD/STI) कहते हैं। NCERT के अनुसार इनके दो प्रमुख वर्ग हैं — जीवाणु-जनित: गोनोरिया (Gonorrhoea) व सिफ़लिस (Syphilis); और विषाणु-जनित: मस्से (Warts) व HIV-AIDS। इनमें HIV सबसे गंभीर है, क्योंकि यह शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को कमज़ोर कर देता है।

बचाव का सबसे सरल उपाय — यौन संपर्क के समय अवरोधक विधि (कंडोम) का प्रयोग, क्योंकि यह संक्रमित स्रावों के सीधे संपर्क को रोकता है। ध्यान दें — गोलियाँ व Copper-T गर्भ रोकते हैं, रोग नहीं; रोगों से बचाव केवल अवरोधक विधि से ही संभव है। यह बात Board के InText प्रश्न में सीधे पूछी गई है, इसलिए पक्की याद रखें। जनन स्वास्थ्य के किसी भी प्रश्न या समस्या में झिझक छोड़कर योग्य चिकित्सक से परामर्श लेना ही सही वैज्ञानिक दृष्टिकोण है।

एक साँस में समझें — गर्भनिरोधक की चार विधियाँ हैं: अवरोधक (कंडोम — रोगों से भी बचाव), रासायनिक गोलियाँ (हॉर्मोन से अंड-निर्गमन रोकना), IUCD/Copper-T (गर्भाशय में, आरोपण रोकना) व शल्यक्रिया (नलिकाएँ अवरुद्ध करना — स्थायी)।

📘 पाठ्य-पुस्तक के प्रश्न (InText Questions)

ये वे प्रश्न हैं जो NCERT किताब के अनुच्छेदों के बीच-बीच में दिए गए हैं। Board में ये प्रश्न वैसे-के-वैसे पूछ लिए जाते हैं, इसलिए इन्हें सबसे पहले तैयार कीजिए। इस अध्याय में कुल तीन सेटों में 11 InText प्रश्न हैं।

(क) अनुच्छेद 8.1 पर आधारित प्रश्न – DNA प्रतिकृति व विविधता

प्रश्न 1. जनन में DNA प्रतिकृति (प्रतिलिपिकरण) का क्या महत्व है?

हल:

चरण 1: जीव अपने जैसे दिखते हैं क्योंकि उनके शरीर की रूपरेखा (body design) एक जैसी होती है। यह रूपरेखा DNA में लिखी होती है — अर्थात लक्षणों की जानकारी DNA के रूप में ही संग्रहित है।

चरण 2: यदि संतति को जनक जैसे लक्षण मिलने हैं, तो उसे जनक के DNA की प्रति मिलनी ही चाहिए। जनन की सबसे मूल घटना यही है — कोशिका अपने DNA की एक प्रतिकृति बनाती है और वह नई कोशिका को मिल जाती है।

उत्तर: DNA प्रतिकृति से ही आनुवंशिक जानकारी एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक जाती है, संतति जनक के समान बनती है और प्रजाति के लक्षण बने रहते हैं। इसके बिना जनन अर्थहीन है — नया जीव बने भी तो उसे शरीर बनाने की “रूपरेखा” ही नहीं मिलेगी।

प्रश्न 2. विविधता, प्रजाति के लिए तो लाभदायक है परंतु व्यक्ति के लिए आवश्यक नहीं — क्यों?

हल:

चरण 1: DNA प्रतिकृति बनते समय छोटी त्रुटियाँ हो जाती हैं, इसलिए संततियाँ जनक से मिलती-जुलती तो होती हैं, पर पूरी तरह एक जैसी नहीं। कुछ विविधताएँ गंभीर हो सकती हैं — ऐसी कोशिका/संतति जीवित नहीं रह पाती। यानी व्यक्ति विशेष के लिए विविधता लाभ की गारंटी नहीं देती, कभी-कभी वह उसके लिए घातक भी हो सकती है।

चरण 2: लेकिन प्रजाति के स्तर पर सोचिए — यदि किसी जनसंख्या के सभी जीव बिल्कुल एक जैसे हों और वातावरण अचानक बदल जाए (जैसे तापमान बहुत बढ़ जाए), तो सभी एक साथ समाप्त हो सकते हैं। विविधता होने पर कुछ जीव बदली परिस्थिति को सहने योग्य निकल आते हैं — वे बचते हैं, बढ़ते हैं और प्रजाति को आगे ले जाते हैं।

उत्तर: इसीलिए विविधता व्यक्ति के लिए आवश्यक रूप से लाभदायक नहीं, परंतु प्रजाति के अस्तित्व, अनुकूलन व जैव विकास के लिए अनिवार्य है।

(ख) अनुच्छेद 8.2 पर आधारित प्रश्न – अलैंगिक जनन

प्रश्न 1. द्विखंडन, बहुखंडन से किस प्रकार भिन्न है?

हल:

चरण 1: द्विखंडन में एककोशिकीय जीव की कोशिका विभाजित होकर दो संतति कोशिकाएँ बनाती है — जैसे अमीबा, पैरामीशियम व जीवाणु। अमीबा में विभाजन किसी भी तल से हो सकता है, जबकि लीशमैनिया में चाबुक-जैसी संरचना के कारण विभाजन निश्चित तल में होता है।

चरण 2: बहुखंडन में एक ही जीव एक साथ अनेक संतति कोशिकाओं में विभाजित हो जाता है — केंद्रक बार-बार बँटता है और प्रत्येक के चारों ओर कोशिका द्रव्य आकर कई संततियाँ एक साथ बन जाती हैं — जैसे मलेरिया परजीवी प्लाज़्मोडियम।

उत्तर: अंतर केवल संख्या का है — द्विखंडन में 2 संततियाँ, बहुखंडन में अनेक संततियाँ एक बार में बनती हैं। दोनों ही अलैंगिक जनन हैं।

प्रश्न 2. बीजाणुओं द्वारा जनन करने से जीव को क्या लाभ होता है?

हल:

चरण 1: बीजाणु (जैसे राइजोपस के) बहुत छोटे व हल्के होते हैं और उनकी संख्या असंख्य होती है — हवा द्वारा वे दूर-दूर तक फैल जाते हैं, इसलिए जीव का प्रसार बड़े क्षेत्र में हो जाता है।

चरण 2: बीजाणुओं के चारों ओर मोटी, मज़बूत भित्ति होती है, जो उन्हें गर्मी, सूखा व अन्य प्रतिकूल परिस्थितियों से तब तक सुरक्षित रखती है, जब तक उन्हें अंकुरण के लिए अनुकूल नम सतह न मिल जाए।

उत्तर: अतः बीजाणु-जनन से जीव को दो लाभ मिलते हैं — (1) प्रतिकूल काल में सुरक्षा और (2) हवा द्वारा दूर तक फैलाव। यही कारण है कि नम ब्रेड पर फफूँद इतनी तेज़ी से फैल जाती है।

प्रश्न 3. क्या आप कुछ कारण सोच सकते हैं, जिनसे अधिक जटिल जीव पुनर्जनन द्वारा नई संतति नहीं उत्पन्न कर सकते?

हल:

चरण 1: पुनर्जनन विशिष्ट कोशिकाओं द्वारा होता है — वे कोशिकाएँ जो तेज़ी से विभाजित होकर सभी प्रकार के ऊतक पुनः बना सकें। सरल जीवों (हाइड्रा, प्लेनेरिया) में ऐसी कोशिकाएँ उपलब्ध होती हैं।

चरण 2: जटिल जीवों का शरीर अत्यंत संगठित होता है — कोशिकाएँ ऊतकों, ऊतक अंगों और अंग अंग-तंत्रों में व्यवस्थित होते हैं और प्रत्येक कोशिका/अंग का कार्य निश्चित होता है (श्रम-विभाजन)। ऐसी विशिष्ट कोशिकाएँ अपने निश्चित कार्य के अतिरिक्त दूसरा कार्य नहीं कर सकतीं।

उत्तर: इसीलिए जटिल जीव का कोई टुकड़ा संपूर्ण जीव नहीं बना सकता — उनमें पुनर्जनन के लिए आवश्यक अविशिष्ट कोशिकाएँ व सरल शरीर-संगठन नहीं होता। मानव में घाव भरना केवल सीमित मरम्मत है, पुनर्जनन नहीं।

प्रश्न 4. कुछ पौधों की वृद्धि के लिए कायिक प्रवर्धन का उपयोग क्यों किया जाता है?

हल:

चरण 1: कुछ पौधे — जैसे केला, संतरा, गुलाब व चमेली — बीज बनाने की क्षमता खो चुके हैं। ऐसे पौधों को उगाने का एकमात्र रास्ता कायिक प्रवर्धन ही है, क्योंकि उनके जड़, तना व पत्ती जैसे भागों में नए पौधे बनाने की क्षमता होती है।

चरण 2: इसके अतिरिक्त कायिक प्रवर्धन से बने पौधों में जनक के सभी अच्छे गुण हूबहू आते हैं और वे बीज से बने पौधों की अपेक्षा जल्दी फल-फूल देते हैं।

उत्तर: अतः बीज-रहित पौधों को फैलाने, अच्छे गुण बनाए रखने व जल्दी उपज पाने के लिए कायिक प्रवर्धन का उपयोग किया जाता है।

प्रश्न 5. जनन की प्रक्रिया में DNA प्रतिकृति का बनना एक आवश्यक घटना क्यों है?

हल:

चरण 1: जनन में मुख्य घटना DNA की दो प्रतियों का बनना है, क्योंकि लक्षणों की सारी जानकारी DNA में ही है — प्रति बनेगी तभी वह जानकारी संतति तक जाएगी।

चरण 2: जब DNA की दो प्रतियाँ बन जाती हैं, तो उनके अलग-अलग कोशिकाओं में जाने के लिए अतिरिक्त कोशिकीय संरचना भी बनानी पड़ती है; फिर दो प्रतियाँ अलग होकर दो नई कोशिकाएँ बनाती हैं। अर्थात केवल DNA की प्रति बनना ही काफी नहीं — उसके साथ कोशिका का विभाजन-तंत्र भी जुड़ा है।

उत्तर: इस प्रकार DNA प्रतिकृति बनाना जनन की आधारभूत व अनिवार्य घटना है — इससे शरीर-रूपरेखा की निरंतरता बनी रहती है और प्रतिकृति की हल्की त्रुटियों से विविधता भी आती रहती है।

(ग) अनुच्छेद 8.3 पर आधारित प्रश्न – मानव जनन व जनन स्वास्थ्य

प्रश्न 1. यदि अंड का निषेचन न हो, तो गर्भाशय में क्या परिवर्तन प्रेक्षित होते हैं?

हल:

चरण 1: गर्भाशय प्रतिमाह निषेचित अंड के स्वागत हेतु अपनी भीतरी परत को मोटा व स्पंजी बनाता है, ताकि भ्रूण आरोपित हो सके।

चरण 2: यदि निषेचन न हो, तो अंड नष्ट हो जाता है और इस तैयार परत की आवश्यकता नहीं रहती।

उत्तर: तब गर्भाशय की मोटी व स्पंजी भीतरी परत धीरे-धीरे टूटकर रक्त व श्लेष्मा के रूप में योनि मार्ग से बाहर आ जाती है — यही मासिक धर्म (ऋतुस्राव) है।

प्रश्न 2. युवा भ्रूण के आरोपण के पश्चात गर्भाशय में क्या परिवर्तन होते हैं?

हल: निषेचन के बाद युग्मनज विभाजित होकर भ्रूण बनाता है और गर्भाशय में आरोपित हो जाता है। आरोपण के बाद गर्भाशय की दीवार और मोटी होती है व रक्त-आपूर्ति से समृद्ध हो जाती है। उसी दीवार में एक विशेष ऊतक — अपरा (placenta) — विकसित होता है, जो भ्रूण को गर्भाशय की दीवार से जोड़ता है और माँ के रक्त से भ्रूण को पोषण व ऑक्सीजन उपलब्ध कराता है। गर्भावस्था के दौरान मासिक चक्र रुक जाता है, क्योंकि परत को भ्रूण के विकास के लिए बनाए रखना होता है।

उत्तर: संक्षेप में — आरोपण के बाद गर्भाशय-भित्ति मोटी व रक्त-समृद्ध रहती है, अपरा का विकास होता है और भ्रूण का विकास गर्भाशय में ही जारी रहता है।

प्रश्न 3. भ्रूण, माँ के शरीर के अंदर पोषण कैसे प्राप्त करता है?

हल:

चरण 1: भ्रूण गर्भाशय की दीवार में आरोपित होता है और वहाँ विशेष ऊतक अपरा बनता है — यह गर्भाशय-भित्ति में धँसी चक्रिका जैसी संरचना है।

चरण 2: अपरा में भ्रूण की ओर प्रवर्ध (villi) होते हैं और माँ की ओर रक्त-कोटर उन्हें घेरे रहते हैं, जिससे विनिमय हेतु विशाल सतह-क्षेत्र मिलता है।

उत्तर: माँ के रक्त से ग्लूकोज़ व ऑक्सीजन अपरा द्वारा भ्रूण तक पहुँचते हैं और भ्रूण के अपशिष्ट पदार्थ अपरा द्वारा ही माँ के रक्त में लौटा दिए जाते हैं — इसी से भ्रूण को पूरे गर्भकाल में पोषण मिलता रहता है।

प्रश्न 4. यदि कोई महिला कॉपर-T (Copper-T) का प्रयोग कर रही है, तो क्या यह उसकी यौन संचारित रोगों से रक्षा करेगा?

हल: कॉपर-T गर्भाशय के अंदर स्थापित एक अंतःगर्भाशयी युक्ति है, जो आरोपण को रोककर गर्भधारण नहीं होने देती। लेकिन यह शुक्राणुओं के प्रवेश या संक्रमित स्रावों के संपर्क को बिल्कुल नहीं रोकती — यौन संपर्क सामान्य रूप से होता है, इसलिए रोगाणु (जीवाणु/विषाणु) एक व्यक्ति से दूसरे तक पहुँच सकते हैं।

उत्तर: नहीं। कॉपर-T केवल गर्भ रोकता है, यौन संचारित रोगों से रक्षा नहीं करता। रोगों से बचाव केवल अवरोधक विधि (कंडोम) से ही संभव है, क्योंकि वही संपर्क में अवरोध पैदा करती है।

📗 NCERT उदाहरण (Examples)

एक बात पहले ही साफ़ कर दें — इस अध्याय में NCERT ने गणित की तरह क्रमांकित “उदाहरण (Examples)” नहीं दिए हैं। किताब की सीख क्रियाकलापों (Activities 8.1 से 8.7) के माध्यम से दी गई है। नीचे उन्हीं क्रियाकलापों पर आधारित सात सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण दिए जा रहे हैं — परीक्षा में इन्हीं पर आधारित प्रेक्षण-प्रश्न (observation questions) आते हैं।

उदाहरण 1 (क्रियाकलाप 8.1). चीनी के घोल में यीस्ट डालकर सूक्ष्मदर्शी से देखने पर क्या दिखता है?

हल: लगभग 10 g चीनी 100 mL जल में घोलकर उसमें यीस्ट के दाने मिलाए जाते हैं और मिश्रण को गर्म स्थान पर रखा जाता है। 1–2 घंटे बाद स्लाइड पर यीस्ट की कोशिकाएँ दिखती हैं, जिनमें से कई पर छोटे मुकुल (buds) बने होते हैं और कुछ में मुकुलों की शृंखला भी दिखती है। निष्कर्ष — यीस्ट में मुकुलन द्वारा अलैंगिक जनन होता है और चीनी उसे वृद्धि के लिए ऊर्जा देती है, इसलिए केवल जल की अपेक्षा चीनी-घोल में कॉलोनी तेज़ी से बढ़ती है।

उदाहरण 2 (क्रियाकलाप 8.2). नम ब्रेड को ठंडी, नमी वाली अँधेरी जगह रखने पर एक सप्ताह में क्या परिवर्तन होता है?

हल: पहले ब्रेड की सतह पर सफ़ेद रूई-जैसा जाल (राइजोपस के तंतु) फैलता है। कुछ दिनों में उस पर काले बिंदु-जैसी गोल संरचनाएँ — बीजाणुधानियाँ — बन जाती हैं, जिनमें बीजाणु भरे होते हैं। निष्कर्ष — बीजाणुओं को अंकुरण के लिए नमी व पोषक पदार्थ चाहिए; सूखी ब्रेड पर यह वृद्धि नहीं होती। यही कारण है कि नम ब्रेड पर फफूँद तेज़ी से फैलती है।

उदाहरण 3 (क्रियाकलाप 8.3). अमीबा की सामान्य स्लाइड व द्विखंडन वाली स्लाइड में क्या अंतर दिखता है?

हल: सामान्य स्लाइड में एक पूर्ण अमीबा कोशिका — कोशिका द्रव्य व एक केंद्रक — दिखता है। द्विखंडन वाली स्लाइड में केंद्रक दो भागों में बँटा हुआ और कोशिका द्रव्य बीच से सिकुड़ा (संकीर्णित) हुआ दिखता है — अर्थात एक कोशिका दो संतति कोशिकाओं में बँटने की अवस्था में है। निष्कर्ष — अमीबा में द्विखंडन होता है।

उदाहरण 4 (क्रियाकलाप 8.4). स्पाइरोगायरा के तंतु को सूक्ष्मदर्शी से देखने पर क्या पहचाना जाता है?

हल: हरे तालाब-जल से लिए गए तंतु में कई कोशिकाएँ एक रेखा में जुड़ी हुई दिखती हैं, जो मिलकर तंतु बनाती हैं। स्पाइरोगायरा एक सरल बहुकोशिकीय जीव है — परिपक्व होने पर यही तंतु टुकड़ों में टूटता है और प्रत्येक टुकड़ा नया तंतु बन जाता है। निष्कर्ष — स्पाइरोगायरा में खंडन द्वारा जनन होता है।

उदाहरण 5 (क्रियाकलाप 8.5). आलू के आँख वाले व बिना आँख वाले टुकड़ों को नम रूई पर रखने पर क्या होता है?

हल: कुछ दिनों में केवल उन्हीं टुकड़ों से हरे प्ररोह व जड़ें निकलती हैं, जिनमें आँख (कलिका) होती है; बिना आँख वाले टुकड़े वैसे ही रह जाते हैं। निष्कर्ष — आलू में कायिक प्रवर्धन तने (कंद) की कलिकाओं से होता है; कलिका ही वृद्धि का केंद्र है।

उदाहरण 6 (क्रियाकलाप 8.6). मनी-प्लांट के कौन-से टुकड़े पानी में रखने पर बढ़ते हैं?

हल: वे टुकड़े बढ़कर नई पत्तियाँ देते हैं जिनमें कम-से-कम एक पर्व (node) व पत्ती होती है, क्योंकि पत्ती के कक्ष (axil) में कलिका होती है। दो पत्तियों के बीच से काटा गया खाली टुकड़ा (पर्व-रहित) नहीं बढ़ पाता। निष्कर्ष — कायिक प्रवर्धन के लिए कलिका का होना अनिवार्य है।

उदाहरण 7 (क्रियाकलाप 8.7). रात भर भिगोए चने के बीज को काटकर देखने पर कौन-से भाग दिखते हैं?

हल: बीजावरण हटाने पर दो मोटे बीजपत्र दिखते हैं, जिनके बीच छोटा भ्रूण होता है — उसका एक सिरा प्रांकुर (भावी प्ररोह) व दूसरा मूलांकुर (भावी जड़) होता है। निष्कर्ष — बीजपत्र भ्रूण के लिए भोजन संचित रखते हैं और अंकुरण में प्रांकुर से तना-पत्ती व मूलांकुर से जड़ बनती है।

✏️ प्रश्नावली (Exercise) – सभी 11 प्रश्नों के हल

प्रश्न 1. अलैंगिक जनन, मुकुलन द्वारा होता है — (a) अमीबा में (b) यीस्ट में (c) प्लाज़्मोडियम में (d) लीशमैनिया में

हल:

चरण 1: हर विकल्प की विधि याद कीजिए — अमीबा में द्विखंडन, प्लाज़्मोडियम में बहुखंडन और लीशमैनिया में भी द्विखंडन होता है।

चरण 2: यीस्ट की कोशिका पर मुकुल (कलिका) बनता है, जो बढ़कर अलग हो जाता है — यही मुकुलन है। हाइड्रा में भी मुकुलन होता है, पर वह विकल्प में नहीं है।

उत्तर: (b) यीस्ट

प्रश्न 2. निम्न में से कौन मानव में मादा जनन तंत्र का भाग नहीं है? (a) अंडाशय (b) गर्भाशय (c) शुक्रवाहिनी (d) अंडवाहिनी

हल:

चरण 1: अंडाशय, गर्भाशय व अंडवाहिनी — तीनों मादा जनन तंत्र के अंग हैं: अंडाशय अंड बनाता है, अंडवाहिनी निषेचन का स्थल है और गर्भाशय में भ्रूण विकसित होता है।

चरण 2: शुक्रवाहिनी नर जनन तंत्र की नलिका है, जो वृषण से शुक्राणुओं को मूत्रमार्ग तक ले जाती है — मादा तंत्र में इसका कोई स्थान नहीं।

उत्तर: (c) शुक्रवाहिनी

प्रश्न 3. परागकोश में होते हैं — (a) बाह्यदल (b) बीजांड (c) स्त्रीकेसर (d) परागकण

हल:

चरण 1: परागकोश, पुंकेसर के सिरे पर स्थित थैली-जैसी संरचना है — यह नर अंग का भाग है।

चरण 2: बाह्यदल फूल का सबसे बाहरी हरा भाग है; बीजांड अंडाशय के अंदर होता है; स्त्रीकेसर पूरा मादा अंग है — तीनों परागकोश में नहीं होते। परागकोश के अंदर ही परागकण बनते हैं।

उत्तर: (d) परागकण

प्रश्न 4. अलैंगिक जनन की अपेक्षा लैंगिक जनन के क्या लाभ हैं?

हल:

चरण 1: लैंगिक जनन में दो जनकों के युग्मक जुड़ते हैं, इसलिए संतति में दोनों जनकों के लक्षणों के नए संयोग बनते हैं — अर्थात विविधता अधिक आती है।

चरण 2: अधिक विविधता से जनसंख्या के कुछ जीव बदले वातावरण (तापमान, रोग, भोजन की कमी आदि) के अनुकूल निकल आते हैं — इससे प्रजाति के बचे रहने की संभावना बढ़ती है।

उत्तर: (1) संतति में दोनों जनकों के लक्षण आते हैं; (2) अधिक विविधता उत्पन्न होती है; (3) बदलते वातावरण में अनुकूलन व अस्तित्व की संभावना बढ़ती है; (4) लंबी अवधि में यही विविधता नई प्रजातियों के उद्भव में सहायक होती है। अलैंगिक जनन में संततियाँ लगभग एक समान होने से ये लाभ नहीं मिलते।

प्रश्न 5. मानव में वृषण के क्या कार्य हैं?

हल:

चरण 1: वृषण नर जनन तंत्र के मुख्य अंग हैं, जो वृषण-कोष में शरीर से बाहर स्थित होते हैं — बाहर होने से उन्हें शुक्राणु-निर्माण के लिए आवश्यक कम तापमान (शरीर से लगभग 2–3°C कम) मिलता है।

चरण 2: वृषण नर युग्मक — शुक्राणु — बनाते हैं। शुक्राणु छोटी कोशिका है, जिसमें आनुवंशिक पदार्थ व गतिशीलता के लिए लंबी पूँछ होती है।

उत्तर: वृषण के कार्य — (1) शुक्राणुओं (नर युग्मकों) का निर्माण और (2) टेस्टोस्टेरॉन हॉर्मोन का स्राव, जो लड़कों में लैंगिक लक्षणों का विकास व शुक्राणु-निर्माण नियंत्रित करता है।

प्रश्न 6. ऋतुस्राव क्यों होता है?

हल:

चरण 1: प्रतिमाह एक अंड अंडाशय से निकलता है और उसी समय गर्भाशय निषेचित अंड के स्वागत के लिए अपनी भीतरी परत को मोटा व स्पंजी बनाकर तैयार करता है।

चरण 2: यदि अंड का निषेचन न हो, तो अंड नष्ट हो जाता है और इस तैयार परत की आवश्यकता समाप्त हो जाती है।

उत्तर: निषेचन न होने पर गर्भाशय की मोटी व स्पंजी भीतरी परत टूटकर रक्त व श्लेष्मा के रूप में योनि से बाहर आ जाती है — इसी प्रक्रिया को ऋतुस्राव (मासिक धर्म) कहते हैं। यह लगभग प्रतिमाह दोहराए जाने वाला प्राकृतिक चक्र है।

प्रश्न 7. पुष्प की अनुदैर्ध्य काट का नामांकित चित्र बनाइए।

हल: (चित्र शब्दों में — परीक्षा में ठीक इसी क्रम में चित्र बनाकर नाम लिखिए।)

चरण 1: सबसे नीचे फूल का डंठल (वृंत) व उस पर बाहरी हरा घेरा — बाह्यदल (Sepal) — बनाइए। उसके अंदर रंगीन दल (Petal) दिखाइए।

चरण 2: दल के अंदर कई पुंकेसर (Stamen) बनाइए — प्रत्येक में पतला तंतु (Filament) व सिरे पर परागकोश (Anther); परागकोश में छोटे बिंदुओं से परागकण दर्शाइए।

चरण 3: ठीक केंद्र में स्त्रीकेसर (Pistil) बनाइए — ऊपर चपटा वर्तिकाग्र (Stigma), बीच में वर्तिका (Style) और नीचे फूला अंडाशय (Ovary), जिसके अंदर छोटे बीजांड (Ovule) दिखाइए।

उत्तर (नामांकन क्रम): बाह्यदल → दल → पुंकेसर (तंतु + परागकोश/परागकण) → स्त्रीकेसर (वर्तिकाग्र + वर्तिका + अंडाशय + बीजांड)। साफ़ चित्र, सीधी रेखाओं से नामांकन व हर नाम सही भाग तक — बस इतना ही पूरे अंकों का सूत्र है।

प्रश्न 8. गर्भनिरोधक की विभिन्न विधियाँ कौन-सी हैं?

हल:

चरण 1 — अवरोधक विधियाँ: शुक्राणु को अंड तक पहुँचने से रोकना — जैसे शिश्न पर कंडोम या योनि में पहने जाने वाले आवरण। ये विधियाँ यौन संचारित रोगों से भी बचाती हैं।

चरण 2 — रासायनिक विधियाँ (गोलियाँ): मुँह से ली जाने वाली गोलियाँ शरीर का हॉर्मोन-संतुलन बदलकर अंड का निकलना ही रोक देती हैं, जिससे निषेचन नहीं हो सकता।

चरण 3 — अंतःगर्भाशयी युक्ति (IUCD): गर्भाशय में चिकित्सक द्वारा स्थापित कॉपर-T जैसी युक्ति आरोपण को रोकती है; कभी-कभी गर्भाशय में जलन जैसे दुष्प्रभाव हो सकते हैं और यह रोगों से बचाव नहीं करती।

उत्तर — चरण 4, शल्यक्रिया विधियाँ: पुरुष में शुक्रवाहिनी व स्त्री में अंडवाहिनी को अवरुद्ध कर देना — शुक्राणु/अंड का मार्ग ही बंद हो जाने से निषेचन असंभव। ये स्थायी व अत्यंत प्रभावी विधियाँ हैं। इस प्रकार गर्भनिरोधक की चार विधियाँ हैं — अवरोधक, रासायनिक, IUCD व शल्यक्रिया।

प्रश्न 9. एककोशिकीय व बहुकोशिकीय जीवों की जनन पद्धति में क्या अंतर है?

हल:

चरण 1: एककोशिकीय जीवों में केवल एक कोशिका होती है और जनन के लिए कोई अलग ऊतक/अंग नहीं होता — अतः वे कोशिका-विभाजन द्वारा ही जनन करते हैं: विखंडन (अमीबा – द्विखंडन, प्लाज़्मोडियम – बहुखंडन) अथवा मुकुलन (यीस्ट)। उनमें कोशिका बँटना ही नए जीव बनना है।

चरण 2: बहुकोशिकीय जीवों में अनेक कोशिकाएँ, ऊतक व अंग-तंत्र होते हैं और जनन के लिए विशेष जनन कोशिकाएँ/अंग होते हैं। वे मुख्यतः लैंगिक जनन करते हैं; सरल बहुकोशिकीय जीवों में अलैंगिक विधियाँ भी होती हैं — जैसे स्पाइरोगायरा में खंडन, हाइड्रा-प्लेनेरिया में पुनर्जनन व पौधों में कायिक प्रवर्धन।

उत्तर: एककोशिकीय जीवों में विभाजन = जनन है, जबकि बहुकोशिकीय जीवों में जनन विशेष कोशिकाओं/अंगों का कार्य है और वे लैंगिक तथा (कुछ में) अलैंगिक — दोनों पद्धतियों का उपयोग कर सकते हैं।

प्रश्न 10. जनन, किसी प्रजाति की जनसंख्या स्थायित्व में किस प्रकार सहायक है?

हल:

चरण 1: सभी जीव अपने-अपने निर्धारित पर्यावास (niche) में रहते हैं और जनन द्वारा नए जीव बनाते रहते हैं। जब तक जन्म-दर व मृत्यु-दर में संतुलन बना रहता है, प्रजाति की जनसंख्या स्थिर रहती है — यह संतुलन केवल जनन से ही संभव है।

चरण 2: जनन में DNA प्रतिकृति की स्थिरता (consistency) से शरीर-रूपरेखा के वे लक्षण बने रहते हैं, जिनसे जीव अपने विशेष पर्यावास का उपयोग कर पाता है; साथ ही हल्की विविधताएँ बदलते पर्यावास में अनुकूलन का अवसर देती हैं।

उत्तर: इस प्रकार जनन — संतुलित जन्म-दर, लक्षणों की निरंतरता व अनुकूलन-योग्य विविधता द्वारा — किसी प्रजाति की जनसंख्या के स्थायित्व को बनाए रखता है। जनन रुकने पर प्रजाति धीरे-धीरे विलुप्त हो जाएगी।

प्रश्न 11. गर्भनिरोधक विधियाँ अपनाने के क्या कारण हो सकते हैं?

हल:

चरण 1: जनन से जनसंख्या बढ़ती है। अनियंत्रित बढ़ती जनसंख्या चिंता का विषय है, क्योंकि बढ़ती आबादी के साथ हर व्यक्ति का जीवन-स्तर सुधारना कठिन हो जाता है — भोजन, आवास, शिक्षा व स्वास्थ्य सुविधाएँ सीमित संसाधनों में सब तक पहुँचाना चुनौती बन जाता है।

चरण 2: व्यक्तिगत स्तर पर भी दंपति बच्चों की संख्या सीमित रखना व उनमें उचित अंतर रखना चाहते हैं, ताकि बच्चों का पोषण, शिक्षा व स्वास्थ्य ठीक से हो सके और माँ का स्वास्थ्य भी सुरक्षित रहे।

उत्तर: अतः जनसंख्या को संतुलित रखने, संसाधनों पर दबाव घटाने व परिवार के जीवन-स्तर व स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए गर्भनिरोधक विधियाँ अपनाई जाती हैं।

📖 Case Study – रामू किसान के बगीचे की कहानी

रामू किसान के बगीचे में केले के पौधे बहुत अच्छे फल देते हैं। उसके पोते ने पूछा — “बाबा, केले में तो बीज होता ही नहीं, फिर आप नए पौधे कहाँ से लाते हैं?” बाबा हँसकर बोले — “बेटा, केला बीज बनाने की क्षमता खो चुका है। हम इसकी जड़ के पास निकलने वाले नए प्ररोहों को अलग करके लगाते हैं — यही कायिक प्रवर्धन है। इससे बिल्कुल वैसा ही पौधा बनता है जैसा जनक था, मीठे केले ही मिलते हैं।” फिर उन्होंने गुलाब की एक टहनी काटकर मिट्टी में लगाई और कहा — “यह कलम है; कुछ ही सप्ताह में इसमें जड़ें आ जाएँगी और नया गुलाब तैयार हो जाएगा, जिसमें ठीक वैसे ही लाल फूल आएँगे।” पोते ने फिर पूछा — “तो क्या यह तरीका हमेशा अच्छा है?” बाबा बोले — “एक कमी है बेटा — सारे पौधे एक जैसे होते हैं। कोई नया रोग आ जाए तो सब एक साथ बीमार पड़ सकते हैं, क्योंकि उनमें विविधता नहीं होती।” इस गद्यांश के आधार पर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए:

Q1. केले के नए पौधे बीज से क्यों नहीं बनाए जाते? —

(A) केले के बीज बहुत महँगे होते हैं
(B) केला बीज बनाने की क्षमता खो चुका है, इसलिए कायिक प्रवर्धन ही रास्ता है
(C) केले में फूल नहीं आते
(D) केले के बीज ज़हरीले होते हैं

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (B) केला बीज बनाने की क्षमता खो चुका है — ऐसे पौधों का प्रसार केवल कायिक प्रवर्धन (जड़/तने के प्ररोहों) से ही संभव है।

Q2. बाबा ने गुलाब की टहनी काटकर लगाई — यह कृत्रिम कायिक प्रवर्धन की कौन-सी विधि है? —

(A) रोपण (ग्राफ़्टिंग)
(B) दाब कलम (लेयरिंग)
(C) कलम लगाना (कटिंग)
(D) ऊतक संवर्धन

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (C) कलम लगाना (कटिंग) — तने के टुकड़े को काटकर मिट्टी में लगाने से जड़ें व कलिकाएँ निकलकर नया पौधा बनता है। गुलाब, गुड़हल व गन्ना इसी विधि से लगाए जाते हैं।

Q3. कायिक प्रवर्धन से बने पौधों की सबसे बड़ी विशेषता क्या है? —

(A) उनमें जनक के सभी गुण हूबहू आते हैं
(B) वे जनक से बिल्कुल अलग होते हैं
(C) वे कभी फल नहीं देते
(D) उन्हें जल की आवश्यकता नहीं होती

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (A) उनमें जनक के सभी गुण हूबहू आते हैं — क्योंकि संतति को DNA केवल एक ही जनक से मिलता है। साथ ही ऐसे पौधे बीज वाले पौधों से जल्दी फल-फूल भी देते हैं।

Q4. बाबा के अनुसार कायिक प्रवर्धन की कमी क्या है? —

(A) पौधे बहुत धीरे बढ़ते हैं
(B) पौधे बहुत महँगे पड़ते हैं
(C) पौधों को अधिक खाद चाहिए
(D) विविधता न होने से रोग या बदला वातावरण सभी पौधों को एक साथ प्रभावित कर सकता है

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (D) विविधता न होने से रोग या बदला वातावरण सभी पौधों को एक साथ प्रभावित कर सकता है — यही अलैंगिक जनन की मूल सीमा है, जबकि लैंगिक जनन में विविधता इस जोखिम को घटाती है।

⭐ Quick Revision – Important Points

  • ✅ जनन की मूल घटना DNA की प्रतिकृति है; प्रतिकृति की हल्की त्रुटियों से विविधता आती है, जो प्रजाति के अस्तित्व व जैव विकास के लिए आवश्यक है, व्यक्ति के लिए आवश्यक नहीं।
  • ✅ अलैंगिक जनन की 6 विधियाँ — विखंडन (अमीबा, प्लाज़्मोडियम, लीशमैनिया), खंडन (स्पाइरोगायरा), पुनर्जनन (हाइड्रा, प्लेनेरिया), मुकुलन (हाइड्रा, यीस्ट), बीजाणु निर्माण (राइजोपस), कायिक प्रवर्धन (गुलाब, आलू, ब्रायोफिलम)।
  • ✅ द्विखंडन में 2 संततियाँ (अमीबा — किसी भी तल से; लीशमैनिया — निश्चित तल से), बहुखंडन में अनेक संततियाँ (प्लाज़्मोडियम)।
  • ✅ कायिक प्रवर्धन — प्राकृतिक (जड़: शकरकंद; तना: आलू, गन्ना, अदरक; पत्ती: ब्रायोफिलम) व कृत्रिम (कलम, दाब कलम, रोपण); ऊतक संवर्धन में कैलस से रोग-मुक्त पौधे बनते हैं।
  • ✅ लैंगिक जनन में युग्मक अर्धसूत्री विभाजन से बनते हैं (गुणसूत्र आधे), निषेचन से युग्मनज में संख्या पूरी (मानव: 23 + 23 = 46) — इसलिए गुणसूत्र संख्या पीढ़ी-दर-पीढ़ी स्थिर रहती है।
  • ✅ पुष्प के भाग (बाहर से केंद्र की ओर) — बाह्यदल → दल → पुंकेसर (तंतु + परागकोश → परागकण) → स्त्रीकेसर (वर्तिकाग्र + वर्तिका + अंडाशय → बीजांड)। एकलिंगी फूल: तरबूज, पपीता; द्विलिंगी: गुड़हल, सरसों।
  • ✅ परागण = परागकण का वर्तिकाग्र तक पहुँचना (स्व/पर); निषेचन = युग्मकों का संलयन (स्थल: बीजांड; उत्पाद: युग्मनज); पराग नलिका नर युग्मक को बीजांड तक ले जाती है।
  • ✅ निषेचन के बाद — बीजांड → बीज, अंडाशय → फल, युग्मनज → भ्रूण; बीज में बीजपत्र (भोजन), प्रांकुर (भावी प्ररोह) व मूलांकुर (भावी जड़); अंकुरण के लिए नमी, वायु व उचित तापमान चाहिए।
  • ✅ वृषण के कार्य — शुक्राणु बनाना + टेस्टोस्टेरॉन बनाना; वृषण-कोष शरीर से 2–3°C कम तापमान देता है। शुक्राणु का मार्ग: वृषण → शुक्रवाहिनी → मूत्रमार्ग। शुक्राशय व प्रोस्टेट के स्राव शुक्राणुओं को पोषण देते हैं व परिवहन आसान करते हैं।
  • ✅ मादा तंत्र — अंडाशय (अंड बनाना) → अंडवाहिनी (निषेचन का स्थल) → गर्भाशय (आरोपण व विकास का स्थल) → योनि (प्रवेश व जन्म मार्ग)। अपरा (placenta) — प्रवर्ध व रक्त-कोटरों द्वारा पोषण-ऑक्सीजन देना व अपशिष्ट लौटाना। निषेचन न हो तो परत टूटकर ऋतुस्राव होता है।
  • ✅ गर्भनिरोधक की 4 विधियाँ — अवरोधक (कंडोम; STI से भी बचाव), रासायनिक गोलियाँ (हॉर्मोन), IUCD/Copper-T (गर्भाशय में; STI से बचाव नहीं), शल्यक्रिया (शुक्रवाहिनी/अंडवाहिनी अवरोध — स्थायी)। STI — जीवाणु-जनित: गोनोरिया, सिफ़लिस; विषाणु-जनित: मस्से, HIV-AIDS।

⚠️ Aam Galtiyan (Common Mistakes)

  • विधि–उदाहरण की जोड़ी उलटना: अमीबा में मुकुलन या यीस्ट में विखंडन लिखना सबसे आम गलती है — सही जोड़ियाँ: अमीबा–द्विखंडन, प्लाज़्मोडियम–बहुखंडन, यीस्ट/हाइड्रा–मुकुलन, स्पाइरोगायरा–खंडन, राइजोपस–बीजाणु, प्लेनेरिया–पुनर्जनन।
  • बीजांड व अंडाशय का रूपांतरण बदलना: निषेचन के बाद बीजांड से बीज और अंडाशय से फल बनता है — “अंडाशय से बीज” लिखना गलत है।
  • परागण व निषेचन को एक समझना: परागण केवल परागकण का वर्तिकाग्र तक पहुँचना है; निषेचन युग्मकों का संलयन है, जो बीजांड में होता है और जिसका उत्पाद युग्मनज है — दोनों अलग घटनाएँ हैं।
  • निषेचन का स्थल गलत लिखना (मानव): मानव में निषेचन अंडवाहिनी में होता है, गर्भाशय में नहीं — गर्भाशय आरोपण व विकास का स्थल है। यह उलझन MCQ में सबसे अधिक फँसाती है।
  • Copper-T से रोग-बचाव समझना: Copper-T केवल गर्भ रोकता है; यौन संचारित रोगों से बचाव केवल कंडोम (अवरोधक विधि) से होता है — InText प्रश्न का यही पक्का उत्तर है।
  • वृषण को शरीर के अंदर लिखना व तापमान भूलना: वृषण वृषण-कोष में शरीर से बाहर होते हैं, क्योंकि शुक्राणु-निर्माण को शरीर से 2–3°C कम तापमान चाहिए — कारण सहित लिखें, तभी पूरे अंक मिलते हैं।
  • पुनर्जनन को जटिल जीवों में संभव मानना: पुनर्जनन केवल सरल जीवों (हाइड्रा, प्लेनेरिया) में संभव है; जटिल जीवों में विशिष्ट कोशिकाएँ व श्रम-विभाजन के कारण कोई टुकड़ा पूरा जीव नहीं बना सकता।

🎯 Bihar Board Exam Tips

  • पुष्प की अनुदैर्ध्य काट का चित्र रोज़ अभ्यास करें: प्रश्नावली का प्रश्न 7 लगभग निश्चित आता है — बाह्यदल, दल, पुंकेसर (तंतु, परागकोश) व स्त्रीकेसर (वर्तिकाग्र, वर्तिका, अंडाशय, बीजांड) साफ़ बनाकर सीधी रेखाओं से नामांकित करें। चित्र के अंक, नामांकन की शुद्धता पर मिलते हैं।
  • विधि–उदाहरण table रट लें: अलैंगिक जनन की 6 विधियों व उनके उदाहरणों पर हर साल 2–3 वस्तुनिष्ठ प्रश्न आते हैं — यह अध्याय के सबसे आसान अंक हैं।
  • अपरा के उत्तर में क्रियाविधि लिखें: केवल “पोषण मिलता है” न लिखें — प्रवर्ध (villi) व रक्त-कोटर (blood spaces) से सतह-क्षेत्र बढ़ना, ग्लूकोज़-ऑक्सीजन आना व अपशिष्ट लौटना — यह पूरा लिखने पर दीर्घ उत्तर में पूरे अंक मिलते हैं।
  • गर्भनिरोधक की चारों विधियाँ उदाहरण सहित तैयार रखें: अवरोधक, रासायनिक, Copper-T व शल्यक्रिया — प्रत्येक की क्रियाविधि एक लाइन में; साथ में “कौन-सी विधि रोगों से बचाती है/नहीं बचाती” अवश्य जोड़ें।
  • कारण वाले प्रश्नों को प्राथमिकता दें: वृषण बाहर क्यों? ऋतुस्राव क्यों? विविधता प्रजाति के लिए क्यों? परागण के बिना निषेचन क्यों नहीं? — BSEB ऐसे “क्यों” वाले प्रश्न बहुत पूछता है; उत्तर में कारण-शृंखला चरणों में लिखें।
  • पिछले वर्षों के BSEB प्रश्न-पत्रों से इस अध्याय के प्रश्न हल करके जाएँ — InText व प्रश्नावली के प्रश्न अक्सर दोहराए जाते हैं।

📝 MCQ Quiz – 15 वस्तुनिष्ठ प्रश्न (स्वयं को जाँचें)

पहले बिना देखे हल करें, फिर “✅ उत्तर देखें” खोलकर मिलाएँ। अंत में Answer Key table दी गई है।

Q1. जनन में DNA प्रतिकृति का मुख्य महत्व है —

(A) कोशिका को ऊर्जा देना
(B) शरीर-रूपरेखा (लक्षणों) की जानकारी संतति तक पहुँचाना
(C) भोजन का पाचन करना
(D) अपशिष्ट पदार्थ बाहर निकालना

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (B) शरीर-रूपरेखा (लक्षणों) की जानकारी संतति तक पहुँचाना — DNA ही आनुवंशिक जानकारी का वाहक है, इसलिए उसकी प्रतिकृति जनन की मूल घटना है।

Q2. अमीबा में अलैंगिक जनन होता है —

(A) द्विखंडन द्वारा
(B) बहुखंडन द्वारा
(C) मुकुलन द्वारा
(D) बीजाणु निर्माण द्वारा

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (A) द्विखंडन द्वारा — अमीबा की कोशिका किसी भी तल से बँटकर दो संतति कोशिकाएँ बनाती है।

Q3. मलेरिया परजीवी प्लाज़्मोडियम में जनन की विधि है —

(A) खंडन
(B) द्विखंडन
(C) बहुखंडन
(D) पुनर्जनन

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (C) बहुखंडन — एक ही जीव एक साथ अनेक संतति कोशिकाओं में विभाजित हो जाता है।

Q4. लीशमैनिया (काला-अज़ार का परजीवी) में जनन होता है —

(A) मुकुलन द्वारा
(B) द्विखंडन द्वारा (निश्चित तल में)
(C) खंडन द्वारा
(D) बीजाणु निर्माण द्वारा

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (B) द्विखंडन द्वारा (निश्चित तल में) — चाबुक-जैसी संरचना के कारण लीशमैनिया का विभाजन एक निश्चित तल में ही होता है।

Q5. स्पाइरोगायरा में जनन की विधि है —

(A) मुकुलन
(B) बीजाणु निर्माण
(C) खंडन
(D) रोपण

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (C) खंडन — स्पाइरोगायरा का तंतु टुकड़ों में टूटता है और प्रत्येक टुकड़ा नया जीव बन जाता है।

Q6. हाइड्रा में पाई जाने वाली अलैंगिक जनन की विधियाँ हैं —

(A) केवल विखंडन
(B) मुकुलन व पुनर्जनन
(C) केवल बीजाणु निर्माण
(D) परागण व निषेचन

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (B) मुकुलन व पुनर्जनन — हाइड्रा के शरीर पर मुकुल बनकर नया जीव बनता है और कटे भाग से भी पूरा जीव पुनः बन सकता है।

Q7. राइजोपस में बीजाणु बनते हैं —

(A) परागकोश में
(B) बीजांड में
(C) कैलस में
(D) बीजाणुधानी में

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (D) बीजाणुधानी में — तंतुओं के सिरों पर बनी गोल बीजाणुधानियों में असंख्य मोटी भित्ति वाले बीजाणु बनते हैं।

Q8. ब्रायोफिलम में कायिक प्रवर्धन होता है —

(A) जड़ द्वारा
(B) पत्ती के किनारों पर बनी कलिकाओं द्वारा
(C) फूल द्वारा
(D) बीज द्वारा

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (B) पत्ती के किनारों पर बनी कलिकाओं द्वारा — पत्ती के खाँचों की कलिकाओं से छोटे पौधे निकल आते हैं।

Q9. परागकण पाए जाते हैं —

(A) वर्तिकाग्र में
(B) अंडाशय में
(C) परागकोश में
(D) बाह्यदल में

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (C) परागकोश में — पुंकेसर के परागकोश के अंदर ही परागकण बनते हैं।

Q10. निषेचन के पश्चात बीजांड परिवर्तित हो जाता है —

(A) फल में
(B) बीज में
(C) पराग नलिका में
(D) बाह्यदल में

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (B) बीज में — बीजांड बीज बनता है और अंडाशय फल बनता है; यह जोड़ी उलटकर न लिखें।

Q11. शुक्राणुओं के निर्माण के लिए आवश्यक तापमान होता है —

(A) शरीर के तापमान के बराबर
(B) शरीर के तापमान से अधिक
(C) शरीर के तापमान से लगभग 2–3°C कम
(D) 0°C

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (C) शरीर के तापमान से लगभग 2–3°C कम — इसीलिए वृषण वृषण-कोष में शरीर से बाहर स्थित होते हैं।

Q12. मानव में निषेचन का स्थल है —

(A) गर्भाशय
(B) अंडाशय
(C) योनि
(D) अंडवाहिनी

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (D) अंडवाहिनी — शुक्राणु व अंड का संलयन अंडवाहिनी में होता है; गर्भाशय आरोपण व विकास का स्थल है।

Q13. निम्न में से कौन-सा अपरा (placenta) का कार्य नहीं है? —

(A) भ्रूण को पोषण पहुँचाना
(B) भ्रूण को ऑक्सीजन देना
(C) भ्रूण के अपशिष्ट माँ के रक्त में लौटाना
(D) शुक्राणुओं का निर्माण करना

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (D) शुक्राणुओं का निर्माण करना — यह वृषण का कार्य है। अपरा पोषण, ऑक्सीजन व अपशिष्ट-विनिमय का कार्य करती है।

Q14. कॉपर-T (Copper-T) स्थापित की जाती है —

(A) अंडाशय में
(B) गर्भाशय में
(C) अंडवाहिनी में
(D) योनि में

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (B) गर्भाशय में — यह अंतःगर्भाशयी युक्ति (IUCD) चिकित्सक द्वारा गर्भाशय में लगाई जाती है और आरोपण को रोकती है।

Q15. मानव के युग्मनज में गुणसूत्रों की संख्या होती है —

(A) 23
(B) 46
(C) 92
(D) 12

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (B) 46 — युग्मकों में 23–23 गुणसूत्र होते हैं; निषेचन से युग्मनज में पूरी संख्या 46 पुनः स्थापित हो जाती है।

Answer Key – उत्तरमाला

प्रश्न 1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12 13 14 15
उत्तर B A C B C B D B C B C D D B B

❓ FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1. जनन जीव के जीवित रहने के लिए आवश्यक क्यों नहीं माना जाता, फिर भी यह इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
उत्तर: जीव को ज़िंदा रखने का काम पोषण, श्वसन व उत्सर्जन जैसी प्रक्रियाएँ करती हैं — जनन के बिना भी कोई जीव अपना जीवन जी सकता है। परंतु जनन के बिना कोई प्रजाति आगे नहीं बढ़ सकती; जन्म व मृत्यु का संतुलन बिगड़ते ही वह धीरे-धीरे विलुप्त हो जाएगी। इसलिए NCERT कहता है — जनन मूलतः व्यक्ति के अस्तित्व के लिए नहीं, प्रजाति की स्थिरता व निरंतरता के लिए आवश्यक है।

प्रश्न 2. फूल के नर व मादा भाग कौन-से हैं और युग्मक कहाँ बनते हैं?
उत्तर: फूल का नर भाग पुंकेसर है — इसके परागकोश में परागकण बनते हैं, जिनसे नर युग्मक बनता है। मादा भाग स्त्रीकेसर है — इसके अंडाशय के अंदर बीजांड होते हैं और बीजांड में मादा युग्मक (अंड कोशिका) होती है। जिन फूलों में दोनों भाग हों वे द्विलिंगी (गुड़हल, सरसों) और जिनमें केवल एक हो वे एकलिंगी (तरबूज, पपीता) कहलाते हैं।

प्रश्न 3. परागण और निषेचन में क्या अंतर है?
उत्तर: परागण परागकणों का परागकोश से वर्तिकाग्र तक पहुँचना है — यह एक स्थानांतरण है, जो उसी फूल में (स्व-परागण) या दूसरे पौधे के फूल तक (पर-परागण, कीट/वायु द्वारा) हो सकता है। निषेचन नर व मादा युग्मकों का संलयन है, जो पराग नलिका द्वारा नर युग्मक के बीजांड तक पहुँचने पर होता है और जिसका उत्पाद युग्मनज है। परागण के बिना निषेचन संभव नहीं, क्योंकि नर युग्मक मादा युग्मक तक पहुँचेगा ही नहीं।

प्रश्न 4. अपरा (placenta) भ्रूण के लिए इतनी महत्वपूर्ण क्यों है?
उत्तर: भ्रूण स्वयं न खा सकता है, न साँस ले सकता है, न अपशिष्ट निकाल सकता है। अपरा गर्भाशय-भित्ति में धँसी वह चक्रिका है, जिसमें भ्रूण की ओर प्रवर्ध व माँ की ओर रक्त-कोटर होते हैं — इससे विशाल सतह-क्षेत्र पर माँ के रक्त से ग्लूकोज़ व ऑक्सीजन भ्रूण तक जाते हैं और भ्रूण के अपशिष्ट माँ के रक्त में लौट आते हैं। अर्थात गर्भकाल में भ्रूण का पोषण, श्वसन व उत्सर्जन — तीनों का सेतु अपरा ही है।

प्रश्न 5. क्या केवल InText और प्रश्नावली के प्रश्न तैयार करना काफी है?
उत्तर: इस अध्याय के लिए लगभग हाँ — Board के अधिकांश प्रश्न इन्हीं 22 प्रश्नों (InText 11 + प्रश्नावली 11) से सीधे या हल्के बदलाव के साथ आते हैं। साथ में अलैंगिक जनन की विधि–उदाहरण table, पुष्प का नामांकित चित्र, अपरा के कार्य और गर्भनिरोधक की चार विधियाँ तैयार कर लें, तो वस्तुनिष्ठ व दीर्घ उत्तरीय — दोनों खंडों की तैयारी पूरी हो जाएगी।

⬅️ पिछला अध्याय: अध्याय 7 — नियंत्रण एवं समन्वय (Control and Coordination): Class 10 Science Chapter 7

➡️ अगला अध्याय: अध्याय 9 — आनुवंशिकता एवं जैव विकास (Heredity and Evolution): Class 10 Science Chapter 9

📚 सभी अध्यायों की सूची यहाँ देखें: NCERT Class 10 Bihar Board Science Book

🔚 Conclusion – निष्कर्ष

बधाई हो! आपने विज्ञान का आठवाँ अध्याय पूरा कर लिया। अब आप जानते हैं कि जनन की नींव DNA प्रतिकृति है, विविधता प्रजाति को कैसे बचाती है, अलैंगिक जनन की छह विधियाँ कौन-सी हैं, फूल में परागण से बीज-फल तक क्या होता है, मानव जनन तंत्र कैसे काम करता है, अपरा भ्रूण को पोषण कैसे देती है और जनन स्वास्थ्य के लिए गर्भनिरोधक की चार विधियाँ कौन-सी हैं।

ऊपर दिए गए सभी 22 हल किए गए प्रश्नों (InText 11 + प्रश्नावली 11), क्रियाकलाप-आधारित उदाहरणों और 15 MCQ का अभ्यास कीजिए। किताब का मूल पाठ पढ़ने के लिए NCERT की आधिकारिक वेबसाइट ncert.nic.in से PDF ले सकते हैं। अब अगले अध्याय — आनुवंशिकता एवं जैव विकास — की तैयारी शुरू कीजिए; वहाँ यही DNA, विविधता व गुणसूत्रों की कहानी और गहरी होगी। शुभकामनाएँ, मेहनत जारी रखिए!