NCERT Class 10 Science Chapter 6 Life Processes in Hindi | जैव प्रक्रम Notes, MCQ व प्रश्न-उत्तर

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परिचय – यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है?

Class 10 Science Chapter 6 Life Processes के NCERT Solutions आपको इस पेज पर सरल हिंदी में, किताब के क्रम से मिलेंगे। Class 10 Science Chapter 6 Life Processes यानी जैव प्रक्रम — यह जीव विज्ञान का सबसे बुनियादी और सबसे बड़ा अध्याय है, क्योंकि हम ज़िंदा कैसे रहते हैं, इसकी पूरी कहानी इसी में छिपी है।

ज़रा सोचिए — आप सुबह उठते हैं, साँस लेते हैं, नाश्ता करते हैं, दौड़ते हैं, पढ़ते हैं और रात को सो जाते हैं। इन सब कामों के पीछे शरीर के अंदर एक चुपचाप चलने वाली विशाल व्यवस्था काम कर रही है — भोजन से ऊर्जा बन रही है, ऑक्सीजन हर कोशिका तक पहुँच रही है, रक्त पूरे शरीर में घूम रहा है और बेकार पदार्थ बाहर निकल रहे हैं। इन्हीं सब प्रक्रियाओं को मिलाकर जैव प्रक्रम (Life Processes) कहते हैं।

इस अध्याय में हम चार बड़े प्रक्रमों को एक-एक करके समझेंगे — पोषण (Nutrition), श्वसन (Respiration), परिवहन (Transportation) और उत्सर्जन (Excretion)। पौधों में ये काम कैसे होते हैं और मनुष्य में कैसे होते हैं — दोनों की तुलना साथ-साथ चलेगी, इसलिए अध्याय लंबा होते हुए भी कठिन नहीं लगेगा।

Bihar Board (BSEB) Class 10 की परीक्षा में इस अध्याय से हर साल बहुत प्रश्न आते हैं — हृदय व नेफ्रॉन के नामांकित चित्र पर दीर्घ उत्तरीय प्रश्न, प्रकाश संश्लेषण व पाचन पर लघु उत्तरीय प्रश्न और एंजाइम, विलाई, वायुकोष्ठिका जैसे पदों पर वस्तुनिष्ठ (MCQ) प्रश्न। एक अच्छी बात यह है कि इस अध्याय का अधिकांश भाग आप अपने ही शरीर से जोड़कर समझ सकते हैं — जो चीज़ रोज़ अपने अंदर घटती हो, उसे रटना नहीं पड़ता!

📌 खास बात: इस अध्याय में दो चित्र Board के सबसे चहेते हैं — मानव हृदय और नेफ्रॉन (वृक्काणु)। दोनों चित्र बनाना शब्दों में चरण-दर-चरण इस पेज पर समझाया गया है। चित्र के साथ सही नामांकन (labelling) लिखने का अभ्यास ज़रूर कीजिए — नामांकन पर अलग से अंक मिलते हैं।

📋 अध्याय की जानकारी (Chapter Information)

Board Bihar Board (BSEB)
Textbook NCERT
Class 10
Subject Science (विज्ञान)
Chapter 6
Chapter Name Life Processes (जैव प्रक्रम)
कुल हल किए गए प्रश्न 34 (InText 21 + प्रश्नावली 13)

📚 इस Chapter में क्या-क्या है? (Topics)

  1. 6.1 जैव प्रक्रम क्या हैं? – सजीव की पहचान, आणविक गति और रख-रखाव वाले प्रक्रम क्यों ज़रूरी हैं
  2. 6.2 पोषण (Nutrition)
    • स्वपोषी पोषण व प्रकाश संश्लेषण — समीकरण, घटनाएँ, क्लोरोप्लास्ट व रंध्र
    • परपोषी पोषण — कवक, अमीबा व अन्य जीवों में भोजन ग्रहण
    • मानव पाचन तंत्र — मुँह से गुदा तक, ग्रंथियाँ, एंजाइम, वसा का पाचन व विलाई द्वारा अवशोषण
  3. 6.3 श्वसन (Respiration) – ग्लूकोज़ का विघटन, वायवीय व अवायवीय श्वसन, मानव श्वसन तंत्र व वायुकोष्ठिका
  4. 6.4 परिवहन (Transportation)
    • मानव में — हृदय, रक्त, रक्त वाहिकाएँ, लसीका व दोहरा परिसंचरण
    • पौधों में — जाइलम द्वारा जल-खनिज (वाष्पोत्सर्जन खिंचाव) व फ्लोएम द्वारा भोजन का स्थानांतरण
  5. 6.5 उत्सर्जन (Excretion) – मानव उत्सर्जन तंत्र, नेफ्रॉन व मूत्र निर्माण, हीमोडायलिसिस और पौधों में उत्सर्जन
  6. पाठ्य-पुस्तक के प्रश्न (InText) – 21 प्रश्न, NCERT क्रियाकलाप-आधारित उदाहरण, प्रश्नावली के 13 प्रश्न
  7. Case Study, Quick Revision, Bihar Board Exam Tips, MCQ Quiz व FAQ

📊 Key Concepts – मुख्य परिभाषाएँ व नियम

पद / नियम अर्थ (एक लाइन में)
जैव प्रक्रम (Life Processes) वे सभी प्रक्रम जो मिलकर जीव के रख-रखाव (maintenance) का कार्य करते हैं — जैसे पोषण, श्वसन, परिवहन व उत्सर्जन।
पोषण (Nutrition) बाहर से भोजन ग्रहण करके उससे ऊर्जा व शरीर-निर्माण की सामग्री प्राप्त करने की प्रक्रिया।
स्वपोषी पोषण (Autotrophic) जिसमें जीव CO2 व जल जैसे सरल अकार्बनिक पदार्थों से स्वयं भोजन बनाता है — जैसे हरे पौधे।
परपोषी पोषण (Heterotrophic) जिसमें जीव भोजन के लिए दूसरे जीवों (स्वपोषियों द्वारा बनाए जटिल पदार्थों) पर निर्भर रहता है — जैसे मनुष्य, कवक।
प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) सूर्य के प्रकाश व क्लोरोफिल की उपस्थिति में CO2 व जल से कार्बोहाइड्रेट बनने की प्रक्रिया; ऑक्सीजन उपोत्पाद के रूप में निकलती है।
रंध्र (Stomata) पत्ती की सतह पर स्थित छोटे छिद्र, जिनसे गैसों का आदान-प्रदान होता है; दो रक्षक कोशिकाएँ इन्हें खोलती-बंद करती हैं।
एंजाइम (Enzyme) जैव-उत्प्रेरक प्रोटीन जो जटिल भोजन को सरल, अवशोषण-योग्य पदार्थों में तोड़ते हैं — जैसे एमाइलेज, पेप्सिन, लाइपेज।
विलाई (Villi) छोटी आंत की भीतरी सतह पर उँगली-जैसे उभार, जो पचे भोजन के अवशोषण के लिए सतह-क्षेत्र कई गुना बढ़ा देते हैं।
श्वसन (Respiration) कोशिकाओं में भोजन (ग्लूकोज़) के विघटन से ऊर्जा मुक्त होने की प्रक्रिया — वायवीय व अवायवीय दो प्रकार की होती है।
वायुकोष्ठिका (Alveoli) फेफड़ों में स्थित गुब्बारे-जैसी छोटी संरचनाएँ, जिनकी पतली भित्ति से रक्त व वायु के बीच गैसों का विनिमय होता है।
दोहरा परिसंचरण (Double Circulation) एक पूरे चक्र में रक्त का हृदय से दो बार गुज़रना — एक बार फेफड़ों की ओर (फुफ्फुसीय) व एक बार शरीर की ओर (दैहिक)।
लसीका (Lymph) प्लाज्मा जैसा हल्का द्रव जो कोशिकाओं के बीच से पचा वसा आदि लेकर अंत में रक्त में मिल जाता है।
वाष्पोत्सर्जन (Transpiration) पत्तियों के रंध्रों से जल के वाष्प के रूप में निकलने की प्रक्रिया; यही पौधे में जल ऊपर खींचने का खिंचाव पैदा करती है।
स्थानांतरण (Translocation) फ्लोएम द्वारा बने हुए भोजन का पत्तियों से पौधे के अन्य भागों (जड़, फल, बीज, वृद्धि-भाग) तक पहुँचना।
उत्सर्जन (Excretion) शरीर में बनी हानिकारक नाइट्रोजनी अपशिष्ट (जैसे यूरिया) को बाहर निकालने की प्रक्रिया।
नेफ्रॉन (Nephron / वृक्काणु) वृक्क की संरचनात्मक व कार्यात्मक छनन-इकाई — बोमन संपुट, ग्लोमेरुलस व लंबी नलिका से बनी होती है।

सबसे काम की बात: चारों प्रक्रम एक-दूसरे से जुड़ी एक ही कड़ी हैं — पोषण से भोजन मिलता है, श्वसन से उससे ऊर्जा बनती है, परिवहन भोजन-ऑक्सीजन को हर कोशिका तक पहुँचाता और अपशिष्ट लौटाता है, और उत्सर्जन उस अपशिष्ट को बाहर निकालता है। यह कड़ी समझ गई तो पूरा अध्याय समझ गया!

जैव प्रक्रम क्या हैं? – ज़िंदा होने का मतलब

सबसे पहला सवाल किताब यही पूछती है — कोई चीज़ सजीव है, यह हम कैसे पहचानें? चलना, साँस लेना, बढ़ना — ये दिखने वाली गतियाँ तो संकेत हैं, पर पौधा बैठा-बैठा भी ज़िंदा होता है और सोया हुआ कुत्ता भी। असली पहचान है आणविक गति (molecular movement) — सजीव के शरीर में अणु लगातार इधर-उधर गति करते रहते हैं, कोशिकाएँ लगातार टूटती-मरती संरचनाओं की मरम्मत करती रहती हैं। जिस दिन यह रख-रखाव रुक गया, उसी दिन जीव निर्जीव हो जाता है।

यही मरम्मत व रख-रखाव ऊर्जा माँगता है, और ऊर्जा के लिए बाहर से सामग्री चाहिए — भोजन, जल और ऑक्सीजन। एककोशिकीय जीव (जैसे अमीबा) में पूरी कोशिका ही वातावरण के सीधे संपर्क में होती है, इसलिए साधारण विसरण (diffusion) से उसका काम चल जाता है। परंतु मनुष्य जैसे बहुकोशिकीय जीव में हर कोशिका वातावरण के संपर्क में नहीं होती — अंदर की कोशिकाओं तक भोजन व ऑक्सीजन पहुँचाने के लिए विशेष तंत्र चाहिए। इसीलिए बहुकोशिकीय जीवों में अलग-अलग अंग व तंत्र बने हैं और इसीलिए विसरण अकेले पर्याप्त नहीं होता।

📌 याद रखें: रख-रखाव वाले प्रक्रम जीव को तब भी चलते रहते हैं जब वह कुछ न कर रहा हो — आप सो रहे हों तो भी श्वसन, परिसंचरण व उत्सर्जन चलता रहता है। यही इस अध्याय की पहली और सबसे बुनियादी बात है।

एक साँस में समझें — ज़िंदा रहने का अर्थ है लगातार मरम्मत; मरम्मत के लिए ऊर्जा चाहिए, और ऊर्जा-प्रबंधन के चार प्रक्रम ही जैव प्रक्रम हैं।

पोषण (Nutrition) – भोजन बनाना और भोजन पचाना

हर जीव को दो कामों के लिए भोजन चाहिए — ऊर्जा के लिए और शरीर की वृद्धि व मरम्मत की सामग्री के लिए। भोजन प्राप्त करने के ढंग के आधार पर जीव दो बड़े वर्गों में बँटते हैं — जो स्वयं भोजन बनाएँ वे स्वपोषी, और जो दूसरों के बनाए भोजन पर निर्भर रहें वे परपोषी। आइए दोनों को अच्छी तरह समझें।

स्वपोषी व परपोषी पोषण में अंतर

बात स्वपोषी पोषण परपोषी पोषण
भोजन कौन बनाता है? जीव स्वयं अपना भोजन बनाता है जीव भोजन नहीं बनाता, दूसरों पर निर्भर रहता है
कच्चा माल सरल अकार्बनिक पदार्थ — CO2, जल, खनिज स्वपोषियों द्वारा बनाए जटिल कार्बनिक पदार्थ
क्लोरोफिल व सूर्य-प्रकाश आवश्यक होते हैं (प्रकाश संश्लेषण में) आवश्यक नहीं होते
उदाहरण सभी हरे पौधे, कुछ जीवाणु व शैवाल मनुष्य व सभी जंतु, कवक (फफूंद), अधिकांश जीवाणु

परपोषी पोषण के भी अपने ढंग हैं — कवक मृत व सड़े-गले पदार्थों पर पाचक रस डालकर घुला भोजन सोख लेते हैं (मृतजीवी), जूँ व फीता-कृमि जैसे जीव दूसरे के शरीर से भोजन चूसते हैं (परजीवी), और जंतु भोजन को शरीर के अंदर लेकर पचाते हैं। इन सब की जड़ एक ही है — भोजन किसी और ने बनाया है।

प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) – पौधे की रसोई

हरे पौधे सूर्य की ऊर्जा को पकड़कर भोजन में बदल देते हैं — यही प्रकाश संश्लेषण है। इस प्रक्रिया में पौधा वायु से कार्बन डाइऑक्साइड और मिट्टी से जल लेकर, क्लोरोफिल की उपस्थिति में सूर्य के प्रकाश की ऊर्जा से कार्बोहाइड्रेट (ग्लूकोज़) बनाता है और ऑक्सीजन बाहर छोड़ता है।

6CO2 + 12H2O →(सूर्य का प्रकाश / क्लोरोफिल) C6H12O6 + 6O2 + 6H2O
(कार्बन डाइऑक्साइड + जल → ग्लूकोज़ + ऑक्सीजन + जल)

प्रकाश संश्लेषण में होने वाली मुख्य घटनाएँ (NCERT के अनुसार तीन चरणों में समझें):

चरण 1: क्लोरोफिल द्वारा प्रकाश ऊर्जा का अवशोषण होता है — पत्ती का हरा रंगद्रव्य (pigment) सूर्य की किरणों को पकड़ता है।

चरण 2: प्रकाश ऊर्जा रासायनिक ऊर्जा में बदलती है और जल के अणु हाइड्रोजन व ऑक्सीजन में विघटित होते हैं। निकलने वाली ऑक्सीजन ही वायु में उपोत्पाद के रूप में जाती है।

चरण 3: अंत में कार्बन डाइऑक्साइड का अपचयन (reduction) होकर कार्बोहाइड्रेट बनता है। बना ग्लूकोज़ पौधा तुरंत उपयोग करता है और बचा हुआ भाग स्टार्च के रूप में संचित हो जाता है — फल, बीज, जड़ व कंद में यही संचित भोजन हमें मिलता है।

कच्चा माल कहाँ से आता है? CO2 वायु से रंध्रों द्वारा, जल जड़ों द्वारा मिट्टी से सोखकर जाइलम से पत्तियों तक, और सूर्य का प्रकाश सीधे वातावरण से। क्लोरोफिल पत्तियों की कोशिकाओं में स्थित हरे अंगक क्लोरोप्लास्ट (हरितलवक) में पाया जाता है — क्लोरोप्लास्ट ही प्रकाश संश्लेषण का वास्तविक स्थल है।

रंध्र (Stomata) – पत्ती के छोटे दरवाज़े

पत्ती की सतह पर अनगिनत सूक्ष्म छिद्र होते हैं — इन्हें रंध्र कहते हैं। प्रत्येक रंध्र दो रक्षक कोशिकाओं (guard cells) से घिरा होता है। रक्षक कोशिकाओं के फूलने से रंध्र खुलता है और सिकुड़ने से बंद हो जाता है।

रंध्रों के दो मुख्य काम हैं — (1) प्रकाश संश्लेषण व श्वसन के लिए गैसों का आदान-प्रदान (CO2 अंदर, O2 बाहर), और (2) वाष्पोत्सर्जन द्वारा अतिरिक्त जल को वाष्प रूप में बाहर निकालना। जब पौधे को जल बचाना हो, तो रंध्र बंद हो जाते हैं — इसीलिए मरुस्थलीय पौधे (जैसे नागफनी) दिन में CO2 लेने के बजाय रात में रंध्र खोलकर CO2 लेते हैं और उसे एक अम्ल के रूप में संचित कर लेते हैं; दिन में उसी से CO2 निकालकर प्रकाश संश्लेषण करते हैं। यह सुंदर अनुकूलन Board में पूछा जाता है।

📌 याद रखें: प्रकाश संश्लेषण में निकलने वाली ऑक्सीजन जल से आती है, CO2 से नहीं — यह MCQ का सबसे बड़ा जाल है। और कार्बोहाइड्रेट बनने के लिए CO2 का अपचयन होता है, उपचयन नहीं।

अमीबा में पोषण – एक कोशिका, पूरा काम

अमीबा एककोशिकीय जीव है, इसलिए उसका पूरा पाचन एक ही कोशिका के अंदर होता है। चरण इस प्रकार हैं:

चरण 1 – अंतर्ग्रहण (Ingestion): भोजन-कण के संपर्क में आते ही अमीबा अपनी कोशिका-झिल्ली से अस्थायी उँगली-जैसे प्रवर्ध निकालता है जिन्हें कूटपाद (pseudopodia) कहते हैं। कूटपाद भोजन को चारों ओर से घेरकर अपने अंदर ले लेते हैं और एक खाद्य रिक्तिका (food vacuole) बन जाती है।

चरण 2 – पाचन (Digestion): खाद्य रिक्तिका के अंदर पाचक रस (एंजाइम) भोजन के जटिल पदार्थों को सरल पदार्थों में तोड़ देते हैं।

चरण 3 – अवशोषण व स्वांगीकरण: पचा हुआ सरल भोजन रिक्तिका से कोशिकाद्रव्य में विसरित हो जाता है और शरीर का भाग बनता है।

चरण 4 – बहिःक्षेपण (Egestion): जो अपचित सामग्री बचती है, वह कोशिका-झिल्ली के पास आकर शरीर से बाहर निकाल दी जाती है।

पैरामीशियम में भी भोजन एक निश्चित स्थान से अंदर जाता है — उसकी सतह पर उपस्थित पक्ष्माभ (cilia) भोजन को अंदर की ओर धकेलते हैं। दोनों उदाहरणों से एक बात साफ है — पाचन की मूल योजना (लेना → तोड़ना → सोखना → निकालना) हर जीव में एक जैसी है; मनुष्य में बस यही काम अलग-अलग अंगों में बँट गया है।

एक साँस में समझें — स्वपोषी भोजन बनाते हैं, परपोषी भोजन लेते हैं; पौधे की रसोई क्लोरोप्लास्ट है, रंध्र उसके दरवाज़े हैं और अमीबा में एक ही कोशिका पूरा पाचन कर लेती है।

मानव पाचन तंत्र – मुँह से गुदा तक का सफ़र

मनुष्य का पाचन एक लंबी नली — आहार नाल (alimentary canal) — में होता है, जो मुँह से शुरू होकर गुदा (anus) तक जाती है। रास्ते में अलग-अलग ग्रंथियाँ अपने-अपने रस डालती हैं। खाना जहाँ-जहाँ रुकता है, वहाँ एक नया काम होता है। आइए खाने के एक कौर के साथ यात्रा करते हैं:

1. मुँह (मुख गुहा): दाँत भोजन को चबाकर छोटे टुकड़ों में तोड़ते हैं — यह यांत्रिक पाचन है। जीभ भोजन को लार के साथ मिलाती है। लार ग्रंथियों से निकलने वाली लार भोजन को नरम व चिकना बनाती है और उसमें उपस्थित लार एमाइलेज (salivary amylase) एंजाइम स्टार्च को शर्करा (माल्टोज़) में तोड़ना शुरू कर देता है। मुँह में केवल स्टार्च का पाचन शुरू होता है, बाकी सब आगे होता है। निगलने के बाद भोजन ग्रासनली (oesophagus) से होकर नीचे उतरता है — ग्रासनली की भित्ति के लयबद्ध संकुचन (क्रमाकुंचन) भोजन को आगे धकेलते हैं।

2. आमाशय (Stomach): यह J-आकार की मांसल थैली है जो भोजन को 2–4 घंटे मथकर पतली लुगदी बना देती है। इसकी भित्ति की जठर ग्रंथियाँ जठर रस निकालती हैं, जिसमें तीन चीज़ें होती हैं — हाइड्रोक्लोरिक अम्ल (HCl), पेप्सिन एंजाइम और श्लेष्म (mucus)। HCl अम्लीय माध्यम बनाकर पेप्सिन को सक्रिय करता है और भोजन के साथ आए जीवाणुओं को मारता है। पेप्सिन प्रोटीन का पाचन शुरू करता है। श्लेष्म आमाशय की भीतरी परत को उसी अम्ल व पेप्सिन से बचाता है — वरना आमाशय स्वयं को ही पचाने लगता!

3. छोटी आंत (Small Intestine): यही पाचन की असली कार्यशाला है — यहीं भोजन का पूर्ण पाचन और अवशोषण दोनों होता है। छोटी आंत के पहले भाग (ग्रहणी) में दो नलिकाओं से दो महत्वपूर्ण रस आते हैं — यकृत से पित्त रस और अग्न्याशय से अग्न्याशयी रस। छोटी आंत की भित्ति की ग्रंथियों से आंत्र रस भी मिलता है। तीनों मिलकर कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन व वसा — तीनों का पाचन पूरा कर देते हैं।

4. बड़ी आंत: पचा हुआ भोजन सोखने के बाद बची सामग्री यहाँ आती है। बड़ी आंत मुख्यतः अतिरिक्त जल व कुछ लवणों का अवशोषण करती है। शेष अपचित सामग्री मल बनकर मलाशय में जमा होती है और समय-समय पर गुदा द्वारा बाहर निकल जाती है।

ग्रंथि / अंग रस व एंजाइम किस पर कार्य करता है? क्या बनता है?
लार ग्रंथि (मुँह) लार — लार एमाइलेज स्टार्च (मंड) शर्करा (माल्टोज़)
जठर ग्रंथि (आमाशय) जठर रस — HCl + पेप्सिन प्रोटीन छोटे प्रोटीन-खंड (पेप्टोन आदि); पाचन यहाँ केवल शुरू होता है
यकृत (Liver) पित्त रस (एंजाइम नहीं होता) वसा की बड़ी गोलिकाएँ वसा की छोटी-छोटी गोलिकाएँ (पायसीकरण / emulsification)
अग्न्याशय (Pancreas) अग्न्याशयी रस — ट्रिप्सिन, लाइपेज, एमाइलेज प्रोटीन, वसा, स्टार्च — तीनों ट्रिप्सिन प्रोटीन को, लाइपेज वसा को, एमाइलेज स्टार्च को तोड़ता है
आंत्र ग्रंथि (छोटी आंत की भित्ति) आंत्र रस के एंजाइम आधे-पचे कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन व वसा ग्लूकोज़, अमीनो अम्ल, वसा अम्ल व ग्लिसरॉल — अंतिम सरल रूप

📌 ध्यान दें: पित्त रस में कोई एंजाइम नहीं होता! उसका काम रासायनिक पाचन नहीं, बल्कि वसा की बड़ी गोलिकाओं को तोड़कर छोटी गोलिकाएँ बनाना (पायसीकरण) और आमाशय से आए भोजन के अम्ल को क्षारीय करना है, ताकि अग्न्याशयी एंजाइम काम कर सकें। यह बात MCQ में बार-बार पूछी जाती है।

वसा का पाचन – सबसे कठिन काम

वसा जल में घुलती नहीं, इसलिए वह आंत में बड़ी-बड़ी गोलिकाओं (globules) के रूप में तैरती है। एंजाइम केवल गोलिका की सतह पर ही काम कर सकता है, इसलिए बड़ी गोलिका का पाचन बहुत धीमा होता।

चरण 1: यकृत से आया पित्त रस (पित्ताशय में संचित होकर) बड़ी वसा-गोलिकाओं को तोड़कर छोटी-छोटी गोलिकाओं में बाँट देता है — यही पायसीकरण है। छोटी गोलिकाओं की कुल सतह कई गुना बढ़ जाती है।

चरण 2: अब अग्न्याशयी रस का लाइपेज एंजाइम इन छोटी गोलिकाओं पर आसानी से कार्य करके वसा को वसा अम्ल व ग्लिसरॉल में तोड़ देता है। आंत्र रस के एंजाइम इस कार्य को पूरा करते हैं।

सरल भाषा में — पित्त रस ने भीड़ को छोटे समूहों में बाँट दिया और लाइपेज ने एक-एक करके सबका काम निपटा दिया।

विलाई और अवशोषण – पचा भोजन रक्त में कैसे जाता है?

पाचन पूरा होने के बाद ग्लूकोज़, अमीनो अम्ल, वसा अम्ल व ग्लिसरॉल जैसे सरल पदार्थों को रक्त तक पहुँचना होता है — इस प्रक्रिया को अवशोषण (absorption) कहते हैं। छोटी आंत इसके लिए विशेष रूप से बनी है:

1. छोटी आंत बहुत लंबी व कुंडलित होती है, इसलिए भोजन को यहाँ लंबा समय व लंबा रास्ता मिलता है।

2. इसकी भीतरी सतह पर लाखों उँगली-जैसे उभार — विलाई (रसांकुर) — होते हैं, जो अवशोषण का सतह-क्षेत्र कई सौ गुना बढ़ा देते हैं।

3. प्रत्येक विलस के अंदर रक्त केशिकाओं का घना जाल और एक लसीका वाहिनी होती है। ग्लूकोज़ व अमीनो अम्ल रक्त केशिकाओं में चले जाते हैं, जबकि वसा अम्ल व ग्लिसरॉल लसीका वाहिनी में प्रवेश करते हैं और बाद में लसीका द्वारा रक्त में मिल जाते हैं।

रक्त में पहुँचा भोजन परिसंचरण द्वारा शरीर की हर कोशिका तक जाता है, जहाँ वह ऊर्जा बनाने, वृद्धि व मरम्मत में उपयोग होता है — इसे स्वांगीकरण (assimilation) कहते हैं।

पाचन का सार एक नज़र में: स्टार्च → (एमाइलेज) → ग्लूकोज़ | प्रोटीन → (पेप्सिन, ट्रिप्सिन) → अमीनो अम्ल | वसा → (पित्त से पायसीकरण + लाइपेज) → वसा अम्ल + ग्लिसरॉल। पाचन का स्थान मुँह से शुरू, पर पूर्ण पाचन व अवशोषण केवल छोटी आंत में होता है।

एक साँस में समझें — मुँह में स्टार्च शुरू, आमाशय में प्रोटीन शुरू, छोटी आंत में सबका पाचन पूर्ण; पित्त वसा को बाँटता है, लाइपेज तोड़ता है और विलाई भोजन को रक्त-लसीका में पहुँचाती हैं।

श्वसन (Respiration) – भोजन से ऊर्जा बनाना

भोजन खा लेना ही काफ़ी नहीं — कोशिका के अंदर ग्लूकोज़ को तोड़कर उसमें बंद ऊर्जा को बाहर निकालना पड़ता है। यही काम श्वसन करता है। ध्यान रहे, यहाँ ‘श्वसन’ का अर्थ केवल साँस लेना नहीं है; वैज्ञानिक अर्थ में श्वसन वह कोशिकीय प्रक्रिया है जिसमें ग्लूकोज़ का विघटन होता है और ऊर्जा ATP के रूप में मिलती है। साँस लेना-छोड़ना (breathing) इसी का एक बाहरी भाग है।

ग्लूकोज़ विघटन का रास्ता – चरण-चित्र शब्दों में

ग्लूकोज़ के विघटन का पहला चरण सभी जीवों में एक समान होता है और बाकी रास्ता ऑक्सीजन की उपलब्धता पर निर्भर करता है। इसे एक चौराहे की तरह समझिए:

पहला चरण (कोशिकाद्रव्य में): ग्लूकोज़ (6-कार्बन अणु) → पाइरुवेट (3-कार्बन अणु) + थोड़ी ऊर्जा

इसके बाद तीन रास्ते:
(क) ऑक्सीजन उपस्थित (वायवीय): पाइरुवेट माइटोकॉन्ड्रिया में → CO2 + जल + अधिक ऊर्जा
(ख) ऑक्सीजन अनुपस्थित — यीस्ट में: पाइरुवेट → एथेनॉल + CO2 + थोड़ी ऊर्जा (किण्वन)
(ग) ऑक्सीजन की कमी — हमारी पेशियों में: पाइरुवेट → लैक्टिक अम्ल + थोड़ी ऊर्जा

पहला चरण कोशिकाद्रव्य (cytoplasm) में होता है; वायवीय विघटन का आगे का भाग माइटोकॉन्ड्रिया में पूरा होता है — इसीलिए माइटोकॉन्ड्रिया को कोशिका का ‘ऊर्जा-घर’ (powerhouse) कहते हैं। पाइरुवेट का CO2, जल व ऊर्जा में विघटन माइटोकॉन्ड्रिया में ही होता है — यह प्रश्नावली का MCQ है, अच्छी तरह याद रखें।

पेशियों में ऐंठन क्यों होती है? ज़ोरदार दौड़-भाग या व्यायाम में पेशियों को ऊर्जा की माँग इतनी बढ़ जाती है कि ऑक्सीजन की आपूर्ति पीछे रह जाती है। तब पेशी-कोशिकाएँ तीसरा रास्ता अपनाती हैं — पाइरुवेट से लैक्टिक अम्ल बनता है। कोशिकाओं में लैक्टिक अम्ल का जमा हो जाना ही पेशी-ऐंठन (cramps) का कारण है। थोड़ी देर आराम करने व गरम पानी की सिकाई से रक्त-प्रवाह बढ़ता है, ऑक्सीजन पहुँचती है और लैक्टिक अम्ल टूटकर हट जाता है — ऐंठन दूर हो जाती है।

वायवीय व अवायवीय श्वसन में अंतर

बात वायवीय श्वसन (Aerobic) अवायवीय श्वसन (Anaerobic)
ऑक्सीजन उपस्थिति में होता है अनुपस्थिति में होता है
ग्लूकोज़ का विघटन पूर्ण विघटन होता है अपूर्ण विघटन होता है
अंतिम उत्पाद CO2 + जल + ऊर्जा यीस्ट में एथेनॉल + CO2 + ऊर्जा; पेशियों में लैक्टिक अम्ल + ऊर्जा
ऊर्जा की मात्रा बहुत अधिक मिलती है बहुत कम मिलती है
स्थान पहला चरण कोशिकाद्रव्य में, आगे माइटोकॉन्ड्रिया में पूरा कोशिकाद्रव्य में ही होता है
उदाहरण मनुष्य व अधिकांश जीवों का सामान्य श्वसन यीस्ट (किण्वन), कुछ जीवाणु; मनुष्य की पेशियों में ऑक्सीजन की कमी पर अस्थायी रूप से

वायवीय श्वसन का समीकरण: C6H12O6 + 6O2 → 6CO2 + 6H2O + ऊर्जा (ATP)
यीस्ट में अवायवीय (किण्वन): C6H12O6 → 2C2H5OH + 2CO2 + ऊर्जा

मानव श्वसन तंत्र – नासिका से वायुकोष्ठिका तक

अब देखते हैं कि ऑक्सीजन हमारे फेफड़ों तक पहुँचती कैसे है। वायु का रास्ता क्रम से याद कीजिए:

चरण 1 – नासिका छिद्र व नासा गुहा: वायु सबसे पहले नासिका से अंदर जाती है। नासा गुहा के महीन रोम व श्लेष्म धूल-कणों व जीवाणुओं को रोक लेते हैं और वायु को नम व शरीर के ताप के बराबर बना देते हैं। इसीलिए मुँह से नहीं, नाक से साँस लेना बेहतर है।

चरण 2 – ग्रसनी व श्वासनली (Trachea): नासा गुहा से वायु ग्रसनी होते हुए श्वासनली में उतरती है। श्वासनली की भित्ति में C-आकार के उपास्थि (cartilage) के अपूर्ण छल्ले होते हैं, जो यह सुनिश्चित करते हैं कि वायु न होने पर भी नली पिचके नहीं — रास्ता हमेशा खुला रहे।

चरण 3 – श्वसनी व श्वसनिकाएँ: वक्ष में पहुँचकर श्वासनली दो श्वसनियों (bronchi) में बँट जाती है — एक दाएँ फेफड़े के लिए, एक बाएँ के लिए। फेफड़ों के अंदर प्रत्येक श्वसनी बार-बार बँटती हुई पतली-पतली श्वसनिकाएँ (bronchioles) बनाती है — ठीक वैसे जैसे पेड़ की डालियाँ छोटी टहनियों में बँटती हैं।

चरण 4 – वायुकोष्ठिकाएँ (Alveoli): श्वसनिकाओं के अंत में गुब्बारे-जैसी छोटी-छोटी थैलियाँ होती हैं — वायुकोष्ठिकाएँ। यहीं गैसों का वास्तविक विनिमय होता है। करोड़ों की संख्या में होने के कारण इनका कुल सतह-क्षेत्र बहुत विशाल होता है। इनकी भित्ति एक कोशिका जितनी पतली होती है और चारों ओर रक्त केशिकाओं का घना जाल लिपटा होता है। वायु की ऑक्सीजन पतली भित्ति से विसरित होकर रक्त में चली जाती है और रक्त की CO2 उसी रास्ते वायु में आ जाती है, जो उच्छ्वास (साँस छोड़ने) के साथ बाहर निकल जाती है।

साँस लेने की यांत्रिकी: फेफड़ों के नीचे एक मांसल पर्दा — डायाफ्राम (मध्यपट) — होता है। साँस लेते समय पसलियों की पेशियाँ व डायाफ्राम संकुचित होते हैं, वक्ष-गुहा का आयतन बढ़ता है, अंदर दाब घटता है और वायु अंदर खिंच आती है। साँस छोड़ते समय पेशियाँ शिथिल होती हैं, आयतन घटता है और वायु बाहर धकेल दी जाती है।

📌 एक मज़ेदार तुलना: स्थलीय जीवों को जलीय जीवों की तुलना में ऑक्सीजन लेने में लाभ है — वायु में ऑक्सीजन की मात्रा, जल में घुली ऑक्सीजन से कहीं अधिक होती है। इसीलिए मछलियों को जल से ऑक्सीजन निकालने के लिए तेज़ गति से साँस-जैसी क्रिया (मुँह-गलफड़े चलाना) करनी पड़ती है, जबकि हम धीमी गति से साँस लेकर भी पर्याप्त ऑक्सीजन पा लेते हैं।

मानव में गैसों का परिवहन – हीमोग्लोबिन की भूमिका

फेफड़ों तक ऑक्सीजन पहुँच गई — पर उसे पैरों की कोशिकाओं तक कौन पहुँचाएगा? यह काम रक्त करता है। लाल रक्त कोशिकाओं (RBC) में उपस्थित लाल वर्णक हीमोग्लोबिन की ऑक्सीजन के प्रति विशेष बंधुता होती है — फेफड़ों में, जहाँ ऑक्सीजन अधिक है, वह ऑक्सीजन को पकड़ लेता है और ऊतकों में, जहाँ ऑक्सीजन कम है, उसे छोड़ देता है। सोचिए, यदि ऑक्सीजन केवल जल (प्लाज्मा) में घुलकर जानी होती, तो वह इतनी कम घुलती कि शरीर की माँग पूरी ही न होती — हीमोग्लोबिन ही वह ‘वाहन’ है जो बड़ी मात्रा में ऑक्सीजन ढोता है।

दूसरी ओर, कोशिकाओं में बनी कार्बन डाइऑक्साइड जल में ऑक्सीजन की अपेक्षा अधिक घुलनशील होती है, इसलिए उसका अधिकांश परिवहन रक्त प्लाज्मा में घुली हुई अवस्था में ही हो जाता है — वह फेफड़ों तक आकर वायुकोष्ठिकाओं में विसरित हो जाती है और साँस के साथ बाहर निकल जाती है।

फेफड़ों में गैस-विनिमय के बाद भी कुछ CO2 वायुकोष्ठिकाओं में रह जाती है — अर्थात अंदर आने वाली ताज़ा वायु उससे मिल जाती है। इसके बावजूद व्यवस्था इतनी सुचारु है कि हर साँस पर पर्याप्त ऑक्सीजन मिलती रहती है; अवशिष्ट वायु का एक लाभ यह भी है कि विनिमय के लिए हर क्षण सतह उपलब्ध रहती है।

एक साँस में समझें — ग्लूकोज़ पहले कोशिकाद्रव्य में पाइरुवेट बनता है; ऑक्सीजन मिले तो माइटोकॉन्ड्रिया में CO2+जल+अधिक ऊर्जा, न मिले तो यीस्ट में एथेनॉल व पेशियों में लैक्टिक अम्ल; गैस-विनिमय का केंद्र वायुकोष्ठिका है और वाहक हीमोग्लोबिन।

परिवहन (Transportation) – शरीर के अंदर की डाक-व्यवस्था

पाचन से भोजन रक्त में आ गया और फेफड़ों से ऑक्सीजन भी रक्त में आ गई — अब इन दोनों को शरीर की अरबों कोशिकाओं तक पहुँचाना है, और वहाँ बने अपशिष्ट को वापस लाना है। बहुकोशिकीय जीवों में यह भारी काम परिवहन तंत्र करता है। मनुष्य में इसके तीन अंग हैं — हृदय (पंप), रक्त (वाहक माध्यम) और रक्त वाहिकाएँ (रास्ते)। रक्त एक द्रव संयोजी ऊतक है; इसका तरल भाग प्लाज्मा कहलाता है, जिसमें कोशिकाएँ निलंबित रहती हैं — लाल रक्त कोशिकाएँ (RBC) ऑक्सीजन ढोती हैं, श्वेत रक्त कोशिकाएँ (WBC) रोगों से रक्षा करती हैं और प्लेटलेट्स चोट लगने पर रक्त का थक्का बनाकर रक्त-हानि रोकती हैं। प्लाज्मा पचा भोजन, CO2, हॉर्मोन व नाइट्रोजनी अपशिष्ट को घुली अवस्था में ढोता है।

मानव हृदय – बनावट शब्दों में

हृदय एक मांसल, मुट्ठी के आकार का अंग है जो वक्ष के बीचों-बीच, दोनों फेफड़ों के बीच, थोड़ा बाईं ओर स्थित होता है। ऑक्सीजनयुक्त व ऑक्सीजनरहित रक्त को अलग रखने के लिए यह लंबवत एक दीवार (पट / septum) द्वारा दाएँ व बाएँ भागों में बँटा होता है। प्रत्येक भाग में दो कक्ष होते हैं — ऊपर का छोटा कक्ष आलिंद (atrium) और नीचे का बड़ा, मोटी भित्ति वाला कक्ष निलय (ventricle)। इस प्रकार हृदय में कुल चार कक्ष होते हैं — दायाँ आलिंद, दायाँ निलय, बायाँ आलिंद और बायाँ निलय। आलिंदों की भित्ति पतली होती है क्योंकि उन्हें रक्त केवल नीचे के निलय तक ही धकेलना होता है, जबकि निलयों — विशेषकर बाएँ निलय — की भित्ति बहुत मोटी होती है, क्योंकि बाएँ निलय को रक्त पूरे शरीर तक पंप करना होता है।

कक्षों के बीच व बड़ी वाहिकाओं के मुँह पर कपाट (valves) लगे होते हैं, जो रक्त को केवल एक ही दिशा में बहने देते हैं और उल्टा बहाव रोकते हैं। दाएँ आलिंद व दाएँ निलय के बीच त्रिकपाट (tricuspid) कपाट और बाएँ आलिंद व बाएँ निलय के बीच द्विकपाट (bicuspid / mitral) कपाट होता है। कपाटों के खुलने-बंद होने से ही हृदय की ‘धक-धक’ ध्वनि बनती है, जो स्टेथोस्कोप से सुनी जाती है।

हृदय कैसे काम करता है? – चरण-दर-चरण

चरण 1: शरीर के सभी भागों से ऑक्सीजनरहित (अशुद्ध) रक्त महाशिराओं द्वारा दाएँ आलिंद में आता है। उसी समय फेफड़ों से ऑक्सीजनयुक्त (शुद्ध) रक्त फुफ्फुस शिराओं द्वारा बाएँ आलिंद में आता है।

चरण 2: दोनों आलिंद संकुचित होते हैं। कपाट खुलते हैं और दायाँ आलिंद अपना रक्त दाएँ निलय में तथा बायाँ आलिंद अपना रक्त बाएँ निलय में धकेल देता है।

चरण 3: अब दोनों निलय ज़ोर से संकुचित होते हैं। दायाँ निलय अशुद्ध रक्त को फुफ्फुस धमनी (pulmonary artery) द्वारा फेफड़ों की ओर भेजता है, जहाँ रक्त CO2 छोड़कर O2 ग्रहण करेगा।

चरण 4: बायाँ निलय शुद्ध रक्त को शरीर की सबसे बड़ी धमनी — महाधमनी (aorta) — में पंप करता है, जहाँ से वह धमनियों द्वारा पूरे शरीर में बँट जाता है।

चरण 5: ऊतकों में ऑक्सीजन व भोजन देकर और CO2 व अपशिष्ट लेकर रक्त शिराओं द्वारा फिर दाएँ आलिंद लौट आता है — चक्र फिर शुरू हो जाता है। ध्यान दीजिए, एक ही पूरे चक्र में रक्त हृदय से दो बार गुज़रता है — यही दोहरा परिसंचरण है: एक फुफ्फुसीय चक्र (हृदय ↔ फेफड़े) और एक दैहिक चक्र (हृदय ↔ शरीर)।

दोहरा परिसंचरण क्यों आवश्यक है? शुद्ध व अशुद्ध रक्त अलग-अलग रहने से ऊतकों को अधिक ऑक्सीजनयुक्त रक्त मिलता है और ऊर्जा-उत्पादन कुशल रहता है। स्तनधारियों व पक्षियों को शरीर का ताप बनाए रखने के लिए लगातार अधिक ऊर्जा चाहिए — कुशल ऑक्सीजन-आपूर्ति के बिना यह संभव नहीं होता।

हृदय का चित्र कैसे बनाएँ? – Board के लिए चरण

परीक्षा में हृदय का चित्र बनाते समय ये चरण अपनाएँ — (1) पहले हृदय की बाहरी रूपरेखा बनाएँ — ऊपर चौड़ा और नीचे नुकीला, थोड़ा बाईं ओर झुका हुआ; (2) बीच में लंबवत पट खींचकर दायाँ-बायाँ भाग अलग करें; (3) प्रत्येक भाग में क्षैतिज रेखा से ऊपर छोटा आलिंद व नीचे बड़ा निलय बनाएँ — बाएँ निलय की भित्ति सबसे मोटी दिखाएँ; (4) ऊपर से आने वाली वाहिकाएँ बनाएँ — दाईं ओर महाशिराएँ, बाईं ओर फुफ्फुस शिराएँ; नीचे-बीच से निकलती महाधमनी का चाप (arch) और फुफ्फुस धमनी दिखाएँ; (5) कक्षों के बीच कपाटों को छोटी झुकी रेखाओं से दर्शाएँ; (6) रक्त-प्रवाह की दिशा में छोटे तीर लगाएँ — अशुद्ध रक्त दाईं ओर, शुद्ध रक्त बाईं ओर; (7) अंत में साफ़ नामांकन करें — दायाँ आलिंद, दायाँ निलय, बायाँ आलिंद, बायाँ निलय, महाधमनी, फुफ्फुस धमनी, फुफ्फुस शिरा, महाशिरा व कपाट। एक महत्वपूर्ण जाँच — फुफ्फुस धमनी अशुद्ध रक्त ले जाती है और फुफ्फुस शिरा शुद्ध रक्त लाती है; ये दोनों सामान्य नियम (धमनी = शुद्ध, शिरा = अशुद्ध) के प्रसिद्ध अपवाद हैं।

रक्त वाहिकाएँ – धमनी, शिरा व केशिका

बात धमनी (Artery) शिरा (Vein) केशिका (Capillary)
रक्त की दिशा हृदय से अंगों की ओर ले जाती है अंगों से हृदय की ओर लाती है धमनी व शिरा को जोड़ती है; ऊतकों के अंदर जाल बनाती है
भित्ति मोटी, मांसल व लचीली (उच्च दाब सहने के लिए) पतली, कम लचीली अत्यंत पतली — केवल एक कोशिका मोटी
कपाट नहीं होते होते हैं — रक्त के उल्टे बहाव को रोकने के लिए नहीं होते
रक्त का दाब अधिक, झटकों में बहता है (नाड़ी इसी से महसूस होती है) कम, समान गति से बहता है बहुत कम
सामान्यतः रक्त ऑक्सीजनयुक्त (अपवाद: फुफ्फुस धमनी) ऑक्सीजनरहित (अपवाद: फुफ्फुस शिरा) विनिमय यहीं होता है
मुख्य कार्य उच्च दाब से रक्त आगे पहुँचाना कम दाब पर रक्त वापस लाना रक्त व कोशिकाओं के बीच पदार्थों का आदान-प्रदान

कलाई पर जो नाड़ी (pulse) हम महसूस करते हैं, वह धमनियों में दाब की लहर है — नाड़ी की दर ही हृदय-धड़कन की दर बताती है। केशिकाओं की एक-कोशिका-मोटी भित्ति ही वह स्थान है जहाँ ऑक्सीजन, ग्लूकोज़ आदि कोशिकाओं को मिलते हैं और CO2 व अपशिष्ट रक्त में आते हैं।

लसीका (Lymph) – दूसरा परिवहन मार्ग

केशिकाओं की पतली भित्ति से कुछ प्लाज्मा, प्रोटीन व अन्य पदार्थ रिसकर कोशिकाओं के बीच के स्थानों में आ जाते हैं — यही द्रव लसीका कहलाता है। लसीका अलग वाहिनियों — लसीका वाहिनियों — में बहती हुई अंत में बड़ी शिराओं के पास रक्त में मिल जाती है। इसके दो मुख्य काम हैं — (1) कोशिकाओं के बीच जमा अतिरिक्त द्रव को रक्त तक वापस पहुँचाना, और (2) छोटी आंत से अवशोषित वसा (वसा अम्ल व ग्लिसरॉल) को परिवहित करना। पाचन वाले भाग से जोड़कर याद रखिए — वसा लसीका से जाती है, ग्लूकोज़ व अमीनो अम्ल सीधे रक्त से जाते हैं।

पौधों में परिवहन – जाइलम व फ्लोएम

पौधों को ऊर्जा की आवश्यकता जंतुओं की तुलना में कम होती है और वे सामान्यतः धीमी गति वाले परिवहन तंत्र उपयोग करते हैं, परंतु ऊँचे वृक्षों में दूरियाँ बहुत बड़ी हो सकती हैं। पौधों में परिवहन के दो ऊतक हैं:

जाइलम (Xylem) — जल व खनिज ऊपर की ओर: जाइलम की वाहिकाएँ व वाहिनिकाएँ मृत, खोखली नलिकाएँ होती हैं जो जड़ से पत्तियों तक एक अटूट स्तंभ बनाती हैं। जड़ की कोशिकाएँ मिट्टी से खनिज आयन सक्रिय रूप से अंदर लेती हैं, जिससे जड़ में जल का दाब बनता है और जल स्तंभ को ऊपर धकेलता है — परंतु ऊँचे वृक्षों में जल चोटी तक पहुँचाने की असली शक्ति वाष्पोत्सर्जन खिंचाव (transpiration pull) है। दिन में पत्तियों के रंध्रों से जल वाष्पित होता रहता है; जैसे ही एक अणु पत्ती से उड़ता है, वह अपने नीचे के अणुओं को खींचता है — ठीक वैसे जैसे पुआल (straw) से खींचने पर पेय ऊपर आता है। यही खिंचाव जड़ से चोटी तक जल व घुले खनिजों को बिना ऊर्जा-खर्च के ऊपर ले जाता है। रात में, जब वाष्पोत्सर्जन कम होता है, जड़-दाब (root pressure) की भूमिका अधिक दिखती है — घास की पत्तियों के किनारों पर सुबह दिखने वाली जल-बूंदें इसी का प्रमाण हैं।

फ्लोएम (Phloem) — भोजन का स्थानांतरण: पत्तियों में बना भोजन (मुख्यतः सुक्रोज़ के रूप में) पौधे के उन भागों तक जाना चाहिए जो भोजन नहीं बनाते — जड़, फल, बीज व वृद्धि करते भाग। यह कार्य फ्लोएम की चालनी नलिकाएँ (sieve tubes) अपनी सहचर कोशिकाओं (companion cells) की सहायता से करती हैं। जाइलम के विपरीत, फ्लोएम में गति दोनों दिशाओं में हो सकती है — आवश्यकता के अनुसार ऊपर भी, नीचे भी। यह एक सक्रिय प्रक्रिया है: पदार्थ को फ्लोएम में भरने के लिए ATP से ऊर्जा खर्च होती है; इससे फ्लोएम में परासरण दाब बढ़ता है, जल अंदर आता है और बना दाब भोजन-युक्त रस को कम दाब वाले भागों की ओर धकेल देता है। वसंत ऋतु में कलिकाओं तक संचित भोजन का पहुँचना इसी स्थानांतरण का सुंदर उदाहरण है — उस समय दिशा जड़ से ऊपर की ओर होती है।

बात जाइलम फ्लोएम
क्या परिवहित होता है? जल व घुले खनिज लवण बना हुआ भोजन (सुक्रोज़ आदि), अमीनो अम्ल आदि
दिशा केवल ऊपर की ओर (जड़ → पत्ती) ऊपर व नीचे — दोनों दिशाओं में
मुख्य बल / ऊर्जा वाष्पोत्सर्जन खिंचाव; ऊर्जा (ATP) खर्च नहीं होती परासरण दाब; ATP से ऊर्जा खर्च होती है (सक्रिय प्रक्रिया)
मुख्य कोशिकाएँ वाहिकाएँ व वाहिनिकाएँ (मृत) चालनी नलिकाएँ व सहचर कोशिकाएँ (जीवित)

एक साँस में समझें — मनुष्य में हृदय पंप है, रक्त वाहक है, वाहिकाएँ रास्ते हैं; पौधों में जाइलम जल को ऊपर खींचता है (वाष्पोत्सर्जन खिंचाव) और फ्लोएम भोजन को ऊर्जा खर्च करके दोनों दिशाओं में भेजता है (स्थानांतरण)।

उत्सर्जन (Excretion) – अपशिष्ट बाहर निकालना

कोशिकाओं में लगातार चलने वाली क्रियाओं से कुछ ऐसे उपोत्पाद बनते हैं जो शरीर के लिए हानिकारक हैं — सबसे प्रमुख हैं नाइट्रोजनी अपशिष्ट, यूरिया व यूरिक अम्ल। यदि ये शरीर में जमा होते रहें तो विष का काम करेंगे। इन्हें बाहर निकालने की प्रक्रिया ही उत्सर्जन है। मनुष्य में यह काम वृक्क (kidney) करते हैं।

मानव उत्सर्जन तंत्र – अंगों का क्रम

उत्सर्जन तंत्र के अंग क्रम से याद कीजिए — एक जोड़ी वृक्क (kidneys) — ये सेम के बीज के आकार के अंग हैं जो रक्त को छानते हैं; एक जोड़ी मूत्रवाहिनी (ureters) — ये नलिकाएँ प्रत्येक वृक्क से मूत्र को नीचे ले जाती हैं; मूत्राशय (urinary bladder) — यह मांसल थैली मूत्र को अस्थायी रूप से संचित करती है; और मूत्रमार्ग (urethra) — इससे मूत्र समय-समय पर शरीर से बाहर निकलता है। वृक्क में बना मूत्र बूंद-बूंद मूत्रवाहिनी से मूत्राशय में आता रहता है; मूत्राशय के भरने पर तंत्रिका-नियंत्रण से हम उसे बाहर निकालते हैं।

नेफ्रॉन की बनावट – शब्दों में चरण-दर-चरण

प्रत्येक वृक्क में लगभग दस लाख सूक्ष्म छनन-इकाइयाँ होती हैं — नेफ्रॉन (वृक्काणु)। एक नेफ्रॉन दो भागों से बना होता है — एक छनन-भाग और एक लंबी नलिका। बनावट क्रम से समझिए:

चरण 1 – ग्लोमेरुलस (Glomerulus): वृक्क धमनी की एक सूक्ष्म शाखा वृक्क में आकर केशिकाओं का एक गुच्छा बनाती है — यही गुच्छा ग्लोमेरुलस कहलाता है। यहाँ रक्त उच्च दाब पर होता है, जो छनन के लिए ज़रूरी है।

चरण 2 – बोमन संपुट (Bowman’s Capsule): ग्लोमेरुलस एक दोहरी भित्ति वाले कप-जैसी संरचना के अंदर बैठा होता है — यही बोमन संपुट है। संपुट की भीतरी भित्ति से ही निस्यंदन (छनाई) शुरू होता है और यहीं से नलिका निकलती है।

चरण 3 – कुंडलित नलिका: बोमन संपुट से एक लंबी, अत्यंत कुंडलित नलिका निकलती है। नलिका के चारों ओर रक्त केशिकाओं का घना जाल लिपटा रहता है — पुनःअवशोषण का काम यहीं होता है।

चरण 4 – संग्राहक वाहिनी (Collecting Duct): कई नेफ्रॉनों की नलिकाएँ एक साझा संग्राहक वाहिनी में खुलती हैं। ये वाहिनियाँ मिलकर मूत्र को मूत्रवाहिनी की ओर ले जाती हैं।

नेफ्रॉन का चित्र बनाने के चरण (Board के लिए): (1) ऊपर एक गोल कप जैसी बोमन संपुट बनाएँ और उसके अंदर केशिकाओं का गुच्छा (ग्लोमेरुलस) छोटी कुंडलियों से दिखाएँ; (2) कप के नीचे से एक लंबी, लहराती कुंडलित नलिका नीचे की ओर निकालें और अंत में उसे एक सीधी मोटी संग्राहक वाहिनी से जोड़ें; (3) नलिका के आस-पास केशिका-जाल हल्की रेखाओं से दिखाएँ; (4) आने-जाने वाली रक्त वाहिकाओं पर तीर लगाएँ; (5) नामांकन करें — ग्लोमेरुलस, बोमन संपुट, नलिका (वृक्क नलिका), संग्राहक वाहिनी व केशिका-जाल। चित्र के साथ कार्य के तीन चरण लिखने से उत्तर पूर्ण होता है।

मूत्र कैसे बनता है? – छनन और पुनःअवशोषण

चरण 1 – निस्यंदन (Filtration): ग्लोमेरुलस में उच्च दाब के कारण रक्त का द्रव भाग बोमन संपुट में छनकर आ जाता है। इस प्रारंभिक निस्यंद (filtrate) में ग्लूकोज़, अमीनो अम्ल, लवण, यूरिया, यूरिक अम्ल और प्रचुर जल होता है — अर्थात उपयोगी पदार्थ भी अपशिष्ट के साथ छन जाते हैं। बड़ी प्रोटीन व रक्त कोशिकाएँ छनकर नहीं आतीं।

चरण 2 – चयनात्मक पुनःअवशोषण (Selective Reabsorption): जैसे-जैसे निस्यंद नलिका में आगे बढ़ता है, उपयोगी पदार्थ — सारा ग्लूकोज़, सभी अमीनो अम्ल, आवश्यक लवण और आवश्यकता अनुसार जल — नलिका के चारों ओर की केशिकाओं द्वारा चयन करके वापस रक्त में सोख लिए जाते हैं। कितना जल वापस जाएगा, यह शरीर की आवश्यकता पर निर्भर करता है — शरीर में जल अधिक हो तो कम पुनःअवशोषण होकर पतला मूत्र अधिक मात्रा में बनेगा; जल कम हो (जैसे गर्मी में पसीना अधिक आने पर) तो अधिक पुनःअवशोषण होकर गाढ़ा मूत्र कम मात्रा में बनेगा।

चरण 3 – मूत्र का निर्माण: पुनःअवशोषण के बाद नलिका में जो द्रव बचता है, वही मूत्र है — इसमें यूरिया, यूरिक अम्ल, अतिरिक्त लवण व शेष जल होता है। मूत्र संग्राहक वाहिनी → मूत्रवाहिनी → मूत्राशय के रास्ते शरीर से बाहर जाता है।

हीमोडायलिसिस (Haemodialysis) — संक्षेप में: यदि संक्रमण, चोट या उच्च रक्तचाप से दोनों वृक्क काम करना बंद कर दें, तो रक्त में यूरिया जमा होकर जीवन के लिए खतरा बन जाता है। ऐसी स्थिति में कृत्रिम वृक्क द्वारा रक्त को छानने की प्रक्रिया — डायलिसिस — अपनाई जाती है। इसमें रोगी का रक्त एक ऐसी मशीन से गुज़ारा जाता है जहाँ अर्धपारगम्य झिल्ली के आर-पार विसरण द्वारा नाइट्रोजनी अपशिष्ट अलग हो जाते हैं और शुद्ध रक्त शरीर में लौटा दिया जाता है। ध्यान रहे — डायलिसिस में वृक्क की तरह पुनःअवशोषण नहीं होता, केवल छनन होता है। स्वस्थ व्यक्ति द्वारा वृक्क-दान इसीलिए संभव और महान है, क्योंकि एक वृक्क से भी जीवन सामान्य चल सकता है।

पौधों में उत्सर्जन – कचरा भी काम का!

पौधों के सामने उत्सर्जन की समस्या जंतुओं से अलग है — उनकी ऊर्जा-आवश्यकता कम है, वे जल व CO2 का पुनः उपयोग कर लेते हैं, फिर भी कुछ अपशिष्ट बनते हैं। पौधे इनसे कई चतुर तरीकों से निपटते हैं:

1. प्रकाश संश्लेषण में बनी अतिरिक्त ऑक्सीजन रंध्रों द्वारा वायु में छोड़ दी जाती है — पौधे का अपशिष्ट ही पूरे जगत के लिए जीवनदायी है!

2. अतिरिक्त जल वाष्पोत्सर्जन द्वारा बाहर निकल जाता है।

3. अनेक अपशिष्ट पदार्थ कोशिकाओं की रिक्तिकाओं (vacuoles) में संचित कर लिए जाते हैं।

4. कुछ अपशिष्ट उन पत्तियों में जमा होते हैं जो समय पर गिर जाती हैं — पेड़ पत्ते गिराकर अपशिष्ट भी गिरा देता है।

5. रेज़िन व गोंद जैसे अपशिष्ट पुराने, कार्यहीन जाइलम (अंतःकाष्ठ) में संचित हो जाते हैं।

6. कुछ अपशिष्ट पदार्थ जड़ों द्वारा आस-पास की मिट्टी में स्रावित कर दिए जाते हैं।

एक और महत्वपूर्ण बात — पौधे नाइट्रोजनी अपशिष्ट को जंतुओं की तरह तुरंत बाहर नहीं फेंकते; वे नाइट्रोजन को पुनः उपयोग करके अमीनो अम्ल आदि बनाने में लगा लेते हैं, इसलिए पौधों में नाइट्रोजनी अपशिष्ट की मात्रा बहुत कम बनती है।

एक साँस में समझें — वृक्क की इकाई नेफ्रॉन है: ग्लोमेरुलस में छनन, नलिका में चयनात्मक पुनःअवशोषण और बचा द्रव मूत्र; पौधे अपशिष्ट को रिक्तिका, गिरती पत्तियों, पुराने जाइलम व मिट्टी के रास्ते संभालते हैं।

📘 पाठ्य-पुस्तक के प्रश्न (InText Questions)

ये वे प्रश्न हैं जो NCERT किताब के अनुच्छेदों के बीच-बीच में दिए गए हैं। इस अध्याय में कुल 21 InText प्रश्न हैं — पाँच समूहों में (पृष्ठ 95, 101, 105, 110 व 112)। Board में ये प्रश्न वैसे-के-वैसे पूछ लिए जाते हैं, इसलिए इन्हें सबसे पहले तैयार कीजिए।

(क) पृष्ठ 95 पर आधारित प्रश्न – जैव प्रक्रम की भूमिका

प्रश्न 1. बहुकोशिकीय जीवों, जैसे मनुष्य, की ऑक्सीजन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए विसरण क्यों अपर्याप्त है?

हल:

चरण 1: एककोशिकीय जीवों में कोशिका वातावरण के सीधे संपर्क में होती है, इसलिए विसरण से ऑक्सीजन अंदर और CO2 बाहर आसानी से आ-जा सकती है।

चरण 2: मनुष्य जैसे बहुकोशिकीय जीवों में शरीर बड़ा व जटिल है — अधिकांश कोशिकाएँ वातावरण के सीधे संपर्क में नहीं होतीं, वे शरीर के अंदर गहराई में होती हैं।

चरण 3: विसरण एक धीमी प्रक्रिया है जो केवल छोटी दूरियों पर प्रभावी होती है। अंदर की प्रत्येक कोशिका तक केवल विसरण से ऑक्सीजन समय पर व पर्याप्त मात्रा में नहीं पहुँच सकती।

उत्तर: इसलिए बहुकोशिकीय जीवों में विसरण अपर्याप्त है — उन्हें ऑक्सीजन पहुँचाने के लिए विशेष श्वसन व परिसंचरण तंत्र (फेफड़े व रक्त) की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 2. किसी वस्तु के सजीव होने का निर्णय लेने के लिए हम किन मापदंडों का उपयोग करते हैं?

हल: दिखने वाली गतियाँ — चलना, साँस लेना, बढ़ना — सजीव होने के सामान्य संकेत हैं। परंतु कुछ सजीवों में ऐसी गति नहीं दिखती (जैसे पौधे या सोया हुआ जंतु) और कुछ गतियाँ आँखों से दिखती ही नहीं।

उत्तर: सबसे मूलभूत मापदंड है — आणविक गति व जैव प्रक्रमों की उपस्थिति। यदि किसी में पोषण, श्वसन आदि रख-रखाव वाले प्रक्रम व कोशिकीय संगठन है, तो वह सजीव है — भले ही बाहर से कोई गति न दिखे।

प्रश्न 3. किसी जीव द्वारा किन बाहरी कच्ची सामग्रियों का उपयोग किया जाता है?

हल: बाहरी कच्ची सामग्री का अर्थ है — वे पदार्थ जो जीव अपने वातावरण से लेता है। इनकी प्रकृति जीव की जटिलता व वातावरण पर निर्भर करती है। पृथ्वी पर जीवन कार्बन-आधारित अणुओं पर निर्भर है, इसलिए अधिकांश भोजन-स्रोत भी कार्बन-आधारित होते हैं।

उत्तर: मुख्य बाहरी कच्ची सामग्रियाँ हैं — भोजन (ऊर्जा व शरीर-निर्माण के लिए), ऑक्सीजन (भोजन के विघटन से ऊर्जा पाने के लिए) और जल। स्वपोषी पौधे इसके अतिरिक्त CO2, खनिज व सूर्य-प्रकाश भी बाहर से ही लेते हैं।

प्रश्न 4. जीवन के रख-रखाव के लिए आप किन प्रक्रमों को आवश्यक मानेंगे?

हल: रख-रखाव का अर्थ है — शरीर की संरचनाओं की लगातार मरम्मत व क्षति की पूर्ति। इसके लिए ऊर्जा व सामग्री का निरंतर चक्र चाहिए।

उत्तर: आवश्यक प्रक्रम हैं — (1) पोषण, (2) श्वसन, (3) परिवहन (शरीर के अंदर पदार्थों का) और (4) उत्सर्जन। यही चार प्रक्रम इस पूरे अध्याय का विषय हैं।

(ख) पृष्ठ 101 पर आधारित प्रश्न – पोषण व पाचन

प्रश्न 1. स्वपोषी पोषण व परपोषी पोषण में क्या अंतर है?

हल:

स्वपोषी पोषण: (1) जीव CO2 व जल जैसे सरल अकार्बनिक पदार्थ बाहर से लेकर उन्हें संचित ऊर्जा के रूप (कार्बोहाइड्रेट) में बदल देता है — अर्थात भोजन स्वयं बनाता है। (2) इसके लिए क्लोरोफिल व सूर्य-प्रकाश आवश्यक हैं। (3) उदाहरण — सभी हरे पौधे व कुछ जीवाणु।

परपोषी पोषण: (1) जीव भोजन स्वयं नहीं बनाता; वह स्वपोषियों द्वारा बनाए जटिल पदार्थों को ग्रहण करके उन्हें तोड़ता है। (2) क्लोरोफिल आवश्यक नहीं है। (3) उदाहरण — मनुष्य व सभी जंतु, कवक।

मूल अंतर: स्वपोषी भोजन का निर्माता है, परपोषी भोजन का उपभोक्ता है।

प्रश्न 2. पौधे प्रकाश संश्लेषण के लिए आवश्यक प्रत्येक कच्चा माल कहाँ से प्राप्त करते हैं?

हल:

(1) कार्बन डाइऑक्साइड: वायुमंडल से, पत्तियों के रंध्रों (stomata) द्वारा। (2) जल: मिट्टी से, जड़ों द्वारा अवशोषित होकर जाइलम द्वारा पत्तियों तक पहुँचता है। (3) सूर्य का प्रकाश: सीधे सूर्य से — पत्तियों का क्लोरोफिल इसे ग्रहण करता है। (4) क्लोरोफिल: यह पौधे की हरी कोशिकाओं के क्लोरोप्लास्ट में पहले से उपस्थित होता है।

प्रश्न 3. हमारे आमाशय में अम्ल की क्या भूमिका है?

हल: आमाशय की जठर ग्रंथियों से निकलने वाला हाइड्रोक्लोरिक अम्ल (HCl) तीन काम करता है —

(1) यह आमाशय में अम्लीय माध्यम बनाता है, जो प्रोटीन-पाचक एंजाइम पेप्सिन की क्रिया के लिए आवश्यक है (पेप्सिन इसी माध्यम में सक्रिय होता है)। (2) यह भोजन के साथ आए हानिकारक जीवाणुओं को मारता है। (3) यह भोजन को नरम करने में भी सहायता करता है।

प्रश्न 4. पाचक एंजाइमों का क्या कार्य है?

हल: हमारा भोजन जटिल व बड़े अणुओं (स्टार्च, प्रोटीन, वसा) से बना होता है, जो आंत की भित्ति से सीधे अवशोषित नहीं हो सकते। पाचक एंजाइम इन जटिल पदार्थों को सरल, छोटे व घुलनशील पदार्थों में तोड़ देते हैं — स्टार्च को ग्लूकोज़ में, प्रोटीन को अमीनो अम्ल में और वसा को वसा अम्ल व ग्लिसरॉल में। सरल पदार्थ ही अवशोषित होकर रक्त तक पहुँचते हैं। उदाहरण — एमाइलेज, पेप्सिन, ट्रिप्सिन व लाइपेज।

प्रश्न 5. पचे हुए भोजन के अवशोषण के लिए छोटी आंत की संरचना कैसी होती है?

हल: छोटी आंत अवशोषण के लिए विशेष रूप से अनुकूलित है — (1) यह बहुत लंबी व कुंडलित है, जिससे भोजन को लंबा संपर्क-समय मिलता है; (2) इसकी भीतरी सतह पर लाखों उँगली-जैसे उभार विलाई होते हैं, जो सतह-क्षेत्र को बहुत अधिक बढ़ा देते हैं; (3) प्रत्येक विलस में रक्त केशिकाओं का घना जाल व लसीका वाहिनी होती है, जिससे अवशोषित पदार्थ तुरंत रक्त व लसीका में चला जाता है।

उत्तर का सार: विलाई ही वह संरचना है जो छोटी आंत को अवशोषण का सर्वोत्तम अंग बनाती है — अधिक क्षेत्र, पतली भित्ति और पास में रक्त-जाल।

(ग) पृष्ठ 105 पर आधारित प्रश्न – श्वसन

प्रश्न 1. स्थलीय जीवों की तुलना में जलीय जीवों को साँस लेने की गति अधिक तेज क्यों होती है?

हल: जल में घुली हुई ऑक्सीजन की मात्रा वायु की तुलना में बहुत कम होती है। इसलिए जलीय जीवों को उतनी ही ऑक्सीजन पाने के लिए अधिक मात्रा में जल को अपने श्वसन-अंगों (जैसे गलफड़े) से गुज़ारना पड़ता है — इसी कारण उनकी श्वसन-गति तेज होती है।

प्रश्न 2. ग्लूकोज़ के ऑक्सीकरण के कौन-से तरीके हैं?

हल:

(1) वायवीय श्वसन (ऑक्सीजन की उपस्थिति में): ग्लूकोज़ का पूर्ण विघटन होकर CO2, जल और अधिक ऊर्जा (ATP) मिलती है। (2) अवायवीय श्वसन (ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में): ग्लूकोज़ का आंशिक विघटन होता है — यीस्ट में एथेनॉल व CO2 बनते हैं; हमारी मांसपेशियों में लैक्टिक अम्ल बनता है। इनमें ऊर्जा कम मिलती है।

प्रश्न 3. मनुष्य में ऑक्सीजन व कार्बन डाइऑक्साइड का परिवहन किस प्रकार होता है?

हल: ऑक्सीजन फेफड़ों की वायुकोष्ठिकाओं से रक्त में विसरित होकर हीमोग्लोबिन से जुड़ जाती है और इसी रूप में रक्त के साथ सभी कोशिकाओं तक पहुँचती है। कोशिकाओं से निकली CO2 रक्त के प्लाज्मा में अधिक घुलनशील रूप में घुलकर (और आंशिक रूप से हीमोग्लोबिन से जुड़कर) फेफड़ों तक लाई जाती है, जहाँ से वह साँस के साथ बाहर निकल जाती है।

प्रश्न 4. गैसों के विनिमय के लिए फेफड़ों की संरचना से क्षेत्रफल कैसे बढ़ जाता है?

हल: फेफड़ों के अंदर वायु-नलिकाएँ असंख्य छोटी शाखाओं में बँटकर लाखों गुब्बारे-जैसे वायुकोष्ठिकाओं (alveoli) पर समाप्त होती हैं। इतनी संख्या में वायुकोष्ठिकाएँ कुल सतह-क्षेत्र को हज़ारों गुना बढ़ा देती हैं — और प्रत्येक की भित्ति एक कोशिका मोटी व रक्त-केशिकाओं से घिरी होती है, जिससे गैस-विनिमय तेज़ व प्रभावी हो जाता है।

(घ) पृष्ठ 110 पर आधारित प्रश्न – परिवहन

प्रश्न 1. मानव में परिवहन तंत्र के घटक क्या हैं?

हल: मानव परिवहन तंत्र के तीन मुख्य घटक हैं — (1) हृदय (पंप की तरह काम करता है); (2) रक्त (परिवहन-माध्यम — प्लाज्मा, लाल व श्वेत रक्त कोशिकाएँ, प्लेटलेट्स); (3) रक्त वाहिकाएँ — धमनियाँ, शिराएँ व केशिकाएँ। इन्हीं के साथ लसीका तंत्र भी जुड़ा रहता है।

प्रश्न 2. स्तनधारियों व पक्षियों को ऑक्सीजनित व विऑक्सीजनित रक्त को अलग क्यों रखना पड़ता है?

हल: स्तनधारियों व पक्षियों के शरीर का तापमान स्थिर रखने और अधिक ऊर्जा-आवश्यकता को पूरा करने के लिए कोशिकाओं को निरंतर बहुत अधिक ऑक्सीजन चाहिए। हृदय में चार कक्ष होने से ऑक्सीजनित व विऑक्सीजनित रक्त आपस में नहीं मिलता, जिससे शरीर को शुद्ध (अधिक ऑक्सीजन वाला) रक्त मिलता है और ऊर्जा-उत्पादन अधिकतम होता है।

प्रश्न 3. पौधों में परिवहन के घटक क्या हैं?

हल: पौधों में परिवहन के दो मुख्य घटक हैं — (1) जाइलम, जो जड़ों से जल व खनिज लवण ऊपर तक ले जाता है; (2) फ्लोएम, जो पत्तियों में बने भोजन को पौधे के अन्य भागों तक पहुँचाता है।

प्रश्न 4. पौधों में जल व खनिज लवणों का परिवहन किस प्रकार होता है?

हल: जड़ें मिट्टी से जल व खनिज लवण अवशोषित करती हैं; जाइलम वाहिकाओं द्वारा ये ऊपर की ओर चलते हैं। इस ऊपर की ओर गति का मुख्य बल वाष्पोत्सर्जन खिंचाव है — पत्तियों से जल के वाष्प के रूप में निकलने से एक खिंचाव बनता है, जो जल-स्तंभ को ऊपर खींचता है। यह क्रिया दिन में अधिक तेज़ होती है, जब रंध्र खुले होते हैं।

प्रश्न 5. पौधों में भोजन का परिवहन किस प्रकार होता है?

हल: भोजन का परिवहन स्थानांतरण (translocation) कहलाता है। यह फ्लोएम द्वारा होता है। स्थानांतरण में ऊर्जा (ATP) का उपयोग होता है, और भोजन पत्तियों (स्रोत) से पौधे के अन्य भागों — जड़, तना, फल व बीज (सिंक) — तक दोनों दिशाओं में जा सकता है। सुक्रोज़ के रूप में भोजन का परिवहन होता है।

(ङ) पृष्ठ 112 पर आधारित प्रश्न – उत्सर्जन

प्रश्न 1. वृक्काणु (नेफ्रॉन) की संरचना व कार्यविधि का वर्णन कीजिए।

हल: वृक्काणु वृक्क की छनन-इकाई है। इसकी संरचना — एक कप-जैसी बोमन संपुट जिसमें रक्त-केशिकाओं का गुच्छा ग्लोमेरुलस बैठा होता है, और उससे जुड़ी लंबी कुंडलित नलिका जो अंत में संग्राहक वाहिनी से मिलती है।

कार्यविधि: (1) रक्त ग्लोमेरुलस में उच्च दाब पर छनता है — ग्लूकोज़, अमीनो अम्ल, लवण, यूरिया, यूरिक अम्ल और प्रचुर जल निस्यंद (filtrate) में आ जाते हैं। (2) नलिका के आगे बढ़ने पर उपयोगी पदार्थ — सारा ग्लूकोज़, सभी अमीनो अम्ल, आवश्यक लवण और आवश्यकता के अनुसार जल — नलिका की चारों ओर की केशिकाओं द्वारा चयन करके वापस रक्त में सोख लिए जाते हैं। (3) शेष बचा द्रव (मूत्र) संग्राहक वाहिनी से होता हुआ मूत्राशय में जाता है और मूत्रमार्ग से बाहर निकलता है।

प्रश्न 2. पौधे अपशिष्ट पदार्थों का निपटान किस प्रकार करते हैं?

हल: पौधे अपशिष्ट निपटान कई चतुर तरीकों से करते हैं — (1) प्रकाश संश्लेषण में बनी अतिरिक्त ऑक्सीजन रंध्रों द्वारा वायु में छोड़ दी जाती है; (2) अतिरिक्त जल वाष्पोत्सर्जन द्वारा बाहर निकल जाता है; (3) अनेक अपशिष्ट पदार्थ कोशिकाओं की रिक्तिकाओं (vacuoles) में संचित कर लिए जाते हैं; (4) कुछ अपशिष्ट उन पत्तियों में जमा होते हैं जो समय पर गिर जाती हैं — पेड़ पत्ते गिराकर अपशिष्ट भी गिरा देता है; (5) रेज़िन व गोंद जैसे अपशिष्ट पुराने, कार्यहीन जाइलम (अंतःकाष्ठ) में संचित हो जाते हैं; (6) कुछ अपशिष्ट पदार्थ जड़ों द्वारा आस-पास की मिट्टी में स्रावित कर दिए जाते हैं।

प्रश्न 3. मूत्र की मात्रा का नियमन किस प्रकार होता है?

हल: मूत्र की मात्रा शरीर की आवश्यकता के अनुसार घटती-बढ़ती है — यह नियमन मुख्यतः नलिका द्वारा जल के पुनः अवशोषण की मात्रा से होता है। शरीर में जल अधिक हो तो कम पुनः अवशोषण होकर पतला व अधिक मूत्र बनता है; जल कम हो (जैसे गर्मी में पसीना अधिक आने पर) तो अधिक पुनः अवशोषण होकर गाढ़ा व कम मूत्र बनता है। मूत्र की मात्रा व संघटन में परिवर्तन से शरीर के आंतरिक वातावरण (जल, लवण व pH) का संतुलन बना रहता है।

इस भाग में हमने सीखा — InText के 21 प्रश्न ही इस अध्याय की रीढ़ हैं। इन्हें समझकर पढ़ने के बाद प्रश्नावली के 13 प्रश्न बहुत आसान लगेंगे।

📗 NCERT उदाहरण (Examples)

एक बात पहले ही साफ़ कर दें — इस अध्याय में NCERT ने गणित की तरह क्रमांकित “उदाहरण (Examples)” नहीं दिए हैं। किताब की सीख क्रियाकलापों (Activities 6.1 से 6.7) के माध्यम से दी गई है। नीचे उन्हीं क्रियाकलापों पर आधारित पाँच सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण दिए जा रहे हैं — परीक्षा में इन्हीं पर आधारित प्रेक्षण-प्रश्न (observation questions) आते हैं।

उदाहरण 1 (क्रियाकलाप 6.1-आधारित). रंग-बिरंगी (variegated) पत्ती वाले पौधे को तीन दिन अँधेरे में रखकर फिर धूप में रखने के बाद उसकी पत्ती की स्टार्च-जाँच करने पर क्या निष्कर्ष निकलता है?

हल: पत्ती को उबालकर ऐल्कोहॉल में रखकर क्लोरोफिल निकाला जाता है, फिर आयोडीन डालने पर पत्ती के केवल वे भाग नीले-काले होते हैं जो पहले हरे थे — अर्थात स्टार्च केवल हरे भागों में बना। सफ़ेद भागों में स्टार्च नहीं बना।

निष्कर्ष: प्रकाश संश्लेषण के लिए क्लोरोफिल आवश्यक है।

उदाहरण 2 (क्रियाकलाप 6.2-आधारित). दो समान पौधों को घंटा-जार से ढककर एक के पास KOH (जो CO2 सोखता है) रखा जाए, तो दोनों की पत्तियों की स्टार्च-जाँच में क्या अंतर मिलेगा?

हल: KOH वाले पौधे की पत्ती में स्टार्च नहीं बनेगा या नगण्य बनेगा, क्योंकि उसके पास की CO2 KOH ने सोख ली। दूसरे पौधे की पत्ती सामान्य रूप से नीली-काली होगी।

निष्कर्ष: प्रकाश संश्लेषण के लिए CO2 आवश्यक है। उदाहरण 1 व 2 मिलकर प्रकाश संश्लेषण की दो आवश्यक शर्तें सिद्ध करते हैं।

उदाहरण 3 (क्रियाकलाप 6.3-आधारित). स्टार्च के घोल वाली दो परखनलियों में से एक (A) में लार मिलाकर 30 मिनट रखने के बाद दोनों में आयोडीन डालने पर क्या दिखेगा?

हल: परखनली B (केवल स्टार्च) आयोडीन से नीली-काली हो जाएगी — स्टार्च उपस्थित है। परखनली A (स्टार्च + लार) में रंग-परिवर्तन नहीं होगा या बहुत हल्का होगा, क्योंकि लार के लार एमाइलेज ने स्टार्च को शर्करा में तोड़ दिया है।

निष्कर्ष: लार स्टार्च पर क्रिया करके उसे शर्करा में बदलती है — मुँह में ही स्टार्च का पाचन शुरू हो जाता है।

उदाहरण 4 (क्रियाकलाप 6.4-आधारित). चूने के पानी में (क) मुँह से फूँक मारकर और (ख) पिचकारी से वायु प्रवाहित करके — किसमें चूने का पानी जल्दी दूधिया होगा और क्यों?

हल: मुँह से फूँकी गई वायु (हमारी छोड़ी हुई साँस) से चूने का पानी जल्दी दूधिया होगा, क्योंकि उच्छ्वसित वायु में CO2 की मात्रा सामान्य वायु से अधिक होती है। पिचकारी की सामान्य वायु से दूधिया होने में अधिक समय लगेगा।

निष्कर्ष: हमारी छोड़ी हुई साँस में CO2 अधिक होती है — यही श्वसन का प्रत्यक्ष प्रमाण है।

उदाहरण 5 (क्रियाकलाप 6.5-आधारित). शर्करा के घोल में यीस्ट मिलाकर उपकरण से जोड़ा जाए, तो जुड़ी परखनली के चूने के पानी में क्या परिवर्तन होगा? यह क्या दर्शाता है?

हल: कुछ समय बाद चूने का पानी दूधिया हो जाएगा — अर्थात यीस्ट द्वारा किण्वन में CO2 गैस बनी। घोल में सूंघने पर ऐल्कोहॉल की गंध भी आती है।

निष्कर्ष: किण्वन (यीस्ट में अवायवीय श्वसन) के उत्पाद हैं — एथेनॉल + CO2 + ऊर्जा। यही क्रिया आटा फुलाने व शराब-उद्योग की आधारशिला है।

✏️ प्रश्नावली (Exercise) – सभी 13 प्रश्नों के हल

प्रश्न 1. मानव में वृक्क किस तंत्र का भाग है? (i) पोषण (ii) श्वसन (iii) उत्सर्जन (iv) परिवहन

हल: वृक्क रक्त को छानकर यूरिया जैसे नाइट्रोजनी अपशिष्ट को मूत्र के रूप में बाहर निकालते हैं — यह उत्सर्जन का कार्य है।

उत्तर: (iii) उत्सर्जन

प्रश्न 2. पौधों में जाइलम किसके लिए उत्तरदायी है? (i) जल का परिवहन (ii) भोजन का परिवहन (iii) अमीनो अम्ल का परिवहन (iv) ऑक्सीजन का परिवहन

हल: जाइलम जड़ों से जल व घुले खनिजों को पत्तियों तक पहुँचाता है। भोजन का परिवहन फ्लोएम का कार्य है।

उत्तर: (i) जल का परिवहन

प्रश्न 3. स्वपोषी पोषण के लिए क्या आवश्यक है? (i) कार्बन डाइऑक्साइड व जल (ii) क्लोरोफिल (iii) सूर्य का प्रकाश (iv) उपरोक्त सभी

हल: प्रकाश संश्लेषण के लिए CO2, जल, क्लोरोफिल व सूर्य-प्रकाश — चारों एक साथ आवश्यक हैं; किसी एक की अनुपस्थिति में भोजन नहीं बनेगा (क्रियाकलाप-आधारित उदाहरण 1 व 2 भी यही सिद्ध करते हैं)।

उत्तर: (iv) उपरोक्त सभी

प्रश्न 4. पाइरुवेट के विघटन से कार्बन डाइऑक्साइड, जल व ऊर्जा बनने की क्रिया कहाँ होती है? (i) कोशिकाद्रव्य (ii) माइटोकॉन्ड्रिया (iii) क्लोरोप्लास्ट (iv) केंद्रक

हल: ग्लूकोज़ से पाइरुवेट बनना कोशिकाद्रव्य में होता है, परंतु पाइरुवेट का आगे पूर्ण विघटन (CO2 + जल + ऊर्जा) ऑक्सीजन की उपस्थिति में माइटोकॉन्ड्रिया में होता है। क्लोरोप्लास्ट प्रकाश संश्लेषण का स्थल है — भ्रमित न हों।

उत्तर: (ii) माइटोकॉन्ड्रिया

प्रश्न 5. हमारे शरीर में वसा का पाचन कैसे होता है? यह प्रक्रिया कहाँ होती है?

हल:

चरण 1: वसा का पाचन छोटी आंत में होता है। आंत में वसा बड़ी-बड़ी गोलिकाओं के रूप में होती है, जिन पर एंजाइम सीधे प्रभावी कार्य नहीं कर पाते।

चरण 2: यकृत से स्रावित पित्त रस के लवण बड़ी गोलिकाओं को तोड़कर छोटी-छोटी गोलिकाओं में बदल देते हैं — यह पायसीकरण है, जिससे एंजाइमों के लिए सतह-क्षेत्र बढ़ जाता है।

चरण 3: अग्न्याशयी रस का लाइपेज एंजाइम पायसीकृत वसा को तोड़ता है और आंत्र रस के एंजाइम उसे अंततः वसा अम्ल व ग्लिसरॉल में बदल देते हैं।

उत्तर का सार: वसा का पाचन छोटी आंत में होता है — पहले पित्त से पायसीकरण, फिर लाइपेज से वास्तविक पाचन।

प्रश्न 6. भोजन के पाचन में लार की क्या भूमिका है?

हल: लार की दो भूमिकाएँ हैं — (1) रासायनिक: लार में उपस्थित लार एमाइलेज एंजाइम भोजन के स्टार्च को शर्करा (माल्टोज़) में तोड़ता है — अर्थात पाचन मुँह से ही शुरू हो जाता है। चावल को देर तक चबाने पर मीठा लगना इसी का प्रमाण है। (2) यांत्रिक: लार भोजन को गीला, नरम व चिकना बनाती है, जिससे उसे चबाना, लुगदी (bolus) बनाना व निगलना आसान हो जाता है।

प्रश्न 7. स्वपोषी पोषण के लिए आवश्यक परिस्थितियाँ कौन-सी हैं? इसके उपोत्पाद क्या हैं?

हल:

आवश्यक परिस्थितियाँ: (1) जीवित हरी कोशिकाओं में क्लोरोफिल की उपस्थिति; (2) सूर्य के प्रकाश की पर्याप्त उपलब्धता (ऊर्जा के लिए); (3) कार्बन डाइऑक्साइड की पर्याप्त आपूर्ति (रंध्रों द्वारा); (4) जल की आपूर्ति — जड़ों द्वारा या आस-पास के वातावरण से।

उपोत्पाद: मुख्य उत्पाद कार्बोहाइड्रेट (ग्लूकोज़) है, जो पौधे का भोजन है। ऑक्सीजन उपोत्पाद के रूप में निकलती है — वह जल के विघटन से बनती है और रंध्रों द्वारा वायु में छोड़ी जाती है। साथ में जल भी पुनः बनता है (समीकरण देखिए: 6CO2 + 12H2O → C6H12O6 + 6O2 + 6H2O)।

प्रश्न 8. वायवीय व अवायवीय श्वसन में क्या अंतर है? अवायवीय श्वसन का उपयोग करने वाले कुछ जीवों के नाम लिखिए।

हल:

वायवीय श्वसन: (1) ऑक्सीजन की उपस्थिति में होता है। (2) ग्लूकोज़ का पूर्ण विघटन होता है। (3) उत्पाद — CO2 + जल + अधिक ऊर्जा। (4) पहला चरण कोशिकाद्रव्य में, शेष माइटोकॉन्ड्रिया में होता है।

अवायवीय श्वसन: (1) ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में होता है। (2) ग्लूकोज़ का अपूर्ण विघटन होता है। (3) उत्पाद — एथेनॉल + CO2 (यीस्ट में) या लैक्टिक अम्ल (पेशियों में) + कम ऊर्जा। (4) संपूर्ण क्रिया कोशिकाद्रव्य में ही होती है।

अवायवीय श्वसन वाले जीव: यीस्ट तथा कुछ जीवाणु — ये बिना ऑक्सीजन के ही ऊर्जा प्राप्त करते हैं। (हमारी पेशियों में भी ऑक्सीजन की कमी पर यह क्रिया अस्थायी रूप से होती है।)

प्रश्न 9. गैसों के अधिकतम विनिमय के लिए वायुकोष्ठिकाओं की संरचना कैसी होती है?

हल: वायुकोष्ठिकाओं की संरचना विनिमय के लिए आदर्श है — (1) ये गुब्बारे-जैसी छोटी संरचनाएँ हैं और करोड़ों की संख्या में होने से कुल सतह-क्षेत्र अत्यधिक बड़ा हो जाता है; (2) इनकी भित्ति अत्यंत पतली (एक कोशिका मोटी) होती है, जिससे गैसें शीघ्र विसरित होती हैं; (3) इनके चारों ओर रक्त केशिकाओं का विस्तृत जाल होता है, जिससे विनिमय के लिए रक्त हमेशा वायु के निकट संपर्क में रहता है।

प्रश्न 10. हमारे शरीर में हीमोग्लोबिन की कमी के क्या परिणाम हो सकते हैं?

हल: हीमोग्लोबिन ही रक्त का ऑक्सीजन-वाहक है। उसकी कमी होने पर रक्त की ऑक्सीजन ले जाने की क्षमता घट जाती है। परिणामस्वरूप शरीर की कोशिकाओं को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिलती, श्वसन से ऊर्जा कम बनती है और व्यक्ति को थकान, कमज़ोरी, साँस फूलना व चक्कर जैसे लक्षण होते हैं — इस स्थिति को रक्ताल्पता (anaemia) कहते हैं। यह कमी प्रायः भोजन में आयरन की कमी से होती है, इसलिए हरी पत्तेदार सब्ज़ियाँ, गुड़ आदि आयरन-युक्त भोजन लेना चाहिए।

प्रश्न 11. मानव में दोहरे परिसंचरण का वर्णन कीजिए। यह क्यों आवश्यक है?

हल:

वर्णन: एक पूरे चक्र में रक्त हृदय से दो बार गुज़रता है, इसलिए इसे दोहरा परिसंचरण कहते हैं। इसके दो भाग हैं — (1) फुफ्फुसीय परिसंचरण: दाएँ निलय से ऑक्सीजनरहित रक्त फुफ्फुस धमनी द्वारा फेफड़ों में जाता है; वहाँ ऑक्सीजनयुक्त होकर फुफ्फुस शिराओं द्वारा बाएँ आलिंद में लौटता है। (2) दैहिक परिसंचरण: बाएँ निलय से ऑक्सीजनयुक्त रक्त महाधमनी द्वारा पूरे शरीर में जाता है; ऊतकों से ऑक्सीजनरहित रक्त महाशिराओं द्वारा दाएँ आलिंद में लौटता है।

आवश्यकता: हृदय के दाएँ व बाएँ भाग अलग-अलग होने से शुद्ध व अशुद्ध रक्त मिल नहीं पाते। इससे ऊतकों को अधिक ऑक्सीजनयुक्त रक्त मिलता है और ऊर्जा-उत्पादन कुशल रहता है — मनुष्य को शरीर का ताप बनाए रखने के लिए यह कुशल आपूर्ति अत्यंत आवश्यक है।

प्रश्न 12. जाइलम व फ्लोएम में पदार्थों के परिवहन में क्या अंतर है?

हल:

जाइलम में परिवहन: (1) जल व घुले खनिज लवण जड़ से पत्तियों की ओर जाते हैं। (2) गति केवल ऊपर की ओर होती है। (3) परिवहन वाहिकाओं व वाहिनिकाओं (मृत कोशिकाओं) द्वारा होता है। (4) मुख्य बल वाष्पोत्सर्जन खिंचाव है — यह सरल भौतिक बलों से होता है, ATP की ऊर्जा खर्च नहीं होती।

फ्लोएम में परिवहन: (1) बना हुआ भोजन पत्तियों से पौधे के अन्य भागों तक जाता है। (2) गति दोनों दिशाओं में हो सकती है। (3) परिवहन चालनी नलिकाओं द्वारा सहचर कोशिकाओं (जीवित कोशिकाओं) की सहायता से होता है। (4) यह सक्रिय प्रक्रिया है — पदार्थ भरने में ATP की ऊर्जा खर्च होती है और बना परासरण दाब रस को आगे धकेलता है।

प्रश्न 13. फेफड़ों की वायुकोष्ठिकाओं व वृक्क के नेफ्रॉन की संरचना व कार्यविधि की तुलना कीजिए।

हल:

बात वायुकोष्ठिका (Alveoli) नेफ्रॉन (Nephron)
स्थिति फेफड़ों में, श्वसनिकाओं के अंत में वृक्क में
संरचना गुब्बारे-जैसी छोटी थैली; भित्ति एक कोशिका जितनी पतली कप-जैसा बोमन संपुट (अंदर ग्लोमेरुलस) + लंबी कुंडलित नलिका
रक्त-जाल चारों ओर केशिकाओं का घना जाल ग्लोमेरुलस में केशिका-गुच्छा तथा नलिका के चारों ओर केशिका-जाल
मुख्य कार्य रक्त व वायु के बीच गैसों का विनिमय — O2 रक्त में, CO2 वायु में रक्त का निस्यंदन व उपयोगी पदार्थों का पुनःअवशोषण; अंत में मूत्र निर्माण
सतह-क्षेत्र की भूमिका करोड़ों की संख्या से विशाल क्षेत्र — अधिक गैस-विनिमय के लिए प्रत्येक वृक्क में लगभग दस लाख नेफ्रॉन व लंबी नलिकाएँ — अधिक छनन व पुनःअवशोषण के लिए
अंतिम परिणाम रक्त ऑक्सीजनयुक्त होता है अपशिष्ट-युक्त मूत्र बनता है

समानता: दोनों ही पतली-भित्ति वाली, केशिका-जाल से घिरी, अत्यधिक संख्या में पाई जाने वाली संरचनाएँ हैं — दोनों का उद्देश्य ही बड़ा सतह-क्षेत्र देकर विनिमय को कुशल बनाना है। अंतर केवल विनिमय की प्रकृति का है — एक गैसों का, दूसरी छनन-पुनःअवशोषण का।

इस प्रश्नावली में हमने सीखा — 13 प्रश्नों में से 4 वस्तुनिष्ठ हैं और शेष 9 में पाचन, श्वसन, परिसंचरण व उत्सर्जन के वर्णनात्मक उत्तर हैं; हर उत्तर में चरण-क्रम बनाए रखना ही पूरे अंक की कुंजी है।

📖 Case Study – दौड़, ऐंठन और धड़कन की कहानी

विद्यालय की खेल-प्रतियोगिता में सीमा ने 400 मीटर की दौड़ लगाई। दौड़ के बीच में उसकी साँस तेज़ हो गई, हृदय ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा और अंतिम चरण में उसकी टाँग की पेशियों में तेज़ ऐंठन उठी, जिससे वह धीमी पड़ गई। प्रशिक्षक ने उसे बिठाकर आराम करने और गरम पानी से सिकाई करने की सलाह दी। कुछ देर बाद ऐंठन दूर हो गई। प्रशिक्षक ने समझाया — “तुम्हारे शरीर में एक साथ कई जैव प्रक्रम तेज़ हो गए थे: फेफड़ों ने अधिक ऑक्सीजन ली, हृदय ने रक्त तेज़ी से पंप किया, फिर भी पेशियों को ऑक्सीजन कम पड़ी, इसलिए उनमें एक अम्ल जम गया — वही ऐंठन का कारण है। आराम करने से ऑक्सीजन की आपूर्ति सुधरी और वह अम्ल हट गया।” घर लौटकर सीमा ने यह भी सोचा कि सुबह खाया नाश्ता ही तो दौड़ में ऊर्जा बनकर काम आया था। इस गद्यांश के आधार पर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए:

Q1. दौड़ के दौरान सीमा की टाँग की पेशियों में ऐंठन का कारण क्या था? —

(A) पेशियों में ग्लूकोज़ का जमा होना
(B) ऑक्सीजन की कमी से पेशियों में लैक्टिक अम्ल का जमा होना
(C) पेशियों में CO2 का बिल्कुल न बनना
(D) पेशियों में जल की अधिकता होना

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (B) ऑक्सीजन की कमी से पेशियों में लैक्टिक अम्ल का जमा होना — तेज़ दौड़ में ऑक्सीजन-आपूर्ति माँग से पीछे रह गई, पाइरुवेट लैक्टिक अम्ल में बदला और वही ऐंठन का कारण बना।

Q2. दौड़ते समय ऑक्सीजन को फेफड़ों से पेशियों तक तेज़ी से पहुँचाने का मुख्य कार्य किसने किया? —

(A) केवल प्लाज्मा ने
(B) केवल लसीका ने
(C) हीमोग्लोबिन युक्त लाल रक्त कोशिकाओं व तेज़ पंप करते हृदय ने
(D) प्लेटलेट्स ने

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (C) हीमोग्लोबिन युक्त लाल रक्त कोशिकाओं व तेज़ पंप करते हृदय ने — हीमोग्लोबिन ऑक्सीजन को बाँधकर ढोता है और हृदय रक्त को तेज़ गति से परिसंचरित करता है।

Q3. सीमा के फेफड़ों में गैसों का विनिमय मुख्यतः किस संरचना में हुआ? —

(A) वायुकोष्ठिकाओं में
(B) श्वासनली में
(C) नासा गुहा में
(D) ग्रसनी में

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (A) वायुकोष्ठिकाओं में — इनकी पतली भित्ति व केशिका-जाल के बीच O2 रक्त में जाती है और CO2 वायु में आती है।

Q4. दौड़ के बाद शरीर में बने अपशिष्टों को छानकर मूत्र बनाने का कार्य किस संरचना द्वारा होता है? —

(A) विलाई द्वारा
(B) वायुकोष्ठिका द्वारा
(C) ग्लोमेरुलस द्वारा केवल
(D) नेफ्रॉन द्वारा

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (D) नेफ्रॉन द्वारा — वृक्क की यह छनन-इकाई ग्लोमेरुलस में निस्यंदन व नलिका में पुनःअवशोषण करके मूत्र बनाती है।

⭐ Quick Revision – Important Points

  • ✅ जैव प्रक्रम चार हैं — पोषण, श्वसन, परिवहन व उत्सर्जन; ये सब मिलकर रख-रखाव का कार्य करते हैं।
  • ✅ प्रकाश संश्लेषण: 6CO2 + 12H2O → C6H12O6 + 6O2 + 6H2O; निकलने वाली O2 जल से आती है और स्थल क्लोरोप्लास्ट है।
  • ✅ रंध्र गैस-विनिमय व वाष्पोत्सर्जन करते हैं; रक्षक कोशिकाएँ उन्हें खोलती-बंद करती हैं।
  • ✅ अमीबा कूटपादों से भोजन पकड़कर खाद्य रिक्तिका में पचाता है।
  • ✅ एंजाइम-क्रम: लार एमाइलेज (मुँह, स्टार्च), पेप्सिन (आमाशय, प्रोटीन), ट्रिप्सिन-लाइपेज-एमाइलेज (अग्न्याशय), आंत्र रस (पूर्ण पाचन) — पूर्ण पाचन व अवशोषण छोटी आंत में; विलाई अवशोषण-क्षेत्र बढ़ाती हैं।
  • ✅ पित्त रस में एंजाइम नहीं होता — वह वसा का पायसीकरण करता है; लाइपेज वसा को वसा अम्ल + ग्लिसरॉल में तोड़ता है।
  • ✅ ग्लूकोज़ → (कोशिकाद्रव्य) → पाइरुवेट (3C); ऑक्सीजन मिले तो माइटोकॉन्ड्रिया में CO2 + जल + अधिक ऊर्जा, यीस्ट में एथेनॉल + CO2, पेशियों में लैक्टिक अम्ल (ऐंठन का कारण)।
  • ✅ गैस-विनिमय वायुकोष्ठिकाओं में; O2 का वाहक हीमोग्लोबिन, CO2 मुख्यतः प्लाज्मा में घुलकर जाती है। श्वासनली में C-आकार के उपास्थि छल्ले होते हैं।
  • ✅ हृदय के चार कक्ष; बाएँ निलय की भित्ति सबसे मोटी; कपाट उल्टा बहाव रोकते हैं; एक चक्र में रक्त हृदय से दो बार गुज़रता है — दोहरा परिसंचरण।
  • ✅ धमनियों में कपाट नहीं होते, शिराओं में होते हैं; केशिकाएँ एक कोशिका मोटी होती हैं और विनिमय वहीं होता है। फुफ्फुस धमनी (अशुद्ध) व फुफ्फुस शिरा (शुद्ध) अपवाद हैं।
  • ✅ लसीका छोटी आंत से अवशोषित वसा को रक्त तक पहुँचाती है।
  • ✅ जाइलम जल-खनिज ऊपर ले जाता है (वाष्पोत्सर्जन खिंचाव, ऊर्जा-मुक्त); फ्लोएम भोजन का स्थानांतरण दोनों दिशाओं में करता है (ATP-आधारित सक्रिय प्रक्रिया)।
  • ✅ नेफ्रॉन वृक्क की इकाई है — ग्लोमेरुलस + बोमन संपुट में निस्यंदन, नलिका में चयनात्मक पुनःअवशोषण, शेष द्रव मूत्र; मूत्र की मात्रा पुनः अवशोषित जल की मात्रा से नियंत्रित होती है।
  • ✅ पौधों में उत्सर्जन — रंध्रों से O2 व अतिरिक्त जल, रिक्तिकाओं में संचय, गिरती पत्तियाँ, पुराने जाइलम में रेज़िन-गोंद व जड़ों से मिट्टी में स्राव।

⚠️ Aam Galtiyan (Common Mistakes)

  • प्रकाश संश्लेषण की O2 का स्रोत गलत लिखना: निकलने वाली ऑक्सीजन जल के विघटन से आती है, CO2 से नहीं। समीकरण में 12H2O व उत्पाद में 6H2O लिखना भी अक्सर छूट जाता है।
  • पित्त रस को एंजाइम समझना: पित्त रस में कोई एंजाइम नहीं होता — वह केवल वसा का पायसीकरण करता है व माध्यम को क्षारीय बनाता है। वसा तोड़ने वाला एंजाइम लाइपेज है।
  • पाचन का स्थान भ्रमित करना: मुँह में केवल स्टार्च का, आमाशय में केवल प्रोटीन का पाचन शुरू होता है — तीनों पदार्थों का पूर्ण पाचन छोटी आंत में होता है, बड़ी आंत में नहीं (बड़ी आंत जल सोखती है)।
  • पाइरुवेट बनने का स्थान गलत लिखना: ग्लूकोज़ → पाइरुवेट कोशिकाद्रव्य में होता है; पाइरुवेट → CO2 + जल माइटोकॉन्ड्रिया में। दोनों चरण आपस में बदलना सबसे आम गलती है।
  • धमनी-शिरा का नियम बिना अपवाद रटना: फुफ्फुस धमनी अशुद्ध रक्त ले जाती है और फुफ्फुस शिरा शुद्ध रक्त लाती है। इसी तरह कपाट शिराओं में होते हैं, धमनियों में नहीं — निलय-वाहिका कपाट अलग बात है।
  • जाइलम-फ्लोएम की दिशा व ऊर्जा उलटना: जाइलम में गति एकदिशीय (ऊपर) व ऊर्जा-मुक्त (वाष्पोत्सर्जन खिंचाव) है; फ्लोएम में द्विदिशीय व ATP-खर्च वाली सक्रिय प्रक्रिया है।
  • नेफ्रॉन में पुनःअवशोषण भूल जाना: केवल ‘रक्त छनता है’ लिखना अधूरा उत्तर है — ग्लूकोज़ आदि उपयोगी पदार्थों का चयनात्मक पुनःअवशोषण लिखना अनिवार्य है, वरना मूत्र में ग्लूकोज़ आने जैसी गलत धारणा बनती है। डायलिसिस में पुनःअवशोषण नहीं होता — यह अंतर भी याद रखें।

🎯 Bihar Board Exam Tips

  • हृदय व नेफ्रॉन के चित्र का अभ्यास सबसे पहले करें: दोनों चित्रों को नामांकन सहित बार-बार बनाकर देखिए — इस अध्याय का सबसे बड़ा दीर्घ उत्तरीय प्रश्न इन्हीं में से आता है। चित्र साफ़, बड़ा व पेंसिल से बनाएँ और नामांकन एक ही ओर क्रम से लिखें।
  • ग्लूकोज़-विघटन का प्रवाह-चित्र रट नहीं, समझकर बनाएँ: कोशिकाद्रव्य → पाइरुवेट → तीन रास्ते (माइटोकॉन्ड्रिया / यीस्ट / पेशी) — यह एक ही चित्र InText व प्रश्नावली दोनों के प्रश्नों का उत्तर बन जाता है।
  • तालिकाएँ तैयार रखें: स्वपोषी-परपोषी, वायवीय-अवायवीय, धमनी-शिरा-केशिका, जाइलम-फ्लोएम व वायुकोष्ठिका-नेफ्रॉन — ये पाँच तुलना-तालिकाएँ ही इस अध्याय के आधे लघु प्रश्न हैं। अंतर हमेशा बिंदुवार (1), (2), (3) लिखें।
  • एंजाइम-तालिका अलग से दोहराएँ: ग्रंथि → रस/एंजाइम → पदार्थ → उत्पाद — वस्तुनिष्ठ प्रश्नों में लार एमाइलेज, पेप्सिन, ट्रिप्सिन व लाइपेज के स्थान व कार्य बार-बार पूछे जाते हैं।
  • कारण वाले प्रश्नों में ‘क्योंकि’ से उत्तर शुरू करें: हीमोग्लोबिन की कमी, दोहरा परिसंचरण, विसरण की अपर्याप्तता — ऐसे प्रश्नों में कारण स्पष्ट लिखने पर ही पूरे अंक मिलते हैं।
  • पिछले वर्षों के BSEB प्रश्न-पत्रों से इस अध्याय के प्रश्न हल करके जाएँ — InText के 21 व प्रश्नावली के 13 प्रश्न अक्सर दोहराए जाते हैं।

📝 MCQ Quiz – 15 वस्तुनिष्ठ प्रश्न (स्वयं को जाँचें)

पहले बिना देखे हल करें, फिर “✅ उत्तर देखें” खोलकर मिलाएँ। अंत में Answer Key table दी गई है।

Q1. प्रकाश संश्लेषण के लिए निम्न में से कौन-सी चीज़ आवश्यक नहीं है? —

(A) कार्बन डाइऑक्साइड
(B) जल
(C) ऑक्सीजन
(D) सूर्य का प्रकाश

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (C) ऑक्सीजन — यह प्रकाश संश्लेषण की आवश्यकता नहीं, बल्कि उसका उपोत्पाद है; आवश्यकताएँ CO2, जल, क्लोरोफिल व सूर्य-प्रकाश हैं।

Q2. मनुष्य के मुँह में स्टार्च का पाचन शुरू करने वाला एंजाइम है —

(A) पेप्सिन
(B) ट्रिप्सिन
(C) लाइपेज
(D) लार एमाइलेज

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (D) लार एमाइलेज — यह लार में होता है और स्टार्च को शर्करा (माल्टोज़) में तोड़ता है।

Q3. पित्त रस किस अंग से स्रावित होता है? —

(A) अग्न्याशय
(B) यकृत
(C) आमाशय
(D) छोटी आंत

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (B) यकृत — पित्त रस यकृत में बनता है, पित्ताशय में संचित होता है और छोटी आंत में वसा का पायसीकरण करता है।

Q4. पचे हुए भोजन का अवशोषण मुख्यतः कहाँ होता है? —

(A) छोटी आंत की विलाई में
(B) बड़ी आंत में
(C) ग्रासनली में
(D) आमाशय में

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (A) छोटी आंत की विलाई में — विलाई सतह-क्षेत्र बढ़ाकर ग्लूकोज़, अमीनो अम्ल आदि को रक्त व लसीका में पहुँचाती हैं।

Q5. ग्लूकोज़ से पाइरुवेट बनने की क्रिया कोशिका के किस भाग में होती है? —

(A) माइटोकॉन्ड्रिया में
(B) केंद्रक में
(C) कोशिकाद्रव्य में
(D) क्लोरोप्लास्ट में

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (C) कोशिकाद्रव्य में — ग्लूकोज़ (6C) का पाइरुवेट (3C) में विघटन सभी जीवों में कोशिकाद्रव्य में ही होता है।

Q6. यीस्ट में अवायवीय श्वसन के उत्पाद हैं —

(A) लैक्टिक अम्ल + ऊर्जा
(B) एथेनॉल + CO2 + ऊर्जा
(C) CO2 + जल + ऊर्जा
(D) केवल जल + ऊर्जा

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (B) एथेनॉल + CO2 + ऊर्जा — यही किण्वन है; लैक्टिक अम्ल पेशियों में बनता है, यीस्ट में नहीं।

Q7. ज़ोरदार व्यायाम के बाद पेशियों में ऐंठन का कारण है —

(A) ग्लूकोज़ का जमा होना
(B) CO2 का जमा होना
(C) ऑक्सीजन की अधिकता
(D) लैक्टिक अम्ल का जमा होना

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (D) लैक्टिक अम्ल का जमा होना — ऑक्सीजन की कमी में पाइरुवेट लैक्टिक अम्ल में बदलता है, जिससे ऐंठन होती है।

Q8. मानव में गैसों का विनिमय मुख्यतः कहाँ होता है? —

(A) वायुकोष्ठिकाओं में
(B) श्वासनली में
(C) नासिका में
(D) ग्रसनी में

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (A) वायुकोष्ठिकाओं में — इनकी पतली भित्ति व केशिका-जाल के बीच O2 व CO2 का विसरण होता है।

Q9. रक्त में ऑक्सीजन का परिवहन मुख्यतः कौन करता है? —

(A) प्लाज्मा
(B) श्वेत रक्त कोशिकाएँ
(C) हीमोग्लोबिन (लाल रक्त कोशिकाओं में)
(D) प्लेटलेट्स

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (C) हीमोग्लोबिन — RBC का यह लाल वर्णक फेफड़ों में O2 बाँधता है और ऊतकों में छोड़ता है।

Q10. धमनियों की सही विशेषता कौन-सी है? —

(A) पतली भित्ति व कपाट होते हैं
(B) मोटी, लचीली भित्ति व कपाट नहीं होते
(C) भित्ति एक कोशिका मोटी होती है
(D) इनमें केवल अशुद्ध रक्त बहता है

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (B) मोटी, लचीली भित्ति व कपाट नहीं होते — धमनियाँ उच्च दाब सहती हैं; कपाट शिराओं में होते हैं और एक-कोशिका-मोटी भित्ति केशिकाओं की होती है।

Q11. पौधों में बने भोजन का स्थानांतरण किसके द्वारा होता है? —

(A) जाइलम वाहिकाओं द्वारा
(B) वाहिनिकाओं द्वारा
(C) मूल रोमों द्वारा
(D) फ्लोएम (चालनी नलिकाओं) द्वारा

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (D) फ्लोएम द्वारा — चालनी नलिकाएँ सहचर कोशिकाओं की सहायता से भोजन को दोनों दिशाओं में पहुँचाती हैं; जाइलम जल ले जाता है।

Q12. वृक्क की संरचनात्मक व कार्यात्मक छनन-इकाई है —

(A) नेफ्रॉन
(B) वायुकोष्ठिका
(C) विलाई
(D) न्यूरॉन

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (A) नेफ्रॉन — यह रक्त का निस्यंदन व पुनःअवशोषण करके मूत्र बनाता है। न्यूरॉन तंत्रिका तंत्र की इकाई है।

Q13. ग्लोमेरुलस किस संरचना के अंदर स्थित होता है? —

(A) यकृत में
(B) बोमन संपुट में
(C) मूत्रवाहिनी में
(D) मूत्राशय में

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (B) बोमन संपुट में — केशिकाओं का यह गुच्छा कप-जैसी बोमन संपुट के अंदर बैठा होता है, वहीं से निस्यंदन शुरू होता है।

Q14. पौधों में अतिरिक्त जल मुख्यतः किस प्रक्रिया द्वारा बाहर निकलता है? —

(A) प्रकाश संश्लेषण
(B) श्वसन
(C) वाष्पोत्सर्जन
(D) स्थानांतरण

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (C) वाष्पोत्सर्जन — रंध्रों से जल वाष्प रूप में निकलता है और यही क्रिया जल को ऊपर खींचने का खिंचाव भी बनाती है।

Q15. हीमोडायलिसिस की आवश्यकता किस अंग के कार्य बंद कर देने पर पड़ती है? —

(A) हृदय
(B) फेफड़े
(C) यकृत
(D) वृक्क

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (D) वृक्क — वृक्क विफल होने पर कृत्रिम वृक्क (डायलिसिस) से रक्त छाना जाता है, परंतु इसमें पुनःअवशोषण नहीं होता।

Answer Key – उत्तरमाला

प्रश्न 1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12 13 14 15
उत्तर C D B A C B D A C B D A B C D

❓ FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1. हृदय व नेफ्रॉन के चित्र में पूरे अंक कैसे मिलें?
उत्तर: तीन बातें याद रखें — (1) चित्र बड़ा, साफ़ व पेंसिल से बनाएँ; अंगुलियों से रगड़कर गंदा न करें। (2) नामांकन पूर्ण व सही क्रम में करें — हृदय में चारों कक्ष, महाधमनी, फुफ्फुस धमनी-शिरा, महाशिरा व कपाट; नेफ्रॉन में ग्लोमेरुलस, बोमन संपुट, नलिका व संग्राहक वाहिनी। (3) चित्र के नीचे कार्य के 2–3 चरण शब्दों में लिख दें — केवल चित्र पर निर्भर न रहें। इस पेज पर दोनों चित्रों के बनाने के चरण विस्तार से दिए गए हैं।

प्रश्न 2. प्रकाश संश्लेषण व श्वसन में क्या संबंध है?
उत्तर: दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। प्रकाश संश्लेषण में पौधे CO2 व जल से ग्लूकोज़ बनाकर ऊर्जा संचित करते हैं और O2 छोड़ते हैं। श्वसन में सभी जीव उसी ग्लूकोज़ को O2 से तोड़कर ऊर्जा प्राप्त करते हैं और CO2 छोड़ते हैं। सरल शब्दों में — प्रकाश संश्लेषण ‘भोजन बनाना व ऊर्जा जमा करना’ है और श्वसन ‘भोजन खर्च करके ऊर्जा निकालना’ है। ध्यान रहे, पौधों में श्वसन दिन-रात चलता है, जबकि प्रकाश संश्लेषण केवल प्रकाश में होता है।

प्रश्न 3. साँस लेना (breathing) और श्वसन (respiration) एक ही बात है क्या?
उत्तर: नहीं। साँस लेना एक यांत्रिक क्रिया है — वायु को फेफड़ों में लेना व बाहर छोड़ना। श्वसन एक जैव-रासायनिक क्रिया है जो कोशिकाओं के अंदर होती है — ग्लूकोज़ के विघटन से ऊर्जा बनना। साँस लेना श्वसन की सेवा करता है (O2 पहुँचाना व CO2 हटाना), परंतु दोनों शब्द पर्याय नहीं हैं। Board के उत्तरों में यही सही प्रयोग करें।

प्रश्न 4. क्या केवल InText और प्रश्नावली के प्रश्न तैयार करना काफ़ी है?
उत्तर: इस अध्याय के लिए लगभग हाँ — Board के अधिकांश प्रश्न इन्हीं 34 प्रश्नों (InText 21 + प्रश्नावली 13) से सीधे या हल्के बदलाव के साथ आते हैं। साथ में हृदय व नेफ्रॉन के चित्र, पाँच तुलना-तालिकाएँ और अध्याय के अंत का 15-MCQ Quiz कर लें, तो वस्तुनिष्ठ व चित्र-आधारित प्रश्नों की तैयारी भी पूरी हो जाएगी।

प्रश्न 5. NCERT की किताब (PDF) कहाँ से मिलेगी?
उत्तर: NCERT की आधिकारिक वेबसाइट ncert.nic.in से Class 10 Science की किताब का PDF बिल्कुल मुफ़्त डाउनलोड किया जा सकता है। वहीं से आप हर अध्याय की मूल किताब पढ़ सकते हैं।

🔗 Pichhla / Agla Adhyay – पिछले व अगले अध्याय पढ़ें

⬅️ पिछला अध्याय: अध्याय 5 — तत्वों का आवर्त वर्गीकरण (Periodic Classification of Elements): Class 10 Science Chapter 5

➡️ अगला अध्याय: अध्याय 7 — नियंत्रण एवं समन्वय (Control and Coordination): Class 10 Science Chapter 7

📚 सभी अध्यायों की सूची यहाँ देखें: NCERT Class 10 Bihar Board Science Book

🔚 Conclusion – निष्कर्ष

बधाई हो! आपने विज्ञान का सबसे बड़ा और सबसे उपयोगी अध्याय पूरा कर लिया। अब आप जानते हैं कि पौधे भोजन बनाते कैसे हैं, हमारा पाचन तंत्र भोजन को तोड़कर सोखता कैसे है, ग्लूकोज़ से ऊर्जा बनती कैसे है, हृदय रक्त को पूरे शरीर में घुमाता कैसे है, पौधों में जल चोटी तक पहुँचता कैसे है और वृक्क रक्त छानकर मूत्र बनाते कैसे हैं। यह अध्याय रटा हुआ नहीं, अपने शरीर को समझकर पढ़ा जाने वाला अध्याय है — एक बार समझ आ जाए तो कभी भूलता नहीं।

ऊपर दिए गए सभी 34 हल किए गए प्रश्नों (InText 21 + प्रश्नावली 13), क्रियाकलाप-आधारित उदाहरणों और 15 MCQ का अभ्यास कीजिए, और हृदय व नेफ्रॉन के चित्र नामांकन सहित दो-दो बार बनाकर अवश्य देखिए। किताब का मूल पाठ पढ़ने के लिए NCERT की आधिकारिक वेबसाइट ncert.nic.in से PDF ले सकते हैं। अब अगले अध्याय — नियंत्रण एवं समन्वय — की तैयारी शुरू कीजिए; वहाँ आप जानेंगे कि इन सब प्रक्रमों को नियंत्रित कौन करता है। शुभकामनाएँ, मेहनत जारी रखिए!