NCERT Class 10 Science Chapter 7 Control and Coordination in Hindi | नियंत्रण एवं समन्वय Notes, MCQ व प्रश्न-उत्तर

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परिचय – यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है?

Class 10 Science Chapter 7 Control and Coordination के NCERT Solutions आपको इस पेज पर सरल हिंदी में, किताब के क्रम से मिलेंगे। Class 10 Science Chapter 7 Control and Coordination यानी नियंत्रण एवं समन्वय — यह अध्याय बताता है कि हमारे शरीर के इतने सारे अंग आपस में तालमेल बिठाकर काम कैसे करते हैं, और पौधे, जिनके पास न मस्तिष्क है न तंत्रिकाएँ, फिर भी प्रकाश की ओर मुड़ कैसे जाते हैं।

ज़रा सोचिए — आप गरम तवे को छूते ही हाथ तुरंत पीछे खींच लेते हैं, सोचने का समय भी नहीं मिलता! दौड़ते समय आपका हृदय तेज़ धड़कने लगता है, साँस फूल जाती है, फिर भी आप गिरते नहीं — संतुलन बना रहता है। परीक्षा हॉल में प्रश्न-पत्र देखते ही कभी-कभी दिल ज़ोर से धड़कने लगता है। ये सब अपने-आप, सही समय पर और सही क्रम में कैसे हो जाता है? इसी “अपने-आप और सही तालमेल” का नाम है — नियंत्रण एवं समन्वय।

इस अध्याय में हम दो बड़ी व्यवस्थाएँ समझेंगे। पहली है तंत्रिका तंत्र — न्यूरॉन, तंत्रिका आवेग, सिनैप्स, प्रतिवर्ती क्रिया, मानव मस्तिष्क और मेरुरज्जु की कहानी। दूसरी है रासायनिक समन्वय — अंतःस्रावी ग्रंथियों से निकलने वाले हॉर्मोन, जैसे वृद्धि हॉर्मोन, थायरॉक्सिन, इंसुलिन और एड्रेनालिन। अंत में हम पौधों की दुनिया में झाँकेंगे, जहाँ ऑक्सिन जैसे पादप हॉर्मोन बिना किसी तंत्रिका के पूरे पौधे का काम चलाते हैं।

Bihar Board (BSEB) Class 10 की परीक्षा में इस अध्याय से हर साल प्रश्न आते हैं — न्यूरॉन व मस्तिष्क के नामांकित चित्र पर, प्रतिवर्ती चाप पर, हॉर्मोन और उनकी कमी से होने वाले रोगों पर वस्तुनिष्ठ (MCQ) प्रश्न, लघु उत्तरीय प्रश्न और दीर्घ उत्तरीय प्रश्न, सभी तरह के। अच्छी बात यह है कि यह अध्याय रटने का नहीं, समझने का है — एक बार न्यूरॉन की यात्रा और हॉर्मोन की table समझ आ गई, तो प्रश्न किसी भी रूप में आए, उत्तर बन जाएगा।

📌 खास बात: इस अध्याय में Board के सबसे पसंदीदा प्रश्न तीन हैं — न्यूरॉन की संरचना व कार्य, प्रतिवर्ती क्रिया व प्रतिवर्ती चाप, और “किस हॉर्मोन की कमी से कौन-सा रोग होता है”। इन तीनों को चित्र व table के साथ तैयार कर लीजिए, अध्याय के आधे से अधिक अंक यहीं से बनेंगे।

📋 अध्याय की जानकारी (Chapter Information)

Board Bihar Board (BSEB)
Textbook NCERT
Class 10
Subject Science (विज्ञान)
Chapter 7
Chapter Name Control and Coordination (नियंत्रण एवं समन्वय)
कुल हल किए गए प्रश्न 26 (InText 14 + प्रश्नावली 12)

📚 इस Chapter में क्या-क्या है? (Topics)

  1. 7.1 जंतुओं में तंत्रिका तंत्र
    • ग्राही (Receptors) व तंत्रिका कोशिका (न्यूरॉन) की संरचना व कार्य
    • तंत्रिका आवेग की यात्रा व सिनैप्स (अंतर्ग्रथन)
    • प्रतिवर्ती क्रिया व प्रतिवर्ती चाप (Reflex Arc)
    • मानव मस्तिष्क — अग्र, मध्य व पश्च मस्तिष्क; मेरुरज्जु व परिधीय तंत्रिका तंत्र
    • पेशियों की गति — ऐच्छिक, अनैच्छिक व प्रतिवर्ती क्रियाएँ
  2. 7.2 पौधों में समन्वय — तत्काल अनुक्रिया (छुई-मुई), वृद्धि-आधारित अनुवर्ती गतियाँ व पादप हॉर्मोन
  3. 7.3 जंतुओं में हॉर्मोन — अंतःस्रावी ग्रंथियाँ, प्रमुख हॉर्मोन, उनकी कमी-अधिकता के प्रभाव व पुनर्भरण (Feedback) क्रियाविधि
  4. पाठ्य-पुस्तक के प्रश्न (InText) – 14 प्रश्न, NCERT क्रियाकलाप-आधारित उदाहरण, प्रश्नावली के 12 प्रश्न
  5. Case Study, Quick Revision, Bihar Board Exam Tips, MCQ Quiz व FAQ

📊 Key Concepts – मुख्य परिभाषाएँ व नियम

पद / नियम अर्थ (एक लाइन में)
नियंत्रण एवं समन्वय शरीर के विभिन्न अंगों की क्रियाओं को सही क्रम, सही समय व सही मात्रा में करवाने की व्यवस्था, ताकि पूरा शरीर एक इकाई की तरह काम करे।
ग्राही (Receptor) ज्ञानेन्द्रियों में स्थित विशेष कोशिकाएँ जो वातावरण से सूचना (प्रकाश, ध्वनि, गंध, स्वाद, स्पर्श आदि) ग्रहण करती हैं।
न्यूरॉन (Neuron) तंत्रिका तंत्र की संरचनात्मक व क्रियात्मक इकाई — सूचना को विद्युत आवेग के रूप में ग्रहण करके आगे पहुँचाने वाली विशेष कोशिका।
तंत्रिका आवेग (Nerve Impulse) न्यूरॉन में चलने वाला विद्युत संकेत, जो द्रुमिका से कोशिकाकाय व तंत्रिकाक्ष होते हुए अंतिम सिरे तक जाता है।
सिनैप्स (Synapse) दो न्यूरॉनों के बीच का सूक्ष्म रिक्त स्थान, जहाँ आवेग रासायनिक संकेत में बदलकर अगली कोशिका तक जाता है।
प्रतिवर्ती क्रिया (Reflex Action) किसी उद्दीपन के प्रति बिना सोचे, तुरंत व अपने-आप होने वाली अनुक्रिया — जैसे गरम वस्तु छूते ही हाथ खींच लेना।
प्रतिवर्ती चाप (Reflex Arc) प्रतिवर्ती क्रिया में आवेग का पूरा मार्ग — ग्राही → संवेदी न्यूरॉन → मेरुरज्जु → प्रेरक न्यूरॉन → पेशी/ग्रंथि (प्रभावी अंग)।
हॉर्मोन (Hormone) अंतःस्रावी ग्रंथियों से स्रावित रासायनिक संदेशवाहक, जो रुधिर द्वारा लक्ष्य अंग तक पहुँचकर उसकी क्रिया नियंत्रित करता है।
अंतःस्रावी ग्रंथि नलिकाविहीन ग्रंथि, जो अपना स्राव (हॉर्मोन) सीधे रुधिर में छोड़ती है — जैसे पीयूष, थायरॉयड, अधिवृक्क।
अनुवर्तन (Tropism) पौधों की वह वृद्धि-गति जो उद्दीपन की दिशा पर निर्भर करती है — उद्दीपन की ओर हो तो धनात्मक, विपरीत हो तो ऋणात्मक।
पुनर्भरण क्रियाविधि (Feedback) वह व्यवस्था जिसमें किसी हॉर्मोन का स्तर स्वयं उसके स्राव को घटाता-बढ़ाता है — जैसे रुधिर शर्करा बढ़ने पर इंसुलिन का स्राव बढ़ना।

सबसे काम की बात: जंतुओं में समन्वय की दो व्यवस्थाएँ हैं — तंत्रिका तंत्र तेज़, परंतु अल्पकालिक असर देता है, जबकि हॉर्मोन धीमे, परंतु लंबे समय तक असर देते हैं। यह एक तुलना पूरे अध्याय की कुंजी है!

नियंत्रण एवं समन्वय की आवश्यकता – शरीर एक टीम है

हमारा शरीर कोई एक अंग नहीं है, बल्कि करोड़ों कोशिकाओं व दर्जनों अंगों की एक बड़ी टीम है। टीम तभी जीतती है जब सब खिलाड़ी तालमेल से खेलें। आँख देखती है, मस्तिष्क समझता है, पेशियाँ चलती हैं, हृदय रुधिर पंप करता है — यदि इनमें से कोई एक भी अपने समय से चूक जाए, तो काम बिगड़ जाएगा।

सोचिए, आप सड़क पार कर रहे हैं और सामने से तेज़ वाहन आ रहा है। आँख ने देखा, मस्तिष्क ने खतरा भाँपा, टाँगों की पेशियों ने तेज़ कदम उठाए, हृदय ने अधिक रुधिर भेजा — यह सब कुछ ही क्षणों में, बिना किसी भ्रम के हुआ। यही समन्वय है। और हर क्रिया उतनी ही हो, जितनी ज़रूरत है — न कम, न ज़्यादा — यही नियंत्रण है।

बहुकोशिकीय जीवों में यह काम दो विशेष व्यवस्थाओं से होता है। तंत्रिका तंत्र विद्युत आवेगों द्वारा बिजली की गति से संदेश भेजता है — यह त्वरित अनुक्रियाओं के लिए है। अंतःस्रावी तंत्र हॉर्मोन नामक रासायनिक संदेशवाहक रुधिर में छोड़ता है — ये धीरे पहुँचते हैं, परंतु वृद्धि, विकास व उपापचय जैसी लंबी क्रियाओं को नियंत्रित करते हैं। दोनों व्यवस्थाएँ मिलकर शरीर को वातावरण के हर बदलाव के अनुसार ढालती हैं।

📌 याद रखें: पौधों में तंत्रिका तंत्र नहीं होता। पौधों का पूरा नियंत्रण व समन्वय केवल रासायनिक संकेतों यानी पादप हॉर्मोनों से होता है — इसीलिए पौधों की अनुक्रियाएँ प्रायः धीमी व वृद्धि-आधारित होती हैं।

एक साँस में समझें — नियंत्रण का अर्थ है “कितना और कब” तथा समन्वय का अर्थ है “सब अंग मिलकर”; जंतुओं में यह काम तंत्रिका तंत्र व हॉर्मोन मिलकर करते हैं।

जंतुओं में तंत्रिका समन्वय – सूचना का राजमार्ग

जंतुओं में सूचना पहुँचाने का काम तंत्रिका ऊतक करता है, जो तंत्रिका कोशिकाओं यानी न्यूरॉनों के जाल से बना होता है। यह जाल पूरे शरीर में फैला होता है — जैसे किसी शहर में टेलीफ़ोन के तारों का जाल। सूचना की यात्रा हमेशा एक ही क्रम में होती है, इसे अच्छी तरह समझ लीजिए:

सूचना का मार्ग: वातावरण से सूचना → ग्राही (ज्ञानेन्द्रिय) → संवेदी न्यूरॉन → मस्तिष्क / मेरुरज्जु (केंद्रीय तंत्रिका तंत्र) → प्रेरक न्यूरॉन → प्रभावी अंग (पेशी या ग्रंथि) → अनुक्रिया

ग्राही (Receptors) – सूचना के द्वारपाल

हमारे सभी ज्ञानेन्द्रियों में विशेष कोशिकाएँ होती हैं, जिन्हें ग्राही कहते हैं। ये वातावरण में होने वाले बदलावों को पहचानती हैं। आँख में प्रकाश-ग्राही प्रकाश को, कान में ध्वनि-ग्राही ध्वनि को, नाक में घ्राण (गंध) ग्राही गंध को, जीभ पर स्वाद ग्राही स्वाद को और त्वचा में स्थित ग्राही स्पर्श, दाब, ताप व पीड़ा को पहचानते हैं।

ग्राही का काम केवल पहचानना नहीं है — वह सूचना को न्यूरॉन तक पहुँचाता भी है। यदि ग्राही ठीक से काम न करें, तो हम वातावरण की घटनाओं को जान ही नहीं पाएँगे। नाक बंद होने पर भोजन का स्वाद फीका लगना इसी का छोटा-सा उदाहरण है — स्वाद की पूरी पहचान जीभ व नाक के ग्राहियों के मिले-जुले संकेतों से बनती है।

न्यूरॉन की संरचना – शब्दों में नामांकित चित्र

न्यूरॉन तंत्रिका तंत्र की सबसे बड़ी व सबसे विशेष कोशिका है। Board में इसका नामांकित चित्र लगभग हर वर्ष पूछा जाता है, इसलिए नीचे दिया गया शब्द-वर्णन पढ़कर आप चित्र स्वयं बना सकेंगे — बाएँ से दाएँ, सूचना की दिशा में ही इसके भाग क्रम से आते हैं।

1. द्रुमिका (Dendrite): कोशिकाकाय से निकले हुए छोटे-छोटे, शाखाओं वाले तंतु, जो पेड़ की शाखाओं जैसे दिखते हैं। यही वह सिरा है जहाँ से सूचना सबसे पहले ग्रहण की जाती है। चित्र में ये बाईं ओर झाड़ी की तरह बनाए जाते हैं।

2. कोशिकाकाय (Cell Body / Cyton): न्यूरॉन का मुख्य गोल भाग, जिसमें केंद्रक व कोशिकाद्रव्य होता है। द्रुमिकाओं से आई सूचना पहले यहीं आती है। चित्र में यह बीच का बड़ा गोल भाग है, जिसके अंदर केंद्रक दिखाया जाता है।

3. तंत्रिकाक्ष / एक्सॉन (Axon): कोशिकाकाय से निकलने वाला एक लंबा, एकल तंतु, जो सूचना को विद्युत आवेग के रूप में दूर तक ले जाता है। कुछ न्यूरॉनों में यह एक मीटर से भी लंबा हो सकता है — जैसे मेरुरज्जु से पैर की अंगुली तक जाने वाला न्यूरॉन!

4. माइलिन आच्छद (Myelin Sheath): कई एक्सॉनों के चारों ओर लिपटी वसायुक्त परत, जो तार के ऊपर चढ़े प्लास्टिक के आवरण की तरह काम करती है। यह आवेग को तेज़ी से व बिना रिसाव के आगे बढ़ने में मदद करती है। इसके बीच-बीच में खाली स्थान होते हैं।

5. तंत्रिका अंतिम सिरा (Nerve Ending): एक्सॉन के अंत में बनी छोटी-छोटी शाखाओं के घुंडी-जैसे सिरे। यहीं से आवेग, रसायनों के रूप में, अगली कोशिका को सौंपा जाता है।

चित्र बनाने का क्रम याद रखें: द्रुमिका (झाड़ी) → कोशिकाकाय (केंद्रक सहित गोला) → तंत्रिकाक्ष / एक्सॉन (लंबा तार, माइलिन आच्छद सहित) → तंत्रिका अंतिम सिरा (घुंडियाँ)। तीर हमेशा द्रुमिका से अंतिम सिरे की ओर बनाएँ — यही आवेग की दिशा है।

तंत्रिका आवेग की यात्रा – चरण-दर-चरण

चरण 1: कोई सूचना — जैसे सुई का चुभना — सबसे पहले न्यूरॉन की द्रुमिका के सिरे द्वारा ग्रहण की जाती है।

चरण 2: द्रुमिका के सिरे पर एक रासायनिक क्रिया शुरू होती है, जिससे विद्युत आवेग उत्पन्न होता है।

चरण 3: यह आवेग द्रुमिका से कोशिकाकाय तक और फिर तंत्रिकाक्ष (एक्सॉन) में होता हुआ उसके अंतिम सिरे तक यात्रा करता है।

चरण 4: एक्सॉन के अंतिम सिरे पर पहुँचकर विद्युत आवेग कुछ रसायनों का विमोचन कराता है।

चरण 5: ये रसायन दो न्यूरॉनों के बीच के रिक्त स्थान को पार करके अगले न्यूरॉन की द्रुमिका में वैसा ही विद्युत आवेग प्रारंभ कर देते हैं। अंत में आवेग पेशी कोशिकाओं या ग्रंथियों तक पहुँचकर अनुक्रिया कराता है।

📌 ध्यान दें: आवेग न्यूरॉन के अंदर विद्युत रूप में चलता है, परंतु दो न्यूरॉनों के बीच वह रासायनिक रूप में जाता है। यही इस अध्याय की सबसे बारीक व सबसे अधिक पूछी जाने वाली बात है।

सिनैप्स (Synapse) – दो न्यूरॉनों के बीच की खाई

दो न्यूरॉन आपस में जुड़े नहीं होते — पहले न्यूरॉन के तंत्रिका अंतिम सिरे और अगले न्यूरॉन की द्रुमिका के बीच एक सूक्ष्म रिक्त स्थान होता है। इसी रिक्त स्थान को सिनैप्स (अंतर्ग्रथन) कहते हैं।

जब विद्युत आवेग पहले न्यूरॉन के अंतिम सिरे पर पहुँचता है, तो वहाँ से विशेष रसायन (तंत्रिका-संचारी रसायन) निकलते हैं। ये रसायन सिनैप्स को पार करके अगले न्यूरॉन की द्रुमिका तक जाते हैं और वहाँ नया विद्युत आवेग उत्पन्न कर देते हैं। इस व्यवस्था के दो लाभ हैं — आवेग केवल एक ही दिशा में आगे बढ़ता है, पीछे नहीं लौटता; और आवश्यकता पड़ने पर संकेत को रोका या बदला भी जा सकता है।

एक साँस में समझें — सूचना द्रुमिका से प्रवेश करती है, कोशिकाकाय से होकर एक्सॉन में विद्युत आवेग बनकर दौड़ती है और सिनैप्स पर रसायन बनकर अगली कोशिका को सौंप दी जाती है।

प्रतिवर्ती क्रिया व प्रतिवर्ती चाप – सोचने से पहले की सुरक्षा

कल्पना कीजिए, यदि गरम तवा छूने पर सूचना पहले मस्तिष्क जाती, वहाँ सोच-विचार होता, फिर निर्णय बनता और तब हाथ हटता — इतनी देर में हाथ बुरी तरह जल चुका होता! प्रकृति ने इसीलिए एक छोटा व तेज़ रास्ता बनाया है, जिसे प्रतिवर्ती क्रिया कहते हैं।

प्रतिवर्ती क्रिया वह अनुक्रिया है जो किसी उद्दीपन के प्रति बिना सोचे-समझे, तुरंत व अपने-आप हो जाती है। उदाहरण — गरम वस्तु छूते ही हाथ खींच लेना, आँख के सामने अचानक कुछ आने पर पलक झपकना, मुँह में खाना देखते ही लार आना, खाँसी व छींक आना, अंधेरे में आँख की पुतली का फैलना।

प्रतिवर्ती चाप (Reflex Arc) – चरण-दर-चरण मार्ग

प्रतिवर्ती क्रिया में आवेग जिस मार्ग से यात्रा करता है, वही प्रतिवर्ती चाप है। इसके पाँच चरण अच्छी तरह याद कर लीजिए:

चरण 1 — ग्राही: त्वचा में स्थित ग्राही उद्दीपन (जैसे गरमी या सुई की चुभन) को पहचानता है और संवेदी न्यूरॉन में आवेग उत्पन्न करता है।

चरण 2 — संवेदी न्यूरॉन (Sensory Neuron): यह न्यूरॉन आवेग को ग्राही से लेकर मेरुरज्जु की ओर ले जाता है।

चरण 3 — मेरुरज्जु (Spinal Cord): मेरुरज्जु के अंदर संवेदी न्यूरॉन का आवेग, एक मध्यवर्ती न्यूरॉन के माध्यम से, सीधे प्रेरक न्यूरॉन को सौंप दिया जाता है। यहीं निर्णय तुरंत बन जाता है — मस्तिष्क तक जाने की प्रतीक्षा नहीं होती।

चरण 4 — प्रेरक न्यूरॉन (Motor Neuron): यह न्यूरॉन उत्तर-रूपी आवेग को मेरुरज्जु से संबंधित पेशी तक ले जाता है।

चरण 5 — प्रभावी अंग / पेशी: पेशी सिकुड़ती है और हाथ तुरंत गरम वस्तु से हट जाता है। अनुक्रिया पूरी हुई!

प्रतिवर्ती चाप का सूत्र-क्रम: ग्राही → संवेदी न्यूरॉन → मेरुरज्जु → प्रेरक न्यूरॉन → पेशी (प्रभावी अंग)

ध्यान देने वाली बात — सूचना मस्तिष्क को भी भेजी जाती है, परंतु बाद में। इसीलिए हाथ हटने के बाद हमें पता चलता है कि “अरे, तवा गरम था!” और तब दर्द का अनुभव होता है। प्रतिवर्ती चाप अधिकांश जंतुओं में इसलिए विकसित हुआ है, क्योंकि उनके मस्तिष्क की सोचने की प्रक्रिया इतनी तेज़ नहीं होती कि हर आपात स्थिति में तुरंत निर्णय ले सके। मनुष्य में भी यह व्यवस्था शरीर को गंभीर क्षति से बचाती है।

📌 याद रखें: प्रतिवर्ती क्रियाओं के चाप मेरुरज्जु में बनते हैं, मस्तिष्क में नहीं — यही कारण है कि मेरुरज्जु में चोट लगने पर प्रतिवर्ती क्रियाएँ व मस्तिष्क तक जाने वाले संकेत, दोनों बाधित हो जाते हैं।

एक साँस में समझें — प्रतिवर्ती क्रिया शरीर का आपातकालीन छोटा रास्ता है: ग्राही से मेरुरज्जु और मेरुरज्जु से सीधे पेशी तक, बिना सोचने की देरी के।

मानव मस्तिष्क – शरीर का नियंत्रण कक्ष

मस्तिष्क हमारे शरीर का सबसे नाज़ुक व सबसे महत्वपूर्ण अंग है। यह खोपड़ी की मस्तिष्क-गुहा (क्रेनियम) नामक हड्डी के डिब्बे में सुरक्षित बंद रहता है। इसके चारों ओर सुरक्षात्मक झिल्लियाँ (मेनिंजेस) होती हैं और उनके बीच भरा द्रव झटकों से मस्तिष्क की रक्षा करता है — जैसे कोई नाज़ुक सामान गद्देदार डिब्बे में रखा हो। मस्तिष्क व मेरुरज्जु मिलकर केंद्रीय तंत्रिका तंत्र (Central Nervous System) बनाते हैं।

मस्तिष्क के तीन प्रमुख भाग हैं — अग्र मस्तिष्क, मध्य मस्तिष्क व पश्च मस्तिष्क। आइए एक-एक करके समझें।

1. अग्र मस्तिष्क (Forebrain) – सोचने वाला भाग

यह मस्तिष्क का सबसे बड़ा भाग है और मुख्य रूप से सोचने का काम यही करता है। अग्र मस्तिष्क में विभिन्न ग्राहियों से सूचना प्राप्त करने के अलग-अलग विशेष क्षेत्र होते हैं — सुनने के लिए, देखने के लिए, सूंघने के लिए, स्वाद व स्पर्श के लिए अलग-अलग केंद्र। यहीं भूख से जुड़ा केंद्र भी होता है, जिससे हमें पेट भरने या भूख लगने का अनुभव होता है।

अग्र मस्तिष्क का सबसे बड़ा हिस्सा है प्रमस्तिष्क (Cerebrum) — यह दो गोलार्द्धों से बना होता है और बुद्धि, स्मृति, तर्क, कल्पना, चेतना व ऐच्छिक क्रियाओं का केंद्र है। गणित हल करना, कविता याद करना, साइकिल चलाने का निर्णय लेना — ये सब प्रमस्तिष्क के काम हैं। अगरबत्ती की गंध का पता भी इसी भाग से लगता है, क्योंकि नाक के गंध-ग्राहियों से आई सूचना अग्र मस्तिष्क के घ्राण क्षेत्र में पहुँचकर पहचानी जाती है।

2. मध्य मस्तिष्क (Midbrain) – संदेशों का मध्य केंद्र

मध्य मस्तिष्क, अग्र व पश्च मस्तिष्क के बीच स्थित छोटा-सा भाग है। यह मुख्य रूप से मस्तिष्क के अन्य भागों को परस्पर जोड़ने का काम करता है और आँख व कान से जुड़ी कुछ अनैच्छिक अनुक्रियाओं — जैसे तेज़ प्रकाश में पुतली के आकार में परिवर्तन व सिर को ध्वनि की ओर घुमाना — को नियंत्रित करता है। सरल भाषा में कहें तो यह सूचना के आदान-प्रदान का एक महत्वपूर्ण मध्य केंद्र है।

3. पश्च मस्तिष्क (Hindbrain) – संतुलन व जीवन-क्रियाओं का केंद्र

पश्च मस्तिष्क के तीन भाग हैं — पॉन्ज़, अनुमस्तिष्क (Cerebellum) व मेडुला (Medulla Oblongata)।

अनुमस्तिष्क (Cerebellum): यह प्रमस्तिष्क के नीचे, पीछे की ओर स्थित होता है। इसका काम है — ऐच्छिक क्रियाओं की परिशुद्धता, शरीर की स्थिति (भंगिमा) व संतुलन का अनुरक्षण। सीधी रेखा में चलना, साइकिल का संतुलन बनाए रखना, पेंसिल उठाना, नाचते समय ताल पर कदम रखना — ये सब अनुमस्तिष्क की निगरानी में होते हैं। इसमें गड़बड़ी हो जाए तो व्यक्ति लड़खड़ाने लगता है।

मेडुला (Medulla): यह मस्तिष्क का सबसे पिछला भाग है, जो मेरुरज्जु से जुड़ा होता है। यह शरीर की सबसे आवश्यक अनैच्छिक क्रियाओं को नियंत्रित करता है — रुधिर दाब, लार का स्राव, उल्टी (वमन), हृदय-स्पंदन, श्वसन, निगलना, खाँसी व छींक। सोचिए, यदि साँस लेना हमारी इच्छा पर निर्भर होता, तो सोते समय हम साँस लेना ही भूल जाते! मेडुला इसीलिए जीवन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

पॉन्ज़ (Pons): यह मेडुला के ऊपर स्थित होकर मस्तिष्क के विभिन्न भागों के बीच संकेतों को पहुँचाने में सहायता करता है और श्वसन से जुड़े कुछ नियंत्रण में भी भाग लेता है।

मस्तिष्क का भाग मुख्य कार्य रोज़ का उदाहरण
प्रमस्तिष्क (अग्र मस्तिष्क) सोचना, बुद्धि, स्मृति, तर्क, ऐच्छिक क्रियाएँ, सभी ज्ञानेन्द्रियों की सूचनाओं की व्याख्या, भूख का केंद्र पढ़ना, गणित हल करना, निर्णय लेना, गंध पहचानना
मध्य मस्तिष्क अन्य भागों को जोड़ना; देखने-सुनने से जुड़ी कुछ अनैच्छिक अनुक्रियाएँ तेज़ प्रकाश में पुतली सिकुड़ना
अनुमस्तिष्क (पश्च मस्तिष्क) ऐच्छिक क्रियाओं की परिशुद्धता, शरीर की स्थिति व संतुलन साइकिल चलाना, सीधा चलना, पेंसिल उठाना
मेडुला (पश्च मस्तिष्क) अनैच्छिक क्रियाएँ — रुधिर दाब, हृदय-स्पंदन, श्वसन, लार स्राव, उल्टी, निगलना, खाँसी-छींक बिना सोचे साँस चलना, दिल धड़कना

मेरुरज्जु व परिधीय तंत्रिका तंत्र

मेरुरज्जु (Spinal Cord) मस्तिष्क के मेडुला से शुरू होकर कशेरुक दंड (रीढ़ की हड्डी) के अंदर सुरक्षित चलने वाली लंबी, रज्जु-जैसी संरचना है। इसके दो बड़े काम हैं — पहला, प्रतिवर्ती क्रियाओं का केंद्र होना; दूसरा, शरीर के विभिन्न भागों व मस्तिष्क के बीच संकेतों का आदान-प्रदान मार्ग होना। इसीलिए मेरुरज्जु में आघात लगने पर प्रतिवर्ती क्रियाएँ भी बाधित होती हैं और मस्तिष्क तक जाने-आने वाले संकेत भी।

मस्तिष्क से निकलने वाली कपालीय तंत्रिकाएँ व मेरुरज्जु से निकलने वाली मेरु तंत्रिकाएँ मिलकर परिधीय तंत्रिका तंत्र (Peripheral Nervous System) बनाती हैं। यही तंत्रिकाएँ केंद्रीय तंत्रिका तंत्र को शरीर के हर कोने — ज्ञानेन्द्रियों, पेशियों व ग्रंथियों — से जोड़ती हैं। सरल शब्दों में, केंद्रीय तंत्रिका तंत्र निर्णय लेने वाला मुख्यालय है और परिधीय तंत्रिका तंत्र उसके संदेश ले जाने वाले मार्ग हैं।

पेशियाँ कैसे गति करती हैं? – ऐच्छिक, अनैच्छिक व प्रतिवर्ती

निर्णय बन जाने के बाद काम पेशियों का होता है। पेशी कोशिकाओं में विशेष प्रोटीन होते हैं, जो तंत्रिका आवेग पहुँचने पर अपनी आकृति व व्यवस्था बदल लेते हैं — इसी से पेशी सिकुड़ती है और गति उत्पन्न होती है। गतियों के आधार पर क्रियाएँ तीन प्रकार की होती हैं:

ऐच्छिक क्रियाएँ (Voluntary Actions): जो हमारी इच्छा व सोच से होती हैं — लिखना, बोलना, टहलना, पेंसिल उठाना। इनका नियंत्रण मुख्यतः प्रमस्तिष्क से होता है और अनुमस्तिष्क इनकी परिशुद्धता व संतुलन संभालता है।

अनैच्छिक क्रियाएँ (Involuntary Actions): जो बिना इच्छा के, लगातार अपने-आप होती रहती हैं — हृदय का धड़कना, साँस चलना, आँतों में भोजन का आगे बढ़ना, रुधिर दाब का नियंत्रण। इनका नियंत्रण मुख्यतः मेडुला व मध्य मस्तिष्क से होता है। हम चाहकर भी इन्हें रोक नहीं सकते — और यह हमारे लिए वरदान है!

प्रतिवर्ती क्रियाएँ (Reflex Actions): जो किसी उद्दीपन के उत्तर में तुरंत व बिना सोचे होती हैं — गरम वस्तु से हाथ हटाना, पलक झपकना। इनका केंद्र प्रायः मेरुरज्जु होता है। अनैच्छिक व प्रतिवर्ती में अंतर यह है कि अनैच्छिक क्रियाएँ निरंतर चलने वाली आंतरिक क्रियाएँ हैं, जबकि प्रतिवर्ती क्रियाएँ किसी विशेष उद्दीपन के जवाब में होने वाली त्वरित सुरक्षात्मक अनुक्रियाएँ हैं।

एक साँस में समझें — अग्र मस्तिष्क सोचता है, अनुमस्तिष्क संतुलन व शुद्धता संभालता है, मेडुला जीवन की अनैच्छिक क्रियाएँ चलाता है और मेरुरज्जु प्रतिवर्ती क्रियाओं का केंद्र व संकेतों का मार्ग है।

रासायनिक समन्वय – हॉर्मोन, धीमी डाक-व्यवस्था

तंत्रिका तंत्र की एक सीमा है — विद्युत आवेग शरीर की प्रत्येक कोशिका तक नहीं पहुँच सकता, क्योंकि तंत्रिकाएँ केवल निश्चित स्थानों से जुड़ी होती हैं। परंतु वृद्धि, उपापचय जैसी क्रियाओं में तो शरीर की हर कोशिका को संदेश चाहिए! इस काम के लिए शरीर दूसरी व्यवस्था उपयोग करता है — हॉर्मोन।

हॉर्मोन वे रासायनिक पदार्थ हैं जो अंतःस्रावी ग्रंथियों से बनकर सीधे रुधिर में छोड़े जाते हैं। रुधिर इन्हें पूरे शरीर में घुमाता है और जिस अंग की कोशिकाओं पर इनके लिए विशेष ग्राही होते हैं, वही लक्ष्य अंग इनसे प्रभावित होता है। हॉर्मोन की मात्रा बहुत कम होती है, परंतु प्रभाव बहुत बड़ा — इसीलिए इनका नियंत्रण भी बहुत सूक्ष्म होता है।

तंत्रिका व हॉर्मोन व्यवस्था में मुख्य अंतर याद रखिए — तंत्रिका संदेश तुरंत पहुँचता है, परंतु प्रभाव थोड़ी देर रहता है; हॉर्मोन संदेश धीरे-धीरे पहुँचता है, परंतु प्रभाव लंबे समय तक रहता है और कई बार पूरे शरीर पर पड़ता है।

अंतःस्रावी ग्रंथियाँ व हॉर्मोन – सबसे महत्वपूर्ण Table

ग्रंथि हॉर्मोन मुख्य कार्य कमी / अधिकता का प्रभाव
पीयूष ग्रंथि (Pituitary) — मस्तिष्क के नीचे स्थित, “मास्टर ग्रंथि” वृद्धि हॉर्मोन (Growth Hormone – GH) शरीर की, विशेषकर हड्डियों व पेशियों की वृद्धि व विकास को नियंत्रित करता है; अन्य कई अंतःस्रावी ग्रंथियों के स्राव को भी नियंत्रित करता है। बचपन में कमी → बौनापन (Dwarfism); बचपन में अधिकता → दीर्घकायता / अतिकायता (Gigantism) — शरीर असामान्य रूप से लंबा हो जाता है।
थायरॉयड ग्रंथि (Thyroid) — गर्दन में, श्वासनली के दोनों ओर थायरॉक्सिन (Thyroxine) कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन व वसा के उपापचय (metabolism) की दर को नियंत्रित करता है। इसके बनने के लिए आयोडीन आवश्यक है। आयोडीन की कमी से थायरॉक्सिन कम बनता है → गलगंड / घेंघा (Goitre) — गर्दन में थायरॉयड ग्रंथि फूल जाती है; उपापचय भी धीमा पड़ जाता है।
अग्न्याशय (Pancreas) — पेट के नीचे; मिश्रित ग्रंथि इंसुलिन (Insulin) रुधिर में शर्करा (ग्लूकोज़) के स्तर को नियंत्रित करता है — अतिरिक्त शर्करा को कोशिकाओं में लेने व ग्लाइकोजन के रूप में जमा करने में मदद करता है। इंसुलिन की कमी → रुधिर शर्करा बढ़ जाती है → मधुमेह (Diabetes); रोगी को इंसुलिन के इंजेक्शन देने पड़ सकते हैं।
अधिवृक्क ग्रंथि (Adrenal) — दोनों वृक्कों (गुर्दों) के ऊपर टोपी-जैसी एड्रेनालिन (Adrenaline) आपातकालीन हॉर्मोन — भय, क्रोध, तनाव या खतरे की स्थिति में शरीर को “लड़ने या भागने” के लिए तैयार करता है। यह आपात स्थिति में स्रावित होता है; इसके प्रभाव से हृदय तेज़ धड़कता है, श्वसन दर बढ़ती है व पेशियों को अधिक ऑक्सीजन-रुधिर मिलता है।
वृषण (Testis) — केवल पुरुषों में टेस्टोस्टेरोन (Testosterone) पुरुषों में यौवनारंभ (puberty) पर दिखने वाले परिवर्तन — आवाज़ भारी होना, दाढ़ी-मूँछ आना आदि — को नियंत्रित करता है। इसकी कमी से पुरुषों के द्वितीयक लैंगिक लक्षणों का विकास प्रभावित होता है।
अंडाशय (Ovary) — केवल स्त्रियों में एस्ट्रोजन (Oestrogen / Estrogen) स्त्रियों में यौवनारंभ के परिवर्तन व महिला प्रजनन-चक्र से जुड़े कार्यों को नियंत्रित करता है। इसकी कमी से स्त्रियों के द्वितीयक लैंगिक लक्षणों व प्रजनन कार्यों का विकास प्रभावित होता है।

📌 याद रखें: अग्न्याशय एक मिश्रित ग्रंथि है — यह पाचक रस (बाह्यस्रावी कार्य) भी बनाता है और इंसुलिन हॉर्मोन (अंतःस्रावी कार्य) भी। इसी प्रकार वृषण व अंडाशय भी युग्मक बनाने के साथ-साथ हॉर्मोन स्रावित करते हैं।

एड्रेनालिन – आपातकालीन हॉर्मोन की कहानी

कल्पना कीजिए — आप शांत बैठे हैं और अचानक पीछे से कोई ज़ोर से चिल्ला दे! दिल धक्-से तेज़ धड़कने लगता है, साँस तेज़ हो जाती है, मुँह सूख जाता है। यह कमाल एड्रेनालिन का है, जो अधिवृक्क ग्रंथियों से रुधिर में छोड़ दिया जाता है।

एड्रेनालिन के प्रभाव क्रम से समझिए — (1) हृदय तेज़ी से धड़कता है, जिससे कंकाल पेशियों को अधिक ऑक्सीजनयुक्त रुधिर मिलता है। (2) पाचन तंत्र व त्वचा की ओर जाने वाला रुधिर कम कर दिया जाता है, ताकि रुधिर लड़ने-भागने वाली पेशियों को अधिक मिले। (3) डायाफ़्राम व पसलियों की पेशियों के संकुचन से श्वसन दर बढ़ जाती है। ये सभी अनुक्रियाएँ मिलकर शरीर को आपात स्थिति से निपटने के लिए तैयार कर देती हैं — इसीलिए एड्रेनालिन को आपातकालीन हॉर्मोन कहते हैं।

पुनर्भरण (Feedback) क्रियाविधि – रुधिर शर्करा व इंसुलिन का उदाहरण

हॉर्मोन “उचित मात्रा में, उचित समय पर” ही बनने चाहिए — न कम, न ज़्यादा। यह नियंत्रण पुनर्भरण क्रियाविधि से होता है। थर्मोस्टेट वाला उदाहरण समझिए — कमरे का तापमान बढ़ते ही AC स्वयं धीमा हो जाता है; तापमान घटते ही फिर चल पड़ता है। शरीर में भी बिल्कुल ऐसा ही होता है।

उदाहरण — रुधिर शर्करा: भोजन के बाद रुधिर में शर्करा का स्तर बढ़ता है। अग्न्याशय इसे पहचानकर इंसुलिन का स्राव बढ़ा देता है। इंसुलिन कोशिकाओं को अतिरिक्त शर्करा लेने के लिए प्रेरित करता है, जिससे शर्करा का स्तर घटकर सामान्य हो जाता है। स्तर सामान्य होते ही इंसुलिन का स्राव स्वयं कम हो जाता है। यही ऋणात्मक पुनर्भरण है।

Feedback का क्रम: रुधिर शर्करा ↑ → इंसुलिन स्राव ↑ → कोशिकाएँ शर्करा ग्रहण करती हैं → रुधिर शर्करा सामान्य → इंसुलिन स्राव ↓

यही व्यवस्था थायरॉक्सिन समेत अनेक हॉर्मोनों पर लागू होती है — हॉर्मोन का बढ़ा हुआ स्तर स्वयं उसके आगे बनने को रोकता है, जिससे शरीर का आंतरिक संतुलन (समस्थिति) बना रहता है। यदि यह व्यवस्था बिगड़ जाए — जैसे इंसुलिन कम बनने लगे — तो मधुमेह जैसा रोग हो जाता है, जिसमें रुधिर शर्करा लगातार ऊँची बनी रहती है और रोगी को बाहर से इंसुलिन का इंजेक्शन लेना पड़ता है।

एक साँस में समझें — हॉर्मोन रुधिर द्वारा लक्ष्य अंग तक जाने वाले रासायनिक संदेश हैं; पीयूष वृद्धि, थायरॉयड उपापचय, इंसुलिन शर्करा व एड्रेनालिन आपात स्थिति संभालता है, और Feedback व्यवस्था सबकी मात्रा संतुलित रखती है।

पौधों में समन्वय – बिना तंत्रिका, केवल हॉर्मोन

पौधों के पास न मस्तिष्क है, न तंत्रिकाएँ, न पेशियाँ। फिर भी पौधा प्रकाश की ओर झुकता है, जड़ जल की ओर बढ़ती है और छुई-मुई छूते ही पत्तियाँ सिकोड़ लेती है। यह सब कैसे होता है? उत्तर है — पौधों की कोशिकाएँ सूचना का आदान-प्रदान करने के लिए विद्युत-रासायनिक साधनों का प्रयोग करती हैं और उनकी वृद्धि व गतियाँ पादप हॉर्मोनों द्वारा नियंत्रित होती हैं।

पौधों में दो प्रकार की गतियाँ स्पष्ट दिखती हैं। पहली है तत्काल अनुक्रिया, जिसमें वृद्धि का कोई संबंध नहीं होता — जैसे छुई-मुई की पत्तियों का सिकुड़ना। दूसरी है वृद्धि-आधारित गति, जो धीरे-धीरे होती है — जैसे प्ररोह का प्रकाश की ओर मुड़ना। दोनों को अलग-अलग समझिए।

छुई-मुई की तत्काल गति – वृद्धि से रहित अनुक्रिया

छुई-मुई (संवेदनशील पादप) की पत्तियों को छूते ही वे तुरंत सिकुड़कर झुक जाती हैं। यह गति न तो किसी दिशा विशेष में होती है, न इसमें वृद्धि होती है। वास्तव में पत्तियों के आधार पर स्थित फूली हुई संरचनाओं की कोशिकाओं में छूने पर जल की मात्रा अचानक बदल जाती है — जल निकलने से वे कोशिकाएँ सिकुड़ जाती हैं और पत्ती झुक जाती है। कुछ देर बाद जल पुनः भरता है और पत्तियाँ फिर खुल जाती हैं। ध्यान दीजिए — पौधों में यह सूचना एक कोशिका से दूसरी कोशिका तक विद्युत-रासायनिक साधनों से ही पहुँचती है, किसी तंत्रिका से नहीं। इसी प्रकार की दिशा-रहित गतियों को अनुकुंचन (nastic) गति कहा जा सकता है।

पादप हॉर्मोन – पौधों के रासायनिक संदेशवाहक

पादप हॉर्मोन मुख्य कार्य याद रखने का उदाहरण
ऑक्सिन (Auxin) कोशिकाओं की लंबाई बढ़ाकर वृद्धि को बढ़ावा देता है; प्रकाशानुवर्तन व प्रतान के लिपटने में मुख्य भूमिका; प्ररोह के शीर्ष पर बनता है। प्ररोह प्रकाश की ओर मुड़ना, मटर का प्रतान सहारे पर चढ़ना
जिबरेलिन (Gibberellin) तने की लंबाई / वृद्धि बढ़ाता है, बीजों के अंकुरण में सहायता करता है। तना लंबा होना, बीज अंकुरित होना
साइटोकाइनिन (Cytokinin) कोशिका विभाजन को बढ़ावा देता है; विशेषकर फलों व बीजों में अधिक मात्रा में पाया जाता है, जहाँ कोशिका विभाजन तीव्र होता है। फल व बीज बनना, कलिकाओं का बढ़ना
ऐब्सिसिक अम्ल (Abscisic Acid – ABA) वृद्धि का संदमन करता है — वृद्धि को रोकता है; पत्तियों के मुरझाने (झड़ने) से जुड़ा है, तनाव की स्थिति में रंध्र बंद करने में भी सहायक। पत्तियों का मुरझाना / पतझड़, सुखे में वृद्धि रुकना
एथिलीन (Ethylene / Ethene) फलों के पकने को बढ़ावा देने वाला गैसीय पादप हॉर्मोन। कच्चे फलों का पकना

इनमें से पहले चार हॉर्मोन NCERT के मुख्य पाठ में विशेष रूप से पढ़ाए जाते हैं — ऑक्सिन, जिबरेलिन व साइटोकाइनिन वृद्धि को बढ़ावा देते हैं, जबकि ऐब्सिसिक अम्ल वृद्धि को रोकता है। एथिलीन फलों के पकने के लिए प्रसिद्ध है। परीक्षा में “कौन-सा हॉर्मोन कोशिका विभाजन बढ़ाता है?” या “कौन-सा हॉर्मोन वृद्धि रोकता है?” जैसे प्रश्न सीधे इसी table से बनते हैं।

पौधों की अनुवर्ती गतियाँ (Tropic Movements)

जब पौधे का कोई भाग किसी उद्दीपन की दिशा के अनुसार वृद्धि करके मुड़ता है, तो उसे अनुवर्ती गति कहते हैं। उद्दीपन की ओर मुड़ना धनात्मक और उद्दीपन से दूर मुड़ना ऋणात्मक कहलाता है। पाँच प्रमुख अनुवर्तन इस प्रकार हैं:

1. प्रकाशानुवर्तन (Phototropism) — प्रकाश के प्रति: प्ररोह (तना) प्रकाश की ओर मुड़ता है, अर्थात धनात्मक प्रकाशानुवर्ती है; जड़ प्रकाश से दूर मुड़ती है, अर्थात ऋणात्मक प्रकाशानुवर्ती है। इसका कारण ऑक्सिन है — प्रकाश की विपरीत (छाया वाली) ओर ऑक्सिन अधिक जमा होता है और वहाँ कोशिकाएँ अधिक लंबी होती हैं, जिससे प्ररोह प्रकाश की ओर झुक जाता है।

2. गुरुत्वानुवर्तन (Geotropism) — गुरुत्व के प्रति: जड़ हमेशा पृथ्वी के गुरुत्व की ओर, अर्थात नीचे की ओर बढ़ती है — धनात्मक गुरुत्वानुवर्ती; प्ररोह गुरुत्व के विपरीत ऊपर की ओर बढ़ता है — ऋणात्मक गुरुत्वानुवर्ती। बीज चाहे किसी भी दिशा में बोया जाए, जड़ नीचे व प्ररोह ऊपर ही निकलता है — यही इसका प्रमाण है।

3. रसायनानुवर्तन (Chemotropism) — रसायनों के प्रति: रसायन की ओर या उससे दूर वृद्धि। सबसे अच्छा उदाहरण — पराग नलिका का बीजांड की ओर बढ़ना, जो बीजांड से निकलने वाले आकर्षक रसायनों के कारण होता है।

4. जलानुवर्तन (Hydrotropism) — जल के प्रति: जड़ें जल (नमी) की ओर मुड़कर बढ़ती हैं। खेत में पानी की पाइप की ओर जड़ों का जमा होना इसका रोज़ का उदाहरण है। जड़ों के लिए जलानुवर्तन कई बार गुरुत्वानुवर्तन से भी प्रबल सिद्ध होता है।

5. स्पर्शानुवर्तन (Thigmotropism) — स्पर्श के प्रति: स्पर्श या सहारे के संपर्क में आकर मुड़ना। मटर के प्रतान का उदाहरण प्रसिद्ध है — प्रतान स्पर्श के प्रति अत्यंत संवेदी होते हैं। जब प्रतान किसी सहारे को छूता है, तो छूने वाले भाग की तुलना में दूर वाला भाग तेज़ी से बढ़ता है (ऑक्सिन की सहायता से), जिससे प्रतान सहारे के चारों ओर कुंडलित होकर लिपट जाता है और पौधा ऊपर चढ़ जाता है।

📌 अंतर समझिए: छुई-मुई की गति तत्काल होती है, दिशा पर निर्भर नहीं करती और वृद्धि से जुड़ी नहीं है; जबकि अनुवर्ती गतियाँ धीमी, वृद्धि-आधारित होती हैं और उद्दीपन की दिशा पर पूरी तरह निर्भर करती हैं। यह अंतर Exercise का सीधा प्रश्न है!

एक साँस में समझें — पौधों में समन्वय केवल हॉर्मोनों से होता है: ऑक्सिन, जिबरेलिन व साइटोकाइनिन वृद्धि बढ़ाते हैं, ऐब्सिसिक अम्ल वृद्धि रोकता है, और इन्हीं के कारण पौधा प्रकाश, गुरुत्व, जल, रसायन व स्पर्श की ओर सही दिशा में मुड़ता है।

📘 पाठ्य-पुस्तक के प्रश्न (InText Questions)

ये वे प्रश्न हैं जो NCERT किताब के अनुच्छेदों के बीच-बीच में दिए गए हैं। इस अध्याय में कुल 14 InText प्रश्न हैं — अनुच्छेद 7.1 से 5, अनुच्छेद 7.2 से 5 और अनुच्छेद 7.3 से 4। Board में ये प्रश्न वैसे-के-वैसे पूछ लिए जाते हैं, इसलिए इन्हें सबसे पहले तैयार कीजिए।

(क) अनुच्छेद 7.1 पर आधारित प्रश्न (5 प्रश्न)

प्रश्न 1. प्रतिवर्ती क्रिया तथा टहलने के बीच क्या अंतर है?

हल:

बात प्रतिवर्ती क्रिया टहलना
प्रकृति अनैच्छिक — बिना सोचे, अपने-आप होती है ऐच्छिक — सोचकर, इच्छा से होती है
नियंत्रण मुख्यतः मेरुरज्जु द्वारा मुख्यतः मस्तिष्क (प्रमस्तिष्क) द्वारा
गति अत्यंत तीव्र, तुरंत अनुक्रिया सामान्य गति से, नियंत्रित अनुक्रिया
उद्देश्य शरीर को अचानक क्षति से बचाना एक स्थान से दूसरे स्थान जाना
उदाहरण गरम वस्तु छूते ही हाथ खींचना पार्क में सैर करना

उत्तर: प्रतिवर्ती क्रिया बिना सोचे होने वाली त्वरित सुरक्षात्मक अनुक्रिया है, जबकि टहलना सोचकर की जाने वाली ऐच्छिक क्रिया है।

प्रश्न 2. दो तंत्रिका कोशिकाओं (न्यूरॉन) के मध्य अंतर्ग्रथन (सिनैप्स) में क्या होता है?

हल: जब विद्युत आवेग पहले न्यूरॉन के तंत्रिकाक्ष (एक्सॉन) के अंतिम सिरे पर पहुँचता है, तो वहाँ से विशेष रसायन विमोचित होते हैं। ये रसायन दोनों न्यूरॉनों के बीच के रिक्त स्थान — सिनैप्स — को पार करके अगले न्यूरॉन की द्रुमिका तक पहुँचते हैं और वहाँ इसी प्रकार का नया विद्युत आवेग प्रारंभ कर देते हैं। इस प्रकार संकेत एक न्यूरॉन से दूसरे न्यूरॉन तक, केवल एक ही दिशा में, आगे बढ़ता है।

उत्तर: सिनैप्स पर आवेग विद्युत रूप से रासायनिक रूप में बदलता है, खाई पार करता है और अगले न्यूरॉन में फिर विद्युत आवेग बन जाता है।

प्रश्न 3. मस्तिष्क का कौन-सा भाग शरीर की स्थिति तथा संतुलन का अनुरक्षण करता है?

हल:

उत्तर: अनुमस्तिष्क (Cerebellum) — पश्च मस्तिष्क का यह भाग ऐच्छिक क्रियाओं की परिशुद्धता के साथ-साथ शरीर की स्थिति (भंगिमा) व संतुलन का अनुरक्षण करता है।

प्रश्न 4. हम एक अगरबत्ती की गंध का पता कैसे लगाते हैं?

हल: अगरबत्ती की गंध के कण वायु के साथ हमारी नाक में पहुँचते हैं। नाक में स्थित घ्राण (गंध) ग्राही इन्हें पहचानकर तंत्रिका आवेग उत्पन्न करते हैं। यह आवेग तंत्रिकाओं द्वारा अग्र मस्तिष्क के घ्राण क्षेत्र तक पहुँचता है, जहाँ सूचना की व्याख्या होती है और हमें “यह अगरबत्ती की गंध है” — ऐसा पता चलता है। ध्यान रहे, गंध पहचानने का कार्य अग्र मस्तिष्क का है।

उत्तर: नाक के गंध-ग्राही → तंत्रिका आवेग → अग्र मस्तिष्क का घ्राण क्षेत्र → गंध की पहचान।

प्रश्न 5. प्रतिवर्ती क्रिया में मस्तिष्क की क्या भूमिका है?

हल: प्रतिवर्ती क्रिया में मस्तिष्क की प्रत्यक्ष भूमिका नहीं होती। आवेग ग्राही से संवेदी न्यूरॉन द्वारा मेरुरज्जु तक जाता है, वहीं से प्रेरक न्यूरॉन द्वारा सीधे पेशी को उत्तर भेज दिया जाता है — सोचने की प्रक्रिया इसमें शामिल नहीं होती, इसीलिए अनुक्रिया इतनी तेज़ होती है। बाद में सूचना मस्तिष्क को भी पहुँचती है, जहाँ उसका भंडारण होता है और हमें घटना का अनुभव व स्मृति बनती है — जैसे हाथ हटने के बाद दर्द महसूस होना।

उत्तर: प्रतिवर्ती क्रिया का नियंत्रण मेरुरज्जु करता है; मस्तिष्क केवल सूचना प्राप्त करके उसे स्मृति के रूप में संचित करता है।

(ख) अनुच्छेद 7.2 पर आधारित प्रश्न (5 प्रश्न)

प्रश्न 1. पादप हॉर्मोन क्या हैं?

हल: पौधों द्वारा स्रावित वे रासायनिक पदार्थ, जो पौधे की वृद्धि, विकास व वातावरण के प्रति अनुक्रियाओं का नियंत्रण व समन्वय करते हैं, पादप हॉर्मोन कहलाते हैं। ये पौधे के एक भाग में बनकर अन्य भागों तक पहुँचते हैं। प्रमुख पादप हॉर्मोन हैं — ऑक्सिन, जिबरेलिन, साइटोकाइनिन व ऐब्सिसिक अम्ल। इनमें से ऑक्सिन, जिबरेलिन व साइटोकाइनिन वृद्धि को बढ़ावा देते हैं, जबकि ऐब्सिसिक अम्ल वृद्धि का संदमन करता है।

प्रश्न 2. छुई-मुई पादप की पत्तियों की गति, प्रकाश की ओर प्ररोह की गति से किस प्रकार भिन्न है?

हल:

बात छुई-मुई की पत्तियों की गति प्रकाश की ओर प्ररोह की गति
प्रकार अनुकुंचन गति — दिशा पर निर्भर नहीं प्रकाशानुवर्तन — प्रकाश की दिशा पर निर्भर
उद्दीपन स्पर्श प्रकाश
वृद्धि से संबंध वृद्धि-रहित गति है वृद्धि-आधारित गति है
कारण पत्तियों के आधार की कोशिकाओं से जल की मात्रा में अचानक परिवर्तन प्ररोह के दो ओर असमान वृद्धि (ऑक्सिन के असमान वितरण से)
गति अत्यंत तीव्र — कुछ ही क्षणों में धीमी — घंटों-दिनों में दिखती है

प्रश्न 3. एक पादप हॉर्मोन का उदाहरण दीजिए जो वृद्धि को बढ़ाता है।

हल:

उत्तर: ऑक्सिन — यह प्ररोह के शीर्ष पर बनकर कोशिकाओं की लंबाई बढ़ाता है और पौधे की वृद्धि को बढ़ावा देता है। (जिबरेलिन व साइटोकाइनिन भी वृद्धि बढ़ाने वाले हॉर्मोन हैं।)

प्रश्न 4. किसी सहारे के चारों ओर एक प्रतान की वृद्धि में ऑक्सिन किस प्रकार सहायक है?

हल: प्रतान स्पर्श के प्रति अत्यंत संवेदी होते हैं। जब प्रतान किसी सहारे के संपर्क में आता है, तो संपर्क वाले भाग की अपेक्षा दूर वाला भाग ऑक्सिन के प्रभाव से तेज़ी से बढ़ता है। इस असमान वृद्धि के कारण प्रतान सहारे के चारों ओर कुंडलित (घुमावदार) होकर लिपट जाता है। इसी प्रकार प्रतान सहारा पकड़कर पौधे को ऊपर चढ़ने में मदद करता है।

उत्तर: ऑक्सिन प्रतान के सहारे से दूर वाले भाग की वृद्धि तेज़ करके उसे सहारे के चारों ओर लिपटने में सहायक होता है।

प्रश्न 5. जलानुवर्तन दर्शाने के लिए एक प्रयोग की अभिकल्पना कीजिए।

हल:

चरण 1: एक चौड़ा गमला या ट्रे लीजिए और उसमें रेत / मिट्टी भरिए। बीच में एक छोटा छिद्रयुक्त मिट्टी का घड़ा या जल से भरा बर्तन गाड़ दीजिए, ताकि जल केवल एक ओर की मिट्टी को नम करे; दूसरी ओर की मिट्टी सूखी रहने दीजिए।

चरण 2: नम व सूखी मिट्टी की सीमा के पास कुछ अंकुरित बीज (जैसे सेम या मटर) लगाइए, जिनकी मूलांकुर (नन्ही जड़) दोनों ओर बढ़ सके।

चरण 3: गमले को कुछ दिन सामान्य प्रकाश में रखिए और ऊपर से अलग से जल न डालिए, ताकि नमी का एकमात्र स्रोत वही गड़ा हुआ बर्तन रहे।

चरण 4: कुछ दिनों बाद पौधों को सावधानी से निकालकर जड़ों की दिशा देखिए — जड़ें सूखी मिट्टी की ओर न बढ़कर नम मिट्टी (जल) की ओर मुड़कर बढ़ी हुई मिलेंगी।

निष्कर्ष: जड़ें जल की ओर वृद्धि करती हैं — यही धनात्मक जलानुवर्तन है। इस प्रयोग से सिद्ध होता है कि पौधों में रासायनिक समन्वय द्वारा दिशात्मक वृद्धि होती है।

(ग) अनुच्छेद 7.3 पर आधारित प्रश्न (4 प्रश्न)

प्रश्न 1. जंतुओं में रासायनिक समन्वय कैसे होता है?

हल: जंतुओं में रासायनिक समन्वय अंतःस्रावी ग्रंथियों द्वारा स्रावित हॉर्मोनों से होता है। ये ग्रंथियाँ अपने हॉर्मोन सीधे रुधिर में छोड़ती हैं। रुधिर हॉर्मोनों को पूरे शरीर में ले जाता है, परंतु वे केवल अपने लक्ष्य अंगों पर ही क्रिया करते हैं, क्योंकि केवल उन्हीं की कोशिकाओं पर उन हॉर्मोनों को पहचानने की व्यवस्था होती है। इस प्रकार हॉर्मोन वृद्धि, उपापचय, रुधिर शर्करा, आपात अनुक्रिया आदि का धीमा परंतु दीर्घकालिक समन्वय करते हैं।

प्रश्न 2. आयोडीन युक्त नमक के उपयोग की सलाह क्यों दी जाती है?

हल: थायरॉयड ग्रंथि से बनने वाले थायरॉक्सिन हॉर्मोन के निर्माण के लिए आयोडीन अनिवार्य है। भोजन में आयोडीन की कमी हो जाए तो थायरॉक्सिन कम बनता है, शरीर का उपापचय प्रभावित होता है और थायरॉयड ग्रंथि फूलकर गलगंड (घेंघा) रोग हो जाता है। आयोडीन युक्त नमक खाने से शरीर को नियमित रूप से आवश्यक आयोडीन मिलती रहती है।

उत्तर: थायरॉक्सिन के निर्माण व गलगंड से बचाव के लिए आयोडीन युक्त नमक के उपयोग की सलाह दी जाती है।

प्रश्न 3. जब एड्रेनालिन रुधिर में स्रावित होता है तो हमारे शरीर में क्या अनुक्रिया होती है?

हल: एड्रेनालिन अधिवृक्क ग्रंथियों से स्रावित होकर लक्ष्य अंगों — विशेषकर हृदय — पर क्रिया करता है। इसके प्रभाव से (1) हृदय तेज़ी से धड़कता है, जिससे कंकाल पेशियों को अधिक ऑक्सीजन की आपूर्ति होती है; (2) पाचन तंत्र व त्वचा की ओर जाने वाला रुधिर कम हो जाता है, क्योंकि रुधिर कंकाल पेशियों की ओर मोड़ दिया जाता है; (3) डायाफ़्राम व पसलियों की पेशियों के संकुचन की दर बढ़ने से श्वसन दर बढ़ जाती है। ये सभी अनुक्रियाएँ मिलकर शरीर को आपात स्थिति से निपटने के लिए तैयार करती हैं।

प्रश्न 4. मधुमेह के कुछ रोगियों की चिकित्सा इंसुलिन का इंजेक्शन देकर क्यों की जाती है?

हल: इंसुलिन अग्न्याशय से स्रावित हॉर्मोन है, जो रुधिर में शर्करा के स्तर को नियंत्रित करता है। मधुमेह के रोगियों में इंसुलिन उचित मात्रा में नहीं बनता, जिससे रुधिर शर्करा का स्तर बढ़ा रहता है और अनेक हानिकारक प्रभाव पड़ते हैं। बाहर से इंसुलिन का इंजेक्शन देने पर शर्करा का स्तर नियंत्रित हो जाता है।

उत्तर: शरीर में इंसुलिन की कमी पूरी करके रुधिर शर्करा नियंत्रित करने के लिए मधुमेह के कुछ रोगियों को इंसुलिन के इंजेक्शन दिए जाते हैं।

इस भाग में हमने सीखा — InText के 14 प्रश्नों में न्यूरॉन-सिनैप्स, मस्तिष्क, पादप हॉर्मोन व मानव हॉर्मोन, चारों खंड बराबर महत्वपूर्ण हैं; किसी एक को भी हल्के में न लें।

📗 NCERT उदाहरण (Examples)

एक बात पहले ही साफ़ कर दें — इस अध्याय में NCERT ने गणित की तरह क्रमांकित “उदाहरण (Examples)” नहीं दिए हैं। किताब की सीख क्रियाकलापों (Activities) के माध्यम से दी गई है। नीचे उन्हीं क्रियाकलापों पर आधारित तीन सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण दिए जा रहे हैं — परीक्षा में इन्हीं पर आधारित प्रेक्षण-प्रश्न (observation questions) आते हैं।

उदाहरण 1 (क्रियाकलाप-आधारित). नाक बंद करके चीनी या भोजन चखने पर स्वाद में क्या अंतर महसूस होता है और क्यों?

हल: मुँह में चीनी रखने पर केवल मीठा स्वाद आता है। परंतु नाक बंद कर देने पर अनेक खाद्य पदार्थों का पूरा स्वाद नहीं आता, क्योंकि भोजन की पहचान केवल जीभ के स्वाद ग्राहियों से नहीं, बल्कि नाक के गंध ग्राहियों से मिले संकेतों के साथ मिलकर बनती है। नाक दबाकर खाने पर गंध-संकेत मस्तिष्क तक नहीं पहुँचते, इसलिए स्वाद अधूरा व फीका लगता है। निष्कर्ष — ग्राही मिलकर काम करते हैं और उनकी सूचना अग्र मस्तिष्क में जुड़कर पहचान बनती है।

उदाहरण 2 (क्रियाकलाप-आधारित). गमले में लगे पौधे को खिड़की के पास रखने पर कुछ दिनों में प्ररोह खिड़की की ओर क्यों मुड़ जाता है?

हल: खिड़की से प्रकाश केवल एक ओर से आता है। प्ररोह के शीर्ष पर बना ऑक्सिन प्रकाश वाली ओर से हटकर छाया वाली ओर अधिक जमा हो जाता है। छाया वाली ओर की कोशिकाएँ ऑक्सिन के कारण अधिक लंबी होती हैं, जबकि प्रकाश वाली ओर वृद्धि अपेक्षाकृत कम रहती है। इस असमान वृद्धि से प्ररोह प्रकाश की ओर मुड़ जाता है। यही प्रकाशानुवर्तन है — एक धीमी, वृद्धि-आधारित व दिशात्मक गति।

उदाहरण 3 (क्रियाकलाप-आधारित). छुई-मुई के पौधे को छूने पर पत्तियाँ तुरंत क्यों सिकुड़ जाती हैं, जबकि प्ररोह का मुड़ना घंटों में दिखता है?

हल: दोनों गतियों की क्रियाविधि ही अलग है। छुई-मुई में छूने की सूचना विद्युत-रासायनिक साधनों से कोशिकाओं तक जाती है और पत्तियों के आधार की कोशिकाओं से जल अचानक बाहर निकल जाता है — कोशिकाएँ सिकुड़ती हैं और पत्ती तुरंत झुक जाती है; इसमें वृद्धि शामिल नहीं है। इसके विपरीत प्ररोह के मुड़ने में कोशिकाओं को वास्तव में बढ़ना (लंबा होना) पड़ता है, जो एक धीमी प्रक्रिया है। इसलिए एक गति क्षणों में और दूसरी घंटों-दिनों में दिखती है।

निष्कर्ष: पौधों की तत्काल गतियाँ जल-मात्रा के परिवर्तन से और अनुवर्ती गतियाँ असमान वृद्धि से होती हैं — दोनों में समन्वय का माध्यम रासायनिक संकेत ही है।

✏️ प्रश्नावली (Exercise) – सभी 12 प्रश्नों के हल

प्रश्न 1. निम्नलिखित में से कौन-सा पादप हॉर्मोन है? (a) इंसुलिन (b) थायरॉक्सिन (c) एस्ट्रोजन (d) साइटोकाइनिन

हल: इंसुलिन अग्न्याशय का, थायरॉक्सिन थायरॉयड का और एस्ट्रोजन अंडाशय का — ये तीनों जंतु हॉर्मोन हैं। साइटोकाइनिन पौधों में कोशिका विभाजन को बढ़ावा देने वाला पादप हॉर्मोन है।

उत्तर: (d) साइटोकाइनिन

प्रश्न 2. दो तंत्रिका कोशिका के मध्य खाली स्थान को कहते हैं – (a) द्रुमिका (b) सिनैप्स (c) एक्सॉन (d) आवेग

हल: द्रुमिका व एक्सॉन न्यूरॉन के भाग हैं और आवेग उसमें चलने वाला संकेत है। दो न्यूरॉनों के बीच के सूक्ष्म रिक्त स्थान का विशेष नाम है — सिनैप्स, जहाँ रसायनों द्वारा संकेत आगे बढ़ता है।

उत्तर: (b) सिनैप्स

प्रश्न 3. मस्तिष्क उत्तरदायी है – (a) सोचने के लिए (b) हृदय स्पंदन के लिए (c) शरीर का संतुलन बनाने के लिए (d) उपरोक्त सभी

हल: सोचना अग्र मस्तिष्क (प्रमस्तिष्क) का, हृदय-स्पंदन का नियंत्रण मेडुला का और शरीर का संतुलन अनुमस्तिष्क का कार्य है — ये तीनों मस्तिष्क के ही भाग हैं। अतः तीनों कथन सही हैं।

उत्तर: (d) उपरोक्त सभी

प्रश्न 4. हमारे शरीर में ग्राही का क्या कार्य है? ऐसी स्थितियों पर विचार कीजिए जहाँ ग्राही उचित प्रकार से कार्य नहीं कर रहे हों। क्या समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं?

हल:

चरण 1 — ग्राही का कार्य: ग्राही हमारी ज्ञानेन्द्रियों में स्थित विशेष कोशिकाएँ हैं, जो वातावरण से सूचनाएँ — प्रकाश, ध्वनि, गंध, स्वाद, स्पर्श, ताप, पीड़ा आदि — संग्रहित करती हैं और उन्हें तंत्रिका आवेगों में बदलकर केंद्रीय तंत्रिका तंत्र तक भेजती हैं। इन्हीं सूचनाओं के आधार पर शरीर उचित अनुक्रिया करता है।

चरण 2 — ग्राही खराब होने पर समस्याएँ: यदि ग्राही उचित प्रकार से कार्य न करें, तो वातावरण की सूचना मस्तिष्क तक पहुँचेगी ही नहीं। व्यक्ति गरम वस्तु छूकर भी जलने से नहीं बच पाएगा, क्योंकि पीड़ा-ताप के संकेत ही नहीं मिलेंगे; स्वाद-गंध की पहचान नहीं होगी; ध्वनि सुनाई नहीं देगी या प्रकाश दिखेगा नहीं। परिणामस्वरूप शरीर बदलते वातावरण के प्रति समय पर अनुक्रिया नहीं कर पाएगा और दुर्घटनाओं व गंभीर क्षति की संभावना बहुत बढ़ जाएगी।

उत्तर: ग्राही वातावरण की सूचना ग्रहण करने के द्वार हैं; उनके बिगड़ने पर सूचना-तंत्र टूट जाता है और शरीर खतरे से बच नहीं पाता।

प्रश्न 5. एक तंत्रिका कोशिका (न्यूरॉन) की संरचना बनाइए तथा इसके कार्यों का वर्णन कीजिए।

हल: (चित्र बनाते समय भागों का क्रम यही रखें — द्रुमिका → कोशिकाकाय → तंत्रिकाक्ष → तंत्रिका अंतिम सिरा, और आवेग की दिशा में तीर बनाएँ।)

संरचना: (1) द्रुमिकाएँ — कोशिकाकाय से निकले शाखित छोटे तंतु, जहाँ से सूचना ग्रहण होती है। (2) कोशिकाकाय — केंद्रक युक्त मुख्य भाग, जहाँ से द्रुमिकाएँ व तंत्रिकाक्ष निकलते हैं। (3) तंत्रिकाक्ष (एक्सॉन) — एक लंबा तंतु, जिसके चारों ओर कई बार माइलिन आच्छद होता है; यह आवेग को दूर तक ले जाता है। (4) तंत्रिका अंतिम सिरा — एक्सॉन के अंत की घुंडियाँ, जहाँ से रसायन निकलकर संकेत अगले न्यूरॉन को दिया जाता है।

कार्य:

चरण 1: सूचना सबसे पहले द्रुमिका के सिरे द्वारा उपार्जित होती है और वहाँ रासायनिक क्रिया से विद्युत आवेग उत्पन्न होता है।

चरण 2: आवेग द्रुमिका से कोशिकाकाय तक जाता है और फिर तंत्रिकाक्ष में होता हुआ उसके अंतिम सिरे तक पहुँचता है।

चरण 3: अंतिम सिरे पर आवेग कुछ रसायनों का विमोचन करता है; ये रसायन सिनैप्स को पार करके अगले न्यूरॉन की द्रुमिका में वैसा ही आवेग प्रारंभ कर देते हैं।

उत्तर: इस प्रकार न्यूरॉन सूचना को ग्रहण करने, विद्युत आवेग के रूप में ले जाने व अगली कोशिका तक पहुँचाने का कार्य करता है — यही तंत्रिका तंत्र की मूल क्रियाविधि है।

प्रश्न 6. पादप में प्रकाशानुवर्तन किस प्रकार होता है?

हल:

चरण 1: जब प्रकाश पौधे पर एक ओर से पड़ता है, तो प्ररोह के शीर्ष पर बना ऑक्सिन प्रकाश की ओर से हटकर छाया वाली ओर अधिक एकत्र हो जाता है।

चरण 2: छाया वाली ओर ऑक्सिन की अधिकता से वहाँ की कोशिकाएँ अधिक तेज़ी से लंबी होती हैं, जबकि प्रकाश वाली ओर वृद्धि कम रहती है।

चरण 3: इस असमान वृद्धि के कारण प्ररोह प्रकाश की ओर मुड़ जाता है — यह धनात्मक प्रकाशानुवर्तन है। जड़ें इसके विपरीत प्रकाश से दूर मुड़ती हैं, अर्थात ऋणात्मक प्रकाशानुवर्ती होती हैं।

उत्तर: प्रकाशानुवर्तन ऑक्सिन के असमान वितरण से उत्पन्न असमान वृद्धि का परिणाम है।

प्रश्न 7. मेरुरज्जु आघात में किन संकेतों के आने में व्यवधान होगा?

हल: मेरुरज्जु में दो प्रकार के संकेत एक साथ चलते हैं — शरीर के विभिन्न भागों से मस्तिष्क की ओर जाने वाले संवेदी संकेत और प्रतिवर्ती क्रियाओं से जुड़े संकेत, क्योंकि प्रतिवर्ती चाप मेरुरज्जु में ही बनते हैं। मेरुरज्जु में आघात लगने पर ये दोनों ही प्रकार के संकेत बाधित होंगे — न सूचना मस्तिष्क तक ठीक से पहुँचेगी, न प्रतिवर्ती अनुक्रियाएँ समय पर होंगी। फलस्वरूप शरीर की सुरक्षा-व्यवस्था कमज़ोर पड़ जाएगी और अंगों की गति व संवेदना प्रभावित होगी।

उत्तर: मेरुरज्जु आघात में प्रतिवर्ती क्रियाओं के संकेत व मस्तिष्क को जाने-आने वाले संवेदी-प्रेरक संकेत, दोनों में व्यवधान होगा।

प्रश्न 8. पादप में रासायनिक समन्वय किस प्रकार होता है?

हल: पौधों में तंत्रिका तंत्र नहीं होता। उनमें समन्वय पादप हॉर्मोनों द्वारा होता है। ये हॉर्मोन पौधे के किसी एक भाग में बनकर अन्य भागों तक पहुँचते हैं और वहाँ की कोशिकाओं की वृद्धि, विभाजन व अनुक्रियाओं को नियंत्रित करते हैं। जैसे — ऑक्सिन प्रकाशानुवर्तन व वृद्धि में, जिबरेलिन तने की लंबाई में, साइटोकाइनिन कोशिका विभाजन में और ऐब्सिसिक अम्ल वृद्धि रोकने व पत्तियों के मुरझाने में भूमिका निभाता है। एक या अधिक हॉर्मोन मिलकर या एक-दूसरे के विपरीत कार्य करके पौधे की पूरी वृद्धि-प्रक्रिया का संतुलित समन्वय करते हैं।

प्रश्न 9. एक जीव में नियंत्रण एवं समन्वय के तंत्र की क्या आवश्यकता है?

हल: बहुकोशिकीय जीवों में अरबों कोशिकाएँ व अनेक अंग एक साथ काम करते हैं। नियंत्रण एवं समन्वय के तंत्र की आवश्यकता इसलिए है कि — (1) शरीर के सभी अंग तालमेल से काम करें और कोई क्रिया अधूरी या बिगड़ी हुई न रहे; (2) जीव वातावरण के बदलावों के प्रति उचित व समय पर अनुक्रिया कर सके, ताकि वह खतरे से बच सके व भोजन आदि प्राप्त कर सके; (3) शरीर की आंतरिक स्थितियाँ — जैसे रुधिर शर्करा, ताप — संतुलित बनी रहें; (4) वृद्धि व विकास सही क्रम व सही अनुपात में हो। इस तंत्र के बिना जीव का जीवित रहना ही कठिन हो जाएगा, क्योंकि हर अंग अपनी-अपनी दिशा में बिना तालमेल के काम करने लगेगा।

प्रश्न 10. अनैच्छिक क्रियाएँ तथा प्रतिवर्ती क्रियाएँ एक-दूसरे से किस प्रकार भिन्न हैं?

हल:

बात अनैच्छिक क्रियाएँ प्रतिवर्ती क्रियाएँ
अर्थ बिना इच्छा के लगातार होने वाली आंतरिक क्रियाएँ किसी उद्दीपन के उत्तर में तुरंत होने वाली अनुक्रियाएँ
उद्दीपन की आवश्यकता किसी बाहरी उद्दीपन की आवश्यकता नहीं — अपने-आप निरंतर चलती हैं किसी विशिष्ट उद्दीपन (गरमी, चुभन, तेज़ प्रकाश) पर ही होती हैं
नियंत्रण केंद्र मुख्यतः मध्य मस्तिष्क व मेडुला मुख्यतः मेरुरज्जु
उदाहरण हृदय-स्पंदन, श्वसन, रुधिर दाब, आँतों की गति गरम वस्तु से हाथ हटाना, पलक झपकना, खाँसी-छींक
उद्देश्य शरीर की जीवन-क्रियाएँ निरंतर चलाना शरीर को अचानक क्षति से तुरंत बचाना

प्रश्न 11. जंतुओं में नियंत्रण एवं समन्वय के लिए तंत्रिका तथा हॉर्मोन क्रियाविधि की तुलना तथा व्यतिरेक (contrast) कीजिए।

हल:

बात तंत्रिका क्रियाविधि हॉर्मोन क्रियाविधि
संदेश का रूप विद्युत आवेग (+ सिनैप्स पर रसायन) रासायनिक पदार्थ (हॉर्मोन)
संदेश का मार्ग न्यूरॉनों का निश्चित जाल — केवल जुड़े हुए अंगों तक रुधिर प्रवाह — पूरे शरीर में, परंतु क्रिया केवल लक्ष्य अंग पर
गति अत्यंत तीव्र — क्षणों में पहुँचता है धीमी — पहुँचने में समय लगता है
प्रभाव की अवधि अल्पकालिक — थोड़ी देर का प्रभाव दीर्घकालिक — लंबे समय तक प्रभाव, कभी-कभी स्थायी परिवर्तन
प्रभाव का क्षेत्र सीमित व निश्चित भाग व्यापक — कई अंग एक साथ प्रभावित हो सकते हैं
उदाहरण प्रतिवर्ती क्रिया, ऐच्छिक गति वृद्धि, उपापचय, रुधिर शर्करा का नियंत्रण

समानता: दोनों ही क्रियाविधियाँ शरीर के विभिन्न अंगों के नियंत्रण व समन्वय का कार्य करती हैं और कई स्थानों पर एक-दूसरे के पूरक के रूप में साथ-साथ काम करती हैं।

प्रश्न 12. छुई-मुई पादप में गति तथा हमारी टाँग में होने वाली गति के तरीके में क्या अंतर है?

हल:

बात छुई-मुई पादप में गति हमारी टाँग में गति
गति का कारण पत्तियों के आधार की कोशिकाओं में जल की मात्रा का अचानक परिवर्तन पेशी कोशिकाओं का संकुचन — विशेष प्रोटीनों की आकृति व व्यवस्था बदलने से
नियंत्रण व्यवस्था कोई तंत्रिका तंत्र नहीं — विद्युत-रासायनिक संकेत कोशिका-से-कोशिका जाते हैं तंत्रिका तंत्र द्वारा नियंत्रित — मस्तिष्क / मेरुरज्जु से आवेग आते हैं
प्रकृति अनैच्छिक व दिशा-रहित (अनुकुंचन) गति मुख्यतः ऐच्छिक गति — इच्छा अनुसार चलना, दौड़ना, रुकना
विशेष ऊतक गति के लिए कोई विशेष पेशी ऊतक नहीं होता गति के लिए विशेष पेशी ऊतक होते हैं
सूचना मिलने का ढंग कोशिकाएँ स्वयं जल-परिवर्तन से आकृति बदलती हैं पेशियाँ तंत्रिका आवेग मिलने पर सिकुड़ती हैं

इस प्रश्नावली में हमने सीखा — 12 प्रश्नों में न्यूरॉन का चित्र, प्रतिवर्ती बनाम अनैच्छिक का अंतर और तंत्रिका बनाम हॉर्मोन की तुलना — ये तीन प्रश्न सबसे अधिक भार रखते हैं; इन्हें table बनाकर ही याद करें।

📖 Case Study – डॉक्टर की सलाह और कुत्ते से भागने की कहानी

रमेश के पिताजी को जाँच में रुधिर शर्करा बहुत अधिक मिली। डॉक्टर ने बताया कि उनके शरीर में इंसुलिन पर्याप्त मात्रा में नहीं बन रहा है, इसलिए उन्हें दवा के साथ-साथ भोजन का ध्यान रखना होगा और कुछ रोगियों को इंसुलिन का इंजेक्शन भी लेना पड़ता है। उसी शाम रमेश की छोटी बहन गली में खेल रही थी कि अचानक एक कुत्ता भौंकता हुआ उसकी ओर दौड़ा। वह घबराकर तेज़ी से भागी — उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था, साँस तेज़ चल रही थी और मुँह सूख गया था। घर आकर माँ ने कहा — “यह आपात स्थिति में बनने वाले हॉर्मोन का असर है।” रमेश को विद्यालय की वह बात भी याद आई कि मोहल्ले की एक आंटी की गर्दन में सूजन (गलगंड) आयोडीन की कमी से हुई थी और डॉक्टर ने उन्हें आयोडीन युक्त नमक खाने की सलाह दी थी। इस गद्यांश के आधार पर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए:

Q1. रमेश के पिताजी की रुधिर शर्करा अधिक होने का मुख्य कारण क्या है? —

(A) थायरॉक्सिन का अधिक बनना
(B) इंसुलिन का पर्याप्त मात्रा में न बनना
(C) एड्रेनालिन का कम बनना
(D) वृद्धि हॉर्मोन का अधिक बनना

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (B) इंसुलिन का पर्याप्त मात्रा में न बनना — इंसुलिन ही रुधिर शर्करा को नियंत्रित करता है; उसकी कमी से मधुमेह होता है।

Q2. बहन के दिल के तेज़ धड़कने व साँस तेज़ होने के लिए उत्तरदायी एड्रेनालिन हॉर्मोन किस ग्रंथि से स्रावित होता है? —

(A) पीयूष ग्रंथि
(B) थायरॉयड ग्रंथि
(C) अधिवृक्क ग्रंथि
(D) अग्न्याशय

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (C) अधिवृक्क ग्रंथि — वृक्कों के ऊपर स्थित इस ग्रंथि से स्रावित एड्रेनालिन ही आपात स्थिति में हृदय-गति व श्वसन दर बढ़ाता है।

Q3. गलगंड (घेंघा) से बचाव के लिए डॉक्टर की सलाह का आधार क्या है? —

(A) आयोडीन युक्त नमक से थायरॉक्सिन बनने के लिए आवश्यक आयोडीन मिलती है
(B) नमक से इंसुलिन अधिक बनता है
(C) आयोडीन से वृद्धि हॉर्मोन बनता है
(D) नमक रुधिर शर्करा घटाता है

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (A) आयोडीन युक्त नमक से थायरॉक्सिन बनने के लिए आवश्यक आयोडीन मिलती है — आयोडीन की कमी से ही थायरॉयड ग्रंथि फूलकर गलगंड होता है।

Q4. निम्न में से कौन-सी घटना पुनर्भरण (Feedback) क्रियाविधि का सही उदाहरण है? —

(A) गरम तवा छूते ही हाथ खींच लेना
(B) प्ररोह का प्रकाश की ओर मुड़ना
(C) छुई-मुई की पत्तियों का सिकुड़ना
(D) रुधिर शर्करा सामान्य होते ही इंसुलिन का स्राव कम हो जाना

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (D) रुधिर शर्करा सामान्य होते ही इंसुलिन का स्राव कम हो जाना — यही ऋणात्मक पुनर्भरण है; बाकी तीनों तंत्रिका / पादप गतियों के उदाहरण हैं।

⭐ Quick Revision – Important Points

  • ✅ तंत्रिका तंत्र की इकाई न्यूरॉन है; सूचना का क्रम — द्रुमिका → कोशिकाकाय → तंत्रिकाक्ष (एक्सॉन) → तंत्रिका अंतिम सिरा।
  • ✅ न्यूरॉन के अंदर आवेग विद्युत रूप में और दो न्यूरॉनों के बीच सिनैप्स पर रासायनिक रूप में चलता है।
  • ✅ प्रतिवर्ती चाप: ग्राही → संवेदी न्यूरॉन → मेरुरज्जु → प्रेरक न्यूरॉन → पेशी; प्रतिवर्ती क्रिया बिना सोचे, तुरंत होती है।
  • ✅ प्रमस्तिष्क — सोचना, बुद्धि, स्मृति व ऐच्छिक क्रियाएँ; अनुमस्तिष्क — स्थिति व संतुलन; मेडुला — रुधिर दाब, लार, उल्टी, हृदय-स्पंदन व श्वसन जैसी अनैच्छिक क्रियाएँ।
  • ✅ गंध की पहचान नाक के घ्राण ग्राहियों से सूचना जाकर अग्र मस्तिष्क में होती है; भूख का केंद्र भी अग्र मस्तिष्क में है।
  • ✅ पीयूष ग्रंथि का वृद्धि हॉर्मोन — कमी से बौनापन, अधिकता से दीर्घकायता; पीयूष को मास्टर ग्रंथि कहते हैं।
  • ✅ थायरॉक्सिन (थायरॉयड) उपापचय नियंत्रित करता है; बनने के लिए आयोडीन चाहिए — कमी से गलगंड।
  • ✅ इंसुलिन (अग्न्याशय) रुधिर शर्करा नियंत्रित करता है — कमी से मधुमेह; एड्रेनालिन (अधिवृक्क) आपातकालीन हॉर्मोन है।
  • ✅ टेस्टोस्टेरोन (वृषण) व एस्ट्रोजन (अंडाशय) यौवनारंभ के परिवर्तन लाते हैं।
  • ✅ पादप हॉर्मोन — ऑक्सिन, जिबरेलिन व साइटोकाइनिन वृद्धि बढ़ाते हैं; ऐब्सिसिक अम्ल वृद्धि रोकता है व पत्तियों के मुरझाने से जुड़ा है; साइटोकाइनिन कोशिका विभाजन बढ़ाता है।
  • ✅ अनुवर्तन — प्रकाशानुवर्तन (प्ररोह धनात्मक, जड़ ऋणात्मक), गुरुत्वानुवर्तन (जड़ धनात्मक), जलानुवर्तन (जड़ जल की ओर), रसायनानुवर्तन (पराग नलिका बीजांड की ओर), स्पर्शानुवर्तन (प्रतान का लिपटना)।
  • ✅ छुई-मुई की गति तत्काल, दिशा-रहित व वृद्धि-रहित है — कोशिकाओं से जल निकलने के कारण होती है।

⚠️ Aam Galtiyan (Common Mistakes)

  • गंध का केंद्र गलत लिखना: अगरबत्ती की गंध की पहचान अग्र मस्तिष्क के घ्राण क्षेत्र से होती है — कुछ गाइडों में छपी “पश्च मस्तिष्क” वाली बात गलत है, उसे न दोहराएँ।
  • अनुमस्तिष्क व मेडुला के काम आपस में बदलना: संतुलन व स्थिति अनुमस्तिष्क का काम है; रुधिर दाब, लार व उल्टी मेडुला के काम हैं — यह जोड़ी MCQ में सबसे अधिक उलझाती है।
  • प्रतिवर्ती क्रिया का केंद्र मस्तिष्क लिखना: सामान्य प्रतिवर्ती क्रियाओं का चाप मेरुरज्जु में बनता है; मस्तिष्क को सूचना बाद में मिलती है, वह निर्णय नहीं लेता।
  • सिनैप्स को “जोड़” समझना: दो न्यूरॉन जुड़े नहीं होते — बीच में रिक्त स्थान होता है, जिसे रसायन पार करते हैं। “दो न्यूरॉनों के बीच का खाली स्थान” पूछा जाए तो उत्तर सिनैप्स ही है।
  • द्रुमिका व एक्सॉन की दिशा उलटना: सूचना द्रुमिका से ग्रहण होती है और एक्सॉन द्वारा आगे जाती है — चित्र में तीर उल्टा बनाना सबसे आम चित्र-गलती है।
  • हॉर्मोन व ग्रंथि की जोड़ी बिगाड़ना: इंसुलिन–अग्न्याशय, थायरॉक्सिन–थायरॉयड, एड्रेनालिन–अधिवृक्क, वृद्धि हॉर्मोन–पीयूष — ये चार जोड़ियाँ अलग पर्ची पर लिखकर रट लें।
  • ऐब्सिसिक अम्ल को वृद्धि-वर्धक लिखना: यह एकमात्र प्रमुख पादप हॉर्मोन है जो वृद्धि रोकता है; ऑक्सिन, जिबरेलिन व साइटोकाइनिन वृद्धि बढ़ाते हैं।
  • छुई-मुई की गति को अनुवर्तन लिखना: छुई-मुई की गति दिशा-रहित व वृद्धि-रहित है, इसलिए वह अनुवर्ती गति नहीं है — यह अंतर प्रश्न में प्रायः जाल बिछाकर पूछा जाता है।

🎯 Bihar Board Exam Tips

  • न्यूरॉन व प्रतिवर्ती चाप के चित्र अभ्यास करें: दोनों चित्रों में नामांकन (label) साफ़ व क्रम से लिखें — द्रुमिका, कोशिकाकाय, केंद्रक, तंत्रिकाक्ष, माइलिन आच्छद, तंत्रिका अंतिम सिरा; चाप में ग्राही से पेशी तक पाँचों चरण। चित्र-प्रश्न में नामांकन पर ही सबसे अधिक अंक मिलते हैं।
  • हॉर्मोन-ग्रंथि-रोग की table रट लें: वृद्धि हॉर्मोन–बौनापन/दीर्घकायता, थायरॉक्सिन–गलगंड, इंसुलिन–मधुमेह, एड्रेनालिन–आपात स्थिति — वस्तुनिष्ठ खंड में हर साल इन्हीं जोड़ियों से 2–3 प्रश्न बनते हैं।
  • अंतर वाले प्रश्न table बनाकर लिखें: प्रतिवर्ती बनाम टहलना, अनैच्छिक बनाम प्रतिवर्ती, तंत्रिका बनाम हॉर्मोन, छुई-मुई बनाम टाँग की गति — BSEB में अंतर-प्रश्न बहुत प्रिय हैं; table रूप में उत्तर लिखने से पूरे अंक मिलते हैं।
  • मस्तिष्क के भागों के कार्य एक-एक लाइन में तैयार रखें: प्रमस्तिष्क–सोचना, अनुमस्तिष्क–संतुलन, मेडुला–अनैच्छिक क्रियाएँ — यह त्रिक लगभग हर वर्ष किसी-न-किसी रूप में आता है।
  • पादप हॉर्मोन व अनुवर्तन के उदाहरण साथ लिखें: केवल परिभाषा न लिखें — ऑक्सिन के साथ प्रतान, साइटोकाइनिन के साथ कोशिका विभाजन, रसायनानुवर्तन के साथ पराग नलिका का उदाहरण देने से उत्तर पूर्ण माना जाता है।
  • पिछले वर्षों के BSEB प्रश्न-पत्रों से इस अध्याय के प्रश्न हल करके जाएँ — InText व प्रश्नावली के प्रश्न अक्सर दोहराए जाते हैं।

📝 MCQ Quiz – 15 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

नीचे 15 MCQ दिए गए हैं — पहले स्वयं उत्तर सोचिए, फिर “उत्तर देखें” खोलकर मिलान कीजिए।

Q1. तंत्रिका तंत्र की संरचनात्मक व क्रियात्मक इकाई कौन-सी है? —

(A) मस्तिष्क
(B) न्यूरॉन
(C) मेरुरज्जु
(D) ग्राही

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (B) न्यूरॉन — वही तंत्रिका तंत्र की इकाई है; मस्तिष्क व मेरुरज्जु उसके बने अंग हैं।

Q2. सूचना को ग्रहण करने वाला न्यूरॉन का भाग है —

(A) द्रुमिका
(B) एक्सॉन
(C) माइलिन आच्छद
(D) तंत्रिका अंतिम सिरा

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (A) द्रुमिका — वह सूचना ग्रहण करती है और कोशिकाकाय की ओर भेजती है।

Q3. दो न्यूरॉनों के बीच का खाली स्थान कहलाता है —

(A) द्रुमिका
(B) एक्सॉन
(C) सिनैप्स
(D) मेरुरज्जु

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (C) सिनैप्स — यहाँ आवेग रासायनिक रूप में पार होता है।

Q4. प्रतिवर्ती चाप में आवेग का सही क्रम है —

(A) ग्राही → प्रेरक न्यूरॉन → मेरुरज्जु → संवेदी न्यूरॉन → पेशी
(B) ग्राही → संवेदी न्यूरॉन → मेरुरज्जु → प्रेरक न्यूरॉन → पेशी
(C) ग्राही → मस्तिष्क → मेरुरज्जु → पेशी
(D) पेशी → ग्राही → मेरुरज्जु → संवेदी न्यूरॉन

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (B) यही प्रतिवर्ती चाप का क्रम है — केंद्र मेरुरज्जु है।

Q5. शरीर की स्थिति व संतुलन बनाए रखने वाला मस्तिष्क-भाग है —

(A) प्रमस्तिष्क
(B) मेडुला
(C) अनुमस्तिष्क
(D) पॉन्ज़

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (C) अनुमस्तिष्क — ऐच्छिक क्रियाओं की शुद्धता व संतुलन उसी का काम है।

Q6. रुधिर दाब, हृदय-स्पंदन व लार स्राव का नियंत्रण किससे होता है? —

(A) प्रमस्तिष्क
(B) अनुमस्तिष्क
(C) मध्य मस्तिष्क
(D) मेडुला

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (D) मेडुला — अनैच्छिक क्रियाओं का नियंत्रण केंद्र।

Q7. वृद्धि हॉर्मोन का स्राव किस ग्रंथि से होता है? —

(A) पीयूष ग्रंथि
(B) थायरॉयड ग्रंथि
(C) अधिवृक्क ग्रंथि
(D) अग्न्याशय

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (A) पीयूष ग्रंथि — “मास्टर ग्रंथि” कहलाती है।

Q8. थायरॉक्सिन हॉर्मोन के निर्माण के लिए आवश्यक तत्व है —

(A) कैल्शियम
(B) आयरन
(C) आयोडीन
(D) सोडियम

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (C) आयोडीन — इसकी कमी से थायरॉक्सिन कम बनता है और गलगंड होता है।

Q9. रुधिर शर्करा को नियंत्रित करने वाला हॉर्मोन है —

(A) थायरॉक्सिन
(B) इंसुलिन
(C) एड्रेनालिन
(D) एस्ट्रोजन

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (B) इंसुलिन — अग्न्याशय से स्रावित; कमी से मधुमेह होता है।

Q10. आपातकालीन स्थिति में शरीर को तैयार करने वाला हॉर्मोन है —

(A) इंसुलिन
(B) थायरॉक्सिन
(C) वृद्धि हॉर्मोन
(D) एड्रेनालिन

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (D) एड्रेनालिन — अधिवृक्क ग्रंथि से स्रावित “लड़ो या भागो” हॉर्मोन।

Q11. कोशिका विभाजन को बढ़ावा देने वाला पादप हॉर्मोन है —

(A) ऑक्सिन
(B) जिबरेलिन
(C) साइटोकाइनिन
(D) ऐब्सिसिक अम्ल

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (C) साइटोकाइनिन — कोशिका विभाजन को बढ़ावा देता है।

Q12. वृद्धि को रोकने वाला पादप हॉर्मोन है —

(A) ऐब्सिसिक अम्ल
(B) ऑक्सिन
(C) जिबरेलिन
(D) साइटोकाइनिन

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (A) ऐब्सिसिक अम्ल — वृद्धि का संदमन करता है।

Q13. प्ररोह का प्रकाश की ओर मुड़ना कहलाता है —

(A) गुरुत्वानुवर्तन
(B) प्रकाशानुवर्तन
(C) रसायनानुवर्तन
(D) जलानुवर्तन

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (B) प्रकाशानुवर्तन — प्ररोह धनात्मक प्रकाशानुवर्ती होता है।

Q14. पराग नलिका का बीजांड की ओर बढ़ना किस अनुवर्तन का उदाहरण है? —

(A) प्रकाशानुवर्तन
(B) गुरुत्वानुवर्तन
(C) जलानुवर्तन
(D) रसायनानुवर्तन

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (D) रसायनानुवर्तन — रसायन की ओर वृद्धि।

Q15. छुई-मुई की पत्तियों की गति किस प्रकार की है? —

(A) प्रकाशानुवर्तन
(B) गुरुत्वानुवर्तन
(C) अनुकुंचन (दिशा-रहित, वृद्धि-रहित) गति
(D) जलानुवर्तन

✅ उत्तर देखें

उत्तर: (C) अनुकुंचन गति — कोशिकाओं से जल निकलने के कारण, दिशा व वृद्धि से स्वतंत्र।

Answer Key – उत्तरमाला

प्रश्न 1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12 13 14 15
उत्तर B A C B C D A C B D C A B D C

❓ FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1. शरीर में तंत्रिका तंत्र व हॉर्मोन तंत्र — दोनों की आवश्यकता क्यों है?

उत्तर: तंत्रिका तंत्र विद्युत आवेग से तुरंत व अल्पकालिक संदेश पहुँचाता है, परंतु वह हर कोशिका तक नहीं पहुँच सकता। हॉर्मोन रुधिर द्वारा धीरे परंतु दूर-दूर तक व लंबे समय तक प्रभाव डालते हैं — जैसे वृद्धि व उपापचय का नियंत्रण। दोनों मिलकर ही शरीर का पूरा नियंत्रण व समन्वय संभव बनाते हैं।

प्रश्न 2. पीयूष ग्रंथि को “मास्टर ग्रंथि” क्यों कहते हैं?

उत्तर: क्योंकि पीयूष ग्रंथि से स्रावित हॉर्मोन अन्य अंतःस्रावी ग्रंथियों — थायरॉयड, अधिवृक्क व जनन ग्रंथियों — के स्राव को नियंत्रित करते हैं। साथ ही इसका वृद्धि हॉर्मोन शरीर की वृद्धि का सीधा नियंत्रण करता है।

प्रश्न 3. पौधों में बिना तंत्रिका तंत्र के अनुक्रिया कैसे होती है?

उत्तर: पौधों में अनुक्रिया दो तरह से होती है — छुई-मुई जैसी तत्काल गति कोशिकाओं में जल-परिवर्तन व विद्युत-रासायनिक संकेतों से होती है, और प्ररोह-जड़ के मुड़ने जैसी धीमी गति पादप हॉर्मोनों (ऑक्सिन आदि) के असमान वितरण से होती है।

प्रश्न 4. क्या केवल InText व प्रश्नावली के प्रश्न पढ़ना पर्याप्त है?

उत्तर: परीक्षा की दृष्टि से हाँ — BSEB में इस अध्याय के अधिकांश प्रश्न इन्हीं से या इन्हीं की अवधारणाओं पर बनते हैं। परंतु चित्र-नामांकन (न्यूरॉन, प्रतिवर्ती चाप) व हॉर्मोन-ग्रंथि-रोग की table भी साथ में तैयार रखें, क्योंकि वस्तुनिष्ठ खंड में वे भी पूछे जाते हैं।

प्रश्न 5. इस अध्याय का NCERT PDF कहाँ मिलेगा?

उत्तर: NCERT की आधिकारिक वेबसाइट ncert.nic.in पर Class 10 Science की पुस्तक का अध्याय 7 निःशुल्क PDF में उपलब्ध है।

🔗 Pichhla / Agla Adhyay

⬅️ पिछला अध्याय: NCERT Class 10 Science Chapter 6 — जैव प्रक्रम (Life Processes)

➡️ अगला अध्याय: NCERT Class 10 Science Chapter 8 — जीव जनन कैसे करते हैं (How do Organisms Reproduce?)

📚 सभी अध्याय: NCERT Class 10 Science — Bihar Board (सभी अध्याय)

🔚 Conclusion – निष्कर्ष

इस अध्याय में हमने सीखा कि जीवों का शरीर दो व्यवस्थाओं से चलता है — तंत्रिका तंत्र, जो विद्युत आवेगों से तुरंत संदेश पहुँचाता है, और हॉर्मोन तंत्र, जो रासायनिक संदेशों से धीरे परंतु दूरगामी नियंत्रण करता है। न्यूरॉन की संरचना, प्रतिवर्ती चाप, मस्तिष्क के भाग, अंतःस्रावी ग्रंथियाँ व पादप हॉर्मोन — ये सभी अवधारणाएँ परीक्षा के साथ-साथ अपने शरीर को समझने के लिए भी आवश्यक हैं।

अगले अध्याय में हम जीव जनन कैसे करते हैं (How do Organisms Reproduce?) पढ़ेंगे — जहाँ अलैंगिक व लैंगिक जनन, DNA की भूमिका व मानव जनन तंत्र की विस्तृत चर्चा होगी। NCERT की आधिकारिक पुस्तक ncert.nic.in से भी अवश्य पढ़ें।